पाषाण युग की वो घड़ी जो मौसम बदलने की ख़बर देती थी

    • Author, लैरी ब्लीबर्ग
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

दुनिया भर में सीज़न यानी बदलती ऋतुओं की काफ़ी अहमियत है. भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में खेती का दारोमदार ऋतु-चक्र पर ही निर्भर करता है.

आज हमारे पास एडवांस तकनीक हैं, जिसके ज़रिए हम क़ुदरत का मिज़ाज समय से पहले ही जांच लेते हैं.

लेकिन ज़रा सोचिए जब ये तकनीक नहीं थी, तब लोग किस तरह ऋतु चक्र की जानकारी हासिल करते होंगे.

हाल ही में अमरीका के एरिज़ोना की मशहूर वेर्डे घाटी में स्थित कोकोनीनो नेशनल फॉरेस्ट में कुछ चट्टाने पाई गई हैं, जिन पर अजीब तरह की चित्रकारी है.

जानकार इन चट्टानों को ऋतु-चक्र का कैलेंडर मान रहे हैं.

स्थानीय फ़ोटोग्राफ़र सूज़ी रीड का कहना है कि जब सूरज भू-मध्य रेखा से गुज़रता है, तब इन चट्टानों पर सूरज की रोशनी की किरणों की स्थिति देखने लायक़ होती है.

सूरज की रोशनी

साल 2005 से पहले तक चट्टानों पर बने इन प्राचीन कैलेंडरों की किसी को ख़बर नहीं थी.

साल 2005 में केनेथ ज़ॉल नाम के रिसर्चर ने 'वी बार वी' नाम के ऐतिहासिक रैंच पर चट्टानों पर पड़ने वाली सूरज की रोशनी को ग़ौर से देखा.

इन चट्टानों पर क़रीब एक हज़ार निशान उकेरे हुए थे. इन निशानों में हिरण, सांप और उत्तरी अमरीका में पाए जाने वाले भेड़ियों की तस्वीरें शामिल थीं.

उन्होंने ये जानकारी फॉरेस्ट सर्विस के पुरात्तवविद से साझा कीं. लेकिन किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली. दरअसल ये मामला प्राचीन काल में ऋतु चक्र मापने का था.

सूरज के साथ चांद, तारों का एक साथ एक ही दिशा में होना महज़ इत्तिफ़ाक़ था या कुछ और कहना मुश्किल है.

लेकिन पुराने वक़्त में कुछ लोगों की राय रही है कि इन प्रागैतिहासिक चट्टानों पर एलियन्स ने ये चित्रकारी की होगी.

आकाशीय घटनाओं का अध्ययन

लेकिन पिछले एक दशक में ये बात साफ़ हो गई है कि आदिम समाज के लोगों के बीच आकाशीय घटनाओं का अध्ययन करने की परंपरा रही है.

और ऐसी बहुत सी जगहें हैं, जहां इस बात के सुबूत भी मिलते हैं.

इसीलिए यूनेस्को ने अमरीका के न्यू मेक्सिको के शाको कल्चरल नेशनल हिस्टोरिकल पार्क और इंग्लैंड के स्टोनहेंज जैसी जगहों के खगोलीय विरासती महत्व को समझा.

और इस पर रिसर्च का काम शुरू किया गया. केनेथ ज़ॉल को लगता था कि वी बार वी रैंच में स्थित चट्टान पर अंकित निशान मामूली नहीं हैं. इनमें ज़रूर कई राज़ छुपे हैं.

इन निशानों का गणित समझने के लिए उन्होंने 20वीं और 11वीं सदी की हाई-टेक तकनीक का सहारा लिया. नतीजे चौंकाने वाले थे.

हर महीने जब सूरज की किरणें चट्टान पर पड़ती थीं, तो लगता था मानो सूरज की रोशनी इन चित्रों से बातें कर रही है.

हाई-टेक तकनीक का सहारा

गर्मी के सबसे लंबे दिन यानी 21 जून को सूरज की रोशनी क़रीब आधा दर्जन से ज़्यादा चित्रों पर तेज़ी से पड़ रही थीं.

जबकि साल के सबसे छोटे दिन रौशनी की किरणें चट्टानों के बीच एक निशान भर ही बना रही थीं. ये इस बात का संकेत था कि मौसम बदल रहा है.

रिसर्चरों के मुताबिक़ स्थानीय अमरीकी आदिवासी सिनागुआ यहां सातवीं से पंद्रहवीं सदी के बीच आबाद थे. उनका मुख्य पेशा खेती था.

वो मक्का, कपास और फलियों की खेती करते थे. माना जाता है कि उन्होंने ही खेती के लिहाज़ से इस कैलेंडर को बनाया होगा.

सिनागुआ जाति के वंशज 'होपी' अब यहां से क़रीब 150 मील दूर रहते हैं. रिसर्चर ज़ॉल ने इस संबंध में होपी आदिवासियों से भी जानकारियां जुटाईं.

इन लोगों का कहना था कि इन चट्टानों पर बनी पट्टिकाओं का संबंध किसानों के लिए खेती के लिहाज़ से बहुत ख़ास है.

