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वज़न जैसा हल्का मामला

वंदनावंदना|शनिवार, 02 जून 2012, 13:15 IST

फिल्म अभिनेत्री और पूर्व मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय के 'मोटापे' को लेकर छप रही खबरों से मुझे खुजली तो कई दिनों से मच रही थी. लेकिन तिल का ताड़ बनाने वाले लोगों की फितरत समझकर मैने इस खबर को थोड़ा नजरअंदाज करने की कोशिश की.

लेकिन फिल्म और फैशन का तड़का लिए कान फ़िल्म फेस्टिवल के खत्म होते होते बात हद से आगे बढ़ गई. अब हाथ की खुजली मिटते नहीं मिट रही है.

कान में फिल्मों के मामले में भारत का मामला आमतौर पर ठन ठन गोपाल वाला ही रहता है. हाँ रेड कार्पेट पर छटा बिखेरने में जरूर भारतीय अभिनेत्रियाँ अपना जलवा दिखाती रही हैं.

ग्लैमर किसी भी फिल्म फेस्टिवल और रेड कार्पेट का अहम हिस्सा होता है. इसलिए ये बात तो कुछ हद तक समझ में आती है कि किस हसीना ने रेड कार्पेट पर कौन सी डिजाइनर ड्रेस पहनी है..इस पर 'गिद्द भरी' नजर सभी गढ़ाए रहते हैं.

लेकिन इस बात से क्या मतलब निकाला जाए जब भारत में आधे से ज्यादा लोगों की नज़रें सिर्फ इस बात पर लगी रहीं कि नई नवेली माँ बनी ऐश्वर्या राय कान में कितनी मोटी या पतली दिखेंगी या अपने मोटापे को छिपाने के लिए वे कैसे कपड़े पहनेंगी ?

नवंबर में माँ बनने के बाद जब कभी ऐश्वर्या किसी कार्यक्रम या पार्टी में दिखाई दी, तब तब उन्हें अपने मोटापे के लिए मी़डिया और आम लोगों दोनों की तंज भरी फब्तियों का शिकार होना पड़ा.

मानो वज़न बढ़ाकर ऐश्वर्या ने कोई गुनाह कर दिया हो, मानो छरहरे बदन वाली अपनी पुरानी फिगर में न दिखकर उन्होंने कोई राष्ट्रीय नियम तोड़ दिया हो, मानो ऐश्वर्या के ऐसा करने से राष्ट्र हित को कोई भारी धक्का लगा हो.

माँ बनने के बाद वजन बढ़ना न ही कोई नई बात है और न ही कोई अनहोनी बात. फिर माँ बनने के बाद एक अभिनेत्री के वज़न बढ़ने को लेकर इतना हंगामा क्यों बरपा है. वे तो अभी कोई फिल्म भी नहीं कर रही कि उनके वजन का असर फिल्म में उनकी निभाई भूमिका पर पड़ रहा हो.

हाल के दिनों में अखबारों की तस्वीरों और चैनलों पर नज़र डालें तो ऐश्वर्या को लेकर छपी खबरें बेहद हास्यास्पद और बचकाना तो दूसरी ओर दिल दुखा देने वाली लगीं.

उनके फूले हुए चेहरे का क्लोज़ कप और डबन चिन दिखाना, कमर पर बार-बार कैमरा चमकाना..ये सब क्या दर्शाता है ? किसी ने तो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते हुए ये तक लिख दिया कि क्य ऐश्वर्या दोबारा गर्भवती हैं.

यू ट्यूब पर उपलब्ध उस वीडियो पर क्या कहेंगे जहाँ 'मोटी' ऐश्वर्या की तस्वीरें हैं, बैकग्राउंड में हाथी की आवाज़ डाली गई है. वीडियो में उन्हें काजोल की मिसाल देते हुए सलाह दी गई है कि समय आ गया गया है कि ऐश्वर्या जिम जाना शुरु कर दें.

बतौर अभिनेत्री मैं कतई ऐश्वर्या की फैन नहीं हूँ. दो तीन फिल्मों को छोड़ दें तो मुझे उनका अभिनय कभी जानदार नहीं लगा. उनकी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल उठाए तो बहुत से लोग उनकी हिमायत शायद ही करें. लेकिन यहाँ माजरा दूसरा है.

माँ बनना, बनने के बाद काम दोबारा कब शुरु करना, वजन घटाना या बढ़ाना ये बहुत ही निजी सवाल होते हैं. ऐश्वर्या भले ही पब्लिक पर्सनेलिटी हैं लेकिन मामृत्व के बाद उन्हें अपना फिगर किस कदर मेनटेन करना है ये तय करने की भारी भरकम जिम्मेदारी उनकी खुद की है.

बाहरी लोगों को फ़ज़ूल का एडवाइज़र बनने की ज़रूरत नहीं है. लग रहा है जैसे एक अभिनेत्री के बढ़े हुए वज़न तले देश की उम्मीदें दबी जा रही हैं.

