मालदीव का चीन के क़रीब जाना क्या भारत के ख़िलाफ़ है?

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत के साथ बढ़ी तनातनी के बीच मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने चीन का दौरा पूरा कर लिया है.

इस दौरे में चीन और मालदीव के बीच 20 समझौते हुए हैं. मुइज़्ज़ू ने वो परंपरा भी तोड़ी है, जिसके तहत मालदीव का नया राष्ट्रपति पहला विदेशी दौरा भारत का करता था.

मुइज़्जू ने पहला दौरा तुर्की का किया था. उसके बाद यूएई गए थे और अब चीन का दौरा पूरा किया.

इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में मुइज़्ज़ू इंडिया आउट कैंपेन ज़ोर शोर से चला रहे थे.

चीन से लौटने के बाद उन्होंने ये भी ऐलान कर दिया कि मालदीव में तैनात 88 भारतीय सैनिकों को 15 मार्च तक लौट जाना होगा.

मुइज़्ज़ू का मानना है कि मालदीव की धरती पर विदेशी सैनिकों का होना, मुल्क की संप्रभुता के ख़िलाफ़ है.

मालदीव और चीन के बीच समझौते

चीन और मालदीव के बीच हुए समझौतों में पर्यटन सेक्टर, प्राकृतिक आपदाओं के ख़तरों से निपटने, समुद्री अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और डिज़िटल अर्थव्यवस्था में सहयोग को लेकर बनी सहमति बनी है.

समझौते में शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी परियोजना 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' में सहयोग का फॉर्मूला तय करना भी शामिल है.

मालदीव में हाउसिंग प्रोजेक्ट, फिशरीज प्रोडक्ट्स की प्रोसेसिंग फैक्ट्री और राजधानी माले की पुनर्विकास परियोजना में भी चीन सहयोग करेगा.

मालदीव चीन से पर्यटन और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में सबसे ज़्यादा सहयोग चाहता है. मालदीव की अर्थव्यवस्था में एक तिहाई योगदान टूरिजम सेक्टर का है.

कुछ मीडिया रिपोर्टों में तो कहा गया है कि मालदीव चीन से मुक्त व्यापार समझौता चाहता है लेकिन इससे चीनी क़र्ज़ में फँसने का ख़तरा है.

कुछ मीडिया रिपोर्टों में ये भी कहा गया है चीन मालदीव को 13 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद देगा. हालांकि समझौते के ऐलान में इसका ज़िक्र नहीं है.

मुइज़्ज़ू मालदीव को चीन के क़रीब ले जाकर क्या हासिल करना चाहते हैं?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी हिंदी ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के सेंटर फॉर ईस्ट एशियन स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी से बात की.

चीन की रणनीति

येलेरी बताते हैं कि चूंकि मालदीव में पर्यटन सबसे बड़ा उद्योग है, इसलिए चीनी रिजॉर्ट कंपनियां वहाँ काफ़ी पहले से सक्रिय रही हैं.

कोविड के दौरान जब ज़्यादातर देशों ने मालदीव के पर्यटन उद्योग में अपना काम बंद कर दिया था तब भी चीनी कंपनियां यहाँ पैसा लगा रही थीं.

लेकिन चीनी कंपनियों का ये पैसा बाज़ार से इकट्ठा नहीं किया गया था. ये पैसा चीन के सरकारी बैंकों का था. यानी ये सीधे तौर पर चीन की सरकार का पैसा था.

येलेरी कहते हैं, ''मुइज़्ज़ू के आने के बाद इस पैसे पर मुहर लग गई है. यानी ऐसा पैसा जो अब तक अनौपचारिक तरीक़े से आ रहा था अब औपचारिक हो जाएगा. इसका मतलब ये हुआ कि अगर चीनी निवेश के संबंध में भविष्य में कोई विवाद होता है तो मामला चीन की अदालत में जाएगा और मालदीव सरकार हर्जाना भरने के लिए बाध्य होगी.''

''इस समझौते से चीन ने मालदीव सरकार को अपनी शर्तों से बांध दिया है. भविष्य में मालदीव में कोई दूसरी सरकार भी आए तो भी उस ये समझौता बाध्यकारी होगा.''

मुइज़्ज़ू की रणनीति क्या है?

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या मालदीव इतना कच्चा खिलाड़ी है कि वो चीन की रणनीति को न समझ सके.

