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मलेशिया के कांवड़िये जो अपने शरीर में करते हैं 150 छेद
- Author, टिम मैकडोनल्ड
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
मलेशिया के थईपुसम त्योहार में लाखों तमिल श्रद्धालु शरीक होते हैं. भगवान मुरुगन को प्रसन्न करने के लिए वे अपना शरीर सैकड़ों खूंटियों से छेदते हैं.
भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) के भक्तों के लिए थईपुसम साल का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है.
वैसे तो यह पूरे दक्षिण भारत, श्रीलंका और सिंगापुर में मनाया जाता है, लेकिन मलेशिया में कुआलालंपुर के पास बातू गुफ़ाओं में सबसे ज़ोरदार उत्सव होता है.
यहां यह त्योहार 1892 से मनाया जा रहा है. हर साल की शुरुआत में लगभग 15 लाख लोग कई दिनों के लिए यहां आते हैं.
उत्सव के दौरान हज़ारों लोगों को ढोल-नगाड़ों के साथ नाचते-गाते हुए गुफ़ा की ओर बढ़ते हुए देखा जा सकता है.
वे गुफा के नीचे बने मुख्य द्वार से गुज़रते हैं, भगवान मुरुगन की विशाल प्रतिमा के दर्शन करते हैं और 272 सतरंगी सीढ़ियां चढ़कर गुफ़ा के अंदर बने मंदिर में जाते हैं.
प्रसन्न रहें भगवान
कई तमिलों के लिए और कुछ अन्य हिंदुओं के लिए भी थईपुसम भगवान मुरुगन को प्रसन्न करने का मौक़ा होता है. इसके लिए वे 48 दिनों तक उपवास और पूजा-पाठ करते हैं.
कई श्रद्धालु कांवड़ लेकर चलते हैं जो अलग-अलग आकार-प्रकार की होती है. आम तौर पर यह गोलाकार फ्रेम की होती है, जिसे मोरपंखों और फूल-मालाओं से सजाया जाता है.
इसके फ्रेम से हुक और सैकड़ों खूंटियां लटकी होती हैं जिनको श्रद्धालु अपने शरीर में घुसा लेते हैं.
यह दर्दनाक लगता है, लेकिन कुछ भक्तों के लिए यह उत्सव का मुख्य हिस्सा है.
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एक ईश्वर, अनेक देवता
इस्लाम, ईसाइयत और यहूदी धर्म में एक ही ईश्वर है. उनका संस्थापक एक है और मूल धर्मग्रंथ भी एक है.
हिंदू धर्म इससे अलग है. इसका कोई एक संस्थापक नहीं है. धर्मग्रंथ कई हैं, लेकिन बाइबल या क़ुरान की तरह हिंदुओं का कोई एक सर्वमान्य ग्रंथ नहीं है.
हिंदू धर्म में देवता भी कई हैं, जिनको एक ही परमात्मा के कई रूप माना जा सकता है. इस विश्वास को मानने के रास्ते भी कई हैं.
अधिकांश हिंदू थईपुसम नहीं मनाते या भगवान मुरुगन को नहीं पूजते. यह एक स्थानीय त्योहार है जिसे मलेशिया का तमिल समुदाय मनाता है.
थईपुसम में भी पूजा के कई रूप हैं. बातू गुफ़ाओं में पूजा के लिए आए चौधरी कन्नन कहते हैं, "यह उन (श्रद्धालुओं) के ऊपर है कि वे कैसे अपनी श्रद्धा दिखाते हैं."
कुछ श्रद्धालु अपने माथे पर दूध का बर्तन लेकर चलते हैं. कुछ लोग सिर मुंडवाते हैं. कुछ लोग प्रार्थना करते हैं. कुछ श्रद्धालु घुटनों के बल चलकर परिक्रमा पूरी करते हैं.
बच्चे की मन्नत पूरी होने पर भगवान मुरुगन का धन्यवाद करने के लिए कई लोग बच्चे को गन्ने से बंधे झूले में रखकर मंदिर पहुंचते हैं.
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शरीर को छेदना
कई लोग ख़ुद को छेदते हैं. कुछ लोग हुक का इस्तेमाल करते हैं. कुछ अन्य लोग अपने शरीर में धातु की पतली नुकीली खूंटियां घुसाते हैं. इन खूंटियों में धातु के छोटे बर्तन या नींबू भी टंगे होते हैं.
किशन कुमार के पेट में खूंटियां घुसाने पर उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती.
उनके शरीर और बांहों में 130 से ज़्यादा हुक और खूंटियां घुसाई गई हैं. भाले जैसी दिखने वाली एक छोटी खूंटी उनके दोनों गालों के आर-पार की जाएगी.
वह दर्द कम करने की कोई दवा नहीं खाते. उनके लिए यह भगवान मुरुगन के प्रति उनकी भक्ति है.
किशन कुमार का कहना है कि दर्द से ईश्वर में ध्यान लगाने में मदद मिलती है.
भक्त अपने अहंकार, क्रोध और अन्य मानवीय अवगुणों को भूल जाते हैं और भगवान मुरुगन में ध्यान लगाते हैं.
