शौचालय के बहाने
मेरे एक मित्र सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे मीडिया पर भी नज़र रखते हैं.
वे अक्सर कहते हैं कि एक व्यापक षडयंत्र के तहत ग़ैर ज़रुरी विषयों को मीडिया में उछाला जाता है. वे मानते हैं कि कई ज्वलंत मुद्दों को पृष्ठभूमि में धकेलने के लिए कई बार सरकार भी इस षडयंत्र में शामिल होती है.
मैं एक मीडियाकर्मी की तरह उनसे सहमत नहीं हो पाता. लेकिन कई बार अपनी बिरादरी पर ही शक होने लगता है.
योजना आयोग के शौचालय पर मीडिया में छिड़ी बहस ऐसा ही एक मुद्दा है.
इसी योजना आयोग ने ग़रीबी की परिभाषा तय करते हुए कह दिया था कि शहरों में हर दिन 32 रुपए कमाने वाला ग़रीब नहीं है. वह घोर आपत्ति की बात थी. योजना आयोग की संवेदनहीनता थी.
हमारी स्मृति छोटी होती है. हम भूल जाते हैं कि ग़रीबी की परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने हमेशा ही इसी तरह की कल्पनाशक्ति का परिचय दिया है.
जहाँ तक 35 लाख रुपए लगाकर शौचालय की मरम्मत की बात है यक़ीन मानिए सरकारी भवनों में इस तरह का ख़र्च कोई असामान्य बात नहीं है.
शक हो तो सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता आवेदन लगा कर देख लें कि एक-एक अधिकारी और मंत्री के कार्यालयों पर कितना खर्च होता है. उनके बंगलों का हिसाब निकाल कर देख लें.
ये सवाल सिर्फ़ अधिकारियों के उपयोग के लिए अलग शौचालय और भेदभाव का भी नहीं है. हम जिस समाज में रहते हैं वह बहस के लिए समानता की बात करता है लेकिन जीता इसी भेदभाव के साथ है. यह हमारी विरासत का हिस्सा है और आधुनिक समाज में अपना अस्तित्व बनाए हुए है.
कितने लोग अपने घरेलू नौकरों को अपने शौचालयों का उपयोग करने देते हैं? इस कथित समतामूलक समाज का समाजवाद तब अचानक ग़ायब हो जाता है.
बहुत मजबूरी न हो तो हमारे यहाँ कोई सार्वजनिक शौचालय का उपयोग भी नहीं करता.
इतिहास के छात्र बता सकते हैं कि समाज में शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच एक गहरी खाई हमेशा से रही है. दोनों का जीवन और जीवन स्तर अलग-अलग ही रहा है. आज भी है. लोकतंत्र बहुत से आश्वासन दे सकता है लेकिन ये आश्वासन आज भी नहीं दे सकता कि वह दोनों वर्गो के बीच की खाई को पाट देगा.
मैं जानता हूँ कि ऐसा कहना बहुत से लोगों को नागवार गुज़रेगा लेकिन सच है कि ये बेवजह की बहस है.
ऐसे समय में जब महंगाई जानलेवा हो रही है और बेरोज़गारी का साया दिनों दिन बड़ा होता जा रहा है. ऐसे समय में जब सरकार असहाय दिख रही है और विपक्ष लाचार. ऐसे समय में जब स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक बहुत से सवाल मुंह बाए खड़े हैं. ये निहायत ही ग़ैर-ज़रुरी बहस है.
आपको ज़रुर लग सकता है कि योजना आयोग के शौचालय ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है, लेकिन सच ये है कि शौचालय ने एक-दो-तीन दिनों के लिए ही सही, सरकार को कई ऐसे सवालों से बचा लिया है जो ज़्यादा असुविधाजनक हैं.
क्या हम किसी दिन मूल सवालों पर लौटकर इस सरकार से उसी तरह जवाब मांगेगे जिस तरह से मोंटेक सिंह अहलूवालिया एंड कंपनी के शौचालयों पर मांग रहे हैं?

