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समुद्री शैवाल जिसने आयरलैंड को भुखमरी से बचाया
- Author, इलियट स्टीन
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
समंदर हमारी धरती के 71 फ़ीसदी हिस्से पर फैले हुए हैं. ये धरती की दशा-दिशा तय करते हैं. मौसम इनसे हैं. धरती का 95 फ़ीसदी पानी समंदरों में ही है.
जानकार कहते हैं कि अब तक इंसान, समंदर के 5 फ़ीसदी हिस्से की ही खोज कर पाया है. और इतने से हिस्से में ही क़रीब ढाई लाख जीवों की प्रजातियां पाई गई हैं. मोटे अनुमान कहते हैं कि समंदर में बीस लाख से ज़्यादा जीवों की प्रजातियां हैं, जिनका अब तक इंसान को पता ही नहीं.
समंदर इंसान के खान-पान का ही एक बड़ा ज़रिया हैं. मछलियों से लेकर समुद्री खर-पतवार तक इंसान के खाने के काम में आते हैं.
ऐसा ही एक समुद्री खरपतवार है जो आज कल पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय हो रहा है. इसका नाम है डल्स.
आयरलैंड में डल्स नाम का सी-फ़ूड क़रीब एक हज़ार साल से भी ज़्यादा से यहां के समुद्र तटीय इलाक़ों में रहने वालों का बुनियादी खाना रहा है. लेकिन अब इसकी पहचान और शोहरत नई बुलंदी पर पहुंच रही है. आज ये आयरलैंड ही नहीं, कई देशों में सुपर सी-फूड बन गया है.
डल्स एक ख़ास तरह के लाल-बैंगनी रंग वाले समुद्री शैवाल हैं. बताया जाता है कि 19वीं सदी में जब आयरलैंड में सूखा पड़ा था तो इस सी-वीड ने हज़ारों लोगों की जान बचाई थी.
लंबे समय से हो रहा इस्तेमाल
डल्स ठंडे पानी में पनपता है. ये कनाडा से स्कॉटलैंड के बीच उत्तरी अटलांटिक में कई जगह पाया जाता है. डल्स की खेती करने के तरीक़े को डुलसिंग कहा जाता है. बताया जाता है कि आयरलैंड में डल्स का इस्तेमाल 1400 साल पहले सेंट कोलंबा के ज़माने से किया जा रहा है.
सातवीं और आठवीं सदी के आयरलैंड के स्थानीय क़ानून की किताब क्रिथ गबलाच में दर्ज है कि मेहमानों का स्वागत डल्स से किया जाता था. डल्स को प्रोटीन का अच्छा स्रोत माना जाता है.
1840 में जब आयरलैंड में आलू की फसल तबाह हो गई, तो, समुद्र से दूर रहने वाले बहुत से लोग समुद्री शैवाल की तलाश में समुद्री इलाक़ों में आ जाते थे. ये लंबे वक़्त तक समुद्र तटीय इलाक़ों में रहने वालों का मुख्य खाना था. वो इसे उबालकर और सुखाकर दोनों तरह से खाते थे. बीसवीं सदी आते-आते डल्स के साथ बहुत से तजुर्बे करके इससे नई नई डिश बनाई जाने लगीं.
बीते कुछ वर्षों में आयरलैंड के शेफ़ और कलाकारों ने इसे आयरलैंड में सुपरफूड के तौर पर पेश किया है. बहुत से बड़े रेस्टोरेंट में इसे ख़ास पकवान के तौर पर बेचा जाने लगा है. वहीं आयरलैंड की राजधानी बेलफ़ास्ट की मशहूर सेंट जॉर्ज मार्केट में इसके बने बैग और दूसरे सामान बड़े पैमाने पर देखने को मिल जाएंगे.
डल्स मिलाकर बनता है मक्खन भी
डल्स के शौक़ीन मैकिन्टायर का कहना है कि डल्स आयरिश खानों का प्रतीक है. इस खाने ने आयरलैंड वालों का उस समय में साथ दिया जब आयरलैंड ग़रीबी के दौर से गुज़र रहा था. लेकिन हालात बेहतर होने पर लोगों ने इसे किसानों का खाना मानकर छोड़ दिया था. इसके पौष्टिक गुणों के बारे में जानकर लोगों ने एक बार फिर इसका सेवन करना शुरू कर दिया है. यही नहीं अब इसे दुनिया भर में पहचान मिलनी शुरू हो गई है.
अमरीका के एबीसी न्यूज़ चैनल ने तो इसे द होली ग्रेल ऑफ सी-फूड का नाम दिया है. द न्यूयॉर्कर पत्रिका ने इसे करिशमाई खाने का नाम दिया है. मशहूर ब्रिटिश शेफ़ जैमी ऑलिवर इसे दुनिया की सबसे पौष्टिक सब्ज़ी कहते हैं. इसे खाने के बाद उनके शरीर में जमा पथरी के दो पत्थर बाहर निकल आए. इससे वज़न क़ाबू करने में भी मदद मिलती है.
