बलवान समय की 'लाचारी'
मैं समय हूं....कुछ लोग कहते हैं कि मैं बलवान हूं लेकिन मैं अक्सर खुद को बहुत असहाय महसूस करता हूँ. ये अहसास कोई नया नहीं है लेकिन रह रहकर ये मुझे अपनी क्षुद्रता का भान कराता है.
मैं उस दिन बहुत असहाय था जब मुहम्मद गौरी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा था. कई बार यह लूट चलती रही और मैं मंदिर के बुर्ज पर खड़ा यह लूट देखता रहा. मैं उस दिन भी बहुत असहाय था जब पोरबंदर के एक दुबले पतले लाठी लेकर चलने वाले सत्यवादी व्यक्ति को दिल्ली के बिड़ला हाउस में गोली मार दी गई थी.
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मैं उस दिन बहुत कमज़ोर था जब दिल्ली में सिक्खों को घर से निकाल- निकाल कर मारा गया था. मैं उस दिन भी बहुत कमज़ोर था जब अयोध्या में एक मस्ज़िद को तोड़ कर मिट्टी में मिलाया गया था.
मैं सरयू के पास बैठा यह नज़ारा देखता रहा लेकिन कुछ कर न सका. लेकिन इसके दस साल बाद जो गोधरा में हुआ उसे देखकर मेरी कमज़ोरी भी कमज़ोर हो गई है.
अयोध्या से लेकर गोधरा के बीच मेरी उम्र दस साल बढ़ गई लेकिन मैं इन दिनों बहुत बूढ़ा हो गया हूं क्योंकि मैं भी अब औरों की तरह इंतज़ार में हूँ.
दस वर्षों में सरयू और साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका है. सत्ता बदली है फ़िज़ा भी बदली है लेकिन अगर कुछ नहीं बदल सका है तो मेरा कमज़ोर दिल जो अब भी धड़कता है इस डर में कहीं फिर अयोध्या और गोधरा न हो क्योंकि कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है.
मैं नहीं चाहता कि ये इतिहास दोहराया जाए. आदमी से आदमी को फिर लड़ाया जाए और लाशों की आंच में राजनीति की रोटियां सेंकी जाए.
धर्म के नाम पर राजनीति लंबे समय से देखता रहा हूं. मैंने बुद्ध को देखा है, महावीर को देखा है. शंकराचार्य को भी देखा है. मैंने अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया को भी देखा है. अकबर और औरंगजे़ब को भी देखा है. लेकिन ये दौर-ए-मोदी है जहां हर क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है.
मैं नहीं जानता इतिहास अयोध्या या गोधरा को याद रखेगा या नहीं लेकिन इतना ज़रुर जानता हूं कि मैं इन्हें ज़रुर याद रखूंगा क्योंकि मेरी यादों की पोटली में ये दो सबसे दुखद स्मृतियों में से है.
मैं जानता हूं साबरमती ट्रेन में मारे गए 59 कारसेवकों को भी कोई याद नहीं रखेगा और न ही दंगों में मारे गए 2000 लोगों को. इन पर आयोग काम करेगा. कोर्ट काम करती रहेगी. राजनेता इनके नाम लेते रहेंगे लेकिन न्याय करने वाले मेरा नाम लेकर कहेंगे कि मैं सारे घाव भर देता हूँ.
मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अब मैंने घाव भरने बंद कर दिए हैं. मैंने अपनी आंखें भी बंद कर ली हैं क्योंकि न्याय का इंतज़ार करते लोगों की नज़रें मुझसे अब बर्दाश्त नहीं होती हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
भारत की राजनीति देख कर समय भी थक गया है.
आपका लेख बहुत अच्छा लगा.
प्रिय सुशील जी, इतने अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद. ये सच है कि कभी-कभी हम लाचार हो जाते हैं. हमें न्याय के लिए इंतज़ार करना होगा.
इसमें कोई शक नहीं कि आपने लिखा शानदार है लेकिन इसमें ऐसा महसूस होता है कि आपने किसी ना किसी रूप में कांग्रेस का समर्थन और नरेंद्र मोदी का विरोध किया है.
शब्दों को समय के सूत्र में क्या ख़ूब बांधा है. बहुत दिलचस्प. हाँ समय बलवान तो है पर कभी-कभी बहुत ही असहाय लगता है.
बहुत सुंदर. आपकी बात देश के नागरिक की लाचारी बता रही है. एक नागरिक सोच सकता है, पर देश सरकारों से चलता है.
