कोविड-19 कैसे आपके दिमाग़ को नुकसान पहुँचा सकता है?
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Author, ज़ोई कोरमियर
पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
डॉक्टर जूली हेल्म्स की इंटेसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में मार्च 2020 की शुरुआत में उंगलियों पर गिनने लायक मरीज़ भर्ती थे, लेकिन कुछ ही दिनों में उनका आईसीयू वार्ड कोविड-19 के मरीज़ों से भर गया.
मगर डॉक्टर जूली की चिंता इन मरीज़ों में साँस की तकलीफ़ नहीं, बल्कि कुछ और थी.
डॉक्टर जूली उत्तरी फ़्रांस में स्थित स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय के अस्पताल में काम करती हैं.
वो कहती हैं, "मरीज़ बेहद उत्तेजित थे. कई को न्यूरोलॉजिकल समस्याएं थीं. मुख्य रूप से भ्रम और प्रलाप जैसी दिक्कतें. यह पूरी तरह से असामान्य और डरावना था, ख़ासकर इसलिए क्योंकि हमारे द्वारा जिनका इलाज किया गया, उनमें बहुत से लोग काफ़ी युवा थे. वे 30 से 49 वर्ष के बीच थे और कुछ तो सिर्फ़ 18 साल के थे."
डॉक्टर जूली और उनके सहयोगियों ने अपने यहाँ भर्ती हुए कोविड-19 के मरीज़ों पर एक छोटा अध्ययन किया था जिसे अब ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया है और इसमें कोविड-19 के रोगियों में दिखने वाले न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को दर्ज किया गया है.
फ़रवरी में चीन के शोधकर्ताओं ने वुहान शहर के रोगियों पर एक अध्ययन के बाद यह पाया था कि "कोरोना वायरस संक्रमण का असर लोगों के मस्तिष्क पर भी हुआ."
चीनी शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के मरीज़ों में जो लक्षण देखे थे, उन्होंने उन सभी को 'एन्सीफ़ेलोपैथी' का संकेत बताया था. मेडिकल की भाषा में 'एन्सीफ़ेलोपैथी' शब्द का प्रयोग मस्तिष्क में हुई क्षति के लिए होता है.
कोविड-19: न्यूरोलॉजिकल दिक्कतें
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अब तक, दुनिया भर के 300 से अधिक अध्ययनों से यह पता चलता है कि "कोविड-19 के रोगियों को कुछ न्यूरोलॉजिकल परेशानियाँ भी होती हैं."
इनके अनुसार, कोविड-19 के मरीज़ों में सिरदर्द, सूंघने की शक्ति में कमी (एनोस्मिया) और शरीर में हल्की झनझनाहट (आर्कियोप्लास्टीसिया) जैसे हल्के लक्षणों के अलावा बोलने में असमर्थता (अफासिया), दिल का दौरा या अन्य दौरे पड़ने जैसे गंभीर लक्षण भी शामिल हैं.
हाल के कुछ निष्कर्षों के अनुसार कोविड-19, जिसे काफ़ी हद तक साँस का गंभीर रोग माना जा रहा है, गुर्दों, लीवर, हृदय और शरीर के तमाम सभी अंगों पर असर कर सकता है.
अमरीका के मिशिगन में स्थित हेनरी फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन की न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर एलिसा फॉरी कहती हैं, "हम अभी तक नहीं जानते कि क्या एन्सीफ़ेलोपैथी यानी दिमाग़ में क्षति अन्य वायरसों की तुलना में कोविड-19 में अधिक गंभीर है या नहीं, लेकिन मैं ये बता सकती हूँ कि मरीज़ों में ये लक्षण काफ़ी देखे जा रहे हैं."
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कोरोना वायरस संक्रमण का प्रभाव अधिक बढ़ने पर होने वाली बीमारी कोविड-19 के कितने मरीज़ो में न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई देते हैं, इसे लेकर अनुमान अलग-अलग हैं. पर लगभग 50 प्रतिशत मरीज़ों में, जो कोरोना संक्रमित पाए गए हैं, न्यूरोलॉजिकल परेशानियाँ देखी जा रही हैं.
मगर अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीज़ों के इस किस्म के लक्षणों पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है. अधिकांश लोग, यहाँ तक कि डॉक्टर भी कई बार इन लक्षणों की पहचान नहीं कर पाते.
