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पश्चिम बंगाल के इस मंदिर में दलितों को प्रवेश मिलने में '350 साल' लग गए
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान ज़िले में जातिगत भेदभाव और छुआछूत को तोड़ते हुए क़रीब 350 साल बाद गिधेश्वर मंदिर में दलित समुदाय के लोगों ने प्रवेश किया.
बुधवार को दास समुदाय के पांच लोगों ने पहली बार मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की. इस दौरान मंदिर परिसर में भारी सुरक्षा की व्यवस्था की गई थी.
यह मामला कटवा सब-डिवीज़न के गिधाग्राम का है.
भागीरथी और अजय नदियों के संगम पर बसे कटवा शहर से इस गांव की दूरी करीब 12 किलोमीटर है.
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क्या है पूरा मामला?
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण क़रीब 350 साल पहले हुआ था और तब से ही यहां दलितों को प्रवेश नहीं दिया गया था. हालांकि इस मंदिर के निर्माण की तारीख़ को लेकर कोई पुख़्ता दस्तावेज़ नहीं है.
गिधाग्राम गांव में क़रीब आठ सौ परिवार रहते हैं. इनमें 130 परिवार दास यानी दलित समुदाय के हैं. लेकिन इन लोगों को गांव में बने गिधेश्वर मंदिर में प्रवेश और पूजा-अर्चना का अधिकार नहीं था.
ज़मींदारों के दौर में शुरू हुई परंपरा जारी थी लेकिन इस परंपरा के ख़िलाफ़ दलित समुदाय ने आवाज़ उठानी शुरू की थी.
अब बीते बीस दिनों से जारी विवाद के बाद इस हफ्ते पहली बार इस समुदाय के लोगों को पुलिस की भारी सुरक्षा के बीच मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिली है. बुधवार को दास समुदाय के पांच लोगों ने पहली बार मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की.
पूजा करने वाली महिला ने क्या बताया?
पूजा करने वाले पांच लोगों के समूह में शामिल एक महिला षष्ठी दास बताती हैं, "हमारे पुरखे इस मंदिर में प्रवेश का सपना देखते हुए ही गुज़र गए. हमें आजीवन उपेक्षा का दंश झेलना पड़ा है. लेकिन अब प्रशासन की मदद से हमें मंदिर में प्रवेश का अधिकार मिल गया है. उम्मीद है यह आगे भी जारी रहेगा."
इसी गांव के संजय दास बताते हैं, "हमने पहले भी अपने हक़ की आवाज़ उठाई थी. लेकिन गांव के सवर्ण लोग हमारी आवाज़ सुनने को तैयार नहीं थे. नतीजतन हमें शिवरात्रि या गाजन जैसे त्योहारों पर मन मसोस कर रह जाना पड़ता था या दूसरे किसी मंदिर में जाना पड़ता था. हम यहां सबके साथ मिलकर शांति के साथ रहना चाहते हैं."
दरअसल, बीते महीने शिवरात्रि से पहले ही इस समुदाय के लोगों ने पहली बार मंदिर में प्रवेश की मांग ज़ोरदार तरीके से उठाई थी. इस मंदिर में शिवरात्रि बहुत धूमधाम से मनाई जाती है. दास समुदाय के कुछ युवकों ने स्थानीय प्रशासन को अर्ज़ी दी थी कि उनको भी मंदिर में प्रवेश का अधिकार मिले.
इस मांग के बाद गांव में तनाव फैलने लगा. विवाद बढ़ने पर मंदिर समिति की ओर से स्थानीय प्रशासन को भेजे एक पत्र में तीन सदी से भी ज़्यादा पुरानी परंपरा का ज़िक्र किया गया था.
उसमें कहा गया था, "मालाकार समुदाय के पास मंदिर के भीतर की साफ़-सफ़ाई की ज़िम्मेदारी है. घोष समुदाय के लोग भोग के लिए दूध और छेना पहुंचाते हैं. इसी तरह कुम्हार मिट्टी के बर्तन देता है. हाजरा समुदाय के लोग मशाल जलाने का काम करते हैं."
