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सफ़र 518 किलोमीटर लंबे एक बर्फ़ीले रास्ते का
लंबी चौड़ी सड़कें, मैदानी इलाक़ों में तो आपने ख़ूब देखी होंगी. पहाड़ी इलाक़ों में भी नागिन की तरह रेंगती सड़कों पर कार दौड़ाई होगी. सड़कें तरक़्क़ी का ज़रिया भी होती हैं और मिसाल भी. मैदानी इलाक़ों में तो सड़कें आराम से बना ली जाती हैं, लेकिन टुंड्रा जैसे बर्फ़ीले इलाक़े में अब से पहले ये मुमकिन नहीं था.
यहां स्लेज ही यातायात का इकलौता ज़रिया हुआ करते थे, लेकिन तकनीकी तरक़्क़ी ने ये मुश्किल हल कर दी है. सड़क किस तरह से किसी इलाक़े की तक़दीर और तस्वीर बदलती है, इसकी मिसाल उत्तरी कनाडा का बेहद बर्फ़ीला इलाक़ा है. इस हिस्से को टुंड्रा कहते हैं.
बर्फ़ की सड़क
यहां पर 518 किलोमीटर लंबी बर्फ़ की सड़क बनाई गई है जिसने पूरे इलाक़े की ज़िंदगी ही बदल दी है. ये सड़क कनाडा के फ़ोर्ट चिपयॉन इलाक़े में बनी है. फ़ोर्ट चिपयॉन कनाडा के दूरदराज़ का वो इलाक़ा है जो बर्फ़ से ढंका रहता है. लोग यहां स्लेज के ज़रिए ही लोग आना-जाना करते हैं. मछली का शिकार करके गुज़ारा करते हैं.
लेकिन अब यहां भी बर्फ़ की सड़क पर गाड़ियां दौड़ती हैं. रॉबर्ट ग्रैंडजाम्ब इस इलाक़े के ऐसे बाशिंदे हैं जिन्हें आज भी स्लेज के ज़रिए शिकार के लिए जाना पसंद है. रॉबर्ट का कहते है कि एक समय था जब स्लेज को ख़ींचने वाले कुत्ते उसके मालिक को वहां के समाज में एक अलग मक़ाम दिलाते थे.
फ़ैंसी स्लेज
अगर कोई शख़्स किसी शहर में फ़ैंसी स्लेज के साथ जाता था तो बहुत से लोग उसे अपना दामाद बनाने की ख़्वाहिश ज़ाहिर करने लगते थे क्योंकि उसके कपड़ों और सजे-धजे स्लेज को देखकर माना जाता था कि वो शख़्स पैसे वाला है. रॉबर्ट कहते हैं कि उनकी पत्नी आज भी उनके लिए 'क्री' पोशाक तैयार करती हैं जिसे वो बड़े चाव से पहनते हैं.
हालांकि उनकी स्लेज रेस में दौड़ने वाली स्लेज जैसी नहीं है. इसीलिए उस पर कई लोग अपने सामान के साथ सफ़र कर सकते हैं. रॉबर्ट शिकार के लिए इसी स्लेज का इस्तेमाल करते हैं. रॉबर्ट वो शख़्स हैं जिनके पास इस इलाक़े की अलग-अलग पारंपरिक स्लेज हैं. ये काफ़ी मज़बूत और भारी हैं.
'फ़र' का कारोबार
कुछ दशक पहले तक इस इलाक़े की ज़िंदगी बहुत सादा और शांत थी. सभी के पास एक एक स्लेज ज़रूर होती थी. लोग खाने के लिए मछली का शिकार करते थे. ज़िंदगी की दीगर ज़रूरतों के लिए 'फ़र' का कारोबार करते थे. साल 1788 में यहां सबसे पहले 'फ़र' का कारोबार करने वाली नॉर्थ-वेस्ट कंपनी ने पैर जमाए थे जिसके ज़रिए बहुत से लोगों को कारोबार मिला.
यहां के लोगों की ज़िंदगी ख़रामा-ख़रामा चलती थी. लेकिन 1960 में 'आइस रोड' बनने के बाद यहां के हाताल पूरी तरह से बदल गए. ये सड़क 500 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी है और इस इलाक़े को फ़ोर्ट मैकमरी से जोड़ती है जो कि कनाडा के इस इलाक़े से दक्षिण में 280 किलो मीटर दूर है.
फ़ोर्ट स्मिथ का इलाका
साथ ही ये सड़क उत्तर में 228 किलोमीटर दूर फ़ोर्ट स्मिथ के इलाक़े को भी क़रीब ले आई है. जब यहां बहुत ज़्यादा बर्फ़ जम जाती है तो बड़े-बड़े ट्रक इस सड़क पर पानी डालकर उसे गलाते हैं. सड़क पर सिर्फ 15 सेंटीमीटर मोटी बर्फ़ की चादर बिछी रहती है. वसंत में जब ये बर्फ़ बहुत ज़्यादा पिघलती है तो यहां से गुज़रना मुश्किल हो जाता है.
