« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

ढूँढते रह जाओगे....

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|बुधवार, 30 मई 2012, 07:41 IST

टीम अन्ना घायल शेर की तरह चिल्ला रही है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन्हें आरोप साबित करने की चुनौती दे रहे हैं. कह रहे हैं कि आरोप साबित हुए तो संन्यास ले लेंगे.

प्रशांत भूषण को इस बात का पछतावा नहीं कि उन्होंने प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाते हुए शिखंडी का उदाहरण दे डाला.

कल को सरकार के मंत्री भी इस होड़ में शामिल हो जाएँगे. फिर शुरू होगा कभी न थमने वाला आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला. ऐसा सिलसिला जो कहीं जाकर नहीं थमता.

टीम अन्ना में दरार है, तो सरकार भी लोकपाल विधेयक को लेकर संजीदा नहीं और विपक्ष भी इस मामले पर शेखी बखारने के अलावा कुछ ठोस करता नहीं दिख रहा है.

बाबा रामदेव की एक अलग धुन है. गाहे-बगाहे उनके बयान मीडिया में चर्चा बटोरते हैं और कल को बाबा का नया बयान उनके पुराने बयान की ही बखिया उधेड़ते नजर आता है.

ऐसा लगता है कि सब कुछ एक फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह हो रहा है. नायक, खलनायक सब तय हैं. सरकार भी आनंद मगन है. उसे और क्या चाहिए. पिछले साल अगस्त में हुए आंदोलन से घबराई सरकार घुटने टेक गई. लेकिन समय अनुकूल होते ही उसकी भी भाव-भंगिमा बदल गई.

इस मामले में जनता ने भी कम उपकार नहीं किया है. मैं भी अन्ना तू भी अन्ना के नारे लगाते रामलीला मैदान में जुटी भारी भीड़ का उत्साह भी पस्त हो गया लगता है.

हर कोई रास्ते से भटक गया लगता है. हर किसी को एक-दूसरे को बौना दिखाने में लगा है. इन सबके बीच असल मुद्दों की फिक्र किसी को नहीं.

क्या कभी वो लोकपाल बन पाएगा, जिसके लिए बड़ी शिद्दत से मांग उठी थी? क्या सरकार वर्षों से लटकाए जा रहे लोकपाल विधेयक को उतनी मजबूती दे पाएगी, जिसकी मांग पिछले एक साल से हो रही है?

क्या टीम अन्ना अपनी मांग पर टिकी रहेगी? क्या टीम अन्ना अराजनीतिक रह पाएगी? क्या टीम अन्ना खुद का घर संभाले रख पाएगी? ये सब ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब शायद हम आप सभी ढूँढ़ते ही रह जाएँगे.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 10:26 IST, 30 मई 2012 भीमल, दिलदारनगर:

    भाई पंकज जी, तनिक सब्र करिए. आम जन पहले से ही गुमराह है. तेल देखो तेल की धार देखो.

  • 2. 11:31 IST, 30 मई 2012 नवल जोशी:

    पंकज जी आपने बहुत ही प्रासंगिक और बुनियादी सवाल उठाया है. जनता, अन्ना, टीम अन्ना और सरकार, हर सवाल इसी चौराहे पर आकर जैसे भटक गया है,. आपने पिछले अगस्त में लोकपाल के मुद्दे पर सरकार की घबराहट का जिक्र किया है. अन्ना की पहलकदमी में जिस तरह लोग सडकों पर उतर आये थे बिना इस बात को समझे कि लोकपाल का मतलब क्या है. आम लोगों के लिए यही बहुत था कि एक ऐसा आदमी खडा होकर सरकार से सवाल पूछ रहा है जिसका जीवन रहस्य की परतों में घिरा नहीं है और उसके बारे में कुछ छुपाने योग्य है भी नहीं. इसके बावजूद सरकार ने हर कोण से अन्ना की छानबीन करवाई, कभी भगोड़ा कहा, कभी सनकी और कभी भटका हुआ लेकिन यह आदमी टस से मस नहीं हुआ इससे लोग प्रभावित हुए और साथ चल पड़े. ठीक इसी वक्त अन्तर्राष्टीय जगत में तहरीर चौक छाया हुआ था और पूरा अरब जगत उथल-पुथल से गुजर रहा था. सरकार नहीं चाहती थी कि अन्ना के आन्दोलन का अरब जन उबाल से कोई तारतम्य बन जाए शायद इसलिए सरकार ने थोडी ना नुकुर के बाद अन्ना को सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी. यहीं पर सरकार नैतिक रूप से पराजित हो चुकी थी, क्योंकि यदि अन्ना ही सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि हैं तो फिर संसद और विधान सभाओं में बैठे लोग किसके प्रतिनिधि हैं? अन्ना की ईमानदारी पर कोई शक नहीं है लेकिन समझदारी का कोई प्रमाण अन्ना अब तक नहीं दे सके हैं. इस सिस्टम के लोगों को अन्ना सवालों के दायरे में अन्ना लाये हैं लेकिन सिस्टम पर अन्ना चुप हैं यही बडा सवाल है. इस सिस्टम पर सवाल भी पर्याप्त नहीं है सिस्टम कैसा होना चाहिए पहले यह स्पष्ट होना चाहिए. लेकिन केजरीवाल जैसे लोग जो कांग्रेस को हराने के अभियान में जन सभाएँ करने निकल पते हैं, इससे इनकी अपने बारे में खामखयाली और दिमागी विचलन का पता चलता है. अन्ना के इर्द-गिर्द जो लोग अन्ना टीम के नाम से सक्रिय हैं उनकी कोई विश्वसनीयता अथवा स्वीकार्यता नहीं है ये केवल महत्वाकांक्षी लोग हैं जो कि विभिन्न कारणों से अन्ना के साथ खडे हैं. सवाल हर जगह हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जवाब ही नहीं है,लोग अपने अनुकूल जवाब चाहते हैं जब अनुकूलता का यह आग्रह छूट जाएगा और जो जवाब है उसे स्वीकार करने के लिए लोग ईमानदारी से तैयार होगें शायद तभी जवाब सामने आएगा.

  • 3. 16:23 IST, 30 मई 2012 रोशन चंद:

    सरकार बहुत बड़ी होती है, उसके पास पावर बहुत है. सरकार से लड़ना सबके बस की बात नहीं है, उसे जो करना है वो करेगी. अपना कार्यकाल पूरा करेगी फिर नई सरकार आएगी वो भी यही करेगी जो अब हो रहा है. हमारा सारा सिस्टम ही ठीक नहीं है.

  • 4. 17:38 IST, 30 मई 2012 कुतुबुद्दीन:

    कोर्ई भी सरकार आए ऐसा ही होगा. लेकिन अन्ना जी को बाजू करें तो बाकी सब भ्रष्ट हैं. अन्ना का लोकपाल आ सकता है अगर राष्ट्रपति शासन हो जाए, उसमें सब संभव है.

  • 5. 20:10 IST, 30 मई 2012 जे दवे:

    भारत में हजारों सालों से नरगिस अपनी बेनूरी पे रोए जा रही है लेकिन इस चमन में कोई दीदावर पैदा नहीं होता. इन कई सालों में हमने गुलाम और मजबूर बने रहने की सारी खूबियां संजो कर रखी है. और पूरी दूनिया में लूटने के लिए भारत से ज्यादा बेहतर देश कोई नहीं है, ये बात लुटेरों ने समझ ली है.

  • 6. 06:54 IST, 31 मई 2012 harvir chaudhary:

    टीम अन्ना अपना रास्ता भटक गई है.

  • 7. 09:09 IST, 31 मई 2012 Manbeer Singh:

    पंकज जी, आप बिलकुल सही कह रहे हैं. पर जरा देखिए तो क्या विडंबना है कि जब देश के बारे में कुच बोलना होता है तो पीएम जी मौन व्रत धारण कर लेते हैं.और जब उनके बारे में बोला जाता है तो बिदक जाते हैं. देश ने ही पीएम बनाया है पीएम ने देश नही बनाया. उन्हें देश की बजाय अपनी व्यक्तिगत छवि की चिंता है .