फ़सल बोने का समय

साथ ही धार्मिक त्यौहार भी इन पट्टिकाओं पर पड़ने वाली रोशनी के हिसाब से ही मनाए जाते हैं.

मिसाल के लिए 21 अप्रैल का दिन ज़मीन में बीज बोने से जुड़ा है. इस दिन सूरज की रोशनी मक्के के डंठल जैसी आकृति पर पड़ती है.

इससे लोगों को इशारा मिलता है कि अब फ़सल बोने का समय शुरू हो चुका है.

सबसे अहम दिन तो 8 जुलाई का होता है जब होपी लोगों का 16 दिन तक चलने वाले ध्यान साधना और दुआओं का दौर ख़त्म होता है.

इस दिन सूरज की रोशनी चट्टान पर बनी एक ऐसी आकृति पर पड़ती है जो ख़ुशी से नाचती हुई मालूम देती है.

लोगों को पहले से अंदाज़ा होता है कि 16 दिन बाद सूरज की रोशनी किस आकृति पर पड़ेगी और उसका क्या महत्व है.

पारंपरिक विरासत

होपी लोगों को फ़ख़्र है कि उनके पूर्वज उनके लिए ऐसी बेशक़ीमती विरासत छोड़ गए हैं. हर महीने यहां के लोग कोई ना कोई जश्न मनाते हैं.

हर रोज़ सूरज की रोशनी के हिसाब से यहां काम किए जाते हैं. होपी आदिवासी लोग इसे अपना कैलेंडर मानते हैं.

इन लोगों का कहना है कि चट्टानों पर बने कुछ निशानों का संबंध जनजातीय गुटों से भी है.

इस साल वसंत में होपी लोग अपनी पारंपरिक विरासत से लोगों को रूबरू कराने के लिए नौजवानों के एक ग्रुप को यहां साथ लाए.

और उन्हें इन आकृतियों की बारीकियां समझाईं. रिसर्चर ज़ॉल कहते हैं कि वो अमरीका के फ़ीनिक्स शहर के आस-पास क़रीब 30 ऐसी जगहों की पहचान कर चुके हैं.

इन जगहों पर चट्टानों पर बनी चित्रकारी का इस्तेमाल कैलेंडर के रूप में होता था.

कैलेंडर बनाने का तरीक़ा

इसके अलावा केंद्रीय एरिज़ोना के वेर्डे घाटी में भी इसी तरह की कई और जगह मिल चुकी हैं.

चट्टानों पर बनी चित्रकारी की ख़ासियत है कि इनमें ज़्यादातर संकेंद्रित वृत्त बने हैं जो साल भर सूरज की रोशनी के मुताबिक़ ख़ुद को एक क़तार में बांध लेते हैं.

चट्टानों पर इस तरह के कैलेंडर उकेरने के पीछे एक थ्योरी और काम करती है.

कुछ लोगों का कहना है कि यहां के लोगों को कैलेंडर बनाने का तरीक़ा बाहर से आने वाले सैलानियों ने सिखाया है.

दरअसल, उत्तरी एरिज़ोना में एक शख़्स की क़ब्र मिली है जो कि इस इलाक़े का नहीं लगता.

उसकी क़ब्र उसी तरह के दायरे की शक्ल में नज़र आती है जिस तरह के गोले चट्टानों पर उकेरे गए हैं.

पूर्वजों की निशानी

इस इलाक़े में रिसर्च के दौरान ऐसी बहुत सी जगहों का पता चला है, जिनका इस्तेमाल सूरज की दिशा समझने के लिए किया जाता रहा है.

क़बायली जाति के बहुत से लोगों को सूरज के उगने और डूबने के समय की जानकारी लेने के लिए यहां तैनात किया जाता था.

होपी जनजाति के लोगों में ये चलन आज भी जारी है. कछुए इनके पूर्वजों की निशानी हैं इसीलिए वी बार वी रैंच की चट्टान पर कछुए भी उकेरे गए हैं.

यहां दोपहर बाद सूरज की किरणें तेज़ी से आगे की तरफ़ बढ़ने लगती हैं और धीरे धीरे ख़त्म हो जाती हैं.

फ़ॉरेस्ट रेंजर टेरेलिन ग्रीन का कहना है कि उन्हें ख़ुशी है कि चट्टानों पर बने कैलेंडर को समझने का शौक़ बढ़ रहा है. लेकिन यहां समय मापने के और भी कई तरीक़े हैं.

वसंत ऋतु शुरू होने की ख़बर

हर साल मार्च महीने के आख़िर में यहां काले बाज़ एरिज़ोना की वेर्डे घाटी में लौट आते हैं. दरअसल इन बाज़ों की आमद वसंत ऋतु शुरू होने की ख़बर होती है.

विज्ञान की तरक़्क़ी ने हमें कई नेमतें दी हैं.

मगर वेर्डे घाटी में स्थित ऐसी विरासतें भी हमें बताती हैं कि इंसान की अक़्ल ने उस दौर में भी कामयाबी की तमाम सीढ़ियां चढ़ी थीं.

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