लेकिन सर्दी शुरू होने से पहले इसे फिर से बनाने के काम शुरू हो जाता है. फ़ोर्ट मैकमरी से फ़ोर्ट चिपयॉन तक पहुंचने में करीब साढ़े चार घंटे लगते हैं. यहां चलने वाली गाड़ियों में ऐसे टायर लगाए जाते हैं जो बर्फ़ में आसानी से चलते हैं, लेकिन इस सड़क पर सफ़र आपको अपनी ज़िम्मेदारी पर करना होगा.
क्योंकि अगर आप किसी मुसीबत में फंसे तो पूरे रास्ते सड़क किनारे कोई मदद करना वाला नहीं मिलेगा. या फिर किसी मददगार के आने तक ठंड में इंतज़ार करना होगा. फ़ोर्ट चिपयॉन में रहने वाले इतिहासकार ओलिवर ग्लेनफील्ड का कहना है कि आइस रोड फ़ोर्ड चिपयॉन की लाइफलाइन बन चुकी है.
इस सड़क के बनने के बाद यहां के लोग आस-पास के इलाक़ो में जाकर रोज़गार कमाने लगे हैं. सर्दी के मौसम में यहां खाने-पीने की चीज़ों और ईंधन के दाम गिर जाते हैं क्योंकि इस सड़क के ज़रिए यातायात करना आसान हो जाता है. सर्दी के बाद जब ये सड़क ख़राब हो जाती है तो यहां सारा सामान हवाई जहाज़ की मदद से पहुंचाया जाता है जिसकी वजह से चीजों के दाम बढ़ जाते हैं.
सर्दी का मौसम
उत्तरी इलाक़ों में रहना काफ़ी महंगा पड़ता है. सर्दी के मौसम में चार लीटर दूध की क़ीमत 10 कनाडियन डॉलर होती है जबकि गर्मी में इतना ही दूध 17 कनाडियन डॉलर में मिलता है.
इस सड़क ने यहां के लोगों की ज़िंदगी को बदला तो है, लेकिन किस मायने में बदला है ये कहना मुश्किल है. इतिहासकार ओलिवर ग्लेनफ़ील्ड कहते हैं कि इस सड़क के बनने से पहले यहां के लोगों की ज़िंदगी की रफ़्तार सुस्त थी. आराम से कट रही ज़िंदगी का ये मतलब नहीं था, लेकिन यहां के लोग बाक़ी सारी दुनिया से कटे हुए नहीं थे.
डॉग स्लेज का इस्तेमाल
आज रॉबर्ट ग्रैंडजेम्ब के पास अपनी स्नोमोबाइल है. फिर भी वो अपनी डॉग स्लेज का इस्तेमाल ख़ूब करते हैं. जब भी शिकार करने का मन होता है वो इसी के ज़रिए जाते हैं. यहां तक कि कुछ सैलानियों को भी आस-पास के इलाक़ों की सैर स्लेज से ही कराते हैं. बदलते माहौल को वो बुरा नहीं मानते. बल्कि इसे आर्थिक मज़बूती के तौर पर देखते हैं.
लेकिन रॉबर्ट को एक बात का डर सताता है. उन्हें लगता है कि रोज़गार के लिए लोग दूर दराज़ के मैदानी इलाक़ों में जाते हैं. अपने समुदाय के लोगों से उनका मिलना-जुलना भी कम हो जाता है. कहीं ऐसा ना हो कि लोग बड़े पैमाने पर मैदानी इलाक़ों में ही बस जाएं. इससे उनकी संस्कृति ख़त्म होने का डर है.
शिकार की मछली
वो कहते हैं कि 'अगर हम अपनी पहचान ही खो देंगे तो हमें जानेगा कौन.' ग्रैंडजेम्ब कहते हैं कि स्लेज को खींचने वाले कुत्ते उनके परिवार के सदस्यों की तरह होते है. वो अपने कुत्तों के लिए तमाम तरह कि दवाएं घर पर ही रखते हैं ताकि बीमार पड़ने पर कम से कम उनका फौरी इलाज हो सके.
शिकार की जो मछली वो ख़ुद खाते हैं वही अपने कुत्तों को भी खिलाते हैं. खाना भी उबाल कर दिया जाता है ताकि पचाने में आसानी हो. हालांकि कुछ लोग रेस के लिए अलास्कन नस्ल के कुत्ते पालते हैं, लेकिन गैंडजेम्ब इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. उनका कहना कि रेस में कुत्तों को बहुत रफ़्तार से दौड़ना पड़ता है.
कुत्ते पालने की जिम्मेदारी
इसकी वजह से उन्हें चोट भी लग जाती है और वो बीमार भी पड़ जाते हैं. स्लेज के लिए कुत्ते पालना एक बड़ी ज़िम्मेदारी है. उनका ख़्याल परिवार के सदस्यों की तरह ही रखना पड़ता है. ग्रैंडजेम्ब को लगता है कि अपनी स्लेज के ज़रिए वो आज भी अपनी संस्कृति को संजोए हुए हैं.
उनका कहना है कि आने वाली नस्लों को अपनी संस्कृति के बारे में बताना ज़रूरी है. लेकिन बदलते माहौल में अपने रस्मो रिवाज़ों के मुताबिक़ ख़ुद को कैसे ढाला जाए ये सीखाना भी बहुत ज़रूरी है.
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