एसआईआर के दौरान काम के कथित दबाव से बीएलओ की मौतों पर विवाद

एसआईआर की प्रक्रिया में हिस्सा लेते लोग

इमेज स्रोत, SanjayDas/BBC

इमेज कैप्शन, केंद्रीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने 27 अक्‍तूबर को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर शुरू करने का एलान क‍िया था
    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के दौरान काम के कथित दबाव से बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की मौतें एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही हैं.

शनिवार को नदिया ज़िले में एक महिला बीएलओ रिंकू तरफ़दार की मौत के साथ ही ऐसी मौतों की संख्या बढ़कर तीन हो गई है.

इसके अलावा ब्रेन स्ट्रोक के कारण कम से कम चार लोग गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती हैं.

राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन मौतों के लिए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराया है.

ममता बनर्जी ने आयोग को पत्र लिख कर एसआईआर को अव्यावहारिक बताते हुए इसे तुरंत रोकने की भी मांग की है.

राहुल गांधी ने भी एक्स पर पोस्ट कर इस मुद्दे को उठाया है. उन्होंने लिखा, "एसआईआर के नाम पर देश भर में अफ़रा-तफ़री मचा रखी है- नतीजा? तीन हफ्तों में 16 बीएलओ की जान चली गई. हार्ट अटैक, तनाव, आत्महत्या -एसआईआर कोई सुधार नहीं, थोपा गया ज़ुल्म है."

उन्होंने आरोप लगाया, "ईसीआई ने ऐसा सिस्टम बनाया है जिसमें नागरिकों को ख़ुद को तलाशने के लिए 22 साल पुरानी मतदाता सूची के हज़ारों स्कैन पन्ने पलटने पड़ें. मक़सद साफ़ है - सही मतदाता थककर हार जाए, और वोट चोरी बिना रोक-टोक जारी रहे."

दूसरी ओर, बीजेपी ने इन मौतों के लिए तृणमूल कांग्रेस को ही ज़िम्मेदार ठहराया है.

मीडिया में छपी ख़बरों के मुताबिक़, देश के 12 राज्यों में एसआईआर की कवायद के दौरान अब तक 15 बीएलओ की मौत का दावा किया गया है.

इनमें पश्चिम बंगाल में तीन के अलावा गुजरात और मध्य प्रदेश में चार-चार, राजस्थान में दो, केरल और तमिलनाडु में एक-एक की मौत की बात कही गई है. मध्य प्रदेश में तो बीते 24 घंटों के दौरान ही दो लोगों की मौत का दावा किया गया है.

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

पश्चिम बंगाल में मौतें

एसआईआर प्रक्रिया

इमेज स्रोत, SanjayDas/BBC

इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल में पिछली बार एसआईआर साल 2002 में हुआ था. इस बार यह चार नवंबर से शुरू हो चुका है.

राज्य के नदिया ज़िले के मुख्यालय कृष्णनगर में बीएलओ के तौर पर काम करने वाली रिंकू तरफ़दार नामक एक महिला शिक्षक ने शनिवार को आत्महत्या कर ली.

पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि शव के पास बरामद एक सुसाइड नोट में रिंकू ने अपनी मौत के लिए चुनाव आयोग को ज़िम्मेदार ठहराया है.

राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए ज़िला चुनाव अधिकारी से रिपोर्ट मांगी है.

पुलिस के मुताबिक़, रिंकू ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उन्होंने 95 फ़ीसदी ऑफ़लाइन काम पूरा कर लिया है, लेकिन ऑनलाइन के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है. सुपरवाइज़र को इस बारे में बताने से भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

रिंकू के पति का बयान
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

इससे कुछ दिन पहले पूर्व बर्दवान ज़िले के मेमारी में भी काम के कथित दबाव के कारण ब्रेन स्ट्रोक की वजह से नमिता हांसदा नामक एक बीएलओ की मौत हो गई थी.

इसी तरह बुधवार को जलपाईगुड़ी ज़िले के चाय बागान इलाके़ से शांति मुनि ओरांव नामक एक महिला बीएलओ का शव बरामद किया गया था. इन दोनों मामलों में मृतकों के परिजनों ने काम के भारी दबाव का आरोप लगाया था..

हुगली ज़िले में एक महिला बीएलओ ने काम के कथित दबाव के कारण ब्रेन स्ट्रोक का सामना किया जिसके बाद वो कलकत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती हैं.

बीते 24 घंटों के दौरान कथित तौर पर तबीयत बिगड़ने के कारण दो बीएलओ को अस्पताल में दाख़िल कराया गया है.