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धन्यवाद. आपने मूल सवालों को उठाए जाने की सार्थक बहस की शुरूआत की. एक मीडियाकर्मी होने के नाते आपका, अपने खिलाफ जाने वाली बात को ना मानना तो स्वाभाविक है, पर उसपर शक जाहिर करके वाकई आपने ईमानदारी वाली बात की है. वैसे आजकल अपने देश में खुद को ज्यादा बड़ा ईमानदार साबित करने का चलन जोरों पर है और इसे साबित करने में हमारे प्रधानमंत्री से लेकर सेनाध्यक्ष तक शामिल हैं.
ये कहना कि शौचालयों पर की गई चर्चा बेमानी है, ऐसा कहकर आप सरकारी फिजूलखर्ची जैसे अहम सवाल से लोगों का ध्यान अलग करना चाह रहे हैं. ऐसा लगता है आप पेड न्यूज छाप रहे हैं. कृपया बीबीसी की पुरानी गरिमा को बनाए रखें.
बिल्कुल सही. हमने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, डॉक्टर राधाकृष्णन और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे राष्ट्रपतियों को देखा है जो कैसे काम करते थे. अब मोंटेक सिंह नई पहचान हैं जो देश को विकसित देशों की सूची में शामिल करने कि लिए जी-जान से भिड़े हैं. वे नई सदी के प्रोमेथस हैं.
विनोद जी यह चाहें तो टॉयलेट पर जितना भी खर्च कर लें पर इनको क्या मतलब कि महँगा और सस्ता क्या बला है इन्हें तो अपने लिए एक अदद साफ सुथरे टॉयलेट की दरकार है, सीपीडब्ल्यूडी का आर्किटेक्ट और इंटीइन्तिरिओर डेजैनर क्या बना रहा है और उस पर कितना खर्च कर रहा है ये उसकी बला है, लगता है आप कॉमनवेल्थ गेम्स के खेल भूल गए हों, पर इनका महंगा टॉयलेट 'आम आदमी' को फिर खेतों की ओर यानी जंगल की ओर धकेल रहा है और अब तो जंगल भी नहीं रहे, आजकल मैं गाँव आया हूँ आप को विश्वास दिलाऊं कि जब मैं यहाँ था तब बहुत साफ सुथरा टॉयलेट इस्तेमाल करता था, आप सोच रहे होंगे गाँव और साफ सुथरा टॉयलेट जी हाँ . गाँव में जंगलात के लिए जो नाले और बंजर,परती,खाली जमीन हुआ कराती थी सब या तो चकबंदी में चली गयी या भूमिहीनों में बट गयी, सारे टॉयलेट पर कोई न कोई काबिज है, तब जाकर योजना आयोग की तर्ज़ पर तो नहीं गाँव के लिहाज़ से टॉयलेट बने अब जिनमें जाते हुए डर लगता है कि कहीं इंफेक्शन न हो जाए पर 'गुजरे जमाने' के जंगल के साफ सुथरे टॉयलेट इसी योजना आयोग की भेंट चढ़ गए हैं. अब किसी गाँव में न तो कोई जंगल बचा और न ही जंगलात वाले साफ सुथरे टॉयलेट. ऊपर वाला इन्हें सद्बुद्धि दे कि अब अगर दिमाग नहीं चल रहा है तो घर बैठे क्यों ऐसी की तैसी करवा रहे हैं.
मैं बिलकुल आप के मित्र से सहमत हूँ कि इस देश में अक्सर साजिश के तहत गैर ज़रूरी मुद्दे उछाले जाते हैं. जनता अपने को बेवक़ूफ़ बनते मूक दर्शक बनी रहती है. अगर यह सब जान बूझ कर किया जाता है तो बहुत गंभीर बात है.
कीचड़ उछालना हम सब का स्वभाव बन गया है. शौचालय पर मीडिया में इतनी टिप्पणी होना मजाक है.
आपने बिल्कुल सही लिखा विनोद जी, लोग बड़े मुद्दे को छोड़ कर इस पर बहस कर रहे हैं.