आईसीयू के बिस्तर पर, मेडिकल मशीनरी की आवाज़ों के बीच और दर्द दूर करने वाली दवाओं के असर में गंभीर मरीज़ इन लक्षणों को सही से पहचान नहीं पाते या फिर कोविड-19 से इन लक्षणों/परेशानियों को सीधे तौर पर जोड़कर नहीं देख पाते.
डॉक्टरों के अनुसार, ज़्यादा परेशानी की बात तब है जब मरीज़ का टेस्ट ना हुआ हो, और उसे संक्रमण की जानकारी ना हो, और वो न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को इस महामारी से जोड़कर देख ही ना पायें.
जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी में क्रिटिकल केयर मेडिसिन और एनिस्थीसियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर रॉबर्ट्स का कहना है, "कोविड-19 के मरीज़ों में एक बड़ी संख्या उन मरीज़ों की है जिन्हें कोई और लक्षण नहीं, पर मतिभ्रम या भ्रांतियां हैं."
दिमाग़ी परेशानी के लक्षण
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बहुत सारे शोधकर्ताओं का मानना है कि कोविड-19 के रोगियों में दिख रहे ये न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिमाग़ में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण हैं जो साँस की गंभीर समस्या होने पर आमतौर पर होती है. जबकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना वायरस सीधे तौर पर भी दिमाग़ पर हमला कर सकता है.
जापान में शोधकर्ताओं ने 24 वर्ष के एक लड़के पर अध्ययन किया है जिसे फ़र्श पर बेहोश पाया गया था. वो अपनी ही उल्टी में औंधे मुँह पड़ा था. जब कुछ लोगों ने उसकी मदद के लिए डॉक्टर को फ़ोन किया, तब उसे दौरे पड़ रहे थे.
अस्पताल पहुँचने पर उसके दिमाग़ का एमआरआई किया गया जिससे पता चला कि उसे वायरल मेनिनजाइटिस (दिमाग़ में सूजन) है.
लेकिन इस लड़के के सेरेब्रोस्पाइनल फ़्लूइड यानी मस्तिष्कमेरु द्रव्य में सार्स-कोव-2 यानी कोरोना वायरस के नमूने मिले.
चीनी शोधकर्ताओं को भी गंभीर इन्सेफ़ेलाइटिस से ग्रस्त एक 56 वर्षीय मरीज़ के सेरेब्रोस्पाइनल फ़्लूइड में कोरोना वायरस के नमूने मिले थे.
इसी तरह इटली में एक पोस्टमार्टम के दौरान कोविड-19 की वजह से मरे व्यक्ति के दिमाग़ की नसों में कोरोना वायरस मिला.
इन्हीं के आधार पर कुछ विशेषज्ञों का अब यह भी कहना है कि "वायरस की वजह से साँस लेने का सिस्टम फ़ेल होता है और उससे इंसान की मौत होती है, ऐसा नहीं है. बल्कि वायरस ब्रेनस्टेम पर हमला करता है जो इंसान की मौत का कारण बनता है."
ब्रेनस्टेम - दिमाग़ में एक तरह का कमांड सेंटर है जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि इंसान अगर बेहोश भी हो जाये तो वो साँस लेता रहे.
संक्रामक बीमारियों से दिमाग़ की रक्षा के लिए सिर के भीतर एक 'ब्लड-ब्रेन बैरियर' होता है जो टॉक्सिक एजेंट यानी विषाक्त तत्वों को दिमाग़ में जाने से रोकता है.
अगर कोरोना वायरस इस बैरियर को पार कर सकता है, तो विशेषज्ञों के अनुसार "यह ना सिर्फ़ नसों की केंद्रीय व्यवस्था यानी सेंट्रल नर्व सिस्टम को प्रभावित कर सकता है, बल्कि दिमाग़ में कई वर्षों तक रह भी सकता है."
हालांकि अब तक जो शोध हुए हैं, उनके अनुसार इसकी संभावना बहुत ही कम है.
पुराने अनुभव
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वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कुछ वायरस हैं जो इस तरह शरीर में छिपने की क्षमता रखते हैं.
