कोरोना वायरस: इस मोबाइल ऐप के सहारे लॉकडाउन हटाने में मिलेगी मदद?

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- Author, क्रिस स्टोकेल वाकर
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में कसने वाली कोविड-19 की महामारी से निपटने के लिए तरह तरह की तकनीकों की भी मदद ली जा रही है.
इसी में से एक है मोबाइल कॉटैक्ट ट्रेसिंग तकनीक. जिसके तहत सभी लोगों पर इस बात के लिए नज़र रखी जा सकती है कि वो कहीं किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में तो नहीं आए. या फिर अगर वो ख़ुद संक्रमित हैं तो किसी और को तो ये वायरस नहीं दे रहे.
मोबाइल में कॉटैक्ट ट्रेसिंग ऐप हो, तो लोगों के बारे में ये पता लगाया जा सकता है कि वो कहां आए- गए. और कहीं वो किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में तो नहीं आए. इसके लिए ये ऐप ब्लूटूथ सेंसर का इस्तेमाल करता है. अगर वो किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के आस पास होंगे, तो तुरंत उनके पास एलर्ट का मैसेज जाएगा. इस ऐप का एक फ़ायदा ये भी है कि लोगों को पहले के दौर में किसी कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने के बारे में पता सकते हैं.
कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पहले लोगों और मरीज़ों से बात करके की जाती थी. लेकिन, इसमें काफ़ी समय और मेहनत लगती है. फिर लोग ये भूल भी जाते हैं कि वो किस किससे मिले थे. फिर अगर वो किसी अजनबी से मिले तो उसे पहचान पाना उनके लिए मुश्किल होता है.
लेकिन, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप के साथ ये झंझटें कम होती हैं. अगर ये पूरी तरह से कारगर हों, तो लॉकडाउन खोलने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं.
मोबाइल कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप के लिए जीपीएस के बजाय ब्लूटूथ तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. वजह ये है कि इसमें फ़ोन की बैटरी कम ख़र्च होती है. ये ज़्यादा सटीक होते हैं. और जीपीएस अक्सर बहुमंज़िला इमारतों में काम नहीं करते.

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एप्पल और गूगल ने इसी महीने एलान किया था कि वो ब्लूटूथ की मदद से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की तकनीक ईजाद करने में जुटे हैं. वो मई तक इसे बाज़ार में उतारने की तैयारी कर रहे हैं. और अच्छी बात ये है कि एप्पल और एंड्रॉयड दोनों फ़ोन आपस में इस तकनीक के तहत संवाद कर सकेंगे. कंपनियां कहती हैं कि ये तकनीक स्वैच्छिक होगी. अगर कोई चाहे, तो वो इनका इस्तेमाल न भी करे.
इसके अलावा फ्रांस, अमरीका और ब्रिटेन की सरकारें कोरोना वायरस के प्रकोप पर नज़र रखने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप विकसित कर रही हैं. यूरोप के आठ अन्य देश भी मिल कर ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं. इससे पहले चीन, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप की मदद से कोरोना वायरस संक्रमित लोगों का पता लगाने का प्रयोग हो चुका है.
नीदरलैंड की एम्सटर्डम यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर नैटली हेलबर्गर कहती हैं कि, "इन ऐप से कोविड-19 का प्रकोप थामने में मदद मिल सकेगी. मगर ये कोई जादुई गोली नहीं हैं कि इनसे ये महामारी ख़त्म ही हो जाएगी. क्योंकि अभी हमें ऐसे ऐप के असरदार होने को लेकर कई तरह की आशंकाएं भी हैं."
डेटा संरक्षण का काम करने वाले ब्रिटेन के फिल बूथ भी कहते हैं कि, "वायरस को तकनीक से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. उसे सिर्फ़ संक्रमण फैलाना है.' बूथ को लगता है कि कहीं लोग ये न सोचने लगें कि उनके मोबाइल में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप है, तो वो कोविड-19 से बच जाएंगे."