बहुत ख़ूब.शिक्षा और स्वास्थ का नाम सुनते ही मेरा संतुलन बिगड़ने लगता है और हम अपनी सरकार को एक वहशी दरिंदे के तौर पर देखने को मजबूर हो जाते हैं जो लाशों की सौदागरी करते लोगों पर रोक नहीं लगाती और लाचार मजबूर जनता को उनसे सुरक्षा नहीं देती. शिक्षा का मामला तो और संगीन है. अच्छे स्वास्थ के अभाव में व्यक्तिगत रूप से प्रभाव पड़ता है लेकिन ग़लत शिक्षा के कारण देश का पूरा भविष्य ही अंधकारमय दिखता है. सरकारी स्कूलों में शिक्षा के नाम पर जो दिया जा रहा है वह कुछ नहीं है. अगर मेरी न माने तो गांवों में जाने की ज़रूरत नहीं दिल्ली में स्थित सरकारी स्कूलों के बारहवीं के बच्चों को देख लें. शिक्षा में पढ़ाई को जिस प्रकार वस्तुनिष्ठ बनाया जा रहा है वह सारी सोच का रास्ता बंद करने के लिए काफ़ी है. चार विकल्प दिए जाते हैं जिससे आगे जानने की और न सोचने की ज़रूरत है. वाह रे मॉडल शिक्षा. शिक्षक की कमी तो एक तरफ़ जो शिक्षक हैं उनको भी कलर्क बना दिया गया है. बच्चों को पैसे बंटो. खाना बांटो. उनकी निगरानी करो. सही है नौकरी तो शिक्षक ने की है. फिर लगाम उनपर ही क्यों न लगे. बच्चे चाहे उद्दंड होते रहें. मोबाइल पर तस्वीरें भेजते रहें. शिक्षक मूकदर्शक. पहले की बात याद करें अगर प्रिंसिपल सिर्फ़ बारामदे में निकल पड़ता था, तो सारा स्कूल डिसिप्लीन में आ जाता था. शिक्षक का जो आदर था वह अब कहां.और ये सब हमारी बदली शिक्षा नीति के कारण है.
ये सही है, गरीबों के बारे में आपकी राय बिल्कु सही है. धन्यवाद.
एक बड़े नेता ने कहा था -
"Planning Commission is bunch of Jokers"
योजना आयोग ने उनके वक्तव्य को शौचालय पर 35 लाख रुपये खर्च कर के प्रमाणित कर दिया.
विनोद जी, गरीबी रेखा भारतीय योजना आयोग द्वारा तय प्रति दिन 28 रुपये है.लेकिन आपने इस ब्लॉग में बताया है कि यह 32 रुपए है. आप की तरह के सम्मानित रिपोर्टर द्वारा की गई गलती देखना बुरा है. वैसे मैं आपके ब्लॉग से सहमत नहीं हूँ.
विनोद जी मैं आपकी बातों से सहमत हूं, शौचालय के लिए योजना आयोग जैसे बड़े कार्यालय का केवल 30-35 लाख रूपए मरम्मत में खर्च करना बड़ा सवाल नहीं होना चाहिए, न ही ऐसे हल्के मुद्दों को वजनदार बनाने की जरूरत है. दरअसल मीडिया अमीरी-गरीबी की रेखा तय करने के मानक से बाद से योजना आयोग पर नजर रखी थी, और मौका मिलते ही शौचालय के मामूली खर्च को उछाल दिया गया. मैं दंतेवाड़ा में रहता हूँ, देश का सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिला है, इस जिले में नक्सलवाद के लिए निराकरण के लिए जिले को हजारों करोड रूपयों का एलॉटमेंट मिलता है, जिसे इसी तरह मामूली से कार्यों में हमारे जिले मे भी खर्चा जाता है. सरकारी अफसरों के बंगलों में किसी को झांकने की इजाजत तो नहीं है, लेकिन अगर इन बंगलों के रख-रखाव का खर्च निकाला जाए तो यह देश के लिए चौंकाने वाला आंकड़ा ही होगा.
अच्छा लिखते हैँ.
विनोद जी , आपने सच कहा है.
