यह ज़बान बोलने वाली सिर्फ़ एक महिला बची है

    • Author, अन्ना बिटोंग
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

भाषा या ज़बान सिर्फ़ अभिव्यक्ति का ज़रिया नहीं है. ये सारी दुनिया को जोड़ने का माध्यम भी है. किसी भी भाषा या ज़बान पर किसी एक का हक़ नहीं हो सकता. कोई भी शख्स कोई भी भाषा सीख सकता है.

हरेक समाज की एक ख़ास ज़बान होती है, जो उसे पहचान दिलाती है. दुनिया भर में अनगिनत भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं. आज बहुत सी ज़बानों ने अपना वजूद खो दिया.

जैसे संस्कृत. प्राचीन भारत में इस भाषा का बोल बाला था. बड़े-बड़े ग्रंथ और अथाह साहित्य इस ज़बान में लिखे गए. लेकिन आज इसके पढ़ने वाले कुछ ही लोग हैं. बोलने वाले तो शायद ही मिलें. इतनी समृद्ध भाषा अब सिर्फ़ मंत्र पढ़ने तक सीमित हो कर रह गई है.

ऐसी ही ख़त्म होती ज़बानों में से एक है यघान. ये ज़बान अर्जेंटीना के आख़िरी छोर पर स्थित द्वीप टिएरा डेल फ्यूगो के मूल निवासी बोलते थे. कहने को तो ये ज़बान संस्कृत की तरह ही ताक़तवर और तमाम ख़ूबियों से लबरेज़ थी.

लेकिन, आज सिर्फ़ एक ही महिला ऐसी हैं जो इस ज़बान को फ़र्राटे से बोल लेती हैं. उनका नाम है क्रिस्टिना काल्डेरॉन. क्रिस्टिना का ताल्लुक़ दक्षिण अमरीका के मूल आदिवासियों में से एक यघान क़बीले से है.

1600 साल पुरानी परंपरा

दक्षिण अमरीका के आख़िरी कोने के नज़दीक एक छोटे से जज़ीरे पर यघान क़बीले के लोग रहते हैं. ये लोग संवाद के लिए आग का इस्तेमाल करते थे. चूंकि ये इलाक़ा काफ़ी ठंडा है, लिहाज़ा आग से इन्हें गर्मी भी मिलती है.

1520 में पुर्तगाल के अन्वेषक फर्डिनेंड मैग्लेन ने इस इलाक़े को खोजा था. उन्होंने इस इलाक़े को टिएरा डेल फ्यूगो यानी 'लैंड ऑफ़ फ़ायर' नाम दिया था. क्योंकि मैग्लेन ने इस द्वीप के किनारों पर आग जलती हुई देखी थी.

आज ये प्राचीन क़बीलाई समाज लगभग ख़ात्मे की ओर बढ़ चला है. लेकिन, अभी भी कुछ लोग हैं जो चाहते हैं कि उनकी पहचान बनी रहे. इन्हीं में से एक हैं क्रिस्टिना काल्डेरॉन, जो अपने पूर्वजों की लगभग 1600 साल पुरानी रवायत को आज भी ज़िंदा रखे हुए हैं.

इस समाज की एक ख़ास रवायत थी. साल में एक दिन जब व्हेल समुद्र किनारे आने वाली होती थी तो क़बीले के सभी लोग यहां जमा हो जाते थे और व्हेल का शिकार कर उसका गोश्त मिल बांट कर खाते थे. इसके लिए आग लगाकर धुंआ निकाला जाता था.

ये धुआं एक तरह से दूरदराज़ के क़बीलों के लिए दावतनामा होता था. धुआं देखकर दूसरे क़बीलों के लोग समझ जाते थे कि व्हेल किनारे आ चुकी है. और, अब दावत उड़ाने का समय है.

'मामिलापिनातापाई' यघान ज़बान का अनसुलझा शब्द

16 साल पहले इसी रवायत को क्रिस्टिना ने फिर से शुरू किया है. हर साल 25 नवंबर को वो इसका आयोजन करती हैं.

यघान समाज की ज़बान का एक शब्द बहुत ताक़तवर था. ये शब्द था 'मामिलापिनातापाई'. हरेक के लिए इस शब्द का अलग ही मतलब था. यघान गाइड वरगास के लिए इस शब्द का मतलब है 'बच्चों का अपने बज़ुर्गों के साथ मिल जुलकर बैठना'.

इनके मुताबिक़ पुराने दौर में यघान समाज के बुज़ुर्ग अपने पोते-पोतियों के साथ बैठकर आग जलाते थे और उन्हें कहानियां सुनाते थे.

लेकिन उन्नीसवीं सदी आने तक इस शब्द के बहुत से अर्थ निकाले जाने लगे. मैग्लेन के बाद भी बहुत से अन्वेषकों और खोजकर्ताओं ने लैंड ऑफ़ फ़ायर का रुख़ किया.

1860 में ब्रिटेन के भाषाविद् थॉमस ब्रिजेस उशूआइया पहुंचे और उन्होंने वहां क़रीब 20 साल गुज़ारे. उन्होंने यघान क़बीले की ज़बान को ना सिर्फ़ सीखा और समझा, बल्कि इस ज़बान के क़रीब 32 हज़ार शब्दों वाली याघान-इंग्लिश डिक्शनरी भी तैयार की.

