अगर मैं प्रधानमंत्री होता
स्कूल के दिनों में निबंध लिखने को जो विषय दिए जाते थे वे अक्सर बेहद उबाऊ होते थे. इनमें से एक होता था, 'यदि मैं प्रधानमंत्री होता....'
बचपन में ये कभी समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री होने पर क्या करना पड़ता है और क्या किया जा सकता था. तो अंत में ये होता था कि गुरुजी अपनी मर्जी का एक निबंध लिखवा देते और ज़्यादातर बच्चे उसे रटकर परीक्षा में पास होने का जुगाड़ करते थे.
लेकिन अब कुछ चीज़ें समझ में आती हैं. क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की एक सूची मन में हर वक़्त रहती है. शायद हर सोचने विचारने वाले व्यक्ति के मन में ऐसा होता होगा.
जब यूपीए सरकार की दूसरी पारी के भी तीन साल बीत गए और मीडिया में आकलन की प्रतिस्पर्धा शुरु हो गई तब लगा कि अपने साथियों से ही पूछा जाए कि वे क्या सोचते हैं.
मैंने अपने साथियों से अलग-अलग पूछा कि पिछले आठ वर्षों से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में देख रहे हैं अगर वे मनमोहन सिंह की जगह होते तो क्या करते और क्या नहीं करते?
जो जवाब आए, उन्हें पिरोकर देखें तो यूपीए सरकार और मनमोहन सिंह के कार्यकाल की एक तस्वीर उभरती है. आप भी एक नज़र डालिए. बस, इतनी सी इल्तजा है कि ध्यान में रखिएगा कि ये ब्लॉग मेरे नाम से प्रकाशित हो रहा है लेकिन इस बार विचार उधार के हैं...
दस चीज़ें जो मैं करता (या नहीं करता) अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता...
1. मनमोहन सिंह बहुत पढ़े लिखे और समझदार व्यक्ति हैं. वे सब कुछ समझते हैं. अगर मैं उनकी जगह होता तो कम से कम अपने निर्णय ख़ुद लेता. किसी के इशारे पर नहीं चलता. इस अनिर्णय की स्थिति से ये हो गई है कि पिछले आठ वर्षों में ऐसा एक भी निर्णय याद नहीं आता जो मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में लिया हो. नरसिंह राव के प्रेस सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने लिखा था कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को भले ही 'फ़र्स्ट अमंग इक्वल्स' हों लेकिन वो होते अव्वल ही हैं. निर्णय लेने में उनसे आगे कोई नहीं होता. लेकिन मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों अव्वल नहीं दिखते.
2. मैं प्रधानमंत्री की जगह होता तो लोकप्रियता और गठबंधन की राजनीति में सहन करने की एक सीमा तय करके रखता. याद है जब 2008 में अमरीका से परमाणु समझौते का मुद्दा आया था तो कैसे उन्होंने कैसे अपनी सरकार और अपने प्रधानमंत्रित्व सब कुछ को दाँव पर लगा दिया था. समझ में नहीं आता कि एफ़डीआई से लेकर रेल का भाड़ा बढ़ाए जाने तक दर्जनों और मुद्दों पर वे क्यों समझौता करते चलते हैं. मैं होता तो एक सीमा के बाद इस्तीफ़ा दे देता. मुझे लगता है कि ये सीमा पार हो चुकी है.
3. मुझे याद आता है कि वर्ष 2004 में जब प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण दिया था तो उन्होंने संस्थागत सुधारों की बात कही थी. वह मूल रूप से नौकरशाही में सुधार की बात थी. जिसमें कलेक्टर, एपी जैसे अधिकारियों को निश्चित कार्यकाल देना जैसी बात शामिल थी. उन्होंने कुछ शुरुआत तो की लेकिन नौकरशाही ने आगे कुछ करने नहीं दिया. नतीजा ये है कि आज सरकार गर्त में दिखती है और नौकरशाह मज़े में. मैं होता तो नौकरशाही के विरोध के बावजूद सुधार कार्यक्रम को नहीं छोड़ता. आख़िर देश तो नौकरशाही ही चलाती है. वह जवाबदेह क्यों न बने.
