You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
शरद पवार की पार्टी और विरासत को क्या सुप्रिया सुले बचा पाएंगी?
कीर्ति दुबे
बीबीसी संवाददाता
साल था 2015, दिल्ली के विज्ञान भवन में शरद पवार के 75वें जन्मदिन पर भव्य आयोजन किया गया था.
इस आयोजन में अजित पवार प्रवेश द्वार पर ही खड़े रहे, वो आगंतुकों को रिसीव करते और उन्हें उनकी कुर्सी तक छोड़ के आते.
जब कार्यक्रम शुरु हुआ तो हॉल इतना भर चुका था कि अजित पवार को बैठने के लिए जगह नहीं मिली.
अजित पवार नीचे दरी पर ही बैठ गए.
इस आयोजन में कई लोगों ने शरद पवार से पूछा कि एनसीपी में उनके बाद कौन होगा. हर मंझे राजनेता की तरह उन्होंने जवाब दिया- ये तो लोग तय करेंगे.
ये कहानी मराठी अख़बार लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर सुनाते हैं.
आज आठ साल बाद इस सवाल का जवाब लगभग मिल चुका है और अजित पवार का नाम इस रेस से लगभग बाहर है.
जो नाम सामने हैं वो है शरद पवार की बेटी और बारामती से सांसद सुप्रिया सुले का.
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हाई वोल्टेज ड्रामा चल रहा है. रविवार को अजीत पवार ने आठ विधायकों के साथ कैबिनेट की शपथ ले ली.
नेतृत्व की जंग?
लेकिन बीते रविवार को जो कुछ हुआ उसकी कहानी जून से लिखी जा रही थी.
10 जून को जब शरद पवार ने अपने इस्तीफे का एलान किया तो मंच से जो एक शख्स कार्यकर्ताओं को इस बदलाव को स्वीकार करने अपील कर रहा था वो थे अजित पवार.
अजित पवार मंच से एनसीपी कार्यकर्ताओं से भावुक ना होने की अपील कर रहे थे.
लेकिन इस घटना के लगभग हफ़्ते भर बाद शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को एनसीपी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया.
सुप्रिया सुले को पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति की ज़िम्मेदारी दी गई साथ ही एनसीपी के गृह राज्य महाराष्ट्र की ज़िम्मेदारी दी गई.
इसके बाद मुंबई के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा तेज़ हो गई कि शरद पवार ने इस फ़ैसले से अजित पवार का पार्टी में क्या भविष्य होगा इस सवाल का जवाब दे दिया है.
जब शरद पावर ने ये एलान किया कि वह अपना इस्तीफ़ा वापस ले रहे हैं तो उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में अजित पवार शामिल नहीं हुए.
अजित पवार बनाम सुप्रिया सुले
एनसीपी की राजनीति को क़रीब से समझने वाले इस बात को एक मत से स्वीकार करते हैं कि शरद पवार के बाद अजित पवार ही ऐसे नेता हैं जिनकी पार्टी में बेहतरीन पकड़ है.
लंबे वक़्त तक यही समझा जा रहा था कि एनसीपी में शरद पवार के बाद पार्टी की कमान अजित पवार के पास जाएगी.
पवार परिवार की तीन पीढ़ियां राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन सबसे कद्दावर नाम शरद पवार के बाद अजित पवार का ही आता रहा है.
हालांकि अब सुप्रिया सुले अपने पिता की पार्टी की कमान संभालने के लिए फ्रंट फुट पर आ चुकी है, लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि क्या सुप्रिया सुले के पास वो कौशल है जिससे वह एनसीपी को चला पाएं?
महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं कि सुप्रिया सुले शरद पवार की बेटी हैं तो ज़ाहिर है उन्हें उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है.
सूर्यवंशी ने बताया, "शरद पवार अपने जीते जी सुप्रिया सुले को बतौर लीडर संवारना बनाना चाहते हैं. जब जयंत पाटिल को एनसीपी का चेयरमैन के तौर पर नियुक्त करते की बात हो रही थी तभी सुप्रिया सुले को भी महाराष्ट्र की बागडोर देने की बात की गई थी. सुप्रिया सुले को अब तक पार्टी में सीधे तौर पर कोई बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं मिली है. जब तक किसी नेता को बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं मिलती तब तक नेता राजनीति में परिपक्व नहीं बन सकता."
सूर्यवंशी उद्धव ठाकरे की मिसाल देते हैं. ऐसी धारणा थी की उद्धव, बाला साहब जैसे तेज़ तर्रार नहीं थे.
लेकिन जब वो सीएम बने तो उन्होंने खुद की पहचान बनाई और वो पहचान बाला साहब ठाकरे को कॉपी करके नहीं बल्कि अपनी सौम्य-भाषी छवि को साथ लेकर चलते हुए ही बनाई.
सुप्रिया सुले क्यों हैं अलग
मराठी अख़बार लोकसत्ता के संपादक गिरिश कुबेर कहते हैं कि शरद पवार जैसे मंझे हुए नेता से ना तो सुप्रिया सुले की कोई तुलना की जा सकती है और ना ही अजित पवार की.
कुबेर मानते हैं कि शरद पवार राजनीति और अपनी विचारधारा को लेकर जितने दृढ़ और स्पष्ट रहते हैं उतनी समझ उन्हें अन्य पार्टियों की राजनीति की भी है.
