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भारत की यह स्थिति जर्मनी अपने ख़िलाफ़ क्यों मान रहा
जर्मनी के नए रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत की हथियारों के लिए रूस पर निर्भरता जर्मनी के हित में नहीं है.
जर्मन प्रसारक डॉयचे वैले के साथ बातचीत में बोरिस पिस्टोरियस से पूछा गया था कि क्या जर्मनी भारत को अधिक हथियार बेचेगा तो उन्होंने कहा, “ये जर्मनी के हाथ में नहीं है कि इसे अपने आप बदल ले. ये ऐसा मुद्दा है, जिसे हमें अपने सहयोगियों के साथ मिलकर समाधान करना है.”
पिस्टोरियस ने कहा, “लेकिन ज़ाहिर तौर पर, भारत अगर रूस के हथियारों और अन्य सामानों पर निर्भर रहता है तो दीर्घकालिक रूप से ये हमारे हित में नहीं होगा. इसलिए, हमें इस बारे में सोचना होगा कि हम क्या कर सकते हैं.”
जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस भारत की यात्रा पर आने वाले हैं. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध मज़बूत करने पर चर्चा होगी.
जर्मनी नहीं चाहता है कि भारत रक्षा ज़रूरतों की मजबूरी में रूस के साथ रहे. जर्मनी को लगता है कि भारत की चिंताओं को पहले दूर करना चाहिए और फिर रूस से उसकी दूरी ख़ुद बन जाएगी.
जनवरी में पद संभालने के बाद से पिस्टोरियस भारत के पहले दौरे पर हैं. रविवार को उन्होंने सिंगापुर में शांगरी ला डायलॉग में हिस्सा लिया. वहीं सोमवार को उन्होंने जक़ार्ता में इंडोनेशिया के रक्षा मंत्री से बात की. मंगलवार को उन्हें भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मिलना है.
भारत को पनडुब्बियां बेचने के संकेत
इस मुलाक़ात से पहले डॉयचे वैले को दिए साक्षात्कार में पिस्टोरियस ने भारत को जर्मनी की पनडुब्बियां बेचने के भी संकेत दिए.
पिस्टोरियस ने एक सवाल के जवाब में कहा, “जब मैं भारत पहुँचूंगा तब मेरे साथ जर्मनी के रक्षा उद्योग के प्रतिनिधि भी होंगे और मैं ये संकेत देना चाहूंगा कि हम इंडोनेशिया, भारत जैसे अपने भरोसेमंद सहयोगियों का सहयोग करने के लिए तैयार हैं. उदाहरण के लिए, इसमें जर्मन पनडुब्बियां की डिलिवरी भी शामिल होंगी.”
भारत छह पारंपरिक पनडुब्बियां ख़रीदने जा रहा है. माना जा रहा है कि ये सौदा 5.2 अरब डॉलर का हो सकता है. जर्मनी भी अपनी पनडुब्बियां भारत को बेचने की कोशिश करेगा.
फ्रांस का एक नवल समूह एक साल पहले इस प्रोजेक्ट से पीछे हट गया था, जिसके बाद जर्मनी की संभावनाएं बढ़ गई हैं.
इससे पहले साल 1981 में भारत ने चार एचडीडब्ल्यू टाइप 209 पनडुब्बियां ख़रीदने का सौदा किया था.
यूक्रेन युद्ध के बाद से बदले सुरक्षा हालात में जर्मनी ने अपने हथियारों के निर्यात पर लगे सख़्त नियंत्रण में कुछ ढील देनी शुरू की है.
हालांकि एक सवाल के जवाब में पिस्टोरियस ने ये भी कहा है कि जर्मनी को भरोसेमंद सहयोगियों के लिए हथियार के निर्यात और दुनिया भर में हथियारों कि सीमित डिलिवरी के बीच संतुलन बनाना है.
पिस्टोरियस ने कहा कि जर्मनी नहीं चाहता कि दुनिया में अधिक हथियार हों.
जर्मन रक्षा मंत्री ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी के संकेत भी दिए.
पिस्टोरियस ने कहा कि भारत-प्रशांत क्षेत्र 21वीं सदी में सुरक्षा, फ्रीडम ऑफ़ नेविगेशन और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों को निर्धारित करेगा.
पिस्टोरियस ने कहा कि भारत-प्रशांत क्षेत्र को लेकर जर्मनी की अपनी गाइडलाइन हैं लेकिन इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए जर्मनी अपने युद्धपोत तैनात कर सकता है.
जर्मनी ने साल 2021 में अपना पहला युद्धपोत इस क्षेत्र में भेजा था और साल 2024 में एक और युद्धपोत यहां भेज सकता है.
पिस्टोरियस ने कहा, “जर्मनी को अपने पुराने और नए सहयोगियों के साथ चर्चा करने की इच्छा भी दिखानी होगी.”
भारत रूस के हथियारों पर कितना निर्भर है?
भारत रूसी हथियारों और डिफेन्स सिस्टम का दुनिया का सबसे बड़ा ख़रीदार है. भारतीय वायु सेना, नौसेना और थल सेना के लगभग 85 प्रतिशत हथियार रूसी हैं और भारत के कुल सुरक्षा के सामानों के आयात का 60 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है.