बहुत अच्छा ब्लॉग. मोदी को अपने बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ेगा.
"मैं उस दिन भी बहुत कमज़ोर था जब अयोध्या में एक मस्ज़िद को तोड़ कर मिट्टी में मिलाया गया था."...यह आप कैसे कह सकते हैं की वो जगह मस्जिद ही थी? अभी तो इस विवाद को सर्वोच्च न्यायालय को हल करना है. आप एक पत्रकार हैं ये तो मैं जानता था मगर न्यायाधीश कब से बन गए जो विवादित मामलों पर फैसला सुनाने लगे??वैसे उस वक़्त आप कहाँ थे और क्या महसूस कर रहे थे जब बाबर ने राम मंदिर को तोड़कर मिट्टी में मिलाया था?
अच्छा बुद्धिविलास है. समझ नहीं आता कि आप जैसे लोग कब तक दो तरह की बातें करते रहेंगे. अयोध्या की विवादित भूमि को मस्जिद क्यों मान रहे हैं. मुद्दों का इतना सरकारीकरण आप जैसे लोग ही कर सकते हैं जिनकी आजीविका इन्हीं मुद्दों से है. पूरी तरह से कांग्रेस परस्त लेख लिखा है आपने. अगर आपको मेरे शब्द तीखे लगें तो मुझे माफ कीजिएगा.
आप अच्छा लिखते हैं लेकिन उन लोगों की भावनाओं के बारे में भूल जाते हैं जिनके अपने साबरमती ट्रेन हादसे में मारे गए. गोधरा दंगों को लेकर तो खूब वाद-विवाद है लेकिन साबरमती ट्रेन हादसे में मारे गए लोगों और उनके परिजनों के बारे में कोई नहीं सोचता.
मानव इतिहास में, समय ने बड़े क्रूर लोगों को देखा होगा, लेकिन नरेंद्र मोदी जैसा आदमी कभी नहीं देखा होगा. कितनी अजीब बात है 10 साल हो गए लेकिन हजारो लोगों की हत्या का कोई अपराधी ही नहीं मिला. अयोध्या में बाबरी मस्जिद नहीं थी तो वो क्या थी? सरकारी ज़मीन पर 6 महीने मूर्ति रख दी जाये तो वो जगह मंदिर हो जाती है और 600 साल से मुसलमान जहाँ नमाज़ पढ़ रहे हों वो जगह मस्जिद ही नहीं है?
संवेदना रखने वाले आदमी का एक न एक कोना हमेशा बहुत कुछ पुरानी दुखद दुर्घटनाओं को याद कर के जलता ही रहता है. मेरा ख्याल है यह एक नकारात्मक प्रवृत्ति है जो पढने वाले को उदास कर देती है. समय के उतार-चढ़ाव, घटनाओं-दुर्घटनाओं से सबक हासिल करना चाहिए न कि उसको याद करके दुखित हो जाईये और दूसरों को दुखित कीजिये. इस लिए मैं आप के इस ब्लॉग को सकारात्नक नहीं मानता. आप को अपनी शैली बदलनी चाहिए.
बहुत अच्छा. धन्यवाद.
सुशील साहब, समय इस तरह सोच सकता है इस पर यकीन नहीं होता है। वो हिन्दू, मुसलमान या सिख को कैसे पहचानेगा? ये हमारे सोचने का नजरिया है। समय तो जानता है कि इंसान के पागलपन में इंसान मारा जा रहा है धर्म के नाम पर अधर्म ही किया जा रहा है, मुझे नहीं लगता है कि गॉधी को गोली मारे जाने और कुछ ही समय पहले बीबीसी हिन्दी कार्यक्रम में पाणिनी आंनद द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में जिन दो बहनों की भूख से मौत हो गयी थी इसमें समय कोई अन्तर करता होगा ,यदि समय कभी बोलेगा तो गॉधी जी के लिए अधिक दुखी और इन दो बहिनों की मौत पर कम दुखी होगा ऐसा नहीं लगता है दोनों ही हत्यायें हैं । यह हमारी सोच है कि किसी की मौत या हत्या पर हम उसका वजन देखते हैं और उसी के अनुरूप प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, आपने भी कुछ संवेदनशील घटनाओं का ही जिक्र किया है। यह तो राजनीतिक बयान अधिक लगता है।
सुशील जी याद करने के लिए देश में केवल ययोध्या और गोघरा ही नही है?.क्या भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को न्याय मिल गया ? आपने उनकी बातें इसलिए नहीं की क्योंकि उससे तो तुष्टिकरण हो नहीं रहा है.आप भी या तो घटनाओं को राजनैतिक नजरिए से देखते हैं या मज़हबी नजरिए से.कम से कम बीबीसी वालों से तो ऐसी उमीद नहीं रखी जाती
कौरव कौन, कौन पांडव / अटल बिहारी वाजपेयी
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|
अब तक तो हमने समय के बलवान होने की बात पढ़ी थी, लेकिन आपने बताया कि समय कितना मजबूर और कमजोर है. समय का विश्लेषण बहुत उम्दा तरीके से किया है. सुशील जी आपको बहुत-बहुत बधाई.