वो अपने प्रतिद्वंदियों की भी राजनीति समझ लेते हैं. उनमें साहित्य, उद्योग, रंगमंच की दुनिया को लेकर भी बेहतरीन समझ है. उनसे हर विषय पर बात की जा सकती है और वो ज्यादातर चीज़ों के बारे में जानकारी रखते हैं, पढ़ते लिखते रहने वाले नेता है.
कुबेर कहते हैं, “सवाल ये है कि क्या सुप्रिया सुले आज इतनी निपुण नेता है कि एनसीपी को चला सकें इसका जवाब है नहीं. अगर सुप्रिया सुले केंद्र में एनसीपी को देखें और महाराष्ट्र में अजित पवार काम देखें तो ये तालमेल पार्टी को चला सकता है. लेकिन सुप्रिया महाराष्ट्र की राजनीति से काफी दूर हैं."
शरद पवार ने यशवंत राव चव्हाण से राजनीति के गुण सीखे हैं.
सुप्रिया सुले संसदीय कामों में, सभी पार्टियों के साथ अच्छा रिश्ता कायम रखने के मामले में बेहतर हैं. केंद्र की राजनीति में वो एनसीपी का सबसे प्रमुख चेहरा हैं.
अजित पवार प्रशासन और राजनीति के मामले में बहुत मज़बूत हैं. उनकी महाराष्ट्र में अपनी पार्टी में अच्छी पकड़ है. लेकिन दिल्ली की राजनीति के बारे में अजित पवार को ज़्यादा कुछ पता नहीं है.
सुप्रिया सुले के राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 2006 से हुई जब उन्हें एनसीपी ने राज्यसभा सांसद बनाया.
साल 2009 में वो पहली बार बारामती पश्चिम से लोकसभा चुनाव जीत कर संसद पहुंची और फिर लागातार यहां सासंद चुनी जाती रहीं.
बारामती से ही अजित पवार भी विधायक हैं. बारामती एनसीपी का गढ़ है. ऐसे में इन दोनों को अपने चुनावी क्षेत्र में रिकॉर्ड अंतर से जीत मिलती रही है.
महाराष्ट्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले पत्रकार ये मानते हैं कि अजित पवार महत्वकांक्षी नेता हैं और वह लोगों के बीच सुप्रिया सुले से अधिक पॉपुलर हैं.
लेकिन उनकी महत्वकांक्षा कभी-कभी एनसीपी के प्रति उनकी वफ़ादारी के आड़े आ जाती है.
साल 2019 में उन्होंने देवेंद्र फड़नवीस की सरकार में उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इस पद पर महज़ 80 घंटे तक ही बने रह सके.
उस वक्त भी अजित पवार के फैसले से शरद पवार ने किनारा कर लिया था.
शरद पवार की चुनौतियां
जानकार मानते हैं कि गठबंधन और नंबर्स की राजनीति में माहिर अजित पवार विचारधारा की राजनीति में अक़्सर कम प्रतिबद्ध नज़र आते हैं.
उनकी मुद्दों को लेकर राय अडिग नहीं रहती लेकिन सुप्रिया सुले ने एनसीपी की विचारधारा से अलग ना कोई बयान दिया है और ना ही कभी कोई क़दम उठाया है.
पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं, “विचारधारा के स्तर पर सुप्रिया सुले शरद पवार की विरासत आगे बढ़ाने में सक्षम हैं. संसद में जब भी सुप्रिया सुले ने कोई भाषण दिया है वह कभी भी एनसीपी के मूल विचारों से अलग नहीं रहा. ”
वहीं, गिरिश कुबेर कहते हैं , “ये भी समझना होगा कि आखिर शरद पवार ने अजित पवार को क्यों नहीं चुना. अजित पवार में संयम और राजनीतिक सूझबूझ की कमी है. राजनीति में संयम ज़रूरी है. साथ ही पार्टी को चलाने के लिए विचारधारा से जुड़ कर रहना भी उतना ही ज़रूरी है जितना की लोगों के बीच पकड़ रखना. ”
लेकिन कुछ लोगों का ये भी मानना है कि सुप्रिया सुले का अंदाज़ काफ़ी तल्ख है और वो लोगों के बीच अपने गुस्सैल रवैये के लिए जानी जाती है. ये छवि उनके लिए मुश्किल पैदा कर सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार संजय जोग कहते हैं कि "सुप्रिया सुले लोगों के बीच उतनी जुड़ी हुई नहीं है जितने अजित पवार है. ऐसे में एनसीपी को चलाने के लिए उन्हें तो कड़ी मेहनत करनी ही होगी."
अगले साल देश में लोकसभा चुनाव है और शरद पवार के पास समय कम है और चुनौतियां काफ़ी बड़ी, क्योंकि एनसीपी में इस फूट से बीजेपी को लोकसभा चुनाव में हो सकता है.
- अजित पवार के एनडीए में आने से क्या बीजेपी को बढ़त मिलेगी?
- अजित पवार के महाराष्ट्र सरकार में आने से एकनाथ शिंदे का क्या होगा?
- अजित पवार बने महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री, बोले- पीएम मोदी को समर्थन, शरद पवार ने कहा- लोग तय करेंगे एनसीपी किसकी
- अजित पवार के शरद पवार से सीखने, सुप्रिया सुले से प्रतिस्पर्धा और महाराष्ट्र की शिंदे सरकार में शामिल होने तक की पूरी कहानी
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)