थॉमस के लिए मामिलापिनातापाई शब्द का मतलब वरगास के अर्थ से बिल्कुल अलग है. थॉमस के मुताबिक़ इस शब्द का मतलब है, एक दूसरे को उम्मीद की नज़र से देखना. हालांकि ब्रिजेस ने इस शब्द को अपनी डिक्शनरी का हिस्सा नहीं बनाया है, क्योंकि ये बहुत कम बोला जाता है.

दरअसल ब्रिजेस ने यघान ज़बान पर कुल तीन शब्दकोश तैयार किए थे. इनमें से दो तो लोगों तक पहुंच गए थे. लेकिन, वो तीसरे पर अभी काम ही कर रहे थे कि 1898 में उनकी मौत हो गई. बहुत से जानकारों का मानना है कि हो सकता है ब्रिजेस तीसरे शब्दकोश में इस शब्द को शामिल करते. हालांकि उन्होंने अपनी दूसरी किताबों में इसका ज़िक्र किया है. लेकिन सटीक मतलब के साथ इसका ज़िक्र कहीं नहीं किया.

यघान ज़बान को ज़िंदा रखने की कोशिश

मौजूदा जानकारों के मुताबिक़ यघान ज़बान को ब्रिजेस से बेहतर किसी ने नहीं समझा. और मामिलापिनातापाई शब्द का अर्थ शायद वो ख़ुद भी बेहतर तरीक़े से नहीं समझ पाए थे. इसीलिए उन्होंने इसे अपने शब्दकोश में जगह नहीं दी.

लेकिन किताबों में इस शब्द के ज़िक्र भर से ही इसे नए-नए मानी मिल गए यहां तक कि अग्रेज़ी में भी इसका ज़िक्र मिलने लगा. 1994 में गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में मामिलापिनातापाई शब्द को दुनिया का सबसे मुख़्तसर लफ़्ज़ माना गया है.

दुनिया भर के लिए मामिलापिनातापाई शब्द का मतलब कुछ भी हो सकता है. लेकिन ख़ुद यघान समाज के लिए ये शब्द एक पहेली बना हुआ है. आज की तारीख़ में सिर्फ़ क्रिस्टिना ही हैं, जो यघान भाषा बोलती हैं.

क्रिस्टिना काल्डेरॉन नौ साल की उम्र तक यघान में ही बात करती थीं. लेकिन जब इस ज़बान के बोलने और समझने वाले कम होने लगे तो उन्होंने स्पेनिश बोलनी शुरू कर दी.

यघान भाषा का अनुवाद तर्जुमा करने वाले बहुत से लोग आज उनके पास आते हैं. लेकिन मामिलापिनातापाई शब्द का सही सही मतलब वो भी नहीं जानतीं. हालांकि एक वजह ये भी हो सकती है कि ख़ुद क्रिस्टिना यघान ज़बान का इस्तेमाल अब नहीं के बराबर करती हैं, तो बहुत से शब्द उनके ज़हन में ना रहे हों.

सिर्फ़ एक इंसान के बोलने वाली यघान ज़बान को आज ख़त्म होती भाषा माना जाता है. लेकिन क्रिस्टिना और उनकी क्रिस्टिना ज़रागा इसे ज़िंदा रखने की आख़िरी कोशिश कर रही हैं.

वो दोनों वर्कशॉप चलाती हैं. इनकी कोशिशों को देखते हुए अब अर्जेंटीना की सरकार भी अब इनकी हौसला-अफ़ज़ाई कर रही है. स्थानीय स्कूल में छोटे बच्चों को ये भाषा पढ़ाई जानी लगी है.

'माई यघान ब्लड'

उन्नीसवीं सदी में यघान समाज और यूरोपीय समाज के दरमियान मेल-जोल काफ़ी बढ़ गया था. तरह तरह की बीमारियों की वजह से यघान क़बीले की आबादी ख़त्म होती जा रही थी. उनकी ज़मीन पर यूरोपीय लोगों का कब्ज़ा बढ़ रहा था. यघान गाइड वरगास बताते हैं कि उन्होंने अपने बुज़ुर्गों को धड़ल्ले से यघान बोली बोलते हुए देखा था.

ये बोली बहुत सुकून से बोली जाती थी. कम शब्दों में अपनी पूरी बात कह दी जाती थी. ज़बान के प्रति अपने पुरखों का लगाव देखकर ही वरगास ने किताब लिखी 'माई यघान ब्लड'.

वरगास आज भी अक्सर उस जगह पर जाते हैं जहां उनके पूर्वज जमा होते थे. यघान समाज के लोग प्रकृति प्रेमी थे. लिहाज़ा वरगास यहां आकर ना सिर्फ़ क़ुदरत के हसीन नज़ारों का दीदार करते हैं, बल्कि अपने बुज़ुर्गों को याद करते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनकी ज़बान और संस्कति बनी रहे.

टिएरा डेल फ्यूगो, को दुनिया का आख़िरी छोर कहा जाता है. आख़िरी छोर पर स्थित इस जगह में यघान भाषा को बोलने वाली आख़िरी महिला क्रिस्टिना ही बची हैं.

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