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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की जेनिफर कॉब एक अलग आशंका जताती हैं. वो कहती हैं कि, "अगर कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग असरदार नहीं साबित होती, तो पर्याप्त मात्रा में परीक्षण नहीं होंगे. अगर वो असरदार हैं भी, तो भी लोगों की निजता में दखल देंगे."
फिल बूथ कहते हैं कि लॉकडाउन हमें सुरक्षित रखता है. इससे वायरस का संक्रमण फैलने की रफ़्तार धीमी हो जाती है. अब तक कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप से वायरस का प्रसार रोकने के ठोस सबूत नहीं दिखे हैं.
इम्तिहान का समय है
इन आशंकाओं के बावजूद भारत समेत कई देश मोबाइल ऐप के ज़रिए लोगों पर निगाह रख रहे हैं. भारत सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया है. जो ये ऐप डाउनलोड करने वालों को बताता रहता है कि वो सेफ़ ज़ोन में हैं या नहीं. उनके संक्रमित होने का ख़तरा कितना कम या ज़्यादा है.
इस दिशा में सबसे आगे रहने वाले देश भी मानते हैं कि ये तकनीक, कोविड-19 का मुक़ाबला करने के व्यापक अभियान का बस एक हिस्सा भर है. फिल बूथ कहते हैं कि जब तक बड़े पैमाने पर टेस्ट नहीं होंगे, तब तक कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग जैसे ऐप बहुत असरदार नहीं हो सकते.
अगर ऐप ये वार्निंग देता है कि किसी संक्रमित होने का ख़तरा है, तो भी इस बात की क्या गारंटी कि वो इंसान इसके बाद तुरंत टेस्ट कराएगा. फिर, लोगों को सामाजिक बहिष्कार का भी डर होता है. इस कारण से भी वो आगे आने में परहेज़ करेंगे.

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बहुत से लोगों को ये भी लगता है कि नया कोरोना वायरस, किसी फ्लू के वायरस जैसा ही है. इससे इतना ख़तरा नहीं है, जितना बताया जा रहा है. ऐसे लोगों के आगे आकर टेस्ट कराने की संभावना कम ही है.
फिल बूथ कहते हैं, "कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और इम्युनिटी पासपोर्ट जैसी तकनीकें अगली महामारी के लिए हैं. अभी तो इनके इस्तेमाल की संस्कृति ही नहीं विकसित हुई है. फिर कंपनियां और सरकारें, लोगों के स्वास्थ्य जुड़े आंकड़ों का दुरुपयोग भी कर सकती हैं."
मोबाइल कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप बनाने में चीन, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर सबसे आगे हैं. सिंगापुर के ट्रेस टुगेदर ऐप की सबसे अधिक तारीफ़ की जा रही है. लेकिन, इस ऐप को विकसित करने में अहम भूमिका निभाने वाले जेसन बे ने हाल ही में एक लेख में कहा कि ऐसे ऐप बहुत असरदार तभी होंगे, जब इनका व्यापक इस्तेमाल होगा. फिलहाल तो सिंगापुर के छह में से केवल एक नागरिक ने इस ऐप को अपने मोबाइल पर इंस्टॉल किया था. जबकि ऐसे ऐप के असरदार होने के लिए ज़रूरी है कि किसी देश की कम से कम 60 प्रतिशत आबादी इनका इस्तेमाल करे.
अब भारत जैसे देश में तो ये मुमकिन ही नहीं. क्योंकि यहां क़रीब 28 फ़ीसद मोबाइल यूज़र्स के पास ही स्मार्टफ़ोन है. ऐसे में अगर भारत में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप आ भी जाता है, तो वो ज़रूरी आंकड़े नहीं जुटा सकेगा.
सिंगापुर के ऐप में एक और ख़ामी थी कि इस ऐप के लिए हर वक़्त फ़ोन को अनलॉक करके रखना होता था. कोई और ऐप प्रयोग करने पर कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप काम करना बंद कर देता था.

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इसके अलावा चीन जैसे देश इन ऐप के माध्यम से अपने नागरिकों पर निगाह भी रखते हैं. चीन के नागरिक तो अपनी सरकार की निगरानी के आदी हैं. मगर, पश्चिमी देशों में प्राइवेसी एक बड़ा मसला है. ऐसे में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप कितना असरदार होगा, कहना मुश्किल है.
ब्रिटेन और जर्मनी में तो ऐसे ऐप के इस्तेमाल को लेकर सख़्त क़ानून बनाए जा रहे हैं, ताकि नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन न हो.
सबसे ज़रूरी ये है कि कोविड-19 से निपटने के सारे उपाय ऐसे होने चाहिए, जो जनता का भरोसा जीत सकें. न कि लोगों में अविश्वास और डर पैदा करें.

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