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कैश की जगह कार्ड हो तो बढ़ती है फ़िजूलख़र्ची?
- Author, लू हाए लिआंग
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
डिजिटल दुनिया में आप का बैंक, आप का वॉलेट या पर्स आप के स्मार्टफ़ोन में आ गया है. एक कप चाय पी, या सब्ज़ी ली, तो भी आप स्मार्टफ़ोन से दुकानदार को पैसे दे सकते हैं.
भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देश ऐसे हैं जो डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दे रहे हैं. ये आसान है. और नक़द भुगतान के तमाम झंझटों से आज़ाद भी.
हालांकि, बहुत से लोग अब भी नक़दी को ही तरज़ीह देते हैं. उन के लिए डिजिटल लेन-देन ख़तरनाक भी है और पेचीदा भी.
बहुत से जानकार कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट करते वक़्त हमें पैसे ख़र्च होने का एहसास नहीं होता. इसलिए हम ज़्यादा ख़र्च कर डालते हैं. फिर, क्रेडिट कार्ड का बिल आता है, तो हमें तकलीफ़ होती है.
ग्राहक के मनोविज्ञान को समझने से पहले हमें समझना होगा कि पैसा क्या है?
आज मनी या पैसा एक कल्पना है. हम इसे बहुत हल्के में लेते हैं. इस बात पर ग़ौर नहीं करते कि कोई सिक्का या नोट इतने क़ीमती कैसे हो जाते हैं?
इंसानी सभ्यता के विकास में पैसा बहुत पुराना आविष्कार नहीं है. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने वाली नताशा पोस्टेल-विनय कहती हैं कि पैसे के आविष्कार से इंसानी समाज में बुनियादी बदलाव आया था. इस से पहले लोग एक सामान लेने के बदले में दूसरा सामान देते थे.
नताशा कहती हैं कि, 'ये अदला बदली से बिल्कुल अलग था. आप को दो अलग-अलग लोगों की ज़रूरतों के सटीक मिलान की ज़रूरत नहीं थी. बस आप के पास कुछ सिक्के होने चाहिए.'
पैसे की क़ीमत और भरोसा
पैसे के सब से शुरुआती इस्तेमाल के सबूत हमें प्राचीन काल के सीरिया और इराक़ में मिले हैं. ये बेबीलोन सभ्यता का हिस्सा था. यहां क़रीब पांच हज़ार साल पहले लोग चांदी के टुकड़ों के बदले में सामानों की ख़रीद-फ़रोख़्त करते थे. इन्हें शेकेल कहा जाता था. यहां के मार्दुक मंदिर के पुजारियों ने सामानों के दाम नियत किए थे. यहीं पर हमें पैसे के हिसाब किताब की पहले बही-खाते मिले और क़र्ज़ का हिसाब भी.
बेबीलोन में चांदी के टुकड़ों को उनकी शुद्धता के लिए नियमित रूप से परखा जाता था. स्थानीय हुकूमत ये सुनिश्चित करती थी कि चांदी में मिलावट न हो. यानी लोगों को अपने सामान के बदले में सही क़ीमत मिले.
नताशा कहती हैं कि, 'पैसे की क़ीमत हो, इस के लिए सब से बुनियादी ज़रूरत होती है भरोसे की.'
बेबीलोन में चांदी के टुकड़ों का तय आकार नहीं होता था. ये भारी-भरकम होते थे. ये सिक्कों जैसा आसान नहीं था.
इंसान ने पहली बार सिक्के यूनानी राज्य लिडिया में आज से क़रीब ३ हज़ार साल पहले ढाले थे.
वहीं, काग़ज़ के पहले नोट चीन में 618-907 ईस्वी के बीच टैंग वंश के शासन के दौरान छापे गए थे. ये नोट निजी तौर पर गारंटी देने के लिए इस्तेमाल किए जाते थे.
भुगतान में आसानी
यूरोप को काग़ज़ के नोटों की अहमियत समझने में क़रीब एक हज़ार साल और लग गए. यूरोप में पहले नोट 17वीं सदी में छापे गए थे.
आज की तारीख़ में नोटों को चांदी या सोने के बराबर क़ीमत से नहीं आंका जाता. अब नोटों की क़ीमत की गारंटी सरकार देती है. ये क़ानूनी तौर पर लेन-देने के लिए मान्यता प्राप्त माध्यम हैं.