किशन कुमार ने शरीर में हुक और खूंटियां घुसाने का काम क़रीबी दोस्तों और छोटी बहन को दिया है.
उनके दोस्तों ने टेंट में ही एक अस्थायी मंदिर बनाया है जो आधार शिविर की तरह काम करता है.
यहां वे अपनी कावड़ रखते हैं (इस प्रक्रिया में एक घंटे से ज़्यादा समय लग सकता है) और बातू गुफ़ाओं के मुख्य मंदिर के लिए निकलने से पहले प्रार्थना करते हैं.
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मंदिर जैसी कांवड़ी
कांवड़ कई आकार-प्रकार की हो सकती हैं. कुछ भारी होती हैं जो कंधे के दोनों तरफ़ फैली होती हैं.
कुछ महत्वाकांक्षी भक्त अपनी पीठ से भारी हुक टांगते हैं जिसमें पहियों पर रखी वेदिका को बांध दिया जाता है. इस वेदिका को आम तौर पर दूसरे लोग धक्का देते हैं.
किशन कुमार ने अपनी कांवड़ पर 15 हज़ार रिंगिट (क़रीब 3,000 पाउंड) से ज़्यादा ख़र्च किए हैं. इसके कुछ हिस्से सिंगापुर और कुछ भारत से मंगाए गए हैं.
चांदी की परत वाली कांवड़ी के फ्रेम को मंदिर जैसा बनाया गया है. इसे मोरपंखों से सजाया गया है.
किशन कुमार इसे और सजाने की सोच रहे हैं.
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मुरुगन की कहानी
किंवदंतियों के मुताबिक़ दानव इदुंबन के कंधे पर रखे लकड़ी के टुकड़े में दो पहाड़ियों को बांधा गया था. उसमें रस्सी की जगह सांप थे.
एक ऋषि ने इदुंबन को वह कांवड़ उठाने को कहा था. वह आराम करने के लिए रुका तो एक युवक एक पहाड़ी पर बैठ गया. इदुंबन उसे फिर नहीं उठा पाया.
दानव उस युवक से लड़ने लगा और फिर भयानक युद्ध शुरू हो गया.
इदुंबन मारा गया, फिर उसे जीवित कर दिया गया. इदुंबन को पता चला कि युवक और कोई नहीं, बल्कि भगवान मुरुगन हैं.
वह असुर भगवान मुरुगन का भक्त बन गया और उसे मुरुगन के मंदिर का द्वारपाल बना दिया गया. भगवान मुरुगन ने घोषणा की कि जो भी भक्त कांवड़ उठाएगा उसे पुण्य मिलेगा.
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पूरी हुई मन्नत
कन्नन डेंगू बुख़ार के बाद पहली बार थईपुसम में शामिल हुए थे. उनके गुरु (और दादा भी) ने उनकी सेहत के लिए भगवान मुरुगन से प्रार्थना की थी.
वह कहते हैं, "उन्होंने भगवान मुरुगन से प्रार्थना की थी कि जब मैं ठीक हो जाऊंगा तो कांवड़ लेकर उनके पास जाऊंगा. इसलिए मैंने यह पूजा शुरू की."
इस साल उनकी शादी हो रही है. कांवड़ की तैयारी में बहुत समय लगता है, इसलिए इस साल वह दूध ले जा रहे हैं, जिसे वह मंदिर की वेदी पर चढ़ाएंगे.
वह एक रस्मी भाला भी ले जा रहे हैं. ऐसा ही एक छोटा भाला उनके गालों के आर-पार घुसा हुआ है.
मुरुगन का भाला
थईपुसम में भाले का बड़ा महत्व है, क्योंकि यह उस पल का उत्सव है जब शिव की पत्नी पार्वती ने अपने बेटे भगवान मुरुगन को भाला दिया था.
बातू गुफ़ाओं की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए भी श्रद्धालु भाले की जय-जयकार करते हैं.
किंवदंतियों के मुताबिक़ भगवान मुरुगन ने भाले से ही असुरों का संहार किया था.
यह लड़ाई आंतरिक संघर्ष के बारे में भी है. असुर अज्ञानता, अहंकार और भय जैसे मानवीय अवगुणों के भी प्रतीक हैं.
कहते हैं कि भगवान मुरुगन ने राक्षसों के राजा का वध किया तो वह आम के एक पेड़ में बदल गया था. उन्होंने आम के पेड़ पर बरछी चलाई तो वह एक मोर और मुर्गे में बदल गया.
मुर्गे को उन्होंने अपने ध्वज में जगह दी और मोर उनका पसंदीदा वाहन बन गया.
थईपुसम में मुर्गा कम ही दिखता है, लेकिन मोर हर जगह दिखता है. कांवड़ियों को मोर पंख से सजाया जाता है. मंदिरों में मोर की मूर्तियां लगी हैं.
महिलाओं की पूजा
थईपुसम पुरुष-प्रधान त्योहार लग सकता है. कांवड़ को पुरुष उठाते हैं. ढोल बजाने वाले समूह भी पुरुषों के होते हैं. गुरु भी पुरुष होते हैं.