4. मुझे तो प्रधानमंत्री का 1992 का भाषण याद आता है जब वित्तमंत्री के रुप में आर्थिक सुधार की शुरुआत करते हुए मनमोहन सिंह ने महात्मा गांधी का उद्धरण देते हुए कहा था कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं वह समाज के आखिरी आदमी के लिए है. आज जब वे प्रधानमंत्री के रूप में आठ साल पूरा कर रहे हैं तो यह देखना पीड़ादायक लगता है कि उनकी अध्यक्षता में चलने वाले योजना आयोग तो कभी हर रोज़ 26 रुपए कमाने वाला ग़रीब नज़र नहीं आता तो कभी उनकी सरकार को ये लगता है कि महंगाई इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लोगों की ख़रीदने की क्षमता बढ़ गई है. मैं होता तो ग़रीबी और महंगाई को लेकर ऐसी हास्यास्पद स्थिति तो कम से कम नहीं बनने देता.
5. मैंने मनमोहन सिंह को हमेशा एक अर्थशास्त्री की तरह देखा है. समझ में नहीं आता कि एक समय भारत को संकट से उबारकर आर्थिक उदारता के दौर में लाने वाले मनमोहन सिंह वामपंथी दलों के इतने दवाब में कैसे आ जाते हैं कि आर्थिक सुधार की पूरी प्रक्रिया ही रुक जाती है. मैं उनकी जगह होता तो उसी अर्थशास्त्री की तरह काम करता रहता.
6. मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो देश में जगह-जगह अनाज तो सड़ने नहीं देता. उनके भंडारण की बेहतर व्यवस्था करता और जमाखोरी को ख़त्म करने के लिए कड़े क़दम उठाता. मैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ख़त्म कर देता और ज़रुरतमंदों को सीधे नक़द राशि देने का इंतज़ाम करता और अनाज का आवंटन हर उस व्यक्ति के लिए होता, जिसे उसकी ज़रुरत है. उसके लिए आय आदि की कोई सीमा नहीं होती.
7. इस समय दुनिया में राजनीतिक पुनर्ध्रुवीकरण की एक प्रक्रिया चल रही है. रूस और चीन एक साथ आते दिख रहे हैं और उनके नेतृत्व में सऊदी अरब के विरोधी इस्लामिक देश जैसे ईरान, सीरिया और लेबनान एक साथ आते दिख रहे हैं. ऐसे में अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो अपनी पूरी विदेश नीति को अमरीका की ओर न मोड़कर दूसरे देशों के साथ काम करने की एक गुंजाइश बचाए रखता है. शायद इससे आने वाले दिनों में, आने वाली पीढ़ियों की मुश्किलें कम हो जातीं.
8. अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो वर्ष 2009 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के ख़िलाफ़ वोट नहीं देता. इस एक निर्णय की वजह से ईरान ने भारत के साथ 21 अरब डॉलर का गैस समझौता ख़त्म कर दिया. इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को जैसा नुक़सान हुआ वह अपूरणीय है. मैं ऐसा कोई क़दम नहीं उठाता.
9. मैं इस प्रधानमंत्री की जगह होता तो अन्ना हज़ारे को कभी गिरफ़्तार नहीं करवाता क्योंकि इसकी कोई वजह नहीं थी. मैं रामदेव के अनशन के दौरान आधी रात को आंसू गैस के गोले छोड़कर मैदान भी खाली नहीं करवाता. अगर ज़रुरी ही होता तो यह काम दिन में करवाया जा सकता था. क्या होता अगर भीड़ हिंसक हो जाती...क्या गोलियाँ भी चलतीं. एक लोकतांत्रिक देश में ये तरीक़ा ठीक नहीं है.
