गांधी जयंती पर गोडसे को ज़िंदा करने की ज़िद: नज़रिया

नाथूराम गोडसे

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    • Author, प्रियदर्शन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

गीतकार यश मालवीय ने पिछले दिनों बापू के नाम एक गीत लिखा है. गीत की शुरुआत इन पंक्तियों से होती है-'राष्ट्रभक्तों ने जलाई / भक्ति की खूंखार लौ / डेढ़ सौ के तुम हुए / टुकड़े तुम्हारे डेढ़ सौ.'

इस दो अक्टूबर को महात्मा गांधी पर एक लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी छपा सीधे 'न्यूयॉर्क टाइम्स' में 'भारत और गांधी को दुनिया की ज़रूरत क्यों है?'लेकिन इसी दिन ट्विटर पर जो हैशटैग ट्रेंड कर रहा था, 'गोडसे अमर रहें'.

बेशक, इस हैशटैग पर आने वाले बहुत सारे ट्वीट गांधी को मानने वालों के भी थे जिन्हें गोडसे की अमरता का नारा पसंद नहीं आ रहा था, लेकिन फिर भी इस हैशटैग का इस तरह ट्रेंड करना क्या बताता है? वे कौन लोग हैं जो गांधी की 150वीं जयंती पर गोडसे को जिलाना चाहते हैं? भारत में यह नई ट्विटर पीढ़ी कहां से आ गई जो गांधी के हत्यारे की मूर्तियां बना रही है, उसकी पूजा कर रही है और उसको देवता बनाने पर तुली है?

यह आरोप लगाना आसान है कि इस काम में बीजेपी के कई नेता और सांसद भी लगे दिखाई पड़ते हैं. नाथूराम गोडसे की देशभक्ति को लेकर बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर के विचार सुन कर प्रधानमंत्री ने भी कहा कि वे जीवन में उनको 'दिल से कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे'.

लेकिन इस बहस में उलझेंगे कि बीजेपी ने क्या कहा और कांग्रेस ने क्या किया, तो वह सूत्र खो जाएगा, जिसके सहारे यह समझा जा सकता है कि आखिर गांधी इस देश की किस मिट्टी से पैदा हुआ था कि क़ब्र में समाता ही नहीं- बार-बार निकल कर बाहर आ जाता है. ख़ुद गांधी जी कहा करते थे कि वे सवा सौ साल तक जीना चाहते हैं और अपनी क़ब्र से भी आवाज़ देते रहेंगे.

महात्मा गांधी की हत्या के मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कटघरे में गोडसे

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इमेज कैप्शन, महात्मा गांधी की हत्या के मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कटघरे में गोडसे

प्रेत को पितर बनाने की कोशिश

हिंदी के एक गीतकार के भीतर यह बहुत तल्ख़ मायूसी है कि गांधी के डेढ़ सौ टुकड़े कर दिए गए हैं तो बहुत सारे लोगों के भीतर यह अफ़सोस है कि उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे की देशभक्ति को यह देश नहीं समझ रहा है.

दरअसल, यहीं से वह डरावनी फांक और फांस शुरू होती है जो गांधी और गोडसे, देश और मनुष्यता और राष्ट्र और राष्ट्रवाद के बीच की समझ या नासमझी का फ़ासला बताती है और यह भी याद दिलाती है कि गांधी का नाम जपते-जपते उन्हें मूर्ति में बदल देने और गोडसे को पूजते-पूजते उसे देवता बनाने की परियोजना लगभग साथ-साथ चल रही है.

चाहें तो याद कर सकते हैं कि पिछले तमाम दशकों में गोडसे के प्रेत का आह्वान करते हुए एक मंत्र-साधना जैसे लगातार की जाती रही है और यह तौलने की कोशिश भी होती रही है कि इस प्रेत को देश अपने पितर की तरह स्वीकार करता है या नहीं.

दूसरी तरफ़, एक असुविधाजनक गांधी को छोड़कर एक सुविधाजनक गांधी तैयार किया जा रहा है जिससे किसी वैचारिक मुठभेड़ की नौबत न आए. यह कटा-छंटा, चिकना-सा गांधी ड्राइंग रूम की मेज़ के लिए है, और घर के भीतर जो पूजाघर है, उसमें गोडसे की प्राण-प्रतिष्ठा होगी.

महात्मा गांधी

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लेकिन ऐसा कहने का आधार क्या है? इसका आधार गांधी-विचार की वो व्याख्याएं हैं जो की जा रही हैं. मसलन, यह सच है कि गांधी गाय को मानते थे. वे चाहते थे कि गोकशी न हो लेकिन उन्होंने साफ़ कह दिया कि वे गाय को बचाने के लिए इंसान की जान नहीं ले सकते, उन्होंने गोभक्तों से कहा कि वे गाय को बचाने के लिए अपनी जान दे दें, लेकिन मुसलमान की जान न लें.

इसी तरह गांधी गांवों को शहरों की कृपा पर निर्भर उपनिवेश नहीं बनाना चाहते थे- वे एक ग्रामीण भारत चाहते थे. यह सपना वाकई दुश्वार है. उनके जीते-जी नेहरू और अंबेडकर इससे असहमति जताते रहे, लेकिन वे फिर भी गांधी का मोल समझते थे और असहमति को गांधी-विचार का हिस्सा ही मानते थे. गांधी और नेहरू के बीच की बहसें देख लीजिए- यह बात बड़ी आसानी से समझ में आ जाएगी.

