गंगोत्री से गंगासागर 2500 किमी तक का सफ़र

तू निकल हिमालय के गृह से, जाकर मिलती है सागर से!

हे अम्बे तेरी शुचि धारा, उत्तम है अमृत, सागर से!

ये पंक्तियां जीवनदायिनी कही जाने वाली गंगा का बखान करती हैं.

गंगा, महज़ एक नदी नहीं है. ये भारत की पहचान है. करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है.

हिमालय की गोद यानी गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर गंगा नदी गंगासागर में जाकर समंदर में मिलने से पहले क़रीब ढाई हज़ार किलोमीटर का सफ़र तय करती है.

स्पाइक रीड

इस दौरान वो क़रीब चालीस करोड़ लोगों के लिए जीवनदायिनी बनती है. हर साल वो लाखों लोगों को मोक्ष दिलाती है.

हिंदुओं में परंपरा है कि किसी के मरने के बाद उसका शवदाह करके अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाती हैं.

गंगा में राफ़्टिंग करते तो आपने बहुत से लोगों को देखा होगा. लेकिन ये कुछ किलोमीटर का सफ़र होता है.

हाल ही में एक शख़्स ने पैडल बोर्ड के ज़रिए गंगा के शुरू से लेकर आख़िर तक का सफ़र तय किया. उनका नाम है स्पाइक रीड. स्पाइक, ब्रिटेन के रहने वाले हैं.

गंगा की गहराई

वो फोटोग्राफ़र हैं. डिज़ाइनर हैं. रीड अक्सर जोखिम भरे साहसिक सफ़र करते हैं. इस बार उन्होंने गंगा के साथ सफ़र करने की ठानी थी.

इसके लिए उन्होंने एक पैडल बोर्ड को ज़रिया बनाया. ये पैडल बोर्ड महज़ 30 इंच चौड़ा, और चौदह फुट लंबा था.

इठलाती, बल खाती गंगा की लहरों के साथ बहकर स्पाइक ने क़रीब ढाई हज़ार किलोमीटर का सफ़र तय किया.

इसकी शुरुआत देवप्रयाग से हुई थी. जहां गंगा की गहराई तो कम थी, मगर लहरों की रफ़्तार इतनी तेज़ कि पहाड़ काट डाले. देवप्रयाग का हिंदू धर्म में बहुत अहम मक़ाम है.

गंगा की डॉल्फिन

यहां दूर-दूर से तीर्थ यात्री पहुंचते हैं. देवप्रयाग में भागीरथी और अलकनंदा मिलती हैं. इनके संगम से ही बनती है गंगा की धारा.

स्पाइक रीड ने सफ़र के दौरान गंगा के रौद्र रूप को भी देखा. उफ़नती नदी को देखा. शांत गंगा को भी देखा.

स्पाइक का कहना था कि इस सफ़र के दौरान सबसे दिलचस्प तजुर्बा था गंगा में पायी जाने वाली डॉल्फ़िन को देखना.

आज की तारीख़ में इन डॉल्फ़िन की बहुत कम तादाद बची है.

कहा जाता है कि गंगा में दो हज़ार से भी कम डॉल्फ़िन बची हैं. ये पानी में रहने वाले किसी भी जीव की सबसे कम तादाद है.

धार्मिक अनुष्ठान

स्पाइक के लिए गंगा के साथ सफ़र करने का तज़ुर्बा बिल्कुल ऐसा था, जैसे कोई बच्चा मां को चिढ़ाने के लिए कभी उसका दामन पकड़े, तो कभी आंचल खींचे.

और मां दुलार से अपने बच्चे को गुदगुदाते हुए अपनी आग़ोश में भर ले. स्पाइक रीड के लिए ये सफ़र बहुत दिलचस्प था. रास्ते में उनकी मुलाक़ात तरह-तरह के लोगों से हुई.

गंगा किनारे लोग खेलते-कूदते भी नज़र आए और धार्मिक अनुष्ठान करते भी दिखे.

बहुत से लोगों के लिए ये जानना ही हैरानी की बात थी कि वो सिर्फ़ पैडल बोर्ड के सहारे गंगासागर तक के सफ़र पर निकले हैं.

असल में स्पाइक रीड, एक स्वयंसेवी संस्था के साथ इस सफ़र पर निकले थे इसका मक़सद लोगों को गंगा की सफ़ाई के लिए जागरूक करना था.

कचरे की गंगा

गंगा क़रीब चालीस करोड़ लोगों के लिए पानी का ज़रिया है. लोग ये दावा करते हैं कि गंगा से मोक्ष मिलता है. उसे मां कहकर पूजा जाता है.

इसके बावजूद गंगा को गंदा करने में किसी को हिचकिचाहट नहीं होती. एक अंदाज़े के मुताबिक़ हर रोज़ एक अरब गैलन कचरा गंगा के पानी में मिलता है.

बहुत से इलाक़ों में गंगा का पानी इतना ख़राब है कि उसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. सीवर से लेकर प्लास्टिक का कचरा तक गंगा में बहाया जाता है.

स्पाइक रीड, रोज़ाना सात आठ घंटे पैडल बोर्ड की मदद से गंगा की लहरों पर सफ़र करते हुए आगे बढ़ते थे.

गंगासागर तक

नवंबर महीने में सुबह कोहरा छाने की वजह से कई बार तय वक़्त पर सफ़र शुरू नहीं होता था.

गंगा का आख़िरी छोर गंगासागर है. यहां आकर गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है.

गंगा की गोद में खेलने के बाद स्पाइक रीड को इस नदी की महानता, भारतीयों के लिए इसकी अहमियत का एहसास हुआ.

साथ ही स्पाइक को ये भी पता चला कि पूजा करने के बावजूद आम हिंदुस्तानी, गंगा की सफ़ाई को लेकर जागरूक नहीं है.

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