10. अगर मैं अपने आपको उनकी जगह रखकर सोचता हूँ कि लगता है कि मैं कम से कम इतना चुप तो नहीं रहता. ये ज़माना बराक ओबामा जैसे नेताओं का है, सोशल मीडिया का है. मैं उनकी जगह होता तो जनता से सीधे संवाद की कोशिश करता और फ़ेसबुक, ट्विटर आदि का ख़ूब प्रयोग करता.
ये तो रही साथियों की राय.
मैं ख़ुद इतनी गहरी बातें नहीं सोच पाता. लेकिन ये ज़रुर सोचता हूँ कि अगर मैं मनमोहन सिंह की जगह होता तो कभी कभी हँसता, मुस्कुराता और कभी दुखी होकर आँसू भी बहाता. चाहे जो करना पड़ता मैं इस सपाट चेहरे से निजात पाता.
लेकिन साहबान क्या किया जाए कि मनमोहन सिंह की जगह कोई हो नहीं सकता. न मैं न मेरे साथी. फिर भी सोचिए कि अगर आप होते तो क्या करते?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
संसदीय चुनाव से पहले कांग्रेस ने नारा दिया था “कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ.” लेकिन अब सरकार की पॉलिसी को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि “कांग्रेस का हाथ अमेरिका के साथ”हो गया है. न तो प्रधानमंत्री सेकुलरिज्म की हिफाज़त कर रहे हैं और न ही हिंदुस्तान की विदेश नीति की. ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री हिन्दुस्तानी अवाम से ज्यादा अमेरिका को खुश करने में लगे हैं. क्या हिंदुस्तान के अगले संसदीय चुनाव में अमरीकी नागरिक भी मतदान करेंगे? अमेरिका के हर सही गलत काम की हिमायत आखिर क्यों कर रहे हैं?
अमेरिका ने इराक पर हमला किया - हिन्दुस्तान खामोश
अमेरिका ने लीबिया पर हमला किया - हिन्दुस्तान खामोश
जनाब जार्ज फर्नांडिस के कपड़े उतरवाए - हिन्दुतान खामोश
जनाब कलाम साहब की बेअदबी की - हिन्दुस्तान खामोश
मोहतरमा मीरा शंकर से बदसुलूकी की - हिन्दुस्तान खामोश
और अब अमेरिका बेवजह ईरान बार पाबन्दी लगा रहा है और प्रधानमंत्री न सिर्फ खामोश हैं बल्कि अमरीका की हिमायत भी कर रहे है. प्रधानमंत्री किसी भी कीमत पर अमरीका को नाराज़ नहीं करना चाहते.
हिन्दुस्तानी कंपनियों ने ईरान से अपना कामकाज समेट लिया ताकि अमरीका नाराज़ न हो. आपने यूएन में ईरान के खिलाफ वोट किया ताकि अमरीका नाराज़ न हो. आप ईरान के सैटेलाइट लांच नहीं करते ताकि अमरीका नाराज़ न हो.
आप ईरान से गैस पाइप लाइन नहीं लाए ताकि अमरीका नाराज़ न हो. आप ने अपनी सरकार की बाज़ी लगा कर अमेरिका से परमाणु करार किया ताकि अमरीका नाराज़ न हो. इसराइल गज़ा पर हमला करता रहा और आप तमाशा देखते रहे ताकि अमरीका नाराज़ न हो.
और अब ईरान से तेल खरीदने से भी आप पीछे हट रहे हैं ताकि अमरीका नाराज़ न हो. ऐसा लगता है कि हिन्दुतान का विदेश मंत्रालय अमरीकी राजदूत चला रहे हों.
क्या हमारा मुल्क इतना कमज़ोर है कि हम अमरीका के हर सही-गलत कदम की हिमायत करते रहेंगे.
अगर मै प्रधानमंत्री होता तो ये सब न करता.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो भारत के हर ज़िले में एम्स जैसा अस्पताल और आईआईटी जैसा इंस्टीच्युट बनवाता और हर गाँव में बिजली पहुँचाता.