भारतीय वायु सेना रूसी सुखोई एसयू-30 एमकेआई, मिग-29 और मिग-21 लड़ाकू विमानों पर निर्भर है, इसके अलावा आईएल-76 और एंटोनोव एएन-32 ट्रांसपोर्ट विमान, एमआई-35 और एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर हैं और हाल ही मेंली गई एस-400 वायु रक्षा प्रणाली भी रूसी है.
भारत की सेना रूसी T72 और T90 युद्धक टैंकों का इस्तेमाल करती है, नौसेना का आईएनएस विक्रमादित्य विमान वाहक पोत पहलेएडमिरल गोर्शकोव था.
भारत की नौसेना आइएल 38 समुद्री निगरानी विमान और कामोव के-31 हेलीकॉप्टर भी उड़ाती है, भारत के पास रूस से पट्टे पर ली हुईएक परमाणु पनडुब्बी है और वह भारत को अपनी परमाणु पनडुब्बी बनाने में भी मदद कर रहा है.
भारत और जर्मनी के रिश्ते
भारत फ़ेडरल रिपब्लिक ऑफ़ जर्मनी को मान्यता देने वाले दुनिया के पहले देशों में से एक है. इसी साल दोनों देशों ने कूटनीतिक संबंधों के 70 साल पूरे होने का जश्न मनाया है.
दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी भी है. साल 2011 के बाद से दोनों देश कैबिनेट मंत्रियों के स्तर पर द्विपक्षीय वार्ताएं कर रहे हैं.
साल 2020 में जर्मनी की सरकार ने भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे और इस क्षेत्र में अपने हितों और प्रतिबद्धता को निर्धारित किया था.
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि इन सब के बावजूद दोनों देशों के बीच सहयोग में कुछ कमी है.
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की शोधकर्ता अमृता नारलीकर एक लेख में कहती हैं, “दोनों ही तरफ़ के नीति निर्माता इस सवाल पर जूझते हैं कि जो उम्मीदें इन संबंधों से लगाई जाती हैं, उनमें दोनों देश कहां पीछे रह जाते हैं.”
विश्लेषक मानते हैं कि लंबे समय से भारत और जर्मनी के संबंध इस तरह रहे हैं कि ना ही इनमें कोई बड़ा नुक़सान हुआ है और ना ही बड़ा फ़ायदा.
लेकिन हाल के सालों में जिस तरह से चीन का उभार हुआ है और हथियारों के लेकर देशों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ी है उसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर हुआ है.
इस बदलते परिवेश में भारत और जर्मनी अपने संबंधों को मज़बूत करने का प्रयास कर रहे हैं.
भारत को लेकर जर्मन नेताओं के बयान
हाल ही में जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स ने एक भाषण में कहा था कि भारत, दक्षिण अफ़्रीका और वियतनाम जैसे देश यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस की आलोचना करने से झिझकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों को बराबरी से लागू नहीं किया जाता है.
ग्लोबल सॉल्यूसंश के 'द वर्ल्ड पॉलिसी फोरम' कार्यक्रम में बोलते हुए ओलाफ़ शॉल्त्स ने कहा, "जब मैं इन देशों के नेताओं से बात करता हूँ तो कई मुझे ये भरोसा देते हैं कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. उनकी चिंता यह है कि ये सिद्धांत समान रूप से लागू नहीं होते."
शॉल्त्स ने कहा, "वो चाहते हैं कि बराबरी की शर्तों पर प्रतिनिधित्व हो और पश्चिम के दोहरे मापदंडों का अंत हो."
शॉल्त्स ने कहा, "मुझे ग़लत मत समझिए- मैं ये नहीं कह रहा हूं कि ये दावें हमेशा उचित होते हैं. लेकिन अगर हम एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के शक्तिशाली देशों को एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने में सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो हमें इनका समाधान करना होगा."
शॉल्त्स ने इससे पहले भी भारत के समर्थन में बयान दिया है.
इस साल फ़रवरी में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए ओलाफ़ शॉल्त्स ने कहा था, "यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं. यह भारतीय विदेश मंत्री का कथन है और उनका तर्क जायज़ है. अगर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सिर्फ़ ताक़तवर लोगों का ही क़ानून चलेगा तो ये सिर्फ़ यूरोप की समस्याएं नहीं रहेंगी."
इस सम्मेलन में ओलाफ़ ने ये भी कहा था कि अगर पश्चिमी देश ये चाहते हैं कि भारत और इंडोनेशिया जैसे देश उनका साथ दें तो उनके साथ सिर्फ़ हमारे साझा मूल्यों पर ज़ोर देने से काम नहीं चलेगा बल्कि पश्चिमी देशों को इन देशों की चिंताओं और हितों का भी ध्यान रखना होगा. ये साझा सहयोग की बुनियादी ज़रूरत है.
दरअसल पिछले साल भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूरोपीय देशों की मानसिकता पर टिप्पणी की थी.
जून 2022 में स्लोवाकिया में एक सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा था, "यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याए हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्या नहीं हैं."
भारत में जर्मनी के राजदूत रहे वाल्टर जे. लिंडनेर ने पिछले साल छह दिसंबर को जयशंकर की इसी टिप्पणी का वीडियो ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा था, ''इनका तर्क बिल्कुल वाजिब है.''
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