लेकिन अब सरकार गांधी से बहस नहीं करती, वह उनकी पूजा करती है. यह वैसी ही पूजा है जैसी सारे पाप धोने के लिए की जाती है. देवताओं के साथ लेकिन एक मुश्किल या आसानी यह है कि वे बहुत दूर हैं, उनकी गवाही नहीं ली जा सकती. गांधी इतने दूर नहीं हैं, इसलिए उनकी गवाही मिल जाती है और फैलाए जा रहे झूठ की कलई खुल जाती है.

गांधी का राष्ट्रवाद

गांधी जैसा दुश्वार राष्ट्रवादी मिलना मुश्किल है. जब पूरे देश में आधिकारिक नागरिकता सूची के बहाने विदेशियों को खोजने और बाहर करने की मुहिम के नाम पर एक छुपे हुए अल्पसंख्यक विरोध को हवा दी जा रही है तब यह कितना अविश्वसनीय लगता है कि गांधी विदेशियों की ही नहीं, अपने आक्रांता समाज की जान-माल की रक्षा को लेकर इतने संवेदनशील थे कि वे सबका विरोध सहते हुए भी इसकी निंदा कर सकते थे.

राजमोहन गांधी की किताब 'मोहनदास' बताती है कि जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद 1919 में अमृतसर में ही हुए कांग्रेस के अधिवेशन में जब इस हत्याकांड का निंदा प्रस्ताव लाया गया तो गांधी जी ने इसमें उन पांच अंग्रेजों की हत्या की निंदा का प्रस्ताव भी जुड़वाया जो इस हत्याकांड से कुछ दिन पहले अमृतसर में मार दिए गए थे.

पूरे अधिवेशन में इसको लेकर हंगामा हो गया. यह उलाहना दिया गया कि यह किसी भारतीय मां की कोख से जन्मी संतान का प्रस्ताव नहीं हो सकता. गांधी ने कहा- यह प्रस्ताव किसी भारतीय मां की कोख से जन्मी संतान का ही हो सकता है. यह प्रस्ताव उनका है.

गोडसे पर लौटें. गोडसे के हाथ में वह पिस्तौल थी जिससे गांधी को गोली मारी गई. लेकिन गोडसे का हाथ गांधी की दिशा में मोड़ने वाले हाथ कौन थे- यह किसी से छुपा नहीं है, सरदार पटेल बता गए हैं कि गांधी की हत्या उस ज़हरीले माहौल के कारण हुई जिसे संघ ने तैयार किया था.

गोडसे की प्राण-प्रतिष्ठा

असगर वजाहत ने अपने एक नाटक में कल्पना की है कि गोडसे की गोली से गांधी की मौत नहीं हुई, वे घायल हुए. उन्होंने गोडसे की फांसी का विरोध किया. गोडसे को दिल्ली की जेल में रख दिया गया. ठीक होकर गांधी एक सुदूर गांव में अपने लोकतंत्र का प्रयोग करने लगे.

यह प्रयोग कांग्रेसी सरकार को इतना नागवार गुज़रा कि उनको गिरफ़्तार करने की नौबत आ गई. गांधी ने मांग की कि उन्हें भी उसी सेल में रखा जाए जिसमें गोडसे है. गांधी की ज़िद के आगे सरकार को फिर घुटने टेकने पड़े.

राजघाट

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असली कहानी दरअसल यहां से शुरू होती है. गांधी और गोडसे एक ही सेल में हैं. गांधी लगातार संवाद की कोशिश करते हैं, गोडसे लगातार उनसे बचता है. गांधी गोडसे से पूछते हैं, तुम्हारी प्रिय किताब कौन है.

गोडसे बताता है कि गीता उसकी प्रिय किताब है. गांधी बताते हैं कि गीता उनकी भी प्रिय किताब है. फिर वे कहते हैं, जिस किताब ने तुम्हें मुझे मारने की प्रेरणा दी, उसी ने मुझे यह सिखाया कि मैं तुम्हें क्षमा कर दूं.

तो जीवन के महाभारत में अपनी-अपनी गीता अपने-अपने ढंग से हम सबको पढ़नी है. यह हम पर निर्भर करता है कि हम मनुष्यता के पक्ष में खड़े हों या मनुष्य विरोधी तर्कों के क़िले में अपना घर बनाएं, हम गांधी से खीजते हुए, नाराज़ होते हुए भी, उनसे एक पुरखे की तरह अपना नाता जोड़ें या गोडसे को चुपके से अपना देवता मानना शुरू कर दें.

गोलियों से गांधी मरे नहीं, मूर्तियों से गोडसे ज़िंदा नहीं होगा. लेकिन यह सच है कि जिस तरह गोडसे की बार-बार प्राण-प्रतिष्ठा की जा रही है, जिस तरह गांधी को उनकी पूजा करके स्वच्छता के दूत की भूमिका में समेटा जा रहा है, उससे यह आशंका होती है कि लोग कहीं गोडसे की ही विचारधारा को प्लास्टिक सर्जरी के ज़रिए गांधी न बना डालें.

लेकिन इसके लिए असली गांधी को गायब करना होगा तो जिस विचारधारा ने गांधी की हत्या की, वह अब उनका अपहरण करने पर तुली है हालांकि गांधी अब भी इतने वज़नी हैं कि उनसे नहीं उठेंगे.

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