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इस जग में बदलाव के सपने

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 09 फरवरी 2012, 17:55 IST

ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन और बहरीन में पिछले एक साल के दौरान मरने वालों की संख्या में फ़र्क़ हो सकता है लेकिन समस्या के प्रकार में कोई फ़र्क़ नहीं.

पाँचों देशों में लोग जारी सैन्य शासकों से जान छुड़ाना चाहते थे या हैं.

ट्यूनीशिया में जनता जल्द ही ज़ैनुल आबदीन की तानाशाही से कुछ सौ लोगों की जान की क़ीमत देकर छुटकारा पाने में कामयाब हो गई.

मिस्र में आंशिक कामयाबी मिली और हुस्नी मुबारक की जगह सैन्य शासकों ने ले ली. मिस्र में संसदीय चुनाव तो सफलतापूर्वक हो चुके हैं लेकिन जब तक राष्ट्रपति चुनाव और संविधान बनाने की प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से पूरी नहीं हो जाती मिस्र के लोकतांत्रिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा.

लीबिया में अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और अरब लीग की मदद से आया परिवर्तन संदिग्ध है. लीबिया गद्दाफ़ी के शासन के मलबे से निकल कर किसी पश्चिम समर्थक तानाशाही की चादर ओढ़ लेगा या वहाँ की आम जनता को अपना भविष्य ख़ुद तय करने की अनुमति मिल पाएगी. जवाब के लिए कम-से-कम एक से दो वर्ष की ज़रुरत है.

यमन में हालाँकि अली अब्दुल्ला सालेह ने हिंसक संघर्ष के बाद सत्ता अपने सहयोगी के हवाले कर दी है लेकिन पुराना तंत्र अपनी जगह बरक़रार है. बहरीन में बदलाव की इच्छा इतनी ही गंभीर है जितनी किसी और अरब देश में, लेकिन बहरीन की क्रांति को फिलहाल पश्चिम समर्थन से सऊदी चादर में लपेट कर पीटा जा रहा है.

सीरिया में पिछले 11 महीनों में बदलाव की इच्छा करने वालों की जितनी हत्याएं हो चुकी हैं इतनी किसी अरब देश में नहीं हुई. लेकिन वहाँ ईरान, चीन और रूस परिवर्तन की राह में बाधा हैं. क्योंकि राष्ट्रपति बशा अल असद फ़िलहाल ईरान के एकमात्र अरब दोस्त हैं.

इसी तरह रूस का देश से बाहर एकमात्र नौसैनिक अड्डा सीरिया में है. चीन के सीरिया में व्यापारिक हित हैं लेकिन चीन और रूस वहाँ परिवर्तन का विरोध कर अमरीका और अन्य देशों को यह संदेश देना चाहते हैं कि हर बार केवल आपकी मनमानी नहीं चलेगी.

चीन और रूस को यह भी आशंका है कि लीबिया की तरह पश्चिम देशों को अगर सीरिया में खुले हस्तक्षेप की अनुमति दे दी गई तो फिर अगला लक्ष्य ईरान होगा जो रूस और चीन के लिए आर्थिक, राजनीतिक और भौगोलिक तौर पर सीरिया से ज़्यादा महत्वपूर्ण देश है.

सुरक्षा परिषद में अब तक रूस 124, अमरीका 82, ब्रिटेन 35, फ्रांस 18 और चीन सात बार वीटो अधिकार का प्रयोग कर चुके हैं. हर बार वीटो किसी नेक मक़सद के लिए नहीं बल्कि कुछ बेचने और कुछ ख़रीदने के लिए इस्तेमाल हुआ है.

