You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ऐसे पता लगाएं कि भविष्य में क्या बचेगा, क्या ख़त्म हो जाएगा
- Author, माउरो गल्लुज़्ज़ो
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
आप जिस शहर में रहते हैं, वहां के बारे में अंदाज़ा लगाइए कि आज से सौ बरस बाद वहां क्या बचेगा?
कौन सी इमारतें रह जाएंगी? कौन से निशां वक़्त के थपेड़ों से मिट जाएंगे? इसे लेकर विवादित लेखक नासिम निकोलस तालिब एक मोटा सा नियम बताते हैं.
वो कहते हैं कि आप अपने शहर में जो पुरानी इमारतें देखते हैं, उनके ही बने रहने की संभावना ज़्यादा है, बनिस्बत नई बनाई गई इमारतों के.
तालिब का कहना है कि अगर आप किसी निर्जीव वस्तु की आगे की उम्र का अंदाज़ा लगाना चाहते हैं तो पहला सवाल ये होना चाहिए कि ये कितने समय से धरती पर मौजूद है.
लंदन शहर को ही लीजिए. यहां बहुत सी इमारतें हैं जो सैकड़ों साल से खड़ी हैं. सबसे पुरानी इमारत है टावर ऑफ़ लंदन, जो 941 वर्ष से विद्यमान है. मर्टन प्रायरी 900 साल से ज़्यादा पुरानी है और चर्च ऑफ़ सेंट बार्थोलोम्यो 896 वर्ष पुराना है.
तालिब का तर्क है कि किसी भी इमारत की लंबी उम्र का अंदाज़ा केवल वक़्त लगा सकता है. हमें ये देखना होगा कि कोई भी इमारत कितने बरस या सदियों से वक़्त के थपेड़े बर्दाश्त कर रही है.
लंदन की नई बहुमंज़िला बिल्डिंग शार्ड, टॉवर ऑफ़ लंदन के मुक़ाबले शायद ही किसी मोर्चे पर ठहरे. दोनों में कोई मुक़ाबला ही नहीं. लेकिन, इस बात की संभावना ज़्यादा है कि शार्ड से ज़्यादा टावर ऑफ़ लंदन ज़्यादा दिन टिकेगा.
- यह भी पढ़ें | आपके लुक्स से तय होती है आपकी शख़्सियत
लिंडी इफेक्ट
नासिम तालिब इस नियम को लिंडी इफेक्ट कहते हैं. 1964 में अमरीकी लेखक अल्बर्ट गोल्मैन ने लिंडीज़ लॉ नाम से एक लेख लिखा था.
इसमें उन्होंने शहर के सेलेब्रिटीज़ के बीच की बातचीत का हवाला दिया था कि वो उन्हें एक जगह जमा हुए ऐसे कॉमेडियन लगते थे, जो बस उस स्थिति में बने रहने की जुगत लगाया करते थे. ऐसा इसलिए ताकि उनका दौर कभी ख़त्म न हो. जबकि अगर वो कम आयोजनों में शामिल होते तो शायद उनके लिए बेहतर होता.
तालिब ने 2012 में आई अपनी किताब 'एंटी फ्रैजाइल: थिंग्स दैट गेन फ़्रॉम डिसऑर्डर' लिखा था कि अगर कोई किताब पिछले पचास साल से छप रही है, तो आगे भी उसकी डिमांड बनी रहेगी. वहीं, कोई नई किताब अगर रातों-रात लोकप्रिय होती है तो, वो उतनी ही जल्दी भुला भी दी जाएगी.
हम एक बार फिर लंदन की इमारतों के बारे में बात करते हैं. वो क़ुदरत की उन्हीं ताक़तों का सामना करती हैं, जो सभी करते हैं. कभी बारिश, तो कभी ठंडी हवा और कभी सूखा. वो मज़बूत ज़रूर हैं. लेकिन, हमेशा अच्छी हालत में नहीं बनी रह सकतीं.
किसी भी अन्य शहर की तरह लंदन में भी नई और पुरानी इमारतों का मेल देखने को मिलता है.
पैरिस में सदियों पुराने गिरजाघर नॉट्र डाम में आग लगने के कुछ ही दिनों के भीतर उसके पुनर्निर्माण के लिए लोगों ने अरबों रुपये का दान किया था.