बात सिर्फ एक नामचीन अभिनेत्री की नहीं है. वे तो पूरी समस्या का नमूना भर है. ऐश्वर्या के वज़न पर ये राष्ट्रीय ऑबसेशन महिलाओं को लेकर भारतीय समाज की अजीबोगरीब सोच दर्शाती है.

ग्लैमर, सेलिब्रटी और सुपरमॉडल तो लोगों को चाहिए लेकिन जब वो महिला सेलिब्रिटी माँ बन जाए तो उनके 'बेडौल, मोटे शरीर' का क्या करें लोगों को पता नहीं.

लगता तो यही है कि जब भारत में भविष्य में कोई सेलिब्रेटी माँ बने तो साल दो साल खुद पर कर्फ्यू लगा ले...जब लोगों की फैंटसी को लुभाने लायक फिगर हो जाए तभी बाहर निकलने की जुरर्त करें..और ये सब वज़न जैसे हल्के मामले के कारण.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:01 IST, 02 जून 2012 gauraw upadhyay:

    मुझे लगता है कि बीबीसी के पास ऐश्वर्या राय के मोटापे जैसे मु्द्दे को छोड़कर और कोई मसला नहीं है लिखने के लिए.

  • 2. 18:39 IST, 02 जून 2012 naval joshi वंदना जी, मुझे लगता है पहली बार आप�:

    वंदना जी, मुझे लगता है पहली बार आपने बेफिजूल मुद्दा उठाया. लेकिन आपने बात उठा ही दी है तो इसके प्रति लोगों का नजरिया भी सामने आना ही चाहिए. जो लोग इस अभिनेत्री के बारे में इस तरह की बात कर रहे हैं वे दरअसल अभिनेत्री में मातृत्व भाव को हजम नहीं कर पा रहे है और यही दुविधा इस अभिनेत्री की भी है.

    पिछले डेढ़ वर्ष से मातृत्व की अनुभूति में जीने वाली यह महिला अपने चेहरे के भावों को जल्द से जल्द मिटाकर फिर से उसी 'मसाला' टाईप स्टाईल में लोगों के सामने आना चाहती है,यही स्थिति उसको हास्यास्पद बना रही है.

    अभिनेत्रियां मोटी भी हो सकती है और पतली भी लेकिन माँ होना और मसाला दिखना दोनों विरोधाभासी हैं. यही इस अभिनेत्री की भी दिक्कत है और इन सौन्दर्य पिपासुओं की भी दिक्कत है. इनके लिए सौन्दर्य का अपना पैमाना है. माँ होने की खूबसूरती ये पहचान भी कैसे सकेगें ? लेकिन यह महिला माँ होने में इस तरह हीनता महसूस न करती तो अधिक सौन्दर्यवती होती.

  • 3. 01:28 IST, 03 जून 2012 Kuldeep:

    कैसे विषय पर आप अपनी ऊर्जा, समय और प्रतिभा बर्बाद कर रही हैं.

  • 4. 03:22 IST, 03 जून 2012 SHYAM :

    वंदना जी, भारत और विश्व में इसके अलावा तमाम मुद्दे हैं जो लोगो से सरोकार रखते हैं !
    अब पत्रकारिता और मीडिया का ये स्तर ,क्या लिखा जाय! जैवविविधता ,रक्षा ,शिक्षा ,महिला शशक्तीकरण इत्यादि इन मुद्दों को बीबीसी ने तो कोसो दूर छोड़ दिया है.

  • 5. 09:47 IST, 03 जून 2012 ksg:

    ये सब फालतू बातें हैं. लोगों को कुछ सकारात्मक काम में अपना समय लगाना चाहिए.

  • 6. 11:44 IST, 03 जून 2012 prem:

    वंदना जी, मीडिया वालों को आप से ज्यादा और कौन जानता है. मीडिया वालों को बस कोई मसाला चाहिए टीआरपी के लिए चाहे मुद्दा शिक्षाप्रद हो या नहीं. इसलिए मीडियावालों को क्या चिंता. आप भी चिंता छोड़ दीजिए. ऐश्वर्या को अपनी ज़िंदगी जीने दीजिए.

  • 7. 23:47 IST, 03 जून 2012 Ajay:

    कैसे विषय पर आप अपनी ऊर्जा, समय और प्रतिभा बर्बाद कर रही हैं.

  • 8. 06:54 IST, 04 जून 2012 Dr.Lal Ratnakar:

    बीबीसी की अपनी सोच है और उसके नज़रिए पर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए. मोटापा तो मोटापा ही होता है वह किसी को भी और कभी भी पकड़ सकता है. अब जैसे मैं ही न चाहते हुए भी मोटा हो गया हूँ पर मेरी स्थिति जरा भिन्न है क्योंकि मैं तो ठहरा आम आदमी. वंदना की अपनी चिंता है किसी की मोटाई नाप लें और अपनी साईट पर लिख लें और परोस दें हमें तो पढ़ना ही है क्योंकि हमें तो नशा है बीबीसी पढ़ने का.

