अराजक स्वामी
बात थोड़ी पुरानी है. एक दशक से थोड़ी ज़्यादा पुरानी. चर्चित वकील राम जेठमलानी उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल के सदस्य थे. उन्हीं दिनों सुब्रमण्यम स्वामी भी लोकसभा में चुनकर पहुँचे थे.
सुब्रमण्यम स्वामी ने खड़े होकर आरोप लगाया कि राम जेठमलानी और हथियारों के सौदागर अदनान खाशोगी में दोस्ती है. राम जेठमलानी ने तमतमाकर आपत्ति दर्ज की और कहा कि स्वामी झूठ बोल रहे हैं.
लेकिन स्वामी कहाँ चुप रहने वाले थे. उन्होंने पहले एक तारीख़ बताई कि किस दिन जेठमलानी और खाशोगी की मुलाक़ात हुई थी. फिर जगह का नाम बताया. फिर ये बताया कि वह एक याट (छोटी नौका) थी जहाँ दोनों मिले थे. स्वामी एक नई जानकारी देते और जेठमलानी तिलमिलाकर खड़े होकर उसे चुनौती देते.
फिर स्वामी ने बताया कि वह जेठमलानी की वकील बेटी रानी जेठमलानी का जन्मदिन था. जेठमलानी ने कहा कि वे स्वामी उनकी अवमानना कर रहे हैं और अध्यक्ष को उन्हें संरक्षण देना चाहिए. लेकिन स्वामी अनवरत जारी रहे. उन्होंने अपनी फ़ाइल से एक फ़ोटो निकाली और संसद को दिखाया. प्रेस गैलरी से फ़ोटो बहुत साफ़ नहीं दिख रही थी लेकिन ये सभी ने देखा कि उसके बाद जेठमलानी ने एक बार भी नहीं कहा कि स्वामी झूठ बोल रहे हैं.
उन्होंने दूसरा आरोप लगाया, "ये फ़ोटो मेरे घर से चोरी हुई है." और स्वामी ने मुस्कुराकर कहा, "आप इस चोरी के लिए एफ़आईआर करवा सकते हैं."
वही स्वामी चीख़-चीख़कर कह रहे थे कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में घोटाला हुआ और सरकार इसे स्वीकार करने की जगह कह रही थी कि स्वामी देश को गुमराह कर रहे हैं. अब सरकार ठीक उसी तरह से चुप हो गई है जिस तरह संसद के भीतर जेठमलानी हो गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने तस्वीर दिखा दी है.
सुब्रमण्यम स्वामी यूँ तो अर्थशास्त्री हैं. इस नाते वो आईआईटी और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स से लेकर हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी तक पढ़ाते रहे हैं.
लेकिन चर्चा में वे अपने विचारों की वजह से रहे हैं. एक समय वे आर्थिक उदारता की वकालत कर रहे थे और तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके विचारों को अवास्तविक बता रही थीं. लेकिन आख़िर वही बाद में वास्तविकता बनी. आर्थिक उदारीकरण ने देश का कितना भला किया, यह विवाद अभी जारी है लेकिन ये विवाद कब का ख़त्म हो गया कि इसके हीरो मनमोहन सिंह थे.
वे विदेश मामलों के जानकार हैं. भारत से चीन और इसराइल के संबंध सुधारने में उनकी भूमिका की चर्चा की जाती है.
स्वामी जनसंघ के सदस्य रहे हैं और इस समय वे हिंदूवादी पार्टी भाजपा के बहुतेरे सदस्यों से ज़्यादा कट्टर हिंदूवादी हैं. पिछले दिनों उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो लिखा वह ज़ाहिर तौर पर इतना सांप्रदायिक था कि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के पद से हटा दिया.
कई बार लगता है कि सुब्रमण्यम स्वामी किसी अतिवादी की तरह सोचते हैं. वे राजनीति के मध्यमार्ग को नकारते चलते हैं.
चाहे वो एलटीटीई के विरोध का मामला हो या फिर सोनिया गांधी का.
वे जनता पार्टी के अध्यक्ष हैं. उनकी पार्टी की वेबसाइट पर सोनिया गांधी पर उनके जो लेख उपलब्ध हैं उनको पढ़कर कुछ लोगों को सिहरन होती है लेकिन ज़्यादातर लोग उसे हँसी में उड़ा देते हैं. लेकिन वही स्वामी जयललिता और सोनिया के बीच सेतु भी बन जाते हैं.