ख़ास कर तब श्रीलंका समेत कई दूसरे देश चीन पर क़र्ज़ के साथ अपनी शर्तें लादने के आरोप लगाते रहे हैं.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के नेल्सन मंडेला सेंटर फ़ॉर पीस एंड कॉन्फ़्लिक्ट रिज़ोल्यूशन में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि दो बड़ी ताक़तों के बीच के छोटे देश 'स्विंग स्टेट' की तरह व्यवहार करते हैं.

जहाँ से उनका ज़्यादा हित सधता है, उसकी ओर वो ज़्यादा झुकाव रखते हैं और दूसरी ओर के देश से सौदेबाजी वाले संबंध बनाए रखते हैं.

वह कहते हैं,'' मुइज़्ज़ू की पार्टी चीन समर्थक रही है और ये उसकी घरेलू राजनीति का भी हिस्सा रहा है. इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में कई बार घरेलू राजनीति का असर दिखता है. मुइज़्ज़ू सरकार ने अपने इसी पुराने रुख़ को बरकरार रखते हुए चीन की ओर ज़्यादा झुकाव दिखाया है.''

वो आगे कहते हैं, ''दूसरा अहम पहलू ये है कि मालदीव पर चीन का क़र्ज़ इतना ज़्यादा है कि मुइज़्ज़ू सरकार के लिए इसे चुकाना संभव नहीं लगता. इस लिहाज से देखें तो चीन की तरफ़ दिखाया जा रहा रुझान मालदीव के व्यावहारिक फ़ैसले की झलक दे रहा है.''

चीन की आर्थिक ताक़त और मालदीव का झुकाव

चीन की विदेश नीति में लेनदेन की भूमिका प्रभावी है. कहा जाता है कि इसका विचारधारा से ज़्यादा लेनादेना नहीं है. घरेलू राजनीति विदेश नीति में दिखाई नहीं पड़ता.

चीन कैश रिच इकोनॉमी है. आज की तारीख़ में चीन यूरोप, अमेरिका, ईरान, रूस समेत दुनिया के तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है. भारत का भी ये बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.

चीन की अर्थव्यवस्था 18 ट्रिलियन डॉलर की है जबकि भारत अभी पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्ययवस्था बनने की कोशिश कर रहा है.

मालदीव की अर्थव्यवस्था का सबसे नाज़ुक पहलू है इसकी अर्थव्यवस्था का पर्यटन पर बहुत ज़्यादा निर्भरता. ऐसे में उसे अपनी अर्थव्यवस्था को डाइवर्सिफिाई करने की जरूरत है.

प्रेमानंद मिश्रा मालदीव की इसी ज़रूरत का ज़िक्र करते हुए कहते हैं,''अपनी अर्थव्यवस्था की किसी एक उद्योग या सेक्टर पर निर्भरता ख़त्म करने के लिए किसी भी देश को इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करना होता है. मालदीव के पास इसके लिए ज़रूरी फंड नहीं हैं. चीन अपनी आर्थिक ताक़त के बूते फंड की कमी पूरी कर सकता है. यहाँ भारत कमज़ोर पड़ जाता है.''

वह कहते हैं, ''भारत मालदीव की अर्थव्यवस्था के ढांचागत हालात को सुधारने में चीन की ऊंचाई तक जाकर मदद नहीं कर सकता. चीन के मालदीव के साथ जो समझौते हुए हैं, उसका ज़्यादा ज़ोर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर ही है ताकि भारत का ये पड़ोसी द्वीपीय देश अपनी अर्थव्यवस्था को ज़्यादा मज़बूत बना सके. ''

मालदीव के मौजूदा रुख़ पर भारत क्या करे?

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं कि डिप्लोमैसी में एक परिपक्वता होनी चाहिए. इसे ज़ीरो सम गेम नहीं मानना चाहिए. यानी किसी का नुकसान किसी का फ़ायदा नहीं हो सकता है.

भारत मालदीव को लेकर अपनी डिप्लोमैसी में पूरी परिपक्वता दिखा रहा है. कल ही भारत और मालदीव के अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक हुई है.

इस बैठक में भारतीय सैनिकों की वापसी से पैदा होने वाले हालात को सुलझाने पर चर्चा हुई. आगे ऐसी और भी बैठकें हो सकती हैं.

उनका कहना है कि नैरेटिव से विदेश नीति के पहलू तय नहीं होते.

लक्षद्वीप विवाद पर भारत में भले ही सोशल मीडियाा पर भले आक्रामकता दिखी लेकिन भारत ने इस पर अपनी ओर से कोई बयान नहीं दिया.

