जापान के आधुनिक संतों की दुर्दशा

आधुनिक संसार में कटा हुआ रह पाना बहुत मुश्किल हो सकता है. ई-मेल, पोस्ट्स, ट्वीट्स, लाइक्स, कमेंट और तस्वीरों की अंतहीन कड़ी हमें लगातार आधुनिक जीवन से जोड़े रहती है.

लेकिन जापान में पांच लाख लोग आधुनिक संतों की तरह जीवन यापन करते हैं. उन्हें हीकीकोमोरी कहा जाता है - ऐसे लोग जो सामाजिक सम्पर्कों से खुद को अलग कर लेते हैं और अक्सर वर्षों तक अपना घर नहीं छोड़ते.

एक सरकारी सर्वेक्षण में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 541,000 (कुल जनसंख्या का 1.57 %) पाई गई. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह संख्या और अधिक है क्योंकि ऐसे लोग मदद लेने में वर्षों लगा देते हैं.

शुरुआत में ऐसा लगा कि यह स्थिति जापानी समाज की ही विशेषता है लेकिन हाल के वर्षों में दुनियाभर से ऐसे मामले सामने आए हैं. जापान के पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया में 2005 में हुए एक विश्लेषण में सामाजिक तौर से अलग-थलग रह रहे लोगों की संख्या 33 हजार (कुल आबादी का 0.3 %) पाया गया जबकि हांगकांग में 2014 में हुए एक सर्वेक्षण में यह संख्या 1.9 प्रतिशत पाई गई.

ये मामले केवल एशिया में ही नहीं बल्कि अमरीका, स्पेन, इटली, फ्रांस और अन्य जगहों से भी सामने आ रहे हैं.

सामाजिक एकाकीपन को लेकर दुनियाभर में चिंता बढ़ रही है. इसका कारण जागरूकता का बढ़ना है या समस्या का बढ़ना है, यह स्पष्ट नहीं है.

पिछले वर्ष जनवरी में ब्रिटेन में अपना पहला एकाकीपन से निपटने वाला मंत्री नियुक्त किया और हाल में ऑफिस ऑफ नेशनल स्टेटिस्टिक्स यानी राष्ट्रीय सांख्यकीय कार्यालय के आंकड़ों में 16 से 24 वर्ष की उम्र के लगभग 10 प्रतिशत लोगों ने "सदैव या प्रायः" एकाकीपन महसूस करने की बात की.

हीकीकोमोरी शोध में एक समान लेखन विवादास्पद घटक आधुनिक प्रौद्योगिकी यानी टेक्नोलॉजी का एकाकी करने वाला प्रभाव शामिल है. इनका आपस में संबंध है कि यह बात अभी तय नहीं है लेकिन यह चिन्ता अवश्य है कि हमारे लगातार अलग-थलग रहने वाले समाज ने जापान की यह खोई हुई पीढ़ी दरअसल एकाकी जीवन बिता रही है.

हीकीकोमोरी शब्द का प्रयोग जापान के मनोवैज्ञानिक तमाकी साइतो ने 1998 में अपनी पुस्तक, सोशल विद्ड्रॉल-एडोलेसेंस विद्आउट एंड में सबसे पहले किया था.

इसका प्रयोग अक्सर इस दशा के भुक्त भोगियों और इस दशा के लिए किया जाता है. आज इस दशा के समान लक्षणों में अकेले रहना, समाज से दूरी बनाना और मनोवैज्ञानिक विषाद होना या इन तीनों का ही मिला-जुला असर शामिल है जो छह महीने या उससे अधिक समय तक चले.

इस दशा को आरम्भ में "संस्कृति से जोड़कर" देखा गया. फुकुओका के क्यूशु विश्वविद्यालय के मनोरोग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर ताकाहीरो कातो, जो हीकीकोमोरी का अध्ययन और उपचार दोनों करते हैं, का मानना है कि जापानी समाज इस बीमारी को पनपने देने के लिहाज से कमजोर है.

परिवार का दबाव

कातो कहते हैं, "जापान में एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है, 'कील बाहर निकली हो तो उसे ठोंक दिया जाएगा'." छह फीट दो इंच की लम्बाई वाले डॉक्टर कातो लगभग मजाक में ही यह भी जोड़ देते हैं कि इसीलिए वे अक्सर झुककर चलते हैं जिससे उन्हें घमंडी न माना जाए.