उनकी साफ़गोई अक्सर बद्तमीज़ी के हद तक चली जाती है और नतीजा मानहानि के मुक़दमे पर ख़त्म होता है. न जाने कितने मानहानि के मुक़दमे उन पर अब भी चल रहे हैं. हर मुक़दमे में वो अपने वकील ख़ुद होते हैं और अब तक वे ख़ासे सफल दिखते हैं.
स्वामी अब 72 वर्ष के हो गए हैं. लेकिन उनकी मुस्कान की कुटिलता अभी भी जवान सी है. पत्रकारों से लेकर राजनीतिज्ञों तक हर कोई उन्हें पहली फ़ुर्सत में 'पागल' क़रार देता है.
वे भारतीय राजनीति का एक ऐसा चरित्र है, जिसे अंग्रेज़ी में 'मैवरिक' कहा जाता है. इतने स्वतंत्र व्यक्तित्व और विचार कि अक्सर अराजक दिखता है.
उनकी इस अराजकता की वजह से, सांप्रदायिकता की वजह से और अप्रत्याशित होने की वजह से कोई उनके क़रीब नहीं होना चाहता. कोई नहीं कहना चाहता कि वह स्वामी को पसंद करता है.
लेकिन उन्हें कोई अनदेखा भी कैसे कर सकता है?
क्या होगा यदि हमारे लोकतंत्र में ऐसे दो चार स्वामी और पैदा हो जाएँ?

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मैं तो स्वामी जी को सलाम करता हूँ जिन्होंने कम से कम बेईमान नेताओं का काला चिट्ठा तो खोला, नहीं तो आप और बीबीसी तो ये भी नहीं कर सकती है. दो-चार और स्वामी जैसे होते तो शायद भारत की काया पलट सकती है.
कृपा कर ये बताएँ कि आप कॉन्ग्रेस का समर्थन कर रहे हैं या स्वामी के ख़िलाफ़ हैं?
शाबाश स्वामी जी.
बहुत अच्छा लेख है. स्वामी, बाबा या अन्ना, हर कोई इस सरकार की नाक में दम किए हुए है लेकिन इसके बाद भी सरकार पूरी तरह बेशर्मी पर उतर आई है. अब स्वामी को लोग पागल कहें या कट्टरवादी इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. आख़िर वो एक ऐसे इंसान तो निकले जो पूरे सबूतों और तथ्यों के साथ अदालत में सरकार को घेर रहे हैं और उन लोगों का काला चिट्ठा खोल रहे हैं जो इस देश की जनता का हक़ मार कर अपना ख़ज़ाना भर रहे हैं. इस देश को ऐसे ही लोगों की ज़रूरत है.
सुब्रमण्यम स्वामी जैसे 2-4 लोग और हो जाएँ तो ये देश फिर से रामराज्य को प्राप्त कर सकता है. मैं स्वामीजी को सलाम करता हूँ.
विनोद जी आपने सुब्रमण्यम स्वामी के सम्बन्ध में जो कुछ भी बताया है उससे यह अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि स्वामी जी के चमत्कारिक अन्वेषण के पीछे वे अकेले नहीं हैं उनके साथ बहुत बडा तंत्र काम कर रहा है और स्वामी जी इस तंत्र की एक अभिव्यक्ति मात्र हैं। एक व्यक्ति केवल अपने दम पर इस तरह की सूचनाएँ एकत्रित कर सके यह सम्भव ही नहीं है। यह किसी पत्रकार की खोजी रिपोर्ट से बहुत आगे की बात है। उनके चमत्कार से अभिभूत होने से पहले सचेत होना चाहिए। लेकिन यह ख़तरनाक संकेत भी है कि सोनिया गॉधी के बारे में उनके दावों का कहीं से भी खण्डन नहीं किया जा रहा है अथवा स्थिति साफ नहीं की जा रही है।रामजेठमलानी के सम्बन्ध अदनान खशोगी से हैं अथवा नहीं,सोनिया के जीवन से सम्बन्धित कौन सा विरोधाभाषी रहस्योद्घाटन श्री स्वामी ने किया यह महत्वपूर्ण है लेकिन खतरनाक नहीं है। एक आदमी इस तरह अनेकों धरातलों पर बिना किसी को नुकसान पहुँचाए जी भी सकता है और इससे बहुत बनता-बिगड़ता भी नहीं है लेकिन सत्ता के गलियारों में दिखाई देने वाला यह संघर्ष यदि विदेशी ताकतों के खेल का एक हिस्सा हो तो यह हमारे लिए सबसे गम्भीर बात है। बावजूद इसके यह सवाल अपनी जगह पर पूरी गम्भीरता से कायम है कि 2 जी मामले में किस तरह सरकार गोलमाल करती आ रही है। लेकिन इसकी आड में हम इस तथ्य को नहीं नकार सकते हैं कि स्वामी जी के सूचना-सूत्र क्या हैं?उनका मकसद क्या है?क्या वे वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं अथवा यह तेवर उनके किसी मकसद को पाने का एक पैंतरा है। स्वामी जी के रहस्योद्घाटन से अभी तक लाभ ही दिखाई दे रहा है। बात इतनी ही हो यह हमारी भी सदिच्छा है कहीं ऐसा न हो कि इस चमत्कारिक नेता के अपने रहस्य हों। और इनके बीच चल रहे संघर्ष के सूत्र कहीं और से संचालित हो रहे हों।
काश ये देश कुछ समझदार होता.