पिछले कुछ महीनों से मालदीव के साथ भारत के साथ चल रहे तनाव के बाद पहली बार विदेश मंत्री एस जयशंकर का बयान आया और वो भी बेहद सधे तरीक़े से.

जयशंकर ने कहा, ''राजनीति तो राजनीति है. मैं इसकी गारंटी नहीं दे सकता कि हर देश, हर दिन, हर व्यक्ति हमारा समर्थन करे या हमसे सहमत हो. हम इसकी बेहतर कोशिश करते हैं और पिछले 10 सालों में कामयाबी भी मिली है. हमने कई मामलों में मज़बूत संपर्क स्थापित किए हैं.''

''राजनीति में उठापटक की स्थिति रहती है लेकिन भारत के बारे में वहां के आम लोगों की राय अच्छी है और उन्हें भारत से अच्छे संबंधों की अहमियत पता है.''

प्रेमानंद मिश्रा कहते हैं, ''बड़ी और समझदार ताक़तें तीन चीज़ों पर ध्यान देती है. वो कितनी सम्मानित, कितनी ज़िम्मेदार और कितनी स्वीकार्य ताक़त है. एक परिपक्व कूटनीति कभी भी दूसरे देश पर धौंस नहीं जमाती.''

''अति राष्ट्रवाद हमारी ताक़त को नुक़सान पहुंचा सकता है. अगर सम्मानित, ज़िम्मेदार और स्वीकार्य ताक़त बनना है तो मैच्योर कूटनीति का सहारा लेना पड़ेगा और भारत यही कर रहा है.''

मालदीव के प्रति भारत का मौजूदा रवैया क्या कहता है?

मालदीव के लिए भारत का जो कूटनीतिक रवैया रहा है, उसकी वजह समझाते हुए अरविंद येलेरी कहते हैं कि श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों ने चीन से क़र्ज़ लेकर समझ लिया है कि इसके क्या ख़तरे हैं. लेकिन मालदीव के लिए वो समय अभी नहीं आया है.

वो कहते हैं, ''मुइज़्ज़ू सरकार भले ही अभी चीन पर बहुत ज़्यादा निर्भरता दिखा रही हो लेकिन एक समय आएगा कि वो चीन की आर्थिक मदद के ख़तरे समझ जाएगा. पिछले दस साल के दौरान भारत ने कभी भी आगे बढ़ कर अपने किसी पड़ोसी देश में हस्तक्षेप नहीं किया है.''

येलेरी कहते हैं,''चीन के ख़तरे को मालदीव के लोग समझ रहे हैं. यहाँ तक कि लक्षद्वीप पर टिप्पणी करने के आरोप में जिन मंत्रियों को हटाया गया उनमें से भी एक ने कहा कि भारत मुस्लिम विरोधी है लेकिन चीन अपने मुस्लिमों के साथ क्या कर रहा है ये भी दुनिया देख रही है.''

''भारत की परिपक्वता इस बात से जाहिर है कि इसने पड़ोसी देशों के साथ विवाद के हालात में भी एक 'प्रोग्रेसिव डिस्कनेक्ट' की नीति अपनाई है. यानी भारत उससे भले ही दूरी बना कर रखेगा लेकिन संबंध नहीं तोड़ेगा.''

अपनी इस नीति की वजह से भारत मालदीव में मौजूद अपने 88 सैनिकों को वापस बुलाने के लिए तैयार है. लेकिन इसे आपसी रिश्तों पर बोझ बनाने की जगह वह इस मुद्दे के समाधान के लिए मालदीव से बातचीत के लिए तैयार है.

दोनों देशों के आला अधिकारियों की इस मुद्दे पर एक उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है और कुछ बैठकें अभी होनी हैं.

भारतीय सैनिक मालदीव में क्यों हैं?

मालदीव में भारत के सिर्फ 88 सैनिक हैं. इन सैनिकों को अलग-अलग मौक़ों पर युद्ध, टोही और बचाव-राहत ऑपरेशनों में मालदीव के सैनिकों को ट्रेनिंग देने के लिए भेजा गया है.

लेकिन इतने कम सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद मालदीव के कुछ राजनीतिक दल और लोग मानते हैं कि ये उनके देश की संप्रभुता के लिए ख़तरा है.

भारत और मालदीव रक्षा समेत कई क्षेत्रों में नज़दीकी सहयोगी रहे हैं. नवंबर 1988 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति मामून अब्दुल गयूम की सरकार की तख्तापलट की कोशिश हुई थी भारतीय सैनिकों ने त्वरित कार्रवाई कर इसे नाकाम कर दिया था और विद्रोहियों को पकड़ लिया था.

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