कातो बताते हैं कि कठोर सामाजिक नियमों, अभिभावकों की ऊंची अपेक्षाएं और शर्मसार करने की एक संस्कृति जापान के समाज को अपूर्णता का अहसास कराने तथा खुद को विनम्र बनाने की इच्छा पैदा करने के लिहाज से एक उपयुक्त माहौल देती है.

29 साल के टोमोकी ने मुझे बताया कि 2015 में अपनी नौकरी छोड़ने के बाद वे दोबारा काम करने के लिए दृढ़ निश्चय कर चुके थे और नियमित तौर पर रोजगार केन्द्रों का चक्कर लगाते थे.

उन्होंने लगभग प्रत्येक दिन एक धार्मिक समूह में जाना भी शुरू कर दिया लेकिन उस समूह के नेता ने उनके रवैये और दोबारा काम शुरू न कर पाने के कारण सबके सामने उनकी आलोचना की.

जब उन्होंने उस समूह के क्रियाकलापों में आना बंद कर दिया तो नेता ने उन्हें एक सप्ताह में कई बार बुलाया. परिवार से पड़ रहे दबाव के साथ-साथ इस दबाव ने उन्हें अपने आप को समाज से पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए मजबूर कर दिया. (सभी हीकीकोमोरी की पहचान छुपाने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.)

टोमोकी ने बताया, "इसके लिए मैंने स्वयं को जिम्मेदार ठहराया. मैं किसी से मिलना नहीं चाहता था, कहीं बाहर जाना नहीं चाहता था."

स्कूल एक विचारधारा को वरीयता देता है, सबकी राय एक जैसी होनी चाहिए. यदि कोई कुछ और कहता है तो वह समूह से बाहर हो जाता है - इचिका.

फुकुओका शहर के हीकीकोमोरी मदद केन्द्र में योकायोका रूम यानी स्थानीय भाषा में आराम कक्ष - एक के बाद एकसमूह का प्रत्येक सदस्य दूसरे जैसा बनने के दबाव के बारे में बताता है. यहां आये 34 वर्षीय हारू कहते हैं, "स्कूल एक विचारधारा को वरीयता देता है, सबकी राय एक जैसी होनी चाहिए. यदि कोई कुछ और कहता है तो वह समूह से बाहर हो जाता है."

जापान में उम्मीदों पर खरा उतरना मुश्किल

जापानी समाज की उम्मीदों पर खरा उतरना और भी कठिन हो गया है. कातो का कहना है कि आर्थिक ठहराव और वैश्वीकरण के कारण जापान के कलेक्टिविस्ट यानी सामूहिक और हाइरार्किकल यानी वर्गीकृत परम्परा का अधिक व्यक्तिपरक यानी इंडिविजुअलस्टिक और प्रतिस्पर्धात्मक यानी कॉम्पटेटिव पश्चिमी विचारों वाले मत से टकराव हो रहा है.

कातो कहते हैं कि जहां एक ओर घर न छोड़कर मां-बाप पर ही निर्भर करने वाले बच्चों को ब्रिटिश अभिभावक शायद सहन न करें वहीं दूसरी ओर जापान के अभिभावक हर हाल में अपने बच्चों को मदद देने के लिए अपने आप को बाध्य पाते हैं और शर्मिन्दगी का भार उन्हें दूसरों से मदद लेने से भी रोकता है.

लेकिन जापान से बाहर भी इस तरह के मामलों में हो रही लगातार बढ़ोतरी इस दशा के एक ही संस्कृति से जुड़े होने पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है.ट

वर्ष 2015 के एक अध्ययन में कातो और अमरीका, दक्षिण कोरिया और भारत के उनके सहयोगी ने पाया कि चारों ही देशों में एक जैसे लक्षण हैं.

अमरीका की ऑरेगॉन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी में मनोरोग के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखक एलन टियो बताते हैं कि इस दशा के लक्षणों वाले अमरीकी उनसे नियमित रूप से सम्पर्क साधते हैं.

उनका कहना है, "लोग अक्सर ये मान लेते हैं कि यह जापान में सबसे ज्यादा आम है. यदि आप औपचारिक रूप से इसकी गणना करें तो कुछ चकित करने वाली जानकारी मिल सकती है."

स्पेन की मनोचिकित्सक एंजलिस मैलागॉन-एमॉर का बार्सिलोना में एक घरेलू चिकित्सा कार्यक्रम में अचानक इस समस्या से सामना हो गया. मैलागॉन-एमॉर और उनके सहयोगियों की मुलाकात अक्सर समाज से अलग-थलग हुए रोगियों से हो जाती थी.