सुब्रह्मण्यम स्वामी दिखावा करते हैं. आपको लगता है वो एकदम ईमानदार हैं? वे भी इंसान हैं और उनसे भी ग़लती होती होगी. निश्चित ही किसी दिन हममें से कोई खड़ा होकर ये कहेगा कि स्वामी आपने ग़लती की, और इसे वो ही साबित भी कर देंगे.
निरर्थक लेख. मुझे समझ में नहीं आ रहा लेखक कहना क्या चाह रहे हैं?
मुझे लगता है कि बीबीसी हिंदी सेवा धीरे-धीरे पत्रकारों के बजाय बौद्धिक सोच रखने वाले महानुभावों पर अधिक ध्यान केन्द्रित कर रही है. मान्यवर आचार्य महोदय, आपका काम समाचार पहुंचाना है, ये बताना नहीं कि देश को किसकी आवश्यकता है और किसकी नहीं.
गलती किससे नहीं होती? जैसे बांग्लादेशी और पाकिस्तानी अभी भी लगे हुए है अपनी गलतियाँ सुधारने में, वैसे ही स्वामी जी भी अपनी गलतियों में भी सुधार कर सकते है. आप चिंता मत करिए. आप सिर्फ अपने आप को देखिए.
कोई 400 साल पहले काशी के विद्वानों ने संत तुलसीदास का भी विरोध किया था. हमारे समाज में यीशू को पत्थर, गांधी को गोली और परिवर्तन का दीप जलानेवालों को अराजक कहते हैं. आपने भी इसी को दोहराया है.
स्वामी को अराजक कहनेवाले ने क्या कभी ख़ुद भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ या अराजकता के ख़िलाफ़ होने की हिम्मत दिखाई है? स्वामी को सलाम.
स्वामियों पर कहाँ समय मिल गया आपको? ये वाले स्वामी भी भ्रष्टाचारियों की लड़ाई लड़ रहे हैं फर्क ये है कि ये न्यायालय में लड़ रहे हैं और वो जनता में लड़ रहे थे. उन्हें तो औरत बनाकर पिटवाया, देखिए इनकी क्या गति होती है. आपको याद है न एक बार 'जेठमलानी' को किसी राजनेता के गुंडों ने बड़ी बेरहमी से बेइज्जत किया था.क्या हुआ मीडिया भी नहीं जानता होगा.इस स्वामी ने तो दोनों की गाँठ खोली है न्यायपालिका की भी और राजनीतिज्ञों की भी.गृहमंत्री जी, तत्कालीन वित्तमंत्री जी कैसे बच रहे हैं यह बच्चा बच्चा भी जानता है पर 'क़ानून' नहीं फँस रहे हैं, सरकार की नज़र में और खासकर सोनिया की दृष्टि में अभी ये अपराधी नज़र नहीं आ रहे होंगे.नियमतः सब गलत हुआ पर वित्त उसमें आड़े नहीं आता पर देश को वित्तीय नुकसान तो हुआ है यह कोर्ट भी स्वीकारता है. धन्य है हिंदुस्तान का न्याय.. विनोद जी ने जितना तथ्यपरक ब्लॉग लिखा है उसकी बधाई, इन राजनेताओं को शर्म तो आती ही नहीं जब देश आज़ाद हुआ होगा तो 'कमाने' की दुकान के रूप में ये पार्टियां बनी थीं या देश को विचार और विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए. स्वामी जी की भी एक पार्टी हुआ करती थी पता नहीं पटरी से उतर गयी लगती है.आजकल किसी प्लेटफार्म पर नज़र नहीं आती और न ही कहीं सुर्खियाँ ही बटोरती है क्या उसकी जगह स्वामी जी ही लड़ रहे हैं. यह ब्लॉग काश चिदंबरम साहब भी पढते पर इसका अंग्रेजी अनुवाद ही उनकी समझ में आएगा सो इसका अनुवाद आंग्ल और इटैलियन में होना चाहिए.