भाई आपकी मस्जिद तो सिर्फ 600 साल पहले बनी, उसके पहले 6000 सालों से वहां मंदिर था वो भी भगवान राम का मंदिर. वैसे भी विदेशी आक्रान्ता बाबर और चंगेज खान ने जितनी तबाही मचाई और लाखों मासूम लोगों को मारा उससे कहीं बहुत कम तबाही मोदी ने की. वैसे भी मोदी ने खुद किसी को नहीं मारा, केवल एक समुदाय विशेष की प्रतिक्रिया जो उसके अपनों के मरने से पैदा हुई थी (साबरमती ट्रेन हादसे में) को रोकने में कोताही की जबकि बाबर ने लाखों मासूमों का कत्लेआम खुद अपने आदेश से करवाया और आप उसी के द्वारा बनवाई मस्जिद के पक्ष में बोल रहे हैं. ताज्जुब है. भाई अगर वो बन्दा बाबर न होकर कोई औलिया, सूफी, या फकीर होता और उसकी मस्जिद होती जो गिरा दी गई होती तो उसकी तरफदारी समझ में भी आती.
झा जी आपने बहुत अच्छा लिखा है.
मन नहीं करता ऐसे ब्लॉग पढ़ने को जो जाति-धर्म के पुराने किस्सों पर लिखे जाते हैं. लेकिन जिस तरह से आपने इसको लिखा है कोई भी बिना पढ़े नही रह सकता| टिप्पणियाँ पढ़ कर नहीं लगता कि हिंदुस्तान के लोगो की सोच बदल रही है.कुछ लोग अभी भी पुरानी सोच के साथ जी रहे हैं.
अगर आपको निष्पक्ष रूप से लिखना नहीं आता तो मत लिखें. आज जो देश की दशा है उसमें उसमें आपलोगों का किया कराया सबसे ज़्यादा है. आपकी सूचना के लिए बता दूँ कि भारत में मुस्लिम थे ही नहीं, जो हैं वो पहले हिन्दू थे और जिन्होंने दबाव के कारण मुस्लिम धर्म को अपनाया. आपलोगों को देश की हालत पर ब्लॉग लिखना चाहिए जिससे कि कुछ सुधार हो.
राम प्रसाद भाई, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि बाबरी मस्जिद मंदिर तोड़ कर बनाई गई और वहां पहले कोई मंदिर था. किसी भी इतिहास की किताब में मंदिर तोड़ने का ज़िक्र नहीं है. अगर बाबर ने मंदिर तोड़ा हो तो क्या अकबर के ज़माने में लोगों को इंसाफ न मिलता? आप कह रहे है बाबर ने तबाही मचाई? मुगलों ने भारत को कितना कुछ दिया, ताजमहल, लालकिला जामा मस्जिद और न जाने कितनी इमारतें सड़के बनवाई. भारत को सोने की चिड़िया बना दिया. छोटे-छोटे राज्यों को मिला कर एक मुल्क बनाया. मुल्क में इंसाफ और अमन कायम किया. उनका इस देश पर बहुत एहसान है.
बधाई हो मित्र अब आप अच्छा लिखने लगे हैं.
आपके ब्लॉग की अंतर्निहित भावना स्पष्ट करती है कि राजनीति ईश्वर की प्रतिनिधि है.
अगर आप समय हैं तो आपको ये भी याद होगा की कैसे बाबर ने अयोध्या में मंदिर तोड़ के मस्जिद बनायी थी तथा कैसे औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ के मस्जिद बनवाई थी.
झा जी, कश्मीरी हिंदुओं के बड़ी संख्या में पलायन के बारे में क्या कहेंगे.
सुशील जी आपका लेख बेहतरीन है पर ये व्यक्ति विशेष लगा, काश आप ये लाइन बदल देते दौर-ए-मोदी = दौ-ए-मनमोहन = दौर-ए-महँगाई = दौर-ए-घोटाले