वाह एक सरकार का शानदार आकलन करने के लिए आपको कोटि-कोटि धन्यवाद. वास्तव में ये सरकार कैसी सरकार है जो आठ सालों में महँगाई और भ्रष्टाचार बढ़ी.
1-काला धन वापस लाता
2-विदेशी कर्ज़ चुका देता (भारत में पैसे की कमी नहीं हैi)
3-सारी फालतू योजनाएँ बंद कर देता
4-गरीबों के बैंक खातों में पैसा जमा करता
5-भ्रष्टाचारियों को कठोर सजा देता
6-हर व्यक्ति को संपत्ति का ऑनलाइन ब्यौरा देना जरूरी होता
7-सरकारी खर्च में कटौती करता
8-सारा सैन्य सामान भारतीय कंपनियों से ही बनवाता
9-बड़े उद्योगों की स्थापना करता
10-विदेश नीति बदलता
बहुत जबरदस्त सुझाव है. काश कि कोई इसे माननीय प्रधानमत्री तक पहुँचाता.
बहुत साधारण है. अगर मैं मनमोहन की जगह होता तो इस्तीफा दे देता. देश की भलाई के लिए इतना ही बहुत है.
1-काला धन वापस लाता
2-विदेशी कर्ज़ चुका देता (भारत में पैसे की कमी नहीं हैi)
3-सारी फालतू योजनाएँ बंद कर देता
4-गरीबों के बैंक खातों में पैसा जमा करता
5-भ्रष्टाचारियों को कठोर सजा देता
6-हर व्यक्ति को संपत्ति का ऑनलाइन ब्यौरा देना जरूरी होता
7-सरकारी खर्च में कटौती करता
8-सारा सैन्य सामान भारतीय कंपनियों से ही बनवाता
9-बड़े उद्योगों की स्थापना करता
10-विदेश नीति बदलता
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो -
1. इस देश के हर नागरिक को सबसे पहले देश सेवा का पाठ पढ़ाता.
2. इस देश के हर नागरिक को कानून का पाठ पढ़ाता.
3. शिक्षा में सुधार कर अपनी भाषा में शिक्षा की व्यवस्था करता. अगर अपनी भाषा में डॉक्टर, इंजीनियर बनते तो मुल्क की तस्वीर बदल जाती.
4. ऐसी व्यवस्था करता कि देश में अच्छा कमानेवाले हर परिवार के लोग टैक्स चुराने की बजाए खुशी-खुशी टैक्स देना पसंद करते.
5. चीन की तरह अपनी उत्पादन क्षमता इतनी बढ़ाता कि देश के साथ साथ विदेशों की जरूरत भी पूरी हो सके.
6. बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए ऐसी व्यवस्था करता जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर आत्मनिर्भरता की स्थिति हासिल हो सकती.
7. अनाज को बारिश में सड़ने नहीं देता और हर उस गरीब और जरूरतमंद को जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिलती, उनके बीच अधिशेष अनाज बांटने का प्रबंध करता.
यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के अनुसार कार्य करता. चाणक्य के अर्थशास्त्र का पालन करता. शिक्षा नीति, न्याय नीति, स्वास्थ्य नीति भारतीय संस्कृति के अनुसार बनाता और यह जो वर्तमान लूटतन्त्र बनाया हुआ है उसको समाप्त करता. भ्रष्टाचार, बलात्कार और मिलावट करने के दोषियों को फाँसी की सजा देता. भारत का राष्ट्रीय धर्म हिन्दू करता. 1000, 500 और सौ के नोटों को बन्द करता. निष्कर्ष यह कि भारत की संस्कृति के अनुसार कार्य करता.
मैं सोचता हूं कि प्रधानमंत्री को बदलना चाहिए.
अन्ना के लोकपाल बिल को पारित करवाता.