कुछ लाभ होगा तो कुछ हानि भी होगी और क्या जैसा अभी स्वामी के कारण हो रहा है?
एकतरफ़ा लेख है ये, कोरी बकवास. स्वामी सिर्फ़ आरोप लगा रहे हैं जो कोई भी कर सकता है. वो राजनीति से प्रेरित हैं ये सब जानते हैं. उनके विचार अतिवादी नहीं हैं, सड़े हुए और दुर्भावना वाले हैं. ऐसे आदमी समाज के लिए ठीक नहीं. भ्रष्टाचार से उतना ख़तरा नहीं जितना स्वामी जैसे लोगों के विचारों से है.
देश का हर सच्चा नागरिक सुब्रमण्यम स्वामी का आभारी है. मेरी नज़र में वो एक देशभक्त हैं.
निर्भीक,ज्ञानी,दूरदर्शी,आत्मविश्वासी और खुद अपना काम करने वाले..स्वामी के बारे में ये बातें झलकती है. वे कई बार हारते हुए नज़र आये पर अपनी लड़ाई जारी रखी और अंतत: जीत हासिल की.2G मामले में उनकी लड़ाई काबिल-ए-तारीफ है.
सुब्रमण्यम स्वामी ने ये साबित किया है कि आप यदि सही रास्ते पर चलेंगे तो तख्त भी हिला सकते है. अन्ना हज़ारे और उनका व्यापक जनसमर्थित आंदोलन भी जिस कांग्रेस ने कुटिलता से दबा दिया, स्वामी के क़ानूनी दावपेंच के आगे उसकी एक न चल सकी. वो चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही है.
वे खोजी पत्रकार जो जोखिम उठाते हुए जान की बाज़ी तक लगा देते हैं और वे लोग जो समाज के हित में जूझते रहते हैं, चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हज़ारे या सुब्रमण्यम स्वामी, ये सभी अराजक हैं उन लोगों के लिए जो बेईमानी कर रहे हैं.
2 जी घोटाले को उजागर करने में सुब्रमण्यम स्वामी की भूमिका पर शायद ही किसी को सन्देह होगा। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि इतने बडे भयानक घोटाले के सामने आने के बावजूद लोग स्वामी जी के साथ इस तरह खड़े नहीं हुए अथवा उन्हें समर्थन नहीं मिल पाया है जैसा कि अन्ना को भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई में लोगों ने अपना समर्थन दिया था। स्वामी जी ने इस लडाई को अकेले ही लडा है उन्हें लोगों से सहयोग की जरूरत भी शायद नहीं है और न ही उन्होने इसके लिए लोगों से किसी प्रकार की अपील ही की है। जिस तरह से वे लड रहे हैं उससे साफ है कि यह उनका व्यक्तिगत रूप से अपना मिशन जैसा है। रामजेठमलानी के सम्बन्ध को उजागर करने के लिए श्री स्वामी तभी तत्पर हुए जब जेठमलानी ने उन्हें चुनौती दी। पता नहीं इस बारे में श्री स्वामी को कब से पता था और लगता है कि यदि जेठमलानी उन्हें चुनौती नहीं देते तो वे शायद ही इस बारे में बोलते। इसके बाद भी रामजेठमलानी क्या-क्या करते रहे हैं स्वामी की खोज इस बारे में कुछ बताती नहीं है सम्भवतः जेठमलानी से स्वामी को कुछ दिक्कत रही होगी इस रहस्योद्घाटन के बाद इनके बीच सम्बन्धों का पुर्ननिर्धारण हुआ होगा और सारी बातें हवा हो गयी। लगता है कि ऐसी ही कुछ शिकायतें यूपीए सरकार से भी स्वामी को हो सकती हैं । अन्यथा क्या कारण है कि स्वामी जी इस लडाई को व्यक्तिगत खुन्नस जैसे लड रहे हैं । लोग भी स्वामी जी से उतनी ही दूरी बनाकर चल रहे हैं जितनी दूरी लोगों की सरकार से है। बडा सवाल इस बात का नहीं है कि कौन घोटालेबाज है और कौन इसका पर्दाफाश कर रहा है वास्तव में लोगों का भरोसा न तो सरकार पर है और न ही स्वामी जी पर। लोग तटस्थ भाव से इनका तमाशा देख रहे हैं। यदि किसी की यह जिद है कि सोनिया और चिदम्बरम को जेल जाना होगा तो यह कल को हो भी सकता है ।