ऐसी दुनिया में भी अगर कोई समूह, वर्ग या देश अपने सपने साकार कर लेता है तो सलाम है ऐसे समूह, वर्ग और देश के लिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 21:38 IST, 09 फरवरी 2012 नवल जोशी:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब, गुस्ताखी माफ़. मैं आपके तर्क से केवल असहमत ही नहीं बल्कि इसकी मुख़ालफ़त भी करता हूँ। आपने मध्यपूर्व की घटनाओं में पश्चिमी ताकतों के कुचक्र को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश ही नहीं की बल्कि इसके लिए रूस और चीन के वीटो इस्तेमाल का पेंच फॅसाने की भी कोशिश की है। आप इस तथ्य से अनजान होते तो कोई बात न थी लेकिन आप जानकार हैं इसके बावजूद इस तरह लिख रहे हैं तो अच्छा नहीं लगा इसलिए मैं आपसे निवेदन करना चाहता हॅ कि जितना सरल आप इस मुद्दे को बता रहे हैं बात उतनी आसान नहीं है। दरअसल अमेरिकापरस्त लोगों ने मध्यपूर्व में मनमानी लूट की है उसकी मिसाल भारत के उस दौर से की जा सकती है जब भारत सोने की चिड़िया कहलाया जाता था, समृद्धि देख कर विदेशी टिड्डी दल की तरह भारत में टूट पडे। ऐसा ही आज मध्यपूर्व के साथ किया जा रहा है अमेरिका की नजर वहॉ तरल सोने पर है इसके लिए कल तक सद्दाम हुसैन से लेकर गद्दाफी और सउदी अरब तक हर किसी का मनमाना तरीके से मोहरों की तरह इस्तेमाल किया। अमेरिका और उसके छुटभय्यों को आज लगता है कि तानाशाहों और दलालों के जरिए अब वहॉ मनमानी लूट नहीं की जा सकती है इसलिए अब अमेरिका वहॉ कथित रूप से लोकतंत्र समर्थक ताकतों को अपने चंगुल में फॅसा रहा है यह पूरा प्रायोजित नाटक है। जिससे कि ईरान,लेबनान और हमास के प्रति लोगों के रूझान को बदला जा सके।मध्यपूर्व में किसी नई व्यवस्था के बारे में लोकतंत्रवादी बात नहीं कर रहे हैं वे केवल शासकों को हटाना चाहते हैं और इसके लिए अमेरिका और यूरोप के समर्थन से अपने देश में मारकाट मचा रहे हैं वहॉ लोगों के सामने आगे कुऑ पीछे खाई जैसी स्थिति हो गयी है।वहॉ शासको को हटाया जाना चाहिए। लेकिन जितनी कुत्सित मानसिकता से गद्दाफी को मारा गया ये लोग अच्छा समाज और राजनीति दे सकने में सक्षम होगें इसमें सन्देह है। हमारा शासक कितना ही दुष्ट हो उसे हम ही हटायेगें, अपने सारे सूत्र विदेशियों के हाथों में देकर लोकतंत्र लाने से बेहतर वह निकृष्ट तानाशाही ही है जिसे इतने वर्षों सह लिया उसे कुछ और समय रूक कर निबटाया जा सकता था। हो सकता है कि ये लोकतंत्रवादी हों लेकिन मेरा मानना है कि ये देशभक्त तो कतई नहीं हैं।

  • 2. 11:45 IST, 10 फरवरी 2012 नवल जोशी:

    वुसतुल्लाह खान साहब, आपने कहा है कि कोई समूह, वर्ग या देश अपने सपने साकार कर लेता है तो उसे सलाम है,इस कथन का परिप्रेक्ष्य मध्यपूर्व की घटनाएँ हैं।मुझे नहीं लगता है कि इस क्षेत्र की घटनाएं ऐसी स्थिति तक पहुँच चुकी है जहॉ उन्हें सलाम भेजा जा सके,अभी तक मध्यपूर्व में उथल-पुथल ही चल रही है फिलहाल तो इसका कोई अन्त दिखाई नहीं देता है जैसा कि आपने भी कहा है कि मिस्र में होस्नी मुबारक की जगह सैनिक शासकों ने ले ली है। ऐसा होने की आशंका हर जगह है कि एक तानाशाही को हटाकर दूसरे की तानाशाही आ सकती है। इसमें सपने साकार होने जैसा कुछ भी दिखाई नही दे रहा है। आप जिस सपने की बात कर रहे हैं उसे 1917 की रूस में हुई सर्वहारा क्रान्ति से जोडा जा सकता है उस क्रान्ति ने जरूर सपने दिखाये थे। और पूरी दुनिया में वैचारिक क्रान्ति का सूत्रपात हुआ था लेकिन मध्यपूर्व में विचार नहीं सिर्फ मारकाट दिखाई दे रही है। इन क्रान्तिकारियों ने अपने लिए क्या सपने देखे हैं यह कहना कठिन है लेकिन लोगों को इन्होने कोई सपने दिखाये हो ऐसा लगता नही हैं हद तो तब हो जाती है जब त्रिपोली में बमबारी करने के लिए विदेशी ताकतों की छत्रछाया में अपने ही लोगों को छलनी करते हुए अपनी ही सम्पत्ति को नेस्तनाबूत कर अपने ही देश में हमलावर हुए। इनको आप सलाम कैसे कर सके यह समझ में नही आया। इन देशों में तानाशाही को इतने लम्बे समय तक लोगों ने झेला है लेकिन जो देश अब इनकी मदद कर रहे हैं वे कल तक इन तानाशाहों के खैरख्वाह रहे हैं।इनको न तो तानाशाहों से कुछ लेना-देना था और न ही इन प्रदर्शकारियों से कुछ लेना देना है,उनकी नजर सिर्फ यहॉ के तेल भण्डार पर है जो इन देशों की मरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अमृत का प्याला हो सकती हैं। जिसे ये लोग क्रान्ति कह कर प्रचारित कर रहे हैं दरअसल वह ऐसी उथल-पुथल है जिसका लुटेरी अर्थव्यथाओं द्वारा भरपूर दोहन किया जा रहा है। माना कि तानाशाही को सहन नहीं किया जाना चाहिए लेकिन विदेशियों को घर बुलाना तो किसी भी हाल में सहन नहीं किया जा सकता है। घर के चूहे को मारने के लिए बाहर से सॉप बुलाने का काम क्रान्तिकारी नहीं करते हैं।

  • 3. 15:33 IST, 10 फरवरी 2012 E.A. Khan Jamshedpur :

    बुस्तुल्लाह खान साहब मैं आपसे और जनाब नवल जोशी जी,जिन्होंने आपके ब्लॉग पर सटीक टिप्पणी की है, दोनों से सहमत हूँ. अरब स्प्रिंग की यह तथाकथित बयार पूरी तरह प्रायोजित जान पड़ती है. एक सभ्य एवं प्रजातान्त्रिक सपने का झांसा देकर लूट-खसोट की अंदरूनी नीयत बना कर और चालाकी से किसी देश की जनता को अपने ही देश में मार काट करने के लिए उकसाना और उन्हें हथियार और साधन मोहैय्या कराना घोर नैतिक अपराध है. ज्यादा इस विषय पर लिखने से मन की खटास बढ़ती जाती है लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा की अरब स्प्रिंग का यह नारा पूरी तरह विदेशी है जो तथाकथित संघर्षरत देशों का नहीं है बल्कि उन लुटेरों का है जो अब तक इन देशों को लूटते आये हैं. सारी दुनिया को इसकी भर्त्सना करनी चाहिए.

  • 4. 15:44 IST, 10 फरवरी 2012 शब्बीर ख़न्ना, रियाद, सऊदी अरब:

    शानदार लिखा है आपने लेकिन इसमें क्या बुराई है. जब अमरीका अपने फ़ायदे के लिए कुछ भी ग़लत या सही कर सकता है तो रूस या चीन क्यों नहीं. रहा सवाल संयुक्त राष्ट्र का तो वो एक मात्र मूक संस्था है जो अमरीका के इशारे पर नाचती है.