वैज्ञानिकों के अनुसार, 1918 में महामारी का कारण बने इन्फ़्लुएंज़ा वायरस ने भी कुछ लोगों के मस्तिष्क पर काफ़ी प्रभाव डाला था. यूके में 1957 में फैली महामारी के बाद भी बहुत सारे मरीज़ डिप्रेशन से पीड़ित हुए थे.
इंपीरियल कॉलेज ऑफ़ लंदन के प्रोफ़ेसर डेविड नट को डर है कि इस बार भी ऐसा कुछ देखने को ना मिले. उन्होंने 1957 में पीड़ित हुए बहुत से लोगों का 1970 और 1980 के दशक में इलाज किया है.
वो कहते हैं, "जिन लोगों को कोरोना संक्रमण के बाद आईसीयू तक जाना पड़ा, और फिर वे ठीक होकर लौटे हैं, उन्हें व्यवस्थित तरीक़े से कुछ वक्त तक मॉनिटर करने की ज़रूरत है ताकि इसका सही अंदाज़ा लगाया जा सके कि उन्हें इस महामारी से किस तरह की और कितनी न्यूरोलॉजिकल क्षति हुई. साथ ही ज़रूरत होने पर उन्हें इलाज भी दिया जाये."
डेविड नट कहते हैं कि "यूके में अधिकांश संस्थाएं जो कोविड-19 के मरीज़ों के इलाज में लगी हैं, वो मरीज़ों में बुनियादी लक्षण तो देख रही हैं, पर इसे कहीं नहीं देखा जा रहा कि रोगियों में न्यूरोलॉजिकल लक्षण कैसे हैं."
पर दिमाग़ का क्या?
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जानकारों की मानें तो कई देशों में अब इस पर अध्ययन करने का प्लान बनाया जा रहा है कि जो लोग कोविड-19 से पूरी तरह ठीक हुए हैं, उन्हें कोई न्यूरोलॉजिकल समस्या तो नहीं है.
पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी 17 देशों के साथ मिलकर वैज्ञानिकों का एक संयोजित कार्यक्रम शुरू करने वाली है ताकि महामारी के न्यूरोलॉजिकल लक्षणों को मॉनिटर किया जा सके.
बहुत से वैज्ञानिकों को विश्वास है कि कोरोना वायरस संक्रमण फेफड़ों और साँस लेने की प्रणाली से नसों के तंत्र के लिए कहीं ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सकता है.
पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी के विज्ञानियों की राय है कि "भले ही वायरस का असर फेफड़ों पर ज़्यादा जल्दी दिखाई देता है, और इसके नतीजे एक इंसान के लिए ज़्यादा घातक साबित हो सकते हैं, लेकिन नर्व सिस्टम पर इसके असर को कम नहीं मानना चाहिए."
फ़्रांस में कोविड-19 के मरीज़ों का इलाज कर रहीं डॉक्टर जूली हेल्म्स की एक मरीज़ जिन्हें दो महीने पहले कोविड-19 आईसीयू से छुट्टी मिली थी, वो अब डिप्रेशन की दवाएं ले रही हैं और उन्हें अब भी कमज़ोरी और थकान रहती है.
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डॉक्टर जूली के अनुसार, ऐसी शिक़ायत करने वाली वो अकेली मरीज़ नहीं हैं.
वो कहती हैं, "कई लोग गंभीर डिप्रेशन में हैं. उन पर नज़र रखने की ज़रूरत है. एक मरीज़ हैं जो बस मर जाना चाहती हैं. वो 60 वर्ष की हैं और वो कहती रहती हैं कि कोविड ने उन्हें मार दिया है. वो कहना चाहती हैं कि ठीक होने के बाद उनका दिमाग़ चलना बंद हो गया है."
डॉक्टर जूली हेल्म्स की चिंता है कि "इस महामारी का अब तक ऐसा कोई ज्ञात इलाज मौजूद नहीं है जो मरीज़ों में न्यूरोलॉजिकल क्षति को रोक सके."
वो कहती हैं, "सांस की गंभीर तकलीफ़ होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा जा सकता है. किडनी फ़ेल होने पर डायलेसिस हो सकता है. पर दिमाग़ का क्या?"
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन
मिशेल रॉबर्ट्सबीबीसी हेल्थ ऑनलाइन एडिटर
अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
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पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.