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जॉर्डन का वो शहर जहां मस्जिद और चर्च के लिए एक ही दरवाज़ा है
- Author, मार्ता विदाल
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
घाटी अभी पूरी तरह नींद से जगी भी नहीं थी. हालांकि सूरज ने अपने आने की ख़बर अपनी सबसे नरम और सुनहरी किरणों के हाथों भिजवा दी थी. सूरज की किरणें उन तीन पहाड़ों की करीनेदार ढलान पर बसे चूना पत्थर से बने घरों के दरवाज़े खटखटा रही थीं.
इसी बीच प्रार्थना के लिए जुटने का बुलावा भी आ गया. शहर की सबसे ऊंची गुंबद से मुअज़्जिन की आवाज़ आधी नींद में डूबे शहर को जगा रही थी. 'अल्लाह-हू-अक़बर... अल्लाह-हू-अक़बर...'
मीनार पर लगा लाउडस्पीकर रोज़ाना की तरह अपनी नौकरी को पूरी ईमानदारी के साथ निभाते हुए लोगों को प्रार्थना के लिए जल्दी जमा होने के लिए आदेश कर रहा था.
कुछ समय ही बीता रहा होगा, तभी उस नींद से जग रहे शहर की घुमावदार सड़कें घंटियों की आवाज़ से खनक उठीं. घुमावदार सड़कों के किनारों पर रातभर के इंतज़ार के बाद चिड़ियों की आवाज़ के साथ-साथ घंटियां भी सुबह की खुशामद कर रही थीं.
इस शहर की खूबसूरती कभी खोए ना, इसकी परंपरा यूं ही बनी रहे, शायद यही सोचकर यूनेस्को के विश्व धरोहर में इसका नाम जोड़ा गया होगा. अस-सॉल्ट की खूबसूरती इसे सिर्फ़ इमारतों के एक शहर से कहीं अधिक बना देती है.
जॉर्डन का यह छोटा सा शहर, जहां आपको मीनारों पर लगे लाउडस्पीकर दिखाई देंगे तो साथ ही में चर्च की शांति भी. जहां मीनारों और टॉवर दोनों का एक ही आसमान है. एक शहर जिसे उसकी सहिष्णुता और आतिथ्य के लिए जाना जाता है.
भूमध्यसागर और अरब प्रायद्वीप के बीच व्यापार और तीर्थयात्राओं को सुगम बनाने के लिए 19वीं शताब्दी के आख़िरी दौर में ऑटोमन साम्राज्य के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से इसे एक संपन्न शहर के रूप में विकसित किया गया था.
शहर का ऐतिहासिक केंद्र बिंदु और आकर्षण का मुख्य केंद्र यहां मौजूद चूना पत्थर के सैकड़ों घर हैं. जिनमें से कुछ 19वीं सदी के अंतिम समय के हैं और कुछ 20वीं शताब्दी के शुरुआती समय के.
इन घरों की ख़ासियस सिर्फ़ इनका चूना पत्थर से होना नहीं है, बल्कि इनके धनुषाकार दरवाज़े, नक्काशीदार स्तंभ और ऊंची-ऊंची खिड़कियां भी हैं.
इन खिड़कियों का आकर्षण धूप में और बढ़ जाता है, जब सूरज की रोशनी से ये चमक उठती हैं.
पीले पत्थर से बनी इमारते हैं ख़ास
थायरा अराबियात यहां की एक स्थानीय दुकानदार हैं. वह शहर की महिलाओं को यहां के परंपरागत सुई-धागे के काम की ट्रेनिंग देती हैं.
थायरा कहती हैं, "पीले पत्थर से बनी इमारतें बेहद महत्वपूर्ण हैं लेकिन यह वो मुख्य वजह नहीं है जो अस-सॉल्ट को दुनिया के किसी भी दूसरे शहर से अलग और ख़ास बनाती है."
हम सिटी सेंटर में उनकी उस छोटी सी दुकान में कढ़ाई किये हुए परिधानों के और स्कार्फ़्स के बीच में बैठ हुए थे. उन्होंने मुझे एक कप कॉफ़ी भी दी जिसमें इलायची की सुगंध भी थी. थायरा वहीं बीच में बैठकर जॉर्डन के एक परंपरागत दुपट्टे शेमाघ को तैयार कर रही थीं.
अपने शहर के बारे में, अपनी जगह के बारे में बताने के लिए उन्होंने बीच में ही अपना काम रोक दिया था.
उन्होंने मुझे अपने शहर और शहर के लोगों के बारे में बताना शुरू किया. उन्होंने कहा, "इस शहर को ख़ास यहां के लोग बनाते हैं , उनकी दयालुता इस शहर को ख़ास बनाती है."
इस बीच बात करते-करते उन्होंने दूसरी बार मेरे कप को भर दिया था. उसके बाद उन्होंने बड़े ही अपने भाव से पूछा- "क्या आपने सुबह का नाश्ता किया है? आइए, मेरे साथ कीजिए."