मैं आपकी बात का समर्थन करता हूं. 5 अप्रैल 2012 को जब अन्ना एक दिन के लिए अनशन पर बैठे थे तो सचिन ने 2 घंटे तक प्रेस कॉन्फ्रेंस की ताकि मीडिया पर अन्ना के कवरेज को काटा जा सके. बाद में ये साफ भी हुआ कि सचिन का राज्यसभा की सदस्यता के नाम पर इस्तेमाल किया गया और अभी जब सारे विपक्ष ने एक साथ पेट्रोल के मुद्दे पर बंद बुलाई तो उसी सिब्बल ने रोमिंग फ्री वर्ल्ड का ऐलान किया और सबसे बड़ी बात की उसी दिन जौनपुर के पास एक ट्रेन हादसा हुआ. आपका ये जानकर हैरत होगी कि अभी तक की जांच में इसे एक षड्यंत्र माना जा रहा है. कोई हैरत नहीं कि मीडिया पर बंद के कवरेज को कम कराने के लिए सरकार ने ये दुर्घटना करवाई हो. हालांकि अंतिम जांच रिपोर्ट में ये बात कभी नहीं आएगी ये सभी को पता है.
बहुत खूब लिखा है आपने. आज जब करोड़ों रुपए के घोटाले हो रहे हैं तो उसके सामने तो ये कुछ भी नहीं है.
श्री विनोद जी का मानना है कि कोई कुचलता है तो उसका आनंद लो, ये तो इस देश में होगा ही, अत्याचार बर्दाश्त करते रहो. जब कोई आपसे सरकारी काम करवाने के लिए रिश्वत माँगी जाएगी तो कृपया फिर उसके विरोध में बीबीसी पर ना लिखना.
मैं इस बात से बिलकुल सहमत हूँ कि व्यापक षडयंत्र के तहत ग़ैर ज़रुरी विषयों को मीडिया में उछाला जाता रहा है. लेकिन मेरी समझ के अनुसार (जितनी भी है) सरकारी खर्च पर बने आलीशान शौचालय का फ्लश भी इस बात से सहमत नहीं होगा कि इस मुद्दे पर तनिक भी बहस करना अनुचित है. अब का शासक वर्ग लोकतांत्रिक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है उसे हमारे हर एक फ़िज़ूल पैसे का हिसाब देना पड़ेग.
मुझे ये पंक्ति दमदार लगी कि कितने लोग अपने टॉयलेट अपने नौकरों इस्तेमाल करने देते हैं.
विनोद वर्मा जी आपके द्वारा उठाया गया मुद्दा बिल्कुल प्रासंगिक है. आज मीडिया का इस्तेमाल राजनीति में अपना उल्लू सीधा करने के लिए हो रहा है. हर बार मीडिया का उपयोग करके जनता को गुमराह किया जाता है. इससे मीडिया भी अपना विश्वास जनता से खो रही है.कभी कभी तो खबरों का इस तरह से अर्धसत्य दिखाया जाता है की पूरी खबर ही उलटी लगने लगती है. हर बार संसद की कार्यवाही के दौरान योजना के तहत कुछ ऐसे मुद्दों को हवा दे दिया जाता है और असली सवाल छुप जाते हैं हद तो तब हो गयी जब एक बार बजट भाषण में वित्त मंत्री जी ने पेट्रोल के दामों में बस 1 रूपये की वृद्धि कर दी और सारा विपक्ष उसी पर हल्ला मचाने लगा और बजट के किसी भी विषय पर चर्चा हुए बिना बजट पास हो गया. शायद पत्रकारिता धर्म की परिभाषा बदल गयी है.
बहुत अच्छा लगा.
विनोद जी, आपने लिखा है कि सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता आवेदन लगा कर देख लें. मेरा सवाल है कि सूचना मांगने पर मिलती है क्या? आप खुद कोशिश कर के देख लीजिए. सार्वजनिक शौचालय की हालत क्या होती है? ये आपने शायद देखा नहीं है. कितने लोग अपने घरेलू नौकरों को अपने शौचालयों का उपयोग करने देते हैं- आपने ये सवाल करके उन लोगों को अच्छा चांटा मारा हैं जिनके आसपास नौकर-चाकर चक्कर लगाते रहते हैं. 35 लाख का शौचालय बड़ा मुद्दा नहीं है, भारत की बड़ी आबादी के घरों में शौचालय नहीं है ये वाकई बड़ा मुद्दा है.
आप की बात शत प्रतिशत सही है.