लेकिन लोगों की रूचि इस बात में नहीं है कि किस गुट के कितने लोगों को जेलों में होने चाहिए। लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं, यह समाप्त हो। इसे सुनिश्चित करने की बजाए इसे या इसे जेल भेजने की व्यक्तिगत राजनीति से न तो देश का भला होगा और न ही लोगों का।
ऐसा संतुलित लेख लिखने के लिए धन्यवाद. काश इसकी आलोचना कर रहे लोग थोड़ा गहराई से सोचें और तब उन्हें स्वामी की मानसिकता में समाहित ख़तरे और लोकतांत्रिक भावना पर आए ख़तरे की समझ हो पाएगी.
कौन कहता है अकेला चना भाड नहीं फोड़ सकता ? उदहारण सामने है. बिना किसी के सहयोग के, बिना मीडिया की फुटेज खाए इस आदमी ने वो कर दिखाया है कि आज बस यही कहने को जी चाहता है कि- अकेला चना भाड फोड़ता है और ऐसा फोड़ता है कि..
विनोद वर्मा आप कहीं से भी एक लेखक नहीं लगते है और दोबारा मत लिखिएगा.
विनोद जी, आपने सुब्रमण्यम स्वामी का बहुत ही अच्छा चरित्र-चित्रण किया है. आप धन्यवाद के पात्र हैं.
लेख दिलचस्प है;स्वामी के व्यक्तित्व को सही रूप में प्रस्तुत करता है.
बी.बी.सी को साधुवाद, स्वामी जी और अन्ना जी जैसे लोगों से ही तो हमारी उम्मीद कायम है।स्वामी जी को कोई कुछ भी कहे पर उन्होने एक मिसाल तो दी है, मेरी समझ से यह देश हित में तो अवश्य है।
देश में काफ़ी काफ़िर और गद्दार हैं जो स्वामी या आर.एस.एस. को बदनाम करते है ताकि भारत को तालिबान और दिल्ली को इलामाबाद बनाया जा सके! जब भी बाबा रामदेव, स्वामी जी या किसी और ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाई है गद्दार चले आते है उन्हें बदनाम करने!
स्वामीजी लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी हैं. उनको मेरा सलाम.
पक्षपात भरा लेख है. क्षमा चाहता हूँ कहने के लिए, लेकिन लगता है आप कांग्रेस के हाथों में बिक गए हैं.
हे भगवान इस देश को 10 -15 स्वामी और दे दो.
विनोद जी , स्वामी जी के विवादित व्यक्तित्व पर आपका विवादित लेख काबिल-ए-तारीफ़ है. पर चाहे 2 जी स्कैम हो या अन्य कोई मुकदमा, स्वामी जी ने वर्तमान संविधान को बखूबी उपयोग में लेते हुए लड़ा है. साथ ही स्वामीजी के कई मुकदमो से देश में कई घोटालों का पर्दाफाश हुआ है. स्वामी जी ने युवाओ में कम होते जा रहे संविधान में विश्वास को पुनः जगाने की कोशिश की है. उन्होंने सिद्ध किया है कि वर्तमान संविधान के साथ भी इस तरह की जाँचें बिठाई जा सकती हैं. अतः जो भी हो जब तक स्वामी जी देश हित में काम करते रहेंगे, मुझ जैसों का समर्थन उन्हें मिलता रहेगा.
जो भी हो स्वामीजी ठीक कर रहे हैं. इस तरह के भ्रष्ट नेताओं के बारे में तो इस देश को पता चल रहा है कि देश को किस दिशा में ले जा रहे थे ये नेता. धन्यवाद स्वामी जी