यह शहर सचमुच थायरा के कहे अनुसार ही थी. शहर की घुमावदार और खूबसूरत गलियों से गुज़रते हुए मुझे दोपहर के खाने, चाय और कॉफ़ी के लिए बार-बार न्योता मिलता ही रहा.
इन गलियों में घूमते हुए जो एक बात मुझे स्पष्ट हो चुकी थी वह यह कि यहां आने वाले मेहमानों के लिए शहर के लोगों में उदारता और आतिथ्य का भाव उनकी जड़ों में हैं.
सदियों से यह शहर व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए यरूशलम, दमिश्क, बग़दाद या मक्का जाने वालों के लिए ठहरने की एक प्रमुख जगह थी. जहां की परंपरा रही है कि वे आगंतुकों, व्यापारियों और तीर्थयात्रियों का दिल खोलकर स्वागत करेंगे. उन्हें खान-पान और रहने का ठिकान देंगे.
19वीं शताब्दी में अस-सॉल्ट प्रशासनिक मुख्यालय बन गया और इसने धार्मिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक़ रखने वाले व्यापारियों को बहुत आकर्षित किया. कई व्यापारी शहर में आकर बस गए और स्थानीय जनजातियों के साथ अच्छे पड़ोसी संबंध विकसित किये.
विविधता
स्थानीय बाल्का गवर्नरेट (जॉर्डन के 12 गवर्नरेट्स में से एक) में पर्यटन विभाग के पूर्व निदेशक रहे अयमान अबू रुम्मन का कहना है, "एस-सॉल्ट पूर्व और पश्चिम के बीच, रेगिस्तान और शहरी केंद्रों के बीच एक केंद्र बन गया. इस शहर की विविधता इसकी वास्तुकला में साफ़ झलकती है."
यहां की विविधता का एक बेहतरीन नमूना अबू ज़बर हाउस है.
ओटोमन शैली में बनी इस इमारत पर यूरोपीय प्रभाव और स्थानीय परंपराओं की छाप साफ़ नज़र आती है. यह भवन स्थानीय चूना पत्थर से तैयार किया गया है. इटैलियन सीलिंग के साथ आर्ट नोव्यू से पुती कांच की खिड़कियां और अलंकृत सेरेमिक टाइल्स इसकी खूबसूरती और विविधता को और बढ़ा देते हैं. यह घर एक बड़े उद्योगपति अबू जबेर का था. वह 19वीं शताब्दी के अंत में यहां आकर बसे थे. फिर साल 2009 में इस इमारत को एक संग्रहालय का रूप दे दिया गया.
इसके बाद जब 1928 में अम्मान को ट्रांसजॉर्डन अमीरात की राजधानी चुना गया तो अस-सॉल्ट का क्षेत्रीय महत्व कम हो गया. लेकिन एक ओर जहां अम्मान में तेज़ी से शहरीकरण हुआ वहीं अस-सॉल्ट आज भी अपनी धरोहर को बचाये रखने में कामयाब है.
जॉर्डन के वास्तुकार रामी डाहेर ने ही इस शहर को विश्व धरोहर में शामिल किये जाने के लिए नामांकन हेतु फ़ाइल तैयार की थी. यह शहर सिर्फ़ इसलिए अनोखा नहीं है क्योंकि यहां ऐतिहासिक चूना पत्थर की इमारते हैं बल्कि जिस तरह इस शहर ने सदियों से अपने आतिथ्य की परंपरा और सहिष्णुता के भाव को संभालकर रखा है, वह दुनिया में कहीं भी आसानी से मिल पाना संभव नहीं है.
शहर की सबसे ख़ास बात
इस शहर की बनावट यानी टोपोग्राफ़ी का यहां के समुदायों में नज़दीकी बनाए रखने में बहुत योगदान है.
आपस में जुड़ी सीढ़ियां, साझा आंगन और सार्वजनिक चौराहों ने लोगों को एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु बनाया है. अलग-अलग धर्मों को मानने वालों को एक साथ मिलजुलकर रहने के लिए प्रोत्साहित किया है. ज़्यादातर परंपरागत इमारतों में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले एक साथ खाना बनाते हैं और साथ खाते हैं.
विभिन्न धर्मों को मानने वालों के बीच प्यार-सम्मान
वहीं अबू ज़बर संग्रहालय के पास बैठे अबू रहमान बताते हैं, "चर्च, मस्जिद की ओर खुलता है और वे दोनों एक ही प्रवेश द्वार साझा करते हैं. वे एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होते हैं. उनके बीच में वैसे ही संबंध हहैं, जैसे एक पड़ोसी के दूसरे से होते हैं."
वह आगे कहते हैं, "यह बात हमारे शहर के सबसे पुराने चर्च के संदर्भ में और स्पष्ट होती है. यह चर्च 1682 में बनाया गया था. यह एक गुफ़ा के चारों ओर है. जिसके बारे में कहा जाता है कि सेंट जॉर्ज वहां गड़ेरियों के सामने प्रकट हुए थे. अरबी में चर्च को अल-ख़ादेर कहते हैं.
ईसाई और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग वहां प्रार्थना के लिए जाते हैं और सभी का वहां स्वागत किया जाता है."
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