लेकिन श्रद्धालुओं में महिलाएं भी हैं. आम तौर पर वे दूध के बर्तन लेकर मंदिर पहुंचती हैं. वैसे यह भी आसान काम नहीं है.
मिसाल के लिए, शेशा सुरेशकुमार कुआलालंपुर के चाइनाटाउन के पास के मंदिर से 14 किलोमीटर दूर बातू गुफाओं तक दूध लेकर आई हैं.
वह एक रथ के साथ आई हैं और उनके हाथों में एक रस्मी भाला भी है. उनका कहना है कि महिलाओं के लिए कांवड़ लेकर चलने की मनाही नहीं है.
"ऐसा नहीं है कि महिलाएं यह नहीं कर सकतीं. यह सिर्फ़ एक परंपरा है कि पुरुष ताक़तवर होते हैं, उन्हीं को ऐसा करना चाहिए और महिलाएं उनकी मदद करें."
"हम बच्चे को जन्म देने का दर्द सहते हैं. यह उससे ज़्यादा तो नहीं हो सकता."
उत्सव का संगीत
बातू गुफ़ाओं के पास ढोल-नगाड़ों की आवाज़ लगातार गूंजती रहती है. कांवड़ उठाए लोग और उनके साथी संगीत की धुन के साथ मंदिर के रास्ते पर बढ़ते हैं.
संगीत इस जुलूस का अनिवार्य हिस्सा है. यह याद दिलाता रहता है कि कांवड़ उठाना भले ही भक्ति का काम है, लेकिन यह एक उत्सव भी है.
कांवड़ लेकर चल रहे श्रीगणेश रामदास कहते हैं, "जब आप कांवड़ उठाते हैं तो आपको नाचना होता है."
नगाड़े की आवाज़ तेज़ करने के लिए उसे बजाने वाले पतली छड़ी का इस्तेमाल करते हैं. कुछ हॉकी स्टिक जैसे मुदगर से भी नगाड़े बजाते हैं.
आवाज़ भारी करने के लिए वे नगाड़े के ऊपर कैस्टर ऑयल लगाते हैं और छड़ी को भी तेल में डुबो देते हैं.
कांवड़ उठाने वालों के उलट ढोल-नगाड़े बजाने वाले समूह किसी मंदिर या समुदाय से जुड़े नहीं होते. श्रद्धालु उनको पैसे देते हैं.
उनको मंदिर की सीढ़ियों के नीचे ही रुकना पड़ता है, क्योंकि ऊपर जाते हुए नाचना बहुत ख़तरनाक है.
सतरंगी सीढ़ियां
बातू गुफा परिसर के मुख्य दरवाजे पर श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है. यह किसी व्यस्त एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर जैसा लगता है.
कांवड़ लेकर चलने वाले और उनके साथी थोड़ी देर के लिए यहां ठहरते हैं, जब तक कि सीढ़ियों और मंदिर की तरफ जाने की उनकी बारी नहीं आ जाती.
अंदर गर्मी, शोरगुल और भीड़भाड़ होती है. वहां से बाहर निकलने में भारी परेशानी हो सकती है.
श्रद्धालु जब भीड़ के बीच से निकलकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हैं तो जोश बढ़ जाता है. वहां वे रुकते हैं, नाचते हैं और रास्ता साफ होने का इंतज़ार करते हैं.
सीढ़ियां जहां से शुरू होती हैं, वहां वे आख़िरी बार नाचते हैं और फिर मंदिर की तरफ बढ़ जाते हैं.
मंदिर में वे अपनी कांवड़ों को अलग कर देंगे और वेदी पर दूध से अभिषेक करके भगवान मुरुगन से मांगी गई मन्नत पूरी करेंगे.
गहरे ज़ख़्म नहीं
बाहर से देखें तो थईपुसम एक कठिन परीक्षा लगती है, लेकिन श्रद्धालु इस पूरे अनुभव के प्रति बहुत उत्साही रहते हैं.
असल में, उनके शरीर में होने वाली छेद बहुत छोटी होती है और उससे गहरे ज़ख़्म नहीं होते. किशन कुमार के मुताबिक ये ज़ख़्म एक हफ्ते के अंदर भर जाते हैं.
रामदास का जन्मदिन उपवास के दिनों में पड़ता है. वह जन्मदिन नहीं मनाते, लेकिन कांवड़ ज़रूर उठाते हैं.
उनका कहना है कि जीवन का असल संघर्ष तो साल के बाकी दिनों में होता है.
"आप अपने माथे पर परिवार का बोझ उठाए रहते हैं. वह ज़्यादा भारी और कठिन है. कांवड़ क्या है? बस 48 दिन, साल के बाकी 300 दिन आप परिवार के लिए काम करते हैं."
किशन कुमार और रामदास दोनों का कहना है कि जब तक वे शारीरिक रूप से सक्षम रहेंगे, तब तक वे कांवड़ उठाते रहेंगे.
कन्नन सहमति जताते हैं. "उस दिन तो रुकना ही पड़ेगा. तब तक मैं हर साल कांवड़ लेकर चलूंगा."
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी ट्रैवल पर उपलब्ध है.)
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