धर्म या धंधा?
मेरे पास दो दिन की छुट्टी थी. सुझाव आया कि मथुरा और वृंदावन दो दिन में घूम सकते हैं. बृजभूमि है...कृष्ण से जुड़ी तमाम लीलाएँ, यमुना का तीर...ये सब सोचकर मन में कौतुहूल भी था.
पर वहाँ जो देखा और अनुभव किया उसका धर्म और कर्म से कम और छल और छलावे से लेना देना ज्यादा था.
मथुरा में प्रवेश करते ही खुद को पंडे या गाइड कहने वाले लोग आपको घेर लेंगे...कहेंगे 31 रुपए में दर्शन कराएंगे. आपकी गाड़ी का दरवाजा अगर खुला मिल गया तो आपके हाँ या न कहने के पहले आपकी गाड़ी में बैठ भी जाएंगे.
दूर दराज़ से आए और इलाके से अपरिचित लोग आसानी से इनकी बातों में आ जाते हैं. लेकिन बाद में पता चलता है कि ये 31 रुपए आपको काफी महंगे पड़ने वाले हैं.
दरअसल ये पूरा रैकेट है. गाइड आपको मंदिर के बाहर तक ले जाता है और अंदर मौजूद किसी पंडित के हवाले कर देता है.
मथुरा में ऐसा ही एक पंडनुमा गाइड हमें मथुरा से गोकुल ले गया, बिना हमें ठीक से बताए कि वो हमें कहाँ ले जा रहा है. रास्ते में वो कुछ बातें बार-बार दोहराता रहा जैसे गाय को दान देना चाहिए, इससे उद्धार होगा वगैरह वगैरह.
मंदिर में गाइड ने हमें पंडित के हवाले कर दिया. पंडितजी भी आते ही समझाने लगे कि गाय के नाम पर दान देना कितना पुण्य की बात होती है. तब समझ में आया कि दरअसल गाइड हमारा दिमाग पहले से कंडीशन कर रहा था ताकि पंडितजी की बात मानने में हमें आसानी हो.
यहाँ तक तो ठीक था. इसके बाद तो पंडितजी ने कमाल ही कर दिया. कहा पूजा के बाद कहा, 'दान देना होगा.'
इस 'दान देना होगा' में आग्रह नहीं आदेश था. उस पर तुर्रा ये कि दान उनकी बताई राशि के अनुसार देना पड़ेगा जिसमें न्यूनतम स्तर तय था. उससे ज्यादा दे पाएँ तो कहना ही क्या. दान न हुआ मानो इनकम टैक्स हो गया कि न्यूनतम कर देना लाजमी है. अनावश्यक भावनात्मक दबाव बनाने के लिए पंडित बोले मंदिर में संकल्प करो कि बाहर दानपत्र में कितने पैसे दोगे, तभी बाहर जाओ.
क्या इसके लिए आपके मन में धार्मिक ब्लैकमेल के अलावा कोई शब्द उभरता है?
मन खिन्न था कि कैसी लूट-खसोट है. धार्मिक लूट का रैकेट बना रखा है. लेकिन बाद में पता चला कि आदमी तो आदमी वहाँ तो बंदर भी रैकेट में शामिल हैं.
वृंदावन में बंदर बहुत हैं. एक बंदर ने हमारा सामान छीन लिया और छू मंतर हो गया. पलक झपकते ही न जाने कहाँ से बहुत से लड़के भागते हुए आए और कहा 500 रुपए दो तो सामान ला देंगे. जब चेहरे पर न का भाव देखा तो रेट कम हो गया. उनमें से एक ने कहा, "अच्छा 100 रुपए." बात 50 रुपए पर तय हुई. आखिर मुसीबत में फँसा व्यक्ति उस समय करे भी क्या. एक मिनट के अंदर सामान वापस ला दिया गया.
वहाँ फल की दुकान लगाए एक दुकानदार ने बताया कि बंदर प्रशिक्षित हैं. बंदर सामान छीनते हैं और इनके प्रशिक्षक पैसों के बदले में सामान वापस देते हैं. कोई हजार रुपए में फँस जाता है तो कोई 50 रुपए में.
