भारत का परमाणु सपना समंदर की रेत से पूरा होगा?

    • Author, एड जेंट
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

भारत के समुद्री तटों का ख़याल आते ही चटख धूप में और भी चमकीली हो उठी रेत और किनारों पर सिपाही की तरह खड़े ताड़ के चितकबरे पेड़ों की तस्वीर उभरती है.

ख़याल आता है तीखी फ़िश करी का और लंबे बालों वाले विदेशी सैलानियों का.

मगर, भारत के समुद्री तटों पर एक ख़ास राज़ भी छुपा है. इन तटों पर जो रेत है, उसमें भविष्य के भारत की रफ़्तार छुपी हो सकती है.

रेत में पाया जाता है रेडियोएक्टिव तत्व थोरियम. थोरियम के बारे में कहा जाता है कि ये साफ़, सुरक्षित एटमी ईंधन है.

भारत लंबे वक़्त से थोरियम के इस ख़ज़ाने का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है.

माना जाता है कि देश के समुद्र तटों पर तीन लाख से साढ़े आठ लाख टन तक थोरियम है.

यानी ये दुनिया भर में थोरियम का सब से बड़ा ख़ज़ाना है. लेकिन, इस क़ुदरती ख़ज़ाने का इस्तेमाल करने की रफ़्तार बहुत ही धीमी है.

अब जबकि पूरी दुनिया एटमी ऊर्जा बनाने की नई तकनीक पर काम कर रही है, तो, एक बार फिर थोरियम के इस ख़ज़ाने पर नज़र है.

पिछले ही साल नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने थोरियम से चलने वाले एटमी रिएक्टर को चालू किया था.

पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ था. कई नई कंपनियां हैं, जो थोरियम वाले रिएक्टर में निवेश कर रही हैं.

पिछले ही साल, चीन ने भी 3.3 अरब डॉलर के निवेश से थोरियम से चलने वाले रिएक्टर विकसित करने का एलान किया था.

थोरियम के समर्थक कहते हैं कि इससे कार्बन मुक्त ईंधन मिलेगा. इससे निकलने वाला एटमी कचरा भी कम ख़तरनाक होगा.

थोरियम से चलने वाले रिएक्टर के हादसे के शिकार होने की आशंका भी कम होगी. ये भी कहा जाता है कि थोरियम से एटम बम बनाना भी बहुत मुश्किल होगा.

तेज़ी से बढ़ती आबादी

पर, थोरियम से बिजली बनाने का सफ़र बहुत लंबा भी है और अनिश्चित भी.

अब तक इससे बिजली बनाने की ठोस और क़ाबिल-ए-ऐतबार तकनीक विकसित नहीं हुई है.

फिर, इसके मुक़ाबले सोलर एनर्जी और विंड एनर्जी में कम निवेश से ज़्यादा