"कोटाल और बाइन समुदाय के लोग भी इसी तरह अलग-अलग काम करते हैं. लेकिन ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखने के अलावा दूसरे किसी समुदाय का व्यक्ति गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर सकता है. यह परंपरा बीते तीन सौ साल के पहले से चली आ रही है. इसलिए गांव के ज़्यादातर लोग इस परंपरा को जारी रखने के पक्ष में हैं."
उसके बाद स्थानीय एसडीओ अहिंसा जैन ने हस्तक्षेप करते हुए एक बैठक बुलाई.
उसमें गांव के दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के अलावा कटवा के विधायक रवींद्रनाथ चटर्जी, मंगलकोट के विधायक अपूर्व चौधरी, कटवा के एसडीपीओ (पुलिस अधिकारी) और गिधेश्वर मंदिर कमिटी के सदस्य भी उपस्थित थे.
दास समुदाय के लोगों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए बीते हफ्ते भी भारी तादाद में पुलिस के जवानों को मौके पर तैनात किया गया था. लेकिन सवर्णों ने दलितों का रास्ता रोक दिया था.
इस बारे में गांव के मदन दास बताते हैं, "बैठक में इस बात पर सहमति बन गई थी कि हमें मंदिर में पूजा-अर्चना का अधिकार मिलेगा. लेकिन बीते हफ्ते हमारे समुदाय के कुछ लोग जब मंदिर पहुंचे तो उसके मुख्य द्वार पर लगा ताला नहीं खोला गया. इसकी वजह से हम पूजा नहीं कर सके."
मदन दास आगे कहते हैं, "दलित जानकर ही स्थानीय सवर्ण लोग हमारे साथ ऐसा व्यवहार करते रहे हैं. पुरोहित उस दिन हमारे पहुंचने से पहले ही मंदिर में ताला लगाकर गायब हो गए थे. बाद में घोषपाड़ा (सवर्णों का मोहल्ला) के लोगों ने पूजा करने गई महिलाओं को मौके से खदेड़ दिया."
हालांकि, गिधेश्वर मंदिर के एक पुजारी माधव घोष दावा करते हैं, "रोज़ सुबह पूजा करने के बाद पुरोहित गर्भगृह का दरवाज़ा बंद कर देते हैं. उसे शाम होने से पहले खोलने की परंपरा नहीं है. लेकिन दासपाड़ा के लोग उसे खोलने की मांग पर अड़े थे. इससे स्थानीय लोग उत्तेजित हो गए थे. बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंच कर सबको शांत कराया."
'मंदिर के दरवाज़े सबके लिए खुलेंगे'
इस मुद्दे पर जारी विवाद और बैठकों के लंबे दौर के बाद आखिर बीती 11 मार्च की शाम तक चली एक बैठक में प्रशासन ने तमाम पक्षों से साफ कर दिया कि मंदिर के दरवाजे़ सबके लिए खुले रहेंगे. इस मामले में जातिगत भेदभाव जारी नहीं रहने दिया जा सकता.
उसके बाद पुलिस सुरक्षा के बीच बुधवार को दास समुदाय के पांच प्रतिनिधियों ने मंदिर में प्रवेश कर पूजा-अर्चना की.
गांव के संजय दास सवाल करते हैं, "हम लोग एक ही गांव में साथ रहते हैं. हर जगह साथ जाते हैं. तो फिर आखिर मंदिर में प्रवेश से वंचित क्यों रहेंगे? ज़मींदारी के दौर में बना यह नियम मौजूदा दौर में पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है."
लेकिन मंदिर में दलितों के प्रवेश का विरोध करने वाले लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि जातिगत भेदभाव या छुआछूत की प्रथा की वजह से ही दास समुदाय को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई थी.
गांव के जयदेव घोष कहते हैं, "हम तो सदियों पुरानी एक परंपरा को कायम रखने का प्रयास कर रहे थे. ब्राह्मणों के अलावा दूसरी जातियों के लोगों को तो मंदिर में प्रवेश की अनुमति थी. लेकिन दास समुदाय के लोगों को कभी मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं मिला था."