  • 9. 09:47 IST, 04 जून 2012 yaswant:

    और भी ग़म है ज़माने में मोटापे के अलावा

  • 10. 10:30 IST, 04 जून 2012 BHEEMAL Dildarnagar:

    इस पर टिपण्णी करना ही समय की बर्बादी है.

  • 11. 16:13 IST, 04 जून 2012 Deepika :

    वंदना जी, भारत और विश्व में इसके अलावा तमाम मुद्दे हैं जो लोगो से सरोकार रखते हैं.
    अब पत्रकारिता और मीडिया का ये स्तर ,क्या लिखा जाए. जैवविविधता ,रक्षा ,शिक्षा ,महिला सशक्तिकरण इत्यादि इन मुद्दों को बीबीसी ने तो कोसो दूर छोड़ दिया है.

  • 12. 16:32 IST, 04 जून 2012 E.A. Khan Jamshedpur :

    वंदना जी आप का ब्लॉग पढने के बाद मुझे यह मजबूरन लिखना पड़ रहा है की भारत में पत्रकारिता किस मजबूरी से गुज़र रही है. इस पेशे में मजबूरन जुड़े हुए लोग अख़बारों की ब्रिकी के लिए क्या- क्या ख़बरें छापने पर मजबूर हो जाते हैं.

  • 13. 18:08 IST, 04 जून 2012 Ram Maurya:

    एकदम फालतू और बकवास विषय है.इतनी फुर्सत नहीं है कि इस पर टिपण्णी की जाए.

  • 14. 20:41 IST, 04 जून 2012 BINDESHWAR PANDEY:

    वंदना जी! आप इस तरह का ब्लॉग लिख कर बीबीसी की गरिमा को कम कर रही हैं.कृपया देश के अन्य मुद्दों पर बात कीजिए ....हम श्रोता और बीबीसी हिंदी डोटकोम के पाठकों की आपसे ऊंची आकांक्षाएं होती हैं अतः इस तरह का ब्लॉग न लिखा जाए...

  • 15. 22:31 IST, 04 जून 2012 imran:

    क्या फर्क पड़ता है.

  • 16. 04:53 IST, 05 जून 2012 Devjeet:

    कैसे फ़ालतू के विषय पर आपने अपना कीमती वक़्त और मेहनत बर्बाद किया है वंदना जी ? बीबीसी जैसे विश्व स्तरीय समाचार पत्र को ये शोभा नहीं देता.

  • 17. 11:23 IST, 05 जून 2012 Anil:

    आप भी इसी मुद्दे का भाग हैं कृपया कुछ रुचिकर मुद्दे पर लिखें.

  • 18. 20:21 IST, 05 जून 2012 सुरेंद्र शर्मा:

    बीबीसी के सर्वे में तो हम 10 में से 10 दे देते हैं मगर अब लगता है सच्चाई कुछ ओर ही होती जा रही है. कोई फर्क नहीं रह गया है दूसरे मीडिया और बीबीसी में. आपने कुपोषित लोगों पर तप नहीं लिखा. फिल्मों की दुनिया अलग है और वे लोग भी अलग जो उनमें काम करते हैं आज वे जरूरत बिना भी नग्नता ही दिखाते है और उसकी बेहूदा वकालत भी करते हैं. तो फिकरे कसने या चटकारे लेने वालों को क्यों कोसा जाये. शर्म तो उन्हें आती है जो यह सब पसंद नहीं करते. आपके ब्लॉग पर प्रतिक्रियाएं ही देख लें.

  • 19. 20:42 IST, 05 जून 2012 बिंदेश्वर पांडे, बीएचयू:

    सभी पाठकों के विचार पढने के बाद मैं आज इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि बीबीसी ने 'वजन जैसा हल्का मामला' को अपने ब्लॉग में जगह दे कर निश्चित रूप से अपने वजन को हल्का किया है

  • 20. 18:32 IST, 07 जून 2012 सुजीत कुमार झा:

    ये सब फालतू बातें हैं.

  • 21. 23:21 IST, 18 जून 2012 Abhijeet Kumar:

    'कान में फिल्मों के मामले में भारत का मामला आमतौर पर ठन ठन गोपाल वाला ही रहता है.' -
    वंदना जी मैं आपके इस वक्तव्य पर आपत्ति जताना चाहता हूं. आपको अपनी जानकारी और पुख्ता करनी चाहिए. कई ऐसे युवा फिल्म मेकर हैं जिनकी फिल्में कान जैसे फिल्म समारोहों में अच्छा कर रही हैं. ये और बात है कि हिंदुस्तानी मीडिया उनको कोई कवरेज नहीं देती. आपलोगों की नजर भी सिर्फ स्टार्स और उनके कपड़ों तक ही सीमित है.

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