इसकी वजह से उन्होंने जापान के हीकीकोमोरी से संबंधित साहित्य का अध्ययन किया. इस विषय पर उनके सबसे ताजा आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2008 से 2014 के बीच उनके सामने ऐसे 190 मामले आए.

लेकिन ये आंकड़े उस समय से पहले के हैं जब इस कार्यक्रम को और विस्तृत किया गया. उन्हें विश्वास है कि आंकड़े किसी बड़ी समस्या का सूक्ष्म रूप दर्शाते हैं.

उनका कहना है कि उस समय हम लोग दस लाख लोगों में केवल दो मनोचिकित्सक और दो नर्स थीं. उनके हिसाब से ऐसे अन्य बहुत मामले मौजूद हैं.

लेकिन इसका एक व्यापक स्पष्टीकरण कठिनाइयों से भरा है. बहुत सारे अध्ययनों में पता चला है कि हीकीकोमोरी ने मुख्य रूप से एक साथ होने वाले मनोरोग या विकास से संबंधित समस्याएं होती हैं जो अपने प्रकार और भीषणता में भिन्न हो सकती हैं. इसके कारण भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं जिनमें कामकाज के तनाव से लेकर पारिवारिक कलह शामिल है.

टियो का कहना है, "हीकीकोमोरी को इतना दिलचस्प यह बात बनाती है कि इसका कोई एक स्पष्टीकरण नहीं है. इसमें कई कारक एक साथ काम करते हैं."

एक कारक जिस पर नियमित तौर पर चर्चा होती है वह है प्रौद्योगिकी की भूमिका. जैसे इंटरनेट, सामाजिक मीडिया और वीडियोगेम. ये तीनों ही मानसिक स्वास्थ्य शोध में बहस का स्रोत पहले भी रहे हैं.

मैंने कई ऐसे हीकीकोमोरी से बात की जो इंटरनेट और वीडियोगेम का बहुत अधिक प्रयोग करते थे. बहुत सारे अध्ययनों में प्रौद्योगिकी के अधिक इस्तेमाल को एक कारक बताया गया है लेकिन यह अब भी पूरी तरह लागू नहीं होती और इनका आपसी रिश्ता भी अभी स्पष्ट नहीं है.

दक्षिण कोरिया में ऐसा कोई भी व्यक्ति जो कम से कम तीन महीने तक एकाकी रहता है उसके लिए ओइत्तोली शब्द का प्रयोग किया जाता है. वहां इनके आपसी संबंध कुछ अधिक स्पष्ट हैं. वर्ष 2013 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 43 ओइत्तोली में से प्रत्येक 10 में से एक को इंटरनेट का नशा था, और 50 प्रतिशत से अधिक के बारे में ऐसा माना गया कि उन्हें इंटरनेट के नशे का खतरा है.

'प्रौद्योगिकी से और ज़्यादा एकाकी हो सकते हैं'

दाइगु के कैथोलिक विश्वविद्यालय में एक मनोचिकित्सक और शोधकर्ता ताई यंग चोई जिन्होंने इस अध्ययन पर काम किया, उन्हें नहीं लगता कि प्रौद्योगिकी की वजह से समाज से विलगाव होता है.

उनका मानना है कि इससे मदद मिलती है और सहायता और गहरी होती है.

वे कहते हैं, "कुछ लोग प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके और अधिक एकाकी हो सकते हैं जिससे यह एकाकीपन और अधिक सख्त और भीषण हो जाता है."

बार्सिलोना में वर्ष 2018 में हीकीकोमोरी के मामलों के अध्ययन में मालागॉन-एमॉर ने पाया कि केवल 30 प्रतिशत लोगों में इंटरनेट का नशा दिखा.

लेकिन उन्हें ये भी पता चला कि यह समूह कम उम्र का था - सारे 190 मामलों की औसत उम्र 39 वर्ष थी लेकिन इंटरनेट के नशे के आदी लोगों की औसत उम्र केवल 24 थी.

वे कहती हैं, "जितना हम लोगों ने देखा है उसमें ये कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं लगता. लेकिन मेरा मानना है कि अगले कुछ वर्षों में सामाजिक एकाकीपन के उन मामलों में यह बहुत बड़ा रूप ले लेगा जिनमें इंटरनेट के नशे से ग्रस्त युवा लोग जुड़े हैं."