अनाज को सड़ने से बचाता और ना कर पाने की स्थिति मे जनता में बाँटने का प्रबंध करता.
कम से कम राजधानी दिल्ली की क़ानून व्यवस्था ठीक करता.
राजनीति से ऊपर उठकर गुजरात के विकास मॉडल को पूरे देश में लागू करता.
प्रतिभा पलायन रोकता.
पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर बनाता.
प्राइवेट स्कूल और हॉस्पिटल का अधिकतम शुल्क निर्धारित करता.
यदि मैं भारत का प्रधान-मंत्री होता तो:
1. सब तरह का आरक्षण समाप्त कर देता.
2. सबको भ्रष्टाचार की खुली छूट देता मगर आयकर विभाग को इतना सतर्क और ईमानदार बना देता कि सारी भ्रष्ट कमाई भारी अर्थ - दंड के साथ सरकारी खजाने में आती और भ्रष्ट कर्मचारी आजीवन जेल की रोटी तोड़ते.
3. काला धन वापस लाने के लिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को तोड़ देता औए अपनी ही पार्टी में काला धन रखने वालों की गिरफ्तारी पहले करता.
4. यह सब न कर पाता तो चुल्लू भर पानी में डूब मरता या कम से कम इस्तीफा देकर अपने गाँव वापस चला जाता.
यदि मैं प्रधानमंत्री होता तो कुछ मित्र देशों के साथ विश्वबैंक और आईएमएफ का विकल्प तैयार करता.
अगर मैं भारत का प्रधानमंत्री होता तो भारतीय सेना को भंग कर देता. भारतीय सेना पर जनता के पैसे का एक बड़ा हिस्सा व्यय हो जाता है. पड़ोसी देशों की स्थिति और उनके साथ भारत के संबंधों को देखते हुए यही ठीक रहेगा क्योंकि चीन को हराया नहीं जा सकता और पाकिस्तान परमाणु क्षमता संपन्न देश है.
अगर मैं भारत का प्रधानमंत्री होता तो मैं गांधी जी का जंतर याद करता और फिर खुद को आम आदमी समझकर खुद ही स्वविवेक से निर्णय लेता.
लोगों की प्रतिक्रियाएं थोड़ी अजीब हैं. लोगों को ये समझना चाहिए कि मनमोहन सिंह एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री हैं प्राचीन राजा नहीं. जिस तरह के सुझाव दिए गए हैं वो केवल राजा-रजवाड़े के जमाने में ही संभव हैं. प्रधानमंत्री के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है. उनपर दया करने की जरूरत है.
1. देश में योग्यता को आगे बढ़ने के लिए आधार बनाता न की धर्म या जाति को. आरक्षण को ख़त्म करके काबिल लोगों को आगे बढ़ने का मौका देता.
2 . देश में सब को बराबर का अधिकार देता. हज में सब्सिडी और कैलाश मानसरोवर में टैक्स जैसे हथकंडे बंद करता.
3. सरकार के सारे काम कम्प्यूटर के द्वारा करना अनिवार्य करता ताकि सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत के लाले पड़ जाते.
4. देश और विदेश में जितना भी काला धन है, उसे देश में वापस लाकर देश की अर्थव्यवस्था में लगाता.
5. न्याय और कानून व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करता. लंबित मुकदमों का समाधान जल्दी करता.
6. नौकरशाही को जवाबदेह बनाता क्योंकि वे जनता के सेवक है जनता के मालिक नहीं.
7. भ्रष्ट नेताओं की सम्पत्ति जब्त करके उनको कड़ी से कड़ी सजा दिलवाता.
8. अर्थव्यवस्था को मजबूत करता और घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों का निजीकरण करता.
9. सरकारी खर्च में कटौती करता.
10. रोजगार के नए अवसर पैदा करता.
अमरीका की नौकरी छोड़ देता, अपने देश के लोगों की फिकर करता. अमरीका की बजाए एशियाई देशों के साथ अच्छे संबंध बनाता. भारत के प्रधानमंत्री की तरह होता, वर्ल्ड बैंक के मुलाजिम की तरह न होता.