उनके परिजनों का दावा है कि वो बीते कई दिनों से एसआईआर के काम के दबाव से शारीरिक और मानसिक तौर पर टूट गए थे.

दक्षिण 24-परगना ज़िले के जयनगर में बीमार बीएलओ कमलपद नस्कर को अस्पताल में दाख़िल कराया गया है.

शनिवार को इलाक़े के ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफ़िसर (बीडीओ) शुभदीप दास भी उनको देखने अस्पताल पहुंचे थे.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, "नस्कर का इलाज चल रहा है. एसआईआर का काम जारी रखने के लिए उनकी जगह एक अन्य बीएलओ की नियुक्ति की गई है."

दक्षिण 24-परगना ज़िले की ही एक अन्य बीएलओ तनुश्री हालदार भी शनिवार रात को अचानक सिर चकराने की वजह से गिर गई थीं. उनको बारुईपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

विवाद और आरोप-प्रत्यारोप

एसआईआर के खिलाफ ममता की रैली

इमेज स्रोत, SanjayDas/BBC

इमेज कैप्शन, टीएमसी ने सड़कों पर उतरकर एसआईआर का विरोध शुरू कर दिया है (फ़ाइल फ़ोटो)

काम के कथित दबाव के कारण बढ़ती मौतों पर राज्य में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच विवाद और आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी लगातार तेज़ हो रहा है.

शनिवार को तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग और बीजेपी पर निशाना साधते हुए एक्स पर अपनी एक पोस्ट में कहा, "चुनाव आयोग की जटिल डिजिटल प्रक्रिया, अवास्तविक डेडलाइन, सज़ा का डर और रात में निगरानी के नाम पर कर्मचारियों को दी जाने वाली मानसिक यातना को स्वीकार नहीं किया जा सकता."

"अमानवीय दबाव के कारण बीएलओ की मौतें हो रही हैं, लेकिन बीजेपी इसका राजनीतिक फ़ायदा उठाने में जुटी है. यह उसकी क्रूर, अमानवीय और ग़ैर-ज़िम्मेदार राजनीति का असली चेहरा है."

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी एक्स पर अपनी एक पोस्ट में नदिया में बीएलओ की मौत की घटना पर दुख जताते हुए सवाल किया है कि आख़िर एसआईआर और कितने लोगों की जान लेगा?

दूसरी ओर, बीजेपी ने इन मौतों के लिए तृणमूल कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया है.

शमिक भट्टाचार्य

सीपीएम नेता और पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजन चक्रवर्ती का सवाल है कि आख़िर काम के दौरान बीएलओ को जान क्यों गंवानी पड़ रही है?

उनका कहना था, "चुनाव आयोग अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं इनकार नहीं कर सकता. साथ ही राज्य सरकार को भी बीएलओ की मदद करनी चाहिए थी, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी और बीजेपी इस प्रक्रिया का राजनीतिक फ़ायदा उठाने में जुटी हैं."

राजनीतिक विश्लेषकों का क्या कहना है?

पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर शुरू हो गई है.

इमेज स्रोत, SanjayDas/BBC

इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल के राज्य न‍िर्वाचन आयोग के मुताबिक़ उनके पास 80,000 से अधिक बूथ लेवल ऑफ़‍िसर (बीएलओ) हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में बीएलओ की मौतों और बीमारियों ने तृणमूल कांग्रेस को चुनाव आयोग और बीजेपी के ख़िलाफ़ एक मज़बूत हथियार दे दिया है.

यही वजह है कि मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी इस मुद्दे पर लगातार दबाव बढ़ा रही हैं.

उन्होंने यह प्रक्रिया शुरू होने के दिन चार नवंबर को एक रैली निकाली थी. अब 25 नवंबर को उत्तर 24-परगना के मतुआ बहुल इलाके़ में भी वो एक रैली निकालेंगी और जनसभा को संबोधित करेंगी.

राज्य में मतुआ वोटर कई सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं और इस वोट बैंक पर कब्जे़ के लिए तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में लंबे समय से खींचतान चलती रही है.

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "राज्य में एसआईआर के मुद्दे पर शुरू से ही विवाद रहा है. सत्ता के दावेदार दोनों राजनीतिक दल इसे अपने-अपने हित में भुनाने में जुटे हैं."

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक तापस मुखर्जी कहते हैं, "ममता बनर्जी बीएलओ की मौतों के बहाने केंद्र, बीजेपी और आयोग पर निशाना साध रही हैं. इसके साथ ही वो पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता दे रही हैं."

उनका कहना है, "उनके निर्देश पर पार्टी के नेता भी ऐसे परिवारों की मदद करते रहे हैं. आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी इसे प्रमुख मुद्दा बना सकती हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.