कातो कहते हैं कि प्रौद्योगिकी का असर कुछ और भी अधिक सूक्ष्म है. वे कहते हैं कि कम्प्यूटर गेम्स ने खेल की प्रकृति ही बदल डाली है.

अब बच्चे अप्रत्याशित असल दुनिया की तुलना में नियंत्रित आभासीय वातावरण में और अधिक समय व्यतीत कर रहे हैं.

साथ ही साथ इंटरनेट, स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया ने आमने-सामने की मुलाकात की तुलना में अप्रत्यक्ष सम्पर्क को और अधिक व्यापक बना दिया है.

कातो कहते हैं, "अब समाज में कोई खतरा या कोई सीधी बातचीत नहीं है. आसानी से रीसेट बटन दबाया जा सकता है और असफलता के अनुभव बहुत कम हैं."

उनका मानना है कि यह बच्चों के विकास के लिए हानिकारक है और इससे वे अन्तर वैयक्तिक संबंधों में कुछ कमजोर पड़ने लगे हैं. ठीक वैसे ही जैसे रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आपको धूल से संबंध जोड़ना ही होगा, उसी तरह स्वावलम्बन और लचीलापन विकसित करने के लिए आपको खतरा उठाना और असफलता का सामना करना ही पड़ेगा.

योकायोका रूम के रोगी बताते हैं कि वे इंटरनेट पर अपनी बात कहने में काफी स्वच्छन्दता अनुभव करते हैं. जब मैं उनसे इसका कारण पूछती हूं तो वे इंटरनेट की गुमनामी को सबसे ऊपर रखते हैं.

27 वर्षीय इचिका कहते हैं कि उन्हें इंटरनेट पर उपलब्ध अपनी ही शर्तों पर बातचीत करने की क्षमता बहुत पसंद आती है.

इस तरह की बातचीत की सीमाओं के बारे में भी लोगों को जानकारी है. 32 वर्षीय हिनाता को ऑनलाइन होने वाली बातचीत के सतही स्वभाव से चिंता होती है और यह भी चिंतित करता है कि आप कितनी आसानी से किसी भी टकराव से दूर हो सकते हैं.

वे कहते हैं, "आप हमेशा ऐसे लोगों से दोस्ती करना चाहेंगे जिनके विचार आपसे मिलते हों और जहां आप अपने विचार रखने में सहज अनुभव करें."

चोई का कहना है, "दुनियाभर में हीकीकोमोरी के बढ़ने के पीछे शत-प्रतिशत प्रौद्योगिकी नहीं हो सकती." लेकिन वे भी ऐसा सोचते हैं कि बिना असल दुनिया में जिए हुए खरीदारी कर लेना, खेलना और सामाजिक जीवन भी जी लेना सामाजिक एकाकीपन को बढ़ावा दे रहा है.

आमने-सामने का सम्पर्क, चाहे वह व्यक्ति से हो या वीडियोचैट पर हो, अवसाद के कम खतरे से संबंधित है, बजाए इसके कि फोन, ई-मेल या सोशल मीडिया पर सम्पर्क हों.

तियो कहते हैं कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने के लिए पर्याप्त शोध नहीं हुआ है. लेकिन उनकी सहजवृत्ति यही बताती है.

कई अध्ययनों में उनकी प्रयोगशाला ने पाया है कि फोन, ई-मेल और सोशल मीडिया के माध्यम से सम्पर्क में रहने की तुलना में आमने-सामने की बातचीत- चाहे वो व्यक्तिगत मुलाकात के माध्यम से हो या वीडियो चैट के जरिए- से अवसाद यानी डिप्रेशन का खतरा कम होता है.

वे कहते हैं, "मेरी और अन्य लोगों की शोध में ये संकेत मिलता है कि यदि आमने-सामने की बातचीत का स्थान ऑनलाइन संवाद ले लेती है तो समस्या उत्पन्न हो रही है."

संचार के तरीके

लेकिन तियो मानते हैं कि प्रौद्योगिकी या टेक्नोलॉजी में ही बुराईयां न देखना भी महत्वपूर्ण है. मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं की जड़ में सोशल मीडिया या ई-मेल नहीं हैं.

ये तो संचार तंत्र हैं जिनका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में प्रयोग हो सकता है. विशेष रूप से, इंटरनेट तो हीकीकोमोरी के एकाकी जीवन का एक झरोखा है.