नक्सलियों के लिए बात, लात और गोली की नीति अपनाता.
कुछ नहीं करता. जब अच्छा नहीं कर सकता तो बुरा भी नहीं करता.
मनमोहन सिंह जी बहुत अच्छे प्रधानमंत्री हैं, काश उन्हें ईमानदारी से काम करने दिया जाता. काश उनके निर्णय मान्य होते.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो मैं यह करता- सारे नेताओं को झुग्गी-झोपड़ी में रखता. उनका इलाज सरकारी अस्पताल में कराता. उन्हें रेल के जनरल कोच में यात्रा कराता. किसी भी नेता को सुरक्षा मुहैया नहीं कराता. सरकारी राशन-दुकान में जो चावल-आटा मिलता है, उसी से खाना बनवाकर उन्हें अपने हाथों से प्यार से खिलाता और कहता- नेताजी! खाना कैसा लग रहा है, ताकि उन्हें कम से कम पता तो लगे कि गरीबी किसे कहते हैं, सिर्फ भाषणबाजी करने के मौके नहीं देता, एक बार उन्हें गरीब बनाकर दिखाता कि गरीबी किसे कहते हैं.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो आईआईटी जैसे संस्थान बनवाता और हर गाँव में बिजली पहुँचाता.
राजनीति से ऊपर उठकर गुजरात के विकास मॉडल को पूरे देश में लागू करता. सारी फालतू योजनाएँ बंद कर देता. बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए ऐसी व्यवस्था करता जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर आत्मनिर्भरता की स्थिति हासिल हो सकती. मैं भारत के प्रधानमंत्री की तरह होता, वर्ल्ड बैंक के मुलाजिम की तरह नहीं.
काश ऐसा होता, मैं प्रधानमंत्री होता तो सबसे पहले मनी एक्सचेंज पर नियंत्रण खत्म करवाता. पेट्रोल से कस्टम हटवाता. अमीरों पर टैक्स बढ़ा देता और गरीबों से हर तरह का टैक्स हटा देता. जहां बाढ आती है, वहां की नदियों को जोड़कर पूरे देश में महानहर योजना बनाता ताकि बाढ का पानी सूखे इलाकों में जाता. बिजनेस-टूरिस्ट वीजा ऑन अरावल करता. भ्रष्टाचार के मामलों में तीन महीनों में सजा दिलाता, सख्त सजा का प्रावधान करता. पूरे देश में सौर ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करवाता. मगर काश मैं प्रधानमंत्री होता...
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो कम से कम इतना जरूर करता कि नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान यानी भारत के पड़ोसी देशों से कम कीमत पर पेट्रोल बेचता. काला धन हर हाल में भारत वापस लाता. भ्रष्ट लोगों को कानून के भरोसे नहीं छोड़ता और उन्हें स्टेडियम में खड़ा करके लोगों के हवाले कर देता.
हमें ये समझना होगा कि प्रधानमंत्री एक पद भर है जहां एक व्यक्ति बैठता है. ये गठबंधन सरकार है जहां सहयोगी दलों की सुननी पड़ती है. इसलिए प्रधानमंत्री के पद पर बैठे व्यक्ति में कोई बुराई नहीं है. लोगों को सही राजनीतिक दल को चुनने में होशियारी दिखानी होगी ताकि एक ही पार्टी को बहुमत मिले और एक ताकतवर नेता देश को नेतृत्व प्रदान कर सके.
विनोद जी, बात ये है कि त्याग की देवी सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद का तोहफा दिया है, वो इस तोहफे को बेच भी नहीं सकते न ही इसे किसी और को दे सकते हैं. तोहफे को संजोए रखना उनकी मजबूरी है.
