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प्रधानमंत्री की पेशी

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|गुरुवार, 14 जून 2012, 20:57 IST

लोकतंत्र को चारित्रिक पतन से बचाने के लिए संस्थाओं और उनके शीर्ष पर बैठे नेताओं की समय-समय पर धुलाई-सिंकाई ज़रूरी होती है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने पाँच घंटे की अपनी पेशी में पत्रकारिता-राजनीति के 'अवैध संबंधों' पर अपना इक़बालिया बयान और सफ़ाई दोनों पेश की है.

लेविसन जाँच आयोग के सामने बाइबल की शपथ लेकर कैमरन ने माना कि "ब्रिटेन में मीडिया और सत्ता के आपसी रिश्ते ख़राब हो गए हैं."

ख़राब का मतलब ये है कि संबंध बहुत मधुर हो गए थे, दोनों तरफ़ के लोग अपनी सीमाओं और मर्यादाओं को तोड़कर 'एक दूसरे की मदद कर रहे थे.'

जो लोग ये मानने को तैयार नहीं होते कि परचून की दुकान की व्यावसायिकता और मीडिया की व्यावसायिकता में अंतर होता है, उन्हें लेविसन जाँच पर ग़ौर करना चाहिए.

वैसे किराना स्टोर एथिक्स भी कालीमिर्च में पपीते के बीज मिलाने या कम तौलने की इजाज़त नहीं देते.

मीडिया अगर सिर्फ़ कारोबार है तो लोकतंत्र का 'चौथा स्तंभ' कहलाने का दंभ छोड़ देना चाहिए, क्यों कोई पत्रकार ख़ुद को आम आदमी से अधिक अहमियत का हक़दार समझता है, अगर वो अपने दर्शकों/पाठकों का प्रतिनिधि यानी जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक दुकानदार है?

संयम और संतुलन के मामले में पत्रकारिता एक कठिन पेशा है. रात-दिन नेताओं के मिलने-जुलने वाले पत्रकार से यही उम्मीद की जाती है कि वह उनके प्रलोभन या बहकावे में आए बिना जनता के हित की बात करेगा.

असंभव है कि नेताओं से दूर रहकर पत्रकार ख़बरें बाहर निकाल पाएगा, मगर वह हमेशा याद रख सकता है कि किस हद को पार करने पर शिष्टाचार व्याभिचार में बदल जाता है.

भारत में इन दिनों मीडिया के रेगुलेशन की बातें हो रही हैं, मीडिया की नैतिकता, सार्थकता और निष्पक्षता पर कहीं गंभीर और कहीं फ़ालतू बहसें चल रही हैं.

भारत की स्थिति ब्रिटेन के मुक़ाबले कहीं अधिक जटिल है. बीसियों नेताओं के अपने चैनल चल रहे हैं, बड़े औद्योगिक घराने मीडिया संस्थानों के मालिक हैं, बड़े मीडिया संस्थान दूसरे धंधों में हाथ-पाँव फँसाए बैठे हैं... मुद्दे अनेक हैं और ठोस समाधान किसी के पास नहीं है.

शायद इतना याद रखना ही मददगार हो--- नैतिकता विचार नहीं, आचरण है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:19 IST, 15 जून 2012 आलोक चौधरी:

    भारत में भी प्रधानमंत्री की पेशी होनी चाहिए.

  • 2. 18:39 IST, 15 जून 2012 Naval Joshi:

    राजेश जी आपने लोकतंत्र और मीडिया के बारे में अपनी बात रखी है न जाने क्यों मुझे लगा कि आप प्रचलित धारणाओं और मान्यताओं से बाहर कुछ भी नहीं कह रहे हैं. इन मान्यताओं और धारणाओं में यदि जरा सा भी दम होता तो आपको शायद बात इतने विस्तार से कहनी न पडती. बार-बार बदली हुई परिस्थितियों में यही बात दोहरायी जाती है और इन बातों का कोई असर नहीं होता है. आपने कहा है कि मीडिया अगर सिर्फ कारोबार है तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने का दंभ छोड देना चाहिए, पहली बात तो यह है कि दंभ किसी भी बात का ठीक नहीं है, इसकी गिरफ्त में आना ही गलत है. दूसरा यह कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कैसे हो सकता है, मीडिया राजतंत्र का भी स्तम्भ रहा है और अब लोकतंत्र का भी स्तम्भ है. हर तंत्र का अपना मीडिया होता है हर तंत्र के अपने-अपने गोएबल्स होते हैं जिनका मूल्यांकन अपने समय के बाद ही किया जा सकता है. इस बात से तो आप सहमत होंगे ही कि मीडिया का मतलब केवल अखबार,टेलीविजन या इन्टरनेट ही नहीं होते हैं. यह तो केवल माध्यम या उपकरण मात्र हैं, असल में जो मीडिया है उस पर अक्सर लोगों की नजर नहीं जाती है, जिसे आप मिडिया कह रहे हैं वह वास्तव में व्यापार ही है और व्यापारियों से लोक-कल्याण की उम्मीद ही क्यों करनी चाहिए? वे व्यापारी हैं और अपने मुनाफे के लिए कुछ भी कर गुजर सकते हैं. जिस तरह डाक्टर होने का मतलब प्राणी मात्र को मानसिक और शारिरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने से होता है, अध्यापक का मतलब अज्ञान के खिलाफ जागृति से है, कोई डाक्टर हो और बीमारियों से तालमेल का विकल्प उसके पास हो अध्यापक हो और अज्ञान के साथ उसका गठजोड हो ,मीडिया का प्रतिनिधि होने का दावा हो और जन के खिलाफ सत्ता को सहारा देने का विकल्प उसके पास हो तो उसे डाक्टर,अध्यापक और मीडिया नहीं कहा जा सकता है. ये लोग असल में व्यापारी हैं जो कि मुनाफे की तलाश में डाक्टर,अध्यापक और मिडिया के पुरोधा बने हैं. आपने कहा है कि संयम और संतुलन के मामले में मीडिया एक कठिन पेशा है, पेशे का मतलब धंधा ही होता है वह हमेशा ही कठिन होता है क्योंकि धंधे का मतलब ही मुनाफा कमाना होता है. यदि कोई काम कठिन लगने लगे तो इसका मतलब है कि वह हमारी प्रकृति के अनुरूप नहीं है, ध्यानचन्द से लेकर आज दरबारा सिंह तक जो भी खिलाडी हाकी लेकर गेंद के पीछे दौडते रहे हैं उसने कभी नहीं कहा है कि हाकी खेलना बहुत कठिन है यही तो उनका आनंद है. दूसरों को हाकी का खेल देखने में कठिन लग सकता है लेकिन ध्यान चन्द्र और दरबारा सिंह के लिए तो हाकी खेलना ही परम आंनद है. आज अधिकतर लोग क्रिकेट खेलना चाहते हैं क्रिकेट खेलने में उनको कोई आंनद नहीं है. केवल पैसे की चमक से इनकी ऑखें चॅुधिया गयी हैं लेकिन कहने को ये सभी अपने को खेल का दीवाना कहते हैं। लेकिन इनकी नजर पैसे पर टिकी होती है। यही इनका कष्ट ,विसंगति और विद्रूपता है। यही हाल लगभग हर क्षेत्र में है ऐसे में केवल मिडिया ही कैसे बचा रह सकता है? इसलिए उम्मीद और निराशा दोनों ही व्यर्थ हैं.

  • 3. 03:07 IST, 19 जून 2012 gunjan jha:

    इतिहास के बस स्टॉप पर ये वैश्विक समाज में नैतिकता की जगह कानून पालन के लिए भय के जोर आजमाने का दौर है. पत्रकार और पत्रकारिता ही नहीं, मेरी इस खिड़की के नीचे वॉल स्ट्रीट से लेकर रायसीना की गायब हुई पहाड़ी तक पूरा दौर ही शायद नैतिकता और कानून के उपयोग और दुरूपयोग के बीच में शटल कॉक की तरह कभी इधर तो कभी उधर दोनों का मतलब ढूँढ़ने में लगा है. इसी संदर्भ में पुराने लोगों की एक पुरानी सी बात याद आ गई. कानून से नहीं बनते राम और सीता, ढेर के ढेर बनते बस हर्षद मेहता.

  • 4. 17:06 IST, 23 जून 2012 bhinyaram khoth:

    आपने बहुत अच्छा लिखा तारीफ के लिय मेरे पास शब्द नहीं हैं

  • 5. 21:08 IST, 27 जून 2012 दिनेश चंद्रा:

    हिन्दुस्तान में क्या ये हो सकता है?

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