पिछले वर्ष तियो और चीन के शोधकर्ताओं ने वी चैट और वीबो जैसे सोशल मीडिया ऐप का प्रयोग कर समाज से कटे किशोरों का सर्वेक्षण किया. सर्वेक्षण के 137 लोगों तक पहुंचने में प्रत्येक प्रतिभागी पर केवल 7.27 डॉलर का खर्च आया.

इन प्रतिभागियों की कुल संख्या का पांचवां हिस्सा इस दशा से आंशिक रूप से जूझ रहा था. इससे यही पता चलता है कि छुपे हुए मामलों तक पहुंचने के लिए यह एक सस्ता तरीका है.

ऑनलाइन और ऑफलाइन संसार में बढ़ता आपसी जुड़ाव भी हीकीकोमोरी को फिर से सामान्य जीवन का हिस्सा बनाने में मदद कर सकता है. वर्ष 2016 में कातो ने एक रोगी के मामले की रिपोर्ट छापी जो निंटेंडो के स्मार्टफोन गेम पोकीमॉन गो को डाउनलोड करने के बाद अचानक प्रतिदिन बाहर की सैर पर जाने लगा था.

इस गेम में आवर्धित वास्तविकता यानी ऑग्मेंटेड रियलिटी का प्रयोग कर डिजिटल जीवों को वास्तविक दुनिया में आवृत्त किया जाता है और खिलाड़ी जा-जा कर इन्हें एकत्र करता है.

कातो मानते हैं कि वास्तविक और आभासीय संसार के बीच इस तरह के पुल हीकीकोमोरी को अपने घरों से बाहर जाने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए प्रथम सम्पर्क साधना आसान बना सकते हैं, वह भी विशेष रूप से तब यदि इस गेम को उनकी आवश्यकतानुसार ढाला जा सके. जैसे कि इस गेम में हीकीकोमोरी सहायता केन्द्रों पर जीवों की जगह कीमती वस्तुओं का प्रकट होना.

उन्होंने जापानी कंपनी के साथ एक ऐसे रोबोट पर भी काम प्रारम्भ किया है जो एक नियंत्रत माहौल में हीकीकोमोरी को फिर से सामाजिक सम्पर्कों से मिलवाए.

हांगकांग में शोधकर्ताओं ने ऐसे ही एक उद्देश्य के लिए कुत्तों का प्रयोग सफलतापूर्वक किया है. वे कहते हैं कि यह एक उदाहरण हो सकता है लेकिन "जापानियों को तो रोबोट पसंद हैं."

टेक्नोलॉजी के साथ हीकीकोमोरी के संबंधों का उपयोग करने के लिए कम हाइटेक तरीके भी हो सकते हैं. टोक्यो के कियो विश्वविद्यालय के औषधीय विद्यालय के पीएचडी विद्यार्थी और सकारात्मक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ शिनीचिरो मात्सुगुमा ने हीकीकोमोरी को पुनर्स्थापित करने के लिए एक लाभ निरपेक्ष संस्था बनाई है जिसका नाम स्ट्रेंथ एसोसिएशन है.

कमियों के बजाय अपने सामर्थ्य पर ध्यान केन्द्रित करने वाले सकारात्मक मनोविज्ञान के सिद्धातों का प्रयोग कर उन्होंने 32 रोगियों को कोचिंग दी है/प्रशिक्षित किया है.

उनके अधिकतर रोगी वीडियोगेम खेलते हैं. इस कोचिंग में विशेष रूप से खेल शैली और प्रेरणा स्रोतों पर चर्चा होती है जिससे टीमवर्क यानी सामूहिक कार्य रणनीति या नेतृत्व जैसी क्षमताओं की पहचान हो सके.

वे बताते हैं, "अभिभावकों सहित कई लोग हीकीकोमोरी को ऐसा मानते हैं कि वह कुछ नहीं कर रही है. लेकिन मेरी दृष्टि में वे लोग वीडियोगेम के जरिए अपनी सामर्थ्य विकसित कर रहे होते हैं. मैं उनसे हमेशा कहता हूं कि आप वीडियोगेम खेलकर ऐसी क्षमता बना रहे हैं जिसका जीवन के अन्य क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है."

वे कहते हैं कि इन क्षमताओं को सुदृढ़ करने से न केवल स्वाभिमान में सुधार होता है बल्कि इससे अभिभावकों को भी रोगियों के समाज में पुनः प्रवेश के सर्वोत्तम मार्ग का ज्ञान होता है.