इसी गांव के सजल घोष कहते हैं, "यह परंपरा हमने नहीं बनाई थी. सदियों से ऐसा होता रहा था. हमने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था और दास समुदाय के लोगों ने पहले ऐसी कोई मांग भी नहीं उठाई थी. अब मांग उठने के बाद गांव के कुछ लोगों ने इसका विरोध ज़रूर किया. लेकिन बाद में समझाने पर वो भी इसके लिए सहमत हो गए."
कटवा के विधायक रवींद्रनाथ चटर्जी ने बैठक के बाद पत्रकारों को बताया, "पुलिस प्रशासन ने गांव के लोगों से बातचीत के ज़रिए इस मसले को सुलझा लिया है. अब सब लोग मंदिर में पूजा कर सकते हैं. उम्मीद है आगे इसे लेकर कोई समस्या नहीं होगी."
इस विवाद को सुलझाने में अहम भूमिका निभाने वाली कटवा की एसडीओ अहिंसा जैन ने बैठक के बाद पत्रकारों को बताया, "मौजूदा दौर में ऐसा जातिगत भेदभाव उचित नहीं है. हमने बैठक के ज़रिए गांव के पढ़े-लिखे लोगों को यही बात समझाई थी. यह एक 'टीम एफर्ट' था. आखिर सदियों पुराने इस विवाद को सुलझाने में कामयाबी मिली."
पूर्व बर्दवान ज़िला परिषद के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद लोहार बताते हैं, "ऐसे मामलों का समाधान सिर्फ प्रशासन नहीं कर सकता. इसके लिए आम लोगों को भी जागरूक बनाना होगा. गिधग्राम के अलावा ज़िले के कई अन्य गांवों में भी ऐसी परंपरा कायम है."
बर्दवान के एक समाजशास्त्री धीरेन गोस्वामी कहते हैं, "यह मामला सामने नहीं आता तो हमें पता भी नहीं चलता कि जातिगत भेदभाव और छुआछूत की जड़ें अब भी लोगों के मन में काफी गहरे बसी हुई हैं. इसके लिए आम लोगों में भी जागरूकता फैलाना ज़रूरी है."
कटवा का इतिहास
कटवा शहर का इतिहास करीब पांच सौ साल पुराना है. इसका शुरुआती नाम इंद्राणी परगना था. बाद में इसका नाम बदल कर कंटक नगरी कर दिया गया. जनवरी, 1510 में श्री श्री चैतन्य प्रभु ने यहीं अपने गुरु केशव भारती से दीक्षा ली थी. उस जगह पर अब यहां का सबसे पुराना गौरांग मंदिर खड़ा है.
दो नदियों के संगम पर बसा होने के कारण इस शहर का सामरिक महत्व भी था. इसे नवाबों की राजधानी रही मुर्शिदाबाद का प्रवेश द्वार माना जाता था.
बंगाल के नवाब अलीवर्दी खान और मराठा की सेना के बीच यहां 1742 और 1745 में दो लड़ाइयां हुईं. साल 1757 में पलासी की लड़ाई से पहले ब्रिटिश सेना नवाब की इस अंतिम छावनी पर कब्जा करने के बाद पलासी की ओर रवाना हुई थी.
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी कटवा की अहमियत तेज़ी से बढ़ी. उस दौरान यहां विलियम कैरी (जूनियर) जैसे मिशनरीज़ भी बसे. उनकी कब्र आज भी शहर में है. साल 1850 में कटवा को सब-डिवीजन टाउन का दर्जा मिला था. एक अप्रैल, 1869 को यहां नगर पालिका की स्थापना की गई.
बीसवीं सदी की शुरुआत में रेलवे नेटवर्क से जुड़ने के बाद इस शहर का तेज़ी से विकास हुआ. अज़ीमगंज से कटवा के बीच पहली रेलवे लाइन साल 1903 में बनी थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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