डल्स में लोग अब व्यापारिक संभावनाएं भी तलाश रहे हैं. एलिसन और विल अबरनीथ नाम के दंपती भेड़ की फ़ार्मिंग करते थे. पांच साल पहले उन्होंने पारंपरिक तरीक़े से डल्स मिलाकर मक्खन बनाना शुरू किया था. आज इनका बनाया मक्खन बड़े बड़े रेस्टोरेंट में जाता है. पूरे आयरलैंड में इनका बनाया मक्खन मशहूर है. इस दंपति को डल्स की बदौलत ही ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स, उनकी पत्नी कैमिला और ग्लॉस्टर की रानी से मिलने का मौक़ा मिला.
अन्य शैवाल भी हैं पौष्टिक
बेलफ़ास्ट के मशहूर शेफ़ और बीबीसी के प्रोग्राम ग्रेट ब्रिटिश मेन्यू के विजेता क्रिस फ़ियरन के मुताबिक़ डल्स की ख़ासियत है कि इसे कई तरीक़े से खाया जाता है. ताज़ा डल्स स्वाद में मीठा होता है. लेकिन, बासी पड़ने पर इसका ज़ायक़ा नमकीन होने लगता है. इसे तल के खाया जाता है तो ये पोर्क जैसा टेस्ट देता है. क्रिस कहते हैं जब से बेलीकैसल में मशहूर हैका क्रेज़ बढ़ा है तब से डल्स का इस्तेमाल एक बार फिर से बड़े पैमाने पर होने लगा है. क्रिस ने खुद अपने रेस्टोरेंट में डल्स की एक नई डिश परोसनी शुरू कर दी है.
गिलियन थॉम्पसन आयरलैंड के अन्य बच्चों की तरह बचपन से टॉफ़ी और डल्स खाती आ रही हैं. वो उन लोगों को भी जानती हैं जो समुद्र से डल्स जमा करने का काम करते हैं.
लेकिन वो कभी भी इसके पौष्टिक तत्वों के बारे में नहीं जान पाई थीं. साल 2005 में उन्हें पता चला कि इमराल्ड द्वीप के इर्द-गिर्द 3171 किलोमीटर के समुद्री इलाक़े में 501 तरह की शैवाल हैं, जो पौष्टिक तत्वों से लबरेज़ हैं. एक साल बाद ही उन्होंने ख़ुद की द आइरिश सी-वीड कंपनी खोल ली.
अब गिलियन ख़ुद अप्रैल से सितंबर के महीने में यहां की चट्टानों पर डेरा डाल लेती हैं. वो शैवाल इकट्ठा करने का काम करती हैं, जिसे वो लगभग सभी बड़े सुपर मार्केट में सप्लाई करती हैं. डल्स के अलावा वो काराग्रीन मोस, सी-स्पैघेटी और कुम्बू रोयाल भी जमा करती हैं. जिसे वो जर्मनी और हॉलैंड को सप्लाई करती हैं. गिलियन के मुताबिक़ समुद्री घास में आयरन, मैग्निशयम, पोटैटेशियम और वो तमाम खनिज लवण होते हैं, जिनकी इंसान को ज़रूत है. ये सभी पौष्टिक तत्व ज़मीन पर उपजने वाली किसी सब्ज़ी में एक साथ नहीं मिल सकते.
थाम्पसन ने कुशेनडाल के मशहूर सी-फूड बार अपस्टेयर्स एट जोज़ के हेड शेफ़ स्टीव फ़ैंग को बहुत से शैवाल के साथ साथ पेपर डल्स भी सप्लाई करना शुरू कर दिया है, जिसे वो बड़ी मेहनत से सर्जिकल नाइफ़ से काटकर लाती हैं. थाम्पसन ने इसे समुद्र के कुकुरमुत्ते का उपनाम दिया है.
विडम्बना है कि फ़ैग के परदादा 1800 में उत्तरी आयरलैंड में फल और सब्ज़ियों का आयात करने वालों में से एक थे. लेकिन ना तो उन्होंने कभी डल्स की खेती की और ना ही कभी शैवाल की इतनी क़िस्मों के बारे में जाना जितना कि आज उन्हें अपनी रसोई में देखने को मिलती हैं.
बीमारियों में लाभदायक
आयरलैंड में भी डल्स सबसे ज़्यादा बेलीकैसल में मशहूर है. 1606 से यहां हर साल गर्मी के मौसम की विदाई पर उल्ड लामास फ़ेयर का आयोजन होता है. पूरे आयरलैंड से लोग इस मेले में डल्स बेचने के लिए आते हैं.
डल्स के औषधीय गुण भी हैं. बीमार पड़ने पर या शरीर पर ख़ारिश हो जाने पर इसका इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है. डल्स को अन्य शैवालों के साथ चाय में पका कर पीने से या इसे पानी में डालकर नहाने से त्वचा से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है. बताया जाता है कि बीसवीं सदी तक पूरे आयरलैंड में क़रीब 300 सी-वीड बाथहाउस थे.
स्थानीय लोगों का कहना है कि डल्स बेपनाह गुणों वाली समुद्री शैवाल है, जिसे समय के साथ लोगों ने भुला दिया था. लेकिन अब एक बार फिर से लोग इसकी अहमियत समझ रहे हैं. सबसे बड़ी राहत की बात तो ये है कि लोगों को अब यक़ीन हो गया है कि आयरलैंड को चाहे जैसे हालात का सामना करना पड़े, यहां के लोग कभी भूखे नहीं मरेंगे.
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