हालांकि इस तरीके का मूल्यांकन वैज्ञानिक रूप से अभी नहीं हुआ है लेकिन उनका कहना है कि लगभग 80 प्रतिशत लोगों ने स्कूल, विश्वविद्यालय या व्यावसायिक प्रशिक्षण अपनाने जैसा समाज से दोबारा जुड़ने का पहला कदम उठा लिया है.

परोक्ष परामर्श

हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि प्रत्यक्ष सामाजिक सम्पर्क और गहन चिकित्सा का कोई विकल्प नहीं है. फुकुओका सिटी मेंटल हेल्थ एंड वेलफेयर सेंटर चलाने वाले चिकित्सकीय मनोवेज्ञानिक योको होंडा बताती हैं कि देश की सरकार हीकीकोमोरी को परोक्ष परामर्श देने के लिए उन लोगों को सोशल मीडिया का प्रयोग करने को कहती है. लेकिन अब तक उन्होंने इसका विरोध किया है.

वे इस बात से सहमत हैं कि ये तरीका नये रोगियों के लिए लाभप्रद हो सकता है लेकिन वे कहती हैं, "अपनी उत्कंठा या भावना प्रकट करने के लिए केवल एक ट्वीट काफी नहीं है."

साइकोथैरेपी यानी मनोउपचार और दवाईयों के माध्यम से कसी भी मनोरोग का उपचार करने के अलावा इन लोगों की रणनीति में अशांत घरेलू माहौल को ठीक करने के लिए पारिवारिक प्रशिक्षण देना भी एक मुख्य अंग है. योकायोका कक्ष भी उन लोगों को एक सुरक्षित स्थान देता है जो लोग ठीक होने की राह पर चल निकले हैं.

यहां वे अपने ही जैसे अन्य से मिलते हैं तथा सामाजिक ताने-बाने के गुर फिर से सीखते हैं. लेकिन योको होंडा का कहना है कि मामलों की विभिन्नता के कारण उनका उपचार कठिन हो जाता है.

वे कहती हैं, "हमारी उम्मीद है कि हम इन सभी हीकीकोमोरी को उनकी आवश्यकता के अनुसार मदद दे सकें. लेकिन हमें इसके लिए बहुत मेहनत और बहुत समय की आवश्यकता है."

यही बात बार्सिलोना के हीकीकोमोरी पर 12 महीने के अपने अध्ययन के दौरान मैलागॉन-एमॉर को मालूम हुई.

घर पर या अस्पताल में गहन उपचार पाने वाले लोगों ने सबसे बढ़िया नतीजे दिए जो रोगी अस्पताल से बाहर रहकर अपना उपचार करा रहे थे. उनमें उपचार बीच में छोड़ने तथा और अधिक एकाकीपन की संभावना दिखी. वे कहती हैं, "ये अधिक नाजुक रोगी हैं."

यह अभी अस्पष्ट है कि पश्चिमी देशों को इस तरह के रोगियों की सुनामी से निपटने के लिए तैयारी करनी चाहिए या नहीं. लेकिन सामाजिक एकाकीपन अवसाद से लेकर पीटीएसडी जैसी अन्य दशाओं की भी विशेषता हो सकती है.

इसलिए मैनागॉन-एमॉर मानती हैं कि पश्चिमी देश जापानी अनुभव से काफी कुछ सीख सकते हैं.

तियो को आशा है कि इस रोग की व्यापकता के बावजूद हीकीकोमोरी पर हो रहा शोध हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सामाजिक सम्पर्क की महत्ता की हमारी समझ को विस्तार देगा.

वे कहते हैं, "जब मैं किसी हीकीकोमोरी के अभिभावकों से बात करता हूं तो मुझे यह बात स्पष्ट समझ आती है कि सामाजिक एकाकीपन बहुत बड़े नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है- यह उस व्यक्ति से लेकर उसके परिवार और अन्य लोगों को भी झकझोर देता है. हमने चिकित्सा जगत में सामाजिक सम्पर्कों से संबंधित समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है. और अब मेरा मानना है कि हीकीकोमोरी के कारण एकाकीपन पर बढ़ते हुए हमारे ध्यान के साथ ही हमने इन मुद्दों को स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे के रूप में लेना शुरू कर दिया है. और यह बात अच्छी है."

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