क्रेडिट और डेबिट कार्ड के आने से बहुत पहले से क़र्ज़ के लेन-देन का चलन था. नताशा विनय कहती हैं कि इस के लिए पैसे का असल रूप में मौजूद होना ज़रूरी नहीं था.
बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले क्रेडिट कार्ड का आविष्कार न्यूयॉर्क के फ्लैटबुश नेशनल बैंक के लिए जॉन बिगिन्स ने 1946 में किया था. इस के बाद सेल्समैन के लिए क्रेडिट कार्ड के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया. ब्रिटेन में पहला क्रेडिट कार्ड बारक्लेज़ बैंक ने 29 जून 1966 को जारी किया था.
पहले डेबिट कार्ड ब्रिटेन में 1987 में जारी किए गए थे. चिप और पिन वाले कार्ड 2003 में जारी हुए. और, कॉन्टैक्सलेस कार्ड इस के चार साल बाद बाज़ार में आए.
चीन और भारत जैसे देशों में आज क्यूआर (QR) कोड स्कैन कर के डिजिटल वॉलेट से आसानी से भुगतान हो जाता है.
नुक़सान क्या हैं?
सबसे ज़्यादा कैशलेस लेन-देन कनाडा में होता है. वहां हर नागरिक के पास दो क्रेडिट कार्ड होना आम बात है. वहीं, यूरोपीय देश स्वीडन में केवल 13 फ़ीसद लोग हैं, जो नक़दी से ख़रीद-फरोख़्त करते हैं. इन के मुक़ाबले आज भी क़रीब 70 प्रतिशत अमरीकी, नक़द लेन-देन करते हैं.
कैश का कम इस्तेमाल करने वाले देशों में डिजिटल भुगतान से ज़िंदगी बहुत आसान हो गई है. आप की जेब में पैसे न भी हों, तो आप आसानी से घूम सकते हैं. ख़रीदारी कर सकते हैं.
लेकिन, कैशलेस लेन-देन के नुक़सान क्या हैं?
बहुत से लोगों का मानना है कि कैशलेस ख़रीदारी में लोग ज़्यादा पैसे ख़र्च कर डालते हैं. इंसान का ज़हन कई बार अतार्किक होता है. कई रिसर्च से साबित हुआ है कि अगर हम 100 का नोट खो दें, तो ज़्यादा तकलीफ़ होती है. और अगर 100 का नोट मिल जाए, तो ग़म के मुक़ाबले ख़ुशी कम होती है.
इसी मनोविज्ञान का फ़ायदा उठाने के लिए अर्थशास्त्र के नए सिद्धांत गढ़े गए हैं. ग्राहक के मनोविज्ञान को समझने में नए रिसर्च हो रहे हैं.
इस बारे में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर ड्रैज़े प्रेलेक ने एक रिसर्च किया था. उन्होंने बास्केटबाल मैचों के टिकट की नीलामी की. देखा गया कि जिन के पास नक़दी नहीं थी, वो ज़्यादा बढ़ चढ़ कर बोलियां लगा रहे थे.
क्रेडिट कार्ड रखने वाले अक्सर लापरवाही से ख़र्च करते हैं. हालांकि जब उनका बिल आता है, तो बहुत तकलीफ़ भी होती है.
पर ये बात आप ई-वॉलेट के बारे में कह नहीं सकते. क्योंकि आप को इन से हर भुगतान की फ़ौरन जानकारी होती है. पता चलता रहता है कि आप की डिजिटल जेब कितनी हल्की हो गई.
इस तकलीफ़ के प्रति हर दम सजगह रहने का नतीजा होता है कि हम संभल कर पैसे ख़र्च करते हैं. हालांकि, इसका बुरा प्रभाव ये भी होता है कि हम ख़रीदारी की ख़ुशी से महरूम हो जाते हैं.
इसीलिए, ग्राहको को लुभाने के लिए क्रेडिट कार्ड से किस्तों में भुगतान के विकल्प भी दिए जाते हैं.
कैशलेस व्यवस्था में आप को बहुत सी सहूलतें हासिल होती हैं. बिना तकलीफ़ महसूस किए आप ख़र्च कर सकते हैं.
ये अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहतर है.
अंग्रेज़ी में एक कहावत है, 'खाद की तरह पैसा भी किसी काम का नहीं, जब तक इसे बिखेरा न जाए.'
(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)
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