- यह भी पढ़ें | प्लास्टिक प्रदूषण ख़त्म करने का जुगाड़
पुरानी संस्कृति से डर
हमारी संस्कृति का पुरानी इमारतों और आर्किटेक्चर से गहरा ताल्लुक़ होता है. वहीं, बहुत से लोग इतिहास से इतना घबराते हैं कि उसे मिटाने पर आमादा हो जाते हैं.
जैसे कि सऊदी अरब ने इस्लामिक दौर से पहले के सारे निशान अपने देश से मिटा दिए ताकि वहाबी विचारधारा को चुनौती देने वाली कोई ताक़त न खड़ी हो सके. इसी तरह तालिबान ने बामियान स्थित बुद्ध की विशाल मूर्तियों को उड़ा दिया था.
चीन में शहरों के उद्धार के नाम पर पुरानी बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं. इसी तरह वीगर मुसलमानों को शुद्ध करने के लिए बेहद सख़्त अभियान चलाया जा रहा है. लिंडी इफेक्ट, जिसकी बात तालिब करते हैं, वो अतीत के साथ हमारे रिश्तों को ख़त्म करने वाले लोगों पर गहरा असर डालता है.
लंबे वक़्त तक खड़ी इमारतें तमाम मुश्किल हालात से निपटने के लिए सक्षम हो जाती हैं. अक्सर लोग कहते हैं कि पुराने को मिटाएंगे, तभी नई इबारत लिखी जाएगी. पर, बहुत सी पुरानी और ग़लत परंपराओं अपराधों जैसे दास प्रथा, बलात्कार, हत्या और कट्टरपंथ को मिटाने की बात कोई नहीं करता. ऐसी दोगली बातें करने वालों को इतिहास को क़रीब से जानने-समझने की ज़रूरत है.
- यह भी पढ़ें | लोग रिश्ते में रहते हुए क्यों करते हैं बेवफ़ाई?
झेलने की ताकत
भविष्य को लेकर नासिम तालेब की सोच का एक और पहलू भी है. और वो है किसी का नाज़ुक होना. कोई चीज़ तब नाज़ुक मानी जाती है, जब वो मुश्किल हालात में ख़ुद को बदलकर बचा नहीं पाती. पहले ही झटके में इसके परखच्चे उड़ जाते हैं. हालांकि क़ुदरत की बनाई हुई बहुत सी चीज़ें तमाम झटके सहकर भी खड़ी रहती हैं.
वहीं, इंसान की बनाई तमाम इमारतों, कलाओं और विचारों में भी बदलते हालात में ख़ुद को ढालने की क्षमता होती है.
इसीलिए किसी नई चीज़ का आविष्कार करने में जुटे लोग दो सवाल करते हैं. पहला ये कि इससे किस समस्या का हल निकलेगा? और दूसरा ये कि इससे ज़िंदगी में क्या आसानी आएगी? अगर आप इन सवालों के तसल्लीबख़्श जवाब नहीं खोज पाते हैं, तो बेहतर होगा कि इन सवालों के जवाब मिलने का इंतज़ार करें.
अगर आप भविष्य के बारे में सोच रहे हैं. और ये अंदाज़ा लगाना चाहते हैं कि कौन सी चीज़ मज़बूत है और किसका समय पूरा हो गया, तो आप ये समझ लीजिए कि भविष्य, अतीत के वो टुकड़े हैं, जो सदियों से वक़्त के थपेड़े सहकर भी आज में मौजूद हैं.
वहीं, जो आज है, वो कल टूटकर बिखर भी सकता है. अगर आप ये समझना चाहते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या बचने वाला है तो उन रहस्यों पर ग़ौर कीजिए, जिनकी चर्चा सदियों से होती आ रही है. असली राज़ को तर्क से नहीं मिटाया जा सकता.
कोई नया ट्रेंड या अचानक मिली शोहरत लंबे समय तक नहीं टिकने वाली. बहुत कम चीज़ें ही टिकती हैं.
हमसे और हमारी संस्कृति में जिन का टकराव हमेशा से चला आ रहा है, वो हैं ज़रूरतें और ख़्वाहिशें, मोहब्बत और नफ़रत, आज़ादी और ग़ुलामी. इंसानी सभ्यता में ये टकराव हमेशा चलने वाला है.
जब आप अपनी सोच को वर्तमान की क़ैद से आज़ाद करते हैं तो आपको सिर्फ़ शोर सुनाई देता है. दूर की सोचना आप के आज में ख़लल डालता है.
मशहूर लेखक विलियम गिब्सन ने कहा था: भविष्य की आमद हो चुकी है. इसके सबसे अहम दौर तो पहले ही बीत चुके हैं.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)