वापस लौटने पर एक सहयोगी ने बताया कि जगन्नाथपुरी जैसी जगहों पर तो हालत इससे भी बुरी है.
इस तरह ठगने वाले लोग धर्म-धर्म में फर्क नहीं करते क्योंकि एक अन्य मित्र ने बताया कि अजमेर शरीफ जैसी जगहों पर भी लोगों को कुछ ऐसे ही अनुभवों से गुजरना पड़ता है.
धर्म मानों धर्म न रहकर धंधा बन गया है.
वैसे धंधा तो सम्मानजनक होता है क्योंकि कोई सामान बेचता है और खरीददार खरीदते हैं. शर्तें तय की जाती हैं और मामला साफ़ होता है. यहाँ तो लूट हो गई है. धर्म की लूट.
लेकिन स्पष्ट करना जरूरी है कि सभी लोग ऐसे नहीं होते. पर आस्था और धर्म का दोहन करने वालों की भी कमी नहीं है. इन लोगों की महारत इसी से समझ में आ जाती है कि शिक्षित, जागरुक लोग भी इनके झाँसे में आ जाते हैं.
कुछ हद तक मैं भी इस झाँसे में आ ही गई थी. अफसोस कि ये बात थोड़ी देर से समझ में आई.

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गया, इलाहाबाद, बनारस वगैरह में भी यही चल रहा है. भगवान के दर्शन के नाम पर कई मंदिरों में बड़ी-बड़ी राशि लेने का धंधा भी चल रहा है. जितनी ज्यादा रकम देंगे उतनी आसानी से दर्शन करने का मौका मिलेगा. आपका कहना सही है कि धर्म अब एक धंधा बन चुका है और विडंबना यही है कि इसमें लगे लोगों का धर्म से कोई लेना देना नहीं है.
आप का ब्लॉग काफी सही है. एसा अनुभव मुझे भी हुआ है. मुझे भी बहुत दुःख और व्यथा हुई. ऐसा लगा फिर कभी नहीं आऊंगा. आगे जाकर शान्ति से सोचा. उस की जड़ तक जाने का प्रयास किया..... कम से कम बुद्धिजीवी होने के नाते..... काफी लोगों से खुलकर बात की. यह मसला बहुत पुराना है. इतिहास में जाना पड़ेगा. गुंडे घुस गए है....राजनीति की तरह!!!
इसमें कोई शक नहीं के आज जो हो रहा है वो गलत ही है. पैसे एंठना गलत है. मगर यह लोग है कौन? कहाँ से ऐसी व्यस्था आई? आप ने सही कहा. "दान न हुआ मानो इनकम टैक्स हो गया". क्या आप और मैं कभी सही तरह से टैक्स देंगे अगर वो जबरन न हो? उस पण्डे की रोटी कैसे चलेगी?
ब्राहमण को तो आज कहीं जगह नहीं है. पहले पढाई में, फिर नौकरी में, फिर इन्क्रीमेंट में.....आरक्षण ही आरक्षण. तो जाए कहाँ? चाहे कितना भी वेद/ शास्त्र/ पुराण पढ़ ले, रोटी कहाँ से लाएगा? सोचिएगा, याद करिएगा, पिछले कितने समय पहले आप ने किसी ब्राह्मण को पैसे दिए थे? और कितने? दूसरी बात - हिन्दू धार्मिक काम में तो कोई मजबूरी ही नहीं!! मंदिर जाओ या नहीं, पैसे दो या नहीं. मंदिर चलना चाहिए और हमें मुफ्त भोजन/ प्रसाद मिलाना चाहिए.
बहुत सारी बातें है. यहाँ पूरा करना असंभव है.
एक विनती है. आपके हाथ में कलम है. बहुत ताकत है. उसे तोहमत की बजाय सकारात्मक तरीके से इस्तमाल करें. नई पीढ़ी ऐसे ही उलझी हुई है. हमारी / आप की तरह!! उसे उलझा कर और दूर न ले जाए. शुक्रिया....पूरा पत्र पढ़ने के लिए......
आपने पत्र छापा - शुक्रिया - कुछ हौसला बढ़ा इसलिए फिर कुछ लिखता हूँ.
1- व्यास - महाभारत के रचयिता - मछालिमार थे, वाल्मीकि - रामायण के रचयिता - पारधी थे
ग्नानेश्वर - साधू के लडके थे, इकनाथ, तुकाराम, मीराबाई, कबीर, रैदास .... कोई जन्मसे ब्राहमण नहीं था .....जिसके श्लोक/ भजन आपने वहां सुने होंगे !!! तो ये पंडा कौन है?
2- क्या आपने कभी खुद श्रीमद भगवद गीता खोल कर देखी? या सिर्फ टीवी सीरियल में ही?
3 - पैसे के लिए तो पशुओं को रोटी डालोगे, पर संस्कार के लिए कहाँ है टाइम/ पैसा?
4 - मैंने त्रिवेनिसंगम में एक साधू - जो मुजसे पैसे मांग रहा था - से पुछा, गीता का कोई भी एक श्लोक समझाओ और 300रुपये ले लो !! नहीं तो मैं बताता हूँ और आप 300 मुझे दे दो !! वो नाराज हो कर चला गया !! जब तक मैं खुद ही अपने आप पर गर्व महसूस नहीं करता - खुद की संस्कृति पर महेनत नहीं करता - लोग उल्लू बनायेंगे - साधू/ पंडा/ बाबा - कुछ भी बन कर.
5 - रोटी लक्षी शिक्षण के बजाय गुण लक्षी शिक्षण लायें - जो आज कोई विद्यालय नहीं देता - नतीजा? भ्रष्ट व्यक्ति !!
6 - अर्थ लक्षी समाज व्यस्था के बजाय व्यक्ति लक्षी समाज व्यस्था - जिससे पैसे के पीछे भागता सामाज रुके. -
यह सब काम ब्राह्मण के थे और वो यह मुफ्त में करता था. इसलिए वो पूज्नीय था. समाज उसकी देखभाल करता था और वो समाज की. नाकी जन्म या जाती से.
यह काम करने वाला चाहे कोईभी धर्मं, सम्प्रदाय, वर्ग, जाति, नस्ल का हो, उसे वेद में ब्राह्मण कहा है.
अगर संदेह हो तो खुद पढ़ के देखलो !!!!!
जी बिल्कुल. इतिहास में जाना पड़ेगा. जब मन्दिरों में ऐसे कर्म कांडों की शुरूआत की गई थी तब भारत एक समृद्ध देश था. और भारत की अर्थव्यव्स्था मजबूत करने और मुद्रा के पूरे देश में फ़्लो के लिए ऐसे दान लिया जाता था. ताकि उस दान से प्रसाद, फ़ूल्, सफ़ाई, भोजन जैसे जरूरी चीजें खरीदी जाए और मुद्रा माली, व्यापारी तक आसानी से पहुँच सके.
यह उस दौर की अर्थव्यवस्था हुआ करती थी. लेकिन अब तो लोगों का पेट इतना बड़ा हो गया है कि बिना अरबपति बने पेट भरता ही नहीं. और पंडे अपने स्वार्थ के लिए पैसे इकट्ठे करने में लग गये. मैंने मन्दिर के महन्तों को देखा है. उनके बेटे विदेशी शिक्षा पाने में करोड़ों खर्च कर रहे हैं. अर्थात जिस अर्थव्यवस्था से देशहित करने की सोची गयी थी वह अब सुपुत्रों का हित कर रही है.
गुलामी के दौर ने हमें दरिद्र बनाया है और हम बन भी चुके हैं. ऐसी लूट खँसोट इसी का परिचायक है. दान स्वेच्छा से दिया जाता है न कि घमका कर लिया जाता है. यदि धर्म के नाम पर हमें यह पढ़ना सुनना अच्छा नहीं लगता तो यह हमारी गलती है कि हमने उसे दूषित होने दिया. और अब जब धार्मिक स्थलों पर धर्म की हानि हो रही है तब हमें इतिहास याद आने लगता है. इतिहास बता कर कुछ नहीं होने वाला, वर्तमान में प्रयास किया जाना चाहिए. यदि हमें अपने धर्म को डाकुओं के चंगुल से बचाना है तो, हमारे नेता तो खैर, सब जानते हैं. जैसा राजा वैसी प्रजा.
अच्छा लिखा है आपने. सही बात लिखो तो कमेंट होता ही नहीं, बोलता है कि जो आपने लिखा वो गलत है. आदमी की बजाय अब कम्प्यूटर सही गलत समझने लगा है.
आपके ब्लॉग ने काफी हृदयस्पर्शी ब्लॉग सामग्री दी है. पाठकों को सावधान रहना चाहिए. इस लूट खसूट को उजागर करने के लिए धन्यवाद की पात्र हैं वंदना. मुझको भी कुछ आपके अनुभव का 50 फीसदी भुगतना पड़ा था. किंतु बनारस का हूँ इसलिए निकल आया. मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं, पंडों ने मारा पीटा नहीं अत उनको प्रणाम. किंतु मेरी आपको सलाह है कि बीमारी की तह में जाएँ, पूरा काम करने के बाद बीबीसी पर लिखें. आप मेरा विश्वास कीजिए बीबी अगर आप इस लूट की जड़ में जाना चाहती हैं तो आपको किसी किसी नेताजी के घर चाय पार्टी में बैठना पड़ेगा. और अधिक होमवर्क किया तो परिणाम स्वरूप न्यूज की हेडलाइन आएगी कि संसद में हंगामा, फतवा जारी. पर आप ऐसा करेंगी नहीं.
मेरे साथ भी अजमेर शरीफ दरगाह पर ऐसा ही वाक्या हुआ था.
हाँ ठीक है
वंदना आप बिल्कुल ठीक बोल रही हैं. मैं 100 फीसदी आपसे सहमत हूँ.
आपका ब्लाक पढ़ा तो लगा के मैं भी कुछ शेयर कर लूँ. अजमेर की दरगाह में प्रवेश करने से पहले एक मुजबिर ने मुझको रोक के कहा दुआ करवा लो और तभी अंदर जाना. मैंने कहा ठीक हैं कर दो. बोले 250 रुपये दो . मैंने कहा के 100 रूपए ले लो तो बोले 100 रूपये में क्या दुआ होती है. बाद में मैंने पैसे देने से मन कर दिया तो उसने बुरी बुरी सुना दी और बोले यहाँ करने क्या आते हो.
वंदना जी बहुत अच्छा लिखा है.
एक समर्थक ब्लॉग के लिअ धन्यवाद. मैं भी पिछले साल मथुरा-वृंदावन घूमने के लिए अपनी मां और पत्नी के साथ गया था. वहाँ के पंडा का एक वाक्य अब तक याद है मुझे- 'हँसते के घर बसते'..ये लोग वहाँ हँसने का टाइम ही नहीं देते.
हम भी फँसे थे.
सबसे बड़ी बात ये है कि मंदिरों में मूर्तियों के रूप में जकड़ा हुआ भगवान भी कुछ नहीं कर सकता. वो तो बना ही इस्तेमाल होने के लिए है. और वो कर भी क्या सकता है. गरीबी, भूख, लालच और जानबूझ कर अंधा बनना जब तक रहेगा तब तक नाटक चलता ही रहेगा. 1500 साल की गुलामी ने इसे और भी ऊँचाई पर पहुँचा दिया है.
हमारे देश धर्म तो हमेशा से ही एक संगठित माफिया की तरह रहा है. ऐसे में अगर आप इनके चंगुल में फंस जाते है तो अचरज क्या? बुद्ध से लेकर ओशो तक सभी ने साफ़ कहा है कि धर्म नितांत व्यग्तिगत मामला है.
अच्छा हुआ कि किसी पत्रकार को भी लूटा गया, इससे सच्चाई सामने आई. वैसे ये लूट का धंधा आजकल सब जगह है, ये टीवी चैनल वाले भी लोगों को झांसा ही दे रहे हैं.
मुझे ये जानकार अच्छा लगा कि कोई मंदिरों पर भी नजर रखता है.मैंने जो भी अनुभव किया है उसके मुताबिक उत्तरभारत के मंदिरों में ही ऐसे पंडित होते हैं.अगर आप गुजरात जाए तो कोई इस बात की चिंता नहीं करता कि कितना दान दिया जा रहा है और वहां किसी तरह की चलाकी नहीं देखी जा सकती जो आप मथुरा, हरिद्वार या अजमेर में देखेंगे.मेरा मानना है कि हमे दान जरुर करना चाहिए लेकिन आजकल के युवा दान करना पसंद नहीं करते हैं.
मुझे एक किस्सा याद आता है जब मेरा तबादला जैसलमेर में हुआ तो मैंने सोचा कि मैं अपने सहयोगियों को पुष्कर घुमा लांऊ. मैं गाड़ी लेकर वहां के लिए रवाना हो गया.वहां हम गाइड से मिले और उसने पुष्कर के बारे में हमें बताना शुरु किया,ये तय हुआ था कि हमलोग उसे 1000 रुपए देंगे.बस इसके बाद उसने मुझे पंडित के हवाले कर दिया.पंडित ने मुझ से पूछा कि आपके पिता हैं. मैंने कहा जी नहीं उनका स्वर्गवास हो चुका है . बिना मुझ से पूछे उन्होंने पिंडदान के लिए मंत्र उच्चारण शुरू कर दिया .जब उच्चारण के दौरान उन्होंने मेरे पिता का नाम पूछा तो मैंने कहा बैतुल्लाह खान तो पंडिजी एक दम से खड़े हो गए और ये तमाशा देखकर मेरे सहयोगी मोहन कुमार जी हंस पड़े फिर मैंने कहा पंडितजी आप तो काम पूरा करो ,तुम्हे तुम्हारा पैसा मिल जाएगा .फिर मैंने अपने साहब जी को कहा यहाँ तो गरीब बेचारे का कुछ भी नहीं हो सकता है.
मै भी जब वृन्दावन पंहुचा तो वहा के पंडित ने कहा "जो जो लोग अपने माँ बाप को ज्यादा प्यार करते है और उनकी लम्बी उम्र चाहते है, वो लोग 1000 रुपये का दान करें. और जो लोग अपने माँ बाप को केवल प्यार करते है वो लोग 500 रुपये का दान दें"
सच में बहुत बुरा माहौल बना दिया है ऐसे लोगो ने.
वंदना जी, आपने धार्मिक महत्व की जगहों पर अधार्मिक लोगों के कारनामों का मुद्दा उठाया है,वास्तव में यह बात बहुत उलझन पैदा कर देती है कि धार्मिक महत्व के इन स्थानों का कुछ भी असर इन दुष्टों पर क्यों नहीं होता है,आखिर कैसे माफिया,लुटेरे धूर्त और मक्कार न सिर्फ यहॉ न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि बडी तेजी से फैल भी रहे है। हमारी सोच रहती है कि इन जगहों पर चैतन्य से भरपूर और समाधिस्थ संत होते होगें ,लेकिन जैसा आपने भी बताया और लगता भी है कि स्थिति इससे भी अधिक भयावह है शायद आपने धार्मिक पहलु को ध्यान में रखते हुए काफी संयत तरीके से स्थिति का जिक्र किया है।लेकिन सवाल यह है कि धर्म ही नहीं समाज ,राजनीति और जीवन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं रह गया है जहॉ से संतो ने पलायन कर इन दुष्टों के लिए जगह खाली न की हो। और ऐसा भी नहीं है कि भले लोगों ने दुष्टों से संघर्ष कर लडाई हारी हो और इसके बाद ही दुष्ट काबिज हुए है। हमारी जनप्रतिनिधि सभा हो या फिर दूसरे महत्वपूर्ण स्थान सभी जगहों पर यही स्थिति है।दुष्ट तो अपनी हरकतें कर ही रहे हैं लेकिन तथाकथित भले लोग तो इसका जिक्र भी नहीं करते है । अब चर्चा दुष्टों पर नहीं बल्कि संतो पर होनी चाहिए कि इनका संतत्व इतना पलायनवादी क्यों है? यह संतों (जीवन के हर क्षेत्र में) की जिम्मेदारी है कि वे हर धार्मिक स्थल की गरिमा की रक्षा करें चाहे इसके लिए किसी भी सीमा तक जाना पडे। आपने इतना महत्वपूर्ण विषय उठाया है इसके लिए आपका धन्यवाद.
आपकी टिप्पणी अच्छी नहीं होती.
सही है
आपने मंदिरों की बात उठाई है. मैं आपको एक चीज़ बताता हूँ. मजा़रों में भी अवैध वसूली हो रही है. ऐसी पवित्र जगह पर जाने में जब मन करता है तो पहले जेब में नज़र डालता हूँ कि पैसे हैं या नहीं. अगर पैसे नहीं हैं तो हिम्मत नहीं होती. बिना पैसे के ऐसी जगह नहीं जा सकते जहाँ कदम कदम पर पैसों की डिमांड की जाती है. ऐसे जगहों पर फालूत फकीरों की फौज देखी जा सकती है.
ब्लॉग बहुत अच्छा है
लेख अच्छा है और आपकी बात सोलह आने सही है. लेकिन मुझे यह समझ नहीं आया कि ऐसी जगह जाने कि ज़रुरत क्या है! और अगर चले भी गये तो पंडों के चक्कर में पड़ने कि क्या तुक है!
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. अंधविश्वास हमारी जड़ों में गहरे से बसा है. हर ओर अव्यवस्था है.
बहुत बढ़िया वंदना
आज-कल धर्म माफिया का धर्म-स्थलों पर कब्ज़ा हो चुका है.. धर्म के लिए बस एकमात्र साधन है, धन-दौलत. चाहे अजमेर हो, हरिद्वार हो, द्वारिका हो,पद्मनाभ या तिरुपति बालाजी, सब जगह पैसे लेकर ''धर्म'' प्राप्त किया जा सकता है.. थोथे अंध-विश्वासों का परिणाम तो यही होना है..
मैं मनोज साहब की टिप्पणी से एकदम सहमत हूँ कि ऐसी जगह जाने की और पंडों के चक्कर में पड़ने की ज़रुरत क्या है. यह तो वही बात हुई कि आ बैल मुझे मार
ये कुछ भी नही है.अगर आप पुरी मंदिर जाएं तो वहाँ आपको कुछ लोग घेर लेंगे और आपसे कहेंगे कि आपको हर खंभे की पूजा करनी है और अगर आप ऐसा नही करते हैं तो वो आपको गाली देंगे. देव धर के मंदिर में जब आप जाएंगे तो आपको शुल्क के रुप में 5 रुपए देने होंगे जो अवैध है. मुझे नही मालूम कि हम अपने धर्म पर किस बात का गर्व करते हैं.
वंदना जी, ये पंक्तियां में आपकी जानकारी के लिए लिख रहा हूँ. आपने मेरे मन की बात लिख दी.
धन्यवाद. फिलहाल आपका ब्लॉग लूट के सिर्फ 5 प्रतिशत हिस्सा का परिचय देता है. किताब को उसके कवर से ही नही समझा जा सकता. मुझे हरिद्वार जाने के अवसर मिला. जान कर आश्चर्य होगा कि वहाँ कोर्ट में 80% मुकदमें सिर्फ बाबा लोगों के है. जिस आश्रम में कमाई मोटी हो , राजनीतिज्ञ अच्छी रकम देकर महात्मा लोगों को धक्का देते हैं और स्वयं काबिज हो जाते हैं.चेला लोग को मिला कर पान की सुपारी बना दिया जाता है. ये खेल है.
प्रिय मनीषभाई - अगर आपका एक रिश्तेदार बीमार है तो आप उसे ठीक करने के लिए मदद करोगे या उससे दूर भागोगे? अगर आप को उससे प्यार है तो .
नवल जोशी भाई ने सही कहा है. अगर आप अच्छे है तो जाकर गन्दगी दूर करो. बाजू में खड़ा रहकर चिल्लाने या उससे दूर भागने या उससे मुंह छिपाने से क्या सब अपने आप सुधर जाएगा? यह कमजोरी और भगोडापन की निशानी है.
इसी काम को गीता में कर्मयोग कहा है. पर पढ़ेगा कौन? और क्यों पढ़े? और पढ़ के समझें कैसे? संस्कृत भाषा तो आती ही नहीं. फल की इच्छा छोड़ कर समाज के लिए जान देने वाले पैदा कहां से होंगे? गणित और विज्ञान सीखकर? अच्छी नौकरी पाकर? वो दिन दूर नहीं जब हँसते हँसते फांसी चढ़ने वाले भगतसिंह को आज का युवक बेअकल कहेगा. महात्मा गाँधी की सादगी की हंसी उड़ाएगा. लडकियाँ रानी लक्ष्मीबाई से ज्यादा मुन्नीबाई बनना पसंद करेगी.
आज के युवा को जरुरत है एक सही मार्गदर्शन की. उनकी भूख दिखी है ...मुन्नाभाई की गांधीगिरी, अन्ना हजारे, आमिर की फ़िल्में .........यह सब चलना इसका सबूत है.
कहाँ से शुरू करें? अपने से. रोज मंदिर/ मस्जिद/ गुरुद्वारा/ गिरजाघर जाओ. साथ में बच्चे को ले जाओ. पैसे नहीं, समय दो. सच्चा इंसान बनो. और इसके लिए फना होने की तैयारी रखो.
वन्दना जी आपका ब्लॉग धार्मिक स्थलों पर होने वाली लूट की एक बानगी भर है. इसका इलाज यही है कि हमें इन स्थलों पर जाना ही नहीं चाहिएं.
अच्छा विषय है आपके ब्लॉग का. मैं सिख धर्म से हूं. हमारे यहां भी अरदास या प्रार्थना के रेट फिक्स कर दिए गए हैं. एक आम आदमी भगवान को याद करने की कीमत चुका रहा है. धर्म बिक रहा है क्योंकि हम खरीद रहे हैं.
मेरा मानना है कि जब भी हम कहीं पर ठगे जाते हैं, कहीं न कहीं हमारी लापरवाही और कम जानकारी ही उसका मुख्य कारण होता है. मैं भी इस तरह की ठगी का शिकार हो चुकी हूं और ठगे जाने के बाद मुझे समझ में आया कि कहीं न कहीं मेरी गलती भी थी. मैं समझती हूं कि जब भी कहीं बाहर घूमने जाएं उससे पहले हमें वहां के बारे में अच्छी तरह जान लेना चाहिए. अधिक अच्छा हो यदि वहां आपका कोई परिचित है तो उसकी मदद लें. हो सकता है वह आपके साथ चलने में समर्थ न हो पर आपको सारी जानकारी तो दे ही सकता है. इस प्रकार यदि कुछ बातों को ध्यान में रखा जाय ता हम धार्मिक स्थान पर ही नहीं हर जगह बच सकते हैं.
बिल्कुल सही लिखा है आपने वंदना जी. हर एक धार्मिक स्थल पर इस प्रकार की लूट मची हुई है. धर्म जो है धर्म ना रह कर धंधा बन गया है. हम सभी को जागरूक होने की आवशयकता है, वर्ना धर्म के नाम पर लुटते रहेंगे.
बिलकुल सही लिखा है. सारे धार्मिक स्थलों को पंडों-पुजारियों ने लूट-स्थल में परिवर्तित कर दिया है. विधवाओं के नाम पर भी मथुरा और वृन्दावन में ये लोग तीर्थ यात्रियों को लूटते हैं. मैं तो बिना घूमे ही लौट गया था.
वाह-वाह, क्या लिखती हैं आप, आपका ब्लॉग बहुत पसंद आया हमें.
भारत में पिछली कई सदियों से ऐसा ही होता रहा है, खासकर वैदिक युग के बाद से. गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में बनारस के पंडों से भेंट का उल्लेख किया है. मेरे साथ भी ऐसा कई बार हुआ है जब मैं बिना दर्शन किए वापस आ गया. मगर इन अनुभवों के बाद मेरा विश्वास और मजबूत हुआ है और भगवान के साथ मेरा व्यक्तिगत नाता बन गया है जिसमें किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होती. वैसे ही जैसे बच्चे को माँ को बुलाने के लिए किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं होती.
“अरे मूरख तू ढूँढता है किसे मंदिर-मस्जिद-तहखानों में
जाके देख भगवान मिलेंगे, खेतों और खलिहानों में”
बिलकुल सही लिखा है.
आपने बिल्कुल सही कहा है.जिस धर्म में समानता नहीं, वो धर्म किस काम का.
आपने बहुत सही लिखा है.
आपने सही लिखा है. पूजा मानसिक शांति के लिए की जाती है, ये अब औपचारिकता और धंधा बनकर रह गई है.
धर्म एक नशा है. इसका जितना पीछा करोगे ये सटता चला जाएगा.
आपका ब्लॉग एक सामाजिक बीमारी को सिर्फ एक प्रतिशत लक्षित करता है. यूरोप, अमरीका और विकसित देशों में किसी समस्या को उजागर करने से पहले 1000-2000 लोगों से सर्वेक्षण लिया जाता है. पूरा काम छान-बीन करने के बाद कुछ लिखा जाता है. आपको भी विनती है कि कम-से-कम 108 दरगाहों, मठों, आश्रमों का सर्वेक्षण करें, गुप्त रूप से, गहराई से काम करें, फिर लिखें.
मेरे भाई डा.आशुतोष मिश्रा दक्षिण भारत के एक सुप्रसिद्ध मंदिर के मुख्य द्वार से बिना दर्शन वापस लौट आए क्योकि वहाँ आम और खास लोगों की अलग-अलग लाइनें थीं.
आजकल हर चीज़ का व्यावसायीकरण हो गया है. चाहे पूजा पाठ हो, शिक्षा हो या कुछ और. हर कोई लूट खसोट में लगा हुआ है. क्या करिएगा साहब पूंजीवादी व्यवस्था में इतना तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा.
बिलकुल सही लिखा है. सारे धार्मिक स्थलों को पंडों-पुजारियों ने लूट-स्थल में परिवर्तित कर दिया है./ आप बिल्कुल ठीक बोल रही हैं. मैं 100 फीसदी आपसे सहमत हूँ.
आपने बिल्कुल सही कहा कि आस्था और धर्म के नाम पर दोहन करनेवालों की कमी नहीं है. हमें इनलोगों से बचना चाहिए और लोगों को इनलोगों के धर्म के हथकंडों के प्रति जागरूक करना चाहिए.
मैं भी अपने परिवार के साथ मथुरा गया था तो वहाँ गाइड ने हमलोगों को एक पंडित के पास बिठा दिया और मुँहमाँगा दान देने के लिए कहा. और नहीं देने पर कुछ लोगों ने हमें घेर भी लिया. हमलोग किसी तरह वहाँ से बचकर निकले. ये बात सही है कि धर्म के नाम पर लोग सारे बुरे काम करते हैं.
बहुत बढ़िया वंदना.
आप की बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ. धर्म को आज कल हर जगह धंधा और लूट का साधन बना दिया गया है.