  • 5. 17:56 IST, 10 फरवरी 2012 नवल जोशी:

    आपने मध्य पूर्व में परिवर्तनों का समर्थन किया है,लेकिन इस विरोधाभाष पर आपने कुछ नहीं कहा है कि जिनके खिलाफ जनता सडकों पर उतरी है वे उन्हीं लोगों के दम पर अब तक अपना निरंकुश शासन चलाते रहे जो कि एक प्रकार से आज क्रान्तिकारियों के अभियान की अगुआयी कर रहे हैं। ये पश्चिमी देश कल तक इन शासकों के आका थे जो लोगों का शोषण करते और जुल्म ढाते रहे। आज पश्चिमी देश रातों-रात पाला बदल कर जनता के पक्ष में क्यों खडे हो गये है ? परिवर्तन के लिए लडने वाले लोगों को यह एहसास तो होगा ही कि इन दलाल और तानाशाहों की अपनी कोई ताकत नहीं है ये केवल अमेरिका जैसे देशों की कठपुतली हैं फिर उन्हीं देशों की मदद से होने वाला परिवर्तन कितना कारगर होगा यह सवाल आपको परेशान नहीं करता है?

  • 6. 00:01 IST, 11 फरवरी 2012 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    नवल जोशी जी, आपने बिल्कुल सही लिखा है, ये क्रांति नहीं बल्कि देश से गद्दारी है. बदलाव जग में नहीं बल्कि अमेरिका की ज़रूरतों में आ रहा है. जिस देश में भी अमेरिका घुसेगा उसे बर्बाद ही करेगा. आखिर लोकतंत्र के समर्थकों के पास इतने हथियार कहाँ से आ जाते हैं कि वो अपने देश के हाकिम को टक्कर दे देते हैं. एक-एक करके अमेरिका सबको निगल जायेगा. एक न एक दिन सऊदी अरब का भी यही हाल होगा. या तो अमेरिका को लूट की छूट देता रहे या फिर अमेरिका अपनी आदत के मुताबिक लोकतंत्र कायम करेगा. कोई भी शासक कितना भी ज़ालिम क्यों न हो लेकिन अमेरिका के एजेंटों से तो बेहतर ही होगा. आखिर अमेरिका ब्रिटेन में पूर्ण लोकतंत्र क्यों नहीं कायम करता. महारानी की जगह राष्ट्रपति क्यों नहीं बनाता.

  • 7. 20:20 IST, 11 फरवरी 2012 Farid Ahmad khan:

    प्रिय खान साहब, आपका ब्लॉग काफी देर के बाद आया. आपने अच्छा लिखा है. परिवर्तन की बयार चल पड़ी है आपको भी इसे स्वीकार करना होगा.

  • 8. 22:24 IST, 11 फरवरी 2012 डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड,:

    क्रांति का मतलब राजनीतिक क्रांति और सबको रोज़ी रोटी देना है. मगर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के चलते ये सारी परिभाषाएं बदल गई हैं और अब रोटी डिश-वाशर के साथ आती है और रोज़ी का तो मतलब ही है कि बिना हाथ-पैर हिलाए ढेर सारा पैसा अनवरत आता रहे. सूचना क्रांति का मतलब है कि हर आदमी चाहता है कि दुनिया की सारी दौलत उसके कदमों में आ जाए.
    मगर यह कोई नहीं सोचता की पृथ्वी के सीमित संसाधनों का कहाँ तक दोहन किया जा सकता है और प्रकृति हमारी इस उद्दंडता को कहाँ तक बर्दाश्त कर सकती है. दुनिया में सबको अमीर नहीं बनाया जा सकता, मगर सबको ज़रुरत भर और सिर्फ ज़रूरत भर की चीजें बिना प्रकृति को मुंह चिढ़ाए ज़रूर मुहैय्या कराई जा सकती हैं.
    गाँधी ने कहा था, दुनायाँ में सबकी ज़रुरत भर का है, मगर एक भी आदमी कि लालच भर का नहीं है.
    ज़रुरत अमीरी लाने की नहीं, अमीरी मिटाने की है.
    -- मगर कोई क्रांति ऐसा नहीं सोचती .

    -डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी, क्लीवलैंड, अमेरिका

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