  • 8. 09:38 IST, 31 मई 2012 अनूप अध्यक्ष :

    इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म है, आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार
    बेहयाई इस कदर बढ़ गयी है कि नेताओं को अब जेल जाने में अपमानित होने का लेश मात्र भी भय नहीं. लोकलाज धो पोंछ कर बैठ गएँ हैं. नेताओं को कारावास अथवा घर में कोई फर्क नहीं मालूम होता. उन्हें सब सुविधाएँ मुहैया करायी जाती है.

  • 9. 00:01 IST, 01 जून 2012 Manvedra Singh:

    आपके ढेर सारे सवालों को ढूंढते रह जाओगे के शीर्षक के साथ पढ़ा तो सोच में पड़ गया, क्या वाकई इनका जवाब इतना मुश्किल है? जो आपका पहला सवाल है कि क्या कभी मजबूत लोकपाल बन पायेगा, यह सवाल अपने आप में आनोखा है! और इसे लागू करवाने की जिम्मेदारी टीम अन्ना पे थोपना दूसरा अनोखा सवाल है?
    क्या आपने मेरी तरह बचपन में "जिस डाल पे बैठना उसी को काटना" जैसी मूर्खता से सम्बंधित कहानिया नही सुनी है? इन कहानियो का भारतीय समाज के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान रहा है... तो इसके बावजूद हमारे मनमोहन सिंह और उनके भावी साथी जिसमे सिब्बल और मनु सिंधवी जैसे कथित कौटिल्य शामिल है, से कालिदास बनने की उम्मीद करना अनूठा नही है?
    परन्तु मुझे इसके बावजूद मुझे प्रशांत भूषण का मनमोहन को शिखंडी कहना वाकई बुरा लगा. आखिर शिखंडी की भी कोई इज्जत थी वो तो सीधा भीष्म के सामने खड़ा हो गया था... आपको नही लगता उसने कितना बड़ा खतरा उठाया था?
    मै प्रशांत की जगह होता तो धृतराष्ट्र जैसा बताता... (आम आदमी होने अपने अलग फायदे है आप कुछ भी बोल जाओ, कोई आपकी बात को गंभीरता से नही लेगा. हा हा... आप खुद भी नही...)
    रही जनता के उपकार की बात तो ये आप भी अच्छी तरह जानते है कि पूनम पण्डे के कपडे उतारने की खबर मंहगाई और आर्थिक मंदी से जयादा भारी पड़ती है (मेरी बात का विस्वास न हो तो आप अपने पीछे 3 दिन का रिकॉर्ड देख ले)
    माफ़ कीजियेगा आपके इतने सवालों के जवाब में मै अपने सवाल छोड़ रहा हूँ. नही नही मुझे जवाब नही चाहिए. आप सिर्फ पढ़ लेंगे यही मेरे लिए काफी है.
    - क्या मजबूत लोकपाल लागू करने का दबाव टीम अन्ना की जगह सरकार पे नही होना चाहिए?
    - जनता को टीम अन्ना से सारी उम्मीद करके खुद आईपीएल में व्यस्त होने जैसे बातो से खुद सबक नहीं लेना चाहिए?
    - क्या भारतीय मीडिया को जिम्मेदारी समझते हुए जनता को गुमराह करना नही रूकना चाहिए?
    टीम अन्ना अगर राजीतिक हो भी जाती है तो मुझे इसका कोई आफसोस नही रहेगा, क्योंकि अगर जेपी आन्दोलन का फायदा उठा कर लालू, मुलायम जैसे लोग नेता बन सकते है और हम उन्हे उम्मीदवार के विकल्प के रूप देख सकते है, तो टीम अन्ना के राजनीतिकरण के पूरे पक्ष में हूँ.

  • 10. 13:42 IST, 01 जून 2012 Uma Shanker Chaurasiya:

    टीम अन्ना सरकार पर चाहे जितना भी दबाव बनाने की कोशिश करे मगर सरकार पर इसका कोई असर नही पड़ेगा....क्योंकि सरकार की नियत में खोट है कि अगर लोकपाल बिल पास हो जाएगा तो पूरे सराकर के सहयोगी इस चपेट में लिप्त पाए जाऐगें...

  • 11. 18:23 IST, 01 जून 2012 himmat singh bhati:

    हाजमा खराब है, सिस्टम खराब है , उसे ठीक करने के लिए समय तो लगता है. पाप का घड़ा जब भर जाता है तो फट जाता है.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.