मैं भी वही करता जो मनमोहन जी कर रहे हैं, अब जाओ निर्मल बाबा के पास, घर में पानी की जगह तेल निकलेगा, कृपा बरसनी शुरू हो जाएगी.
आपका सुझाव सही है, प्रधानमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए, कब तक चोली-दामन का साथ निभेगा.
मैं प्रधानमंत्री के पद पर होता तो बिल्कुल उतना ही करता जितने के लिए गांधारी मौसी का इशारा मिलता, ताकि मेरी नौकरी सलामत रहती. मस्त राम मस्ती में आग लगे बस्ती में.
1. नौकरशाहों पर अकुंश लगाता ताकि जन आकांक्षा को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके और विकास योजनाओं के नियोजन, क्रियान्वयन, अनुश्रवण, और मूल्यांकन में जन एवम जन प्रतिनिधियों की सहभागिता वास्तविक अर्थों में होती.
2. निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व काल तक ही सुविधाओं के उपभोग की अनुमति होती
3. कर की प्रणाली आसान करता ताकि आम जन को मंहगाई की मार से मुक्ति मिलती और लोग सस्ते दामों में अपनी जरूरतों को पूरा करने में समर्थ होते.
4. पूरे देश में समरूप शिक्षा एवं स्वास्थ्य की परंपरा को प्रोत्साहित करता.
5. विकास योजनाओं को तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों के बीच सामंजस्य एवं तारतम्य हेतु मार्गदर्शिका और उनका अनुपालन सुनिश्चित करता.
6. विदेशों में भारत की अलग पहचान हेतु सक्रिय विदेश निति को प्रोत्साहित करता.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो सबसे पहले एक नियम बनाता कि जो भी चुनाव लड़ेग, उसे किसी सामाजिक संस्था में जाकर तीन साल काम करना होगा और फिर लोकसभा का सदस्य होगा. दूसरा, लघु उद्योगों को बढ़ावा देता और जनसंख्या को कम करने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर योजना बनाता.
लोगों की प्रतिक्रियाएं थोड़ी अजीब हैं.
बहुत अच्छा ब्लॉग लिखा है. लेकिन काश हमारे प्रधानमंत्री भी इसे पढ़ते. वर्मा जी, इस ब्लॉग की तारीफ़ के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं. आपको कोटि-कोटि धन्यवाद.
बहुत सही.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो अपने पद से इस्तीफ़ा देकर विपक्ष को आमंत्रित करता.
1.आबादी पर रोक लगाता, इससे कई समस्याएँ स्वतः सुलझ जातीं 2. टैक्स चोरी पर कड़ाई से लगाम लगाता
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो - 1.घूसखोरी को जायज करवा देता2. सभी के लिए आरक्षण की व्यवस्था 3. वेश्यावृत्ति को जायज करवा देता
4. परीक्षाओं में चोरी को सही करवा देता 5. वीज़ा व्यवस्था को खत्म कर देता 6. माओवादियों की सारी बातें मान लेता 7. कश्मीर को चरमपंथियों के हवाले कर देता. इन सब के बाद पाँच साल बीत जाने पर जनता से पूछता कि सुधरोगे या नहीं?
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो किसी भी जाति को आरक्षण नहीं देता. ना मैं किसी के इशारे पर चलता.
जब देश के 99 % नेता अपनी संपत्ति ज्यादा से ज्यादा बटोरने में लगे हैं तो प्रधानमंत्री किस-किस को देखेंगे.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो पहले नाकामयाब और विवादास्पद बयान देनेवाले मंत्रियों से इस्तीफ़ा माँग लेता. अनाज सड़ाने के आरोप में कृषि मंत्री से कैफियत पूछता कि आपने उन गोदामों का निरीक्षण किया जहाँ अनाज सड़े? मैं इसकी स्पीडी ट्रायल करवाकर दोषी अफ़सरों और रेलमंत्री से नैतिकता से आधार पर इस्तीफ़ा माँगता. अन्ना के गाँव में जाकर वहाँ गाँववालों की कीर्ति देखकर प्रेरणा लेता.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो कुछ नहीं करता, जैसे मनमोहन सिंह जी नहीं करते हैं, क्योंकि कुछ करना तो वे भी आप और हमारी तरह चाहते ही होंगे, शायद किसी कारण से नहीं कर पा रहे हैं. वैसे मेरा मानना है कि किसी भी प्रधानमंत्री को यह नहीं कहना चाहिए कि वह आखिरी आदमी तक पहुंचना चाहता है, बल्कि उसे खुद आखिरी आदमी बन जाना चाहिए. दिल्ली में रहना या विदेश के दौरे छोड़कर कस्बों-गांवों का रुख करना चाहिए.
अगर मैं इस देशका प्रधानमंत्री होता तो वाकई में प्रधानमंत्री होता किसी की कठपुतली नही.
ब्लैक मनी वालों के नाम जरुर बताता, क्योंकि मैं भारत का प्रधानमेंत्री होता न कि चुनिंदा लोगों का या दूसरे देश का. आखिर जो भी कानून बने हैं वो इस देश की जनता का लिए बने हैं न कि दूसरों के लिए.
मनमोहन सिंह को आज ही हटाओ.
मैं अगर मनमोहन सिंह की जगह होता तो देश में किसी को भूख से मरने नही देता.
मैं एस्टोनिया से हूँ. (यह एक छोटा देश है यूरोप में.) मुझे बहुत पसंद है कि आप इस इस के बारे में विचार करते हैं. मेरे देश में वैसे ही दिक्कतें बहुत हैं लेकिन ज़्यादा मुश्किल है - अपने को प्रधानमंत्री की जगह देखना.
दूसरी, चौथी और पाँचवीं व छठवीं नंबर की सलाहें बहुत ही प्रतिक्रियावादी या कहें कि वैश्वीकरण समर्थन में हैं. शायद ये सलाह लेखक के अपने अंतर्विरोधों का ही नतीजा हैं.
बहादुर भाई मुझे लगता है कि आपकी इस सोच के कारण आपका हाल तो मनमोहन सिंह से भी बुरा होता. देश की सेना देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए होती हैं. अगर सीमा सुरक्षित नहीं हैं तो हम कहँ से सुरक्षित रह पाएँगे. आप जैसी सोच वाले कुछ लोग हो जाये तो देश में उन्नति की बात कैसे हो सकती है. देश की सीमायें सुरक्षित नहीं हैं तो तो देश का आस्तित्व ही खतरे में पड़ जाये गा तो आप आप सेना के लिए हो रहे व्यय को बचा कर क्या करेंगे.
वर्मा जी आपने सही समय पर एक बहुत रोचक विषय उठाया है. क्या आप इस ब्लॉग की एक कॉपी प्रधानमंत्री को भेज सकते हैं. वो चूंकि जनता द्वारा और जनता के लिए चुने गए हैं तो उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए. मैं नहीं समझ पा रहा कि भारतीय लोग पिछले आठ साल से ये सब कैसे सह पा रहे हैं.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो किसी के इशारे पर नहीं चलता और देश हित में कार्य करता. देश को सर्वोपरि मानता. देश को आत्मनिर्भर बनाता. अपने देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करता ताकि दूसरे देश से कर्ज न लेना पड़े. स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देता. गावों के विकास पर विशेष जोर देता.
अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो सबसे पहले बोलना शुरु करता, फिर जो देश के लिए सही होता, वही करता, ना कि वो जो एक परिवार या एक पार्टी के लिए सही होता.
सभी बैंक खातों, पैन नंबर, क्रेडिट कार्ड, मतदाता पहचान, गैस नंबर और मोबाइल नंबर, बिजली और पानी और यहां तक कि घर संपत्ति के पंजीकरण के विवरण सहित बिक्री करपंजीकरण संख्या जोड़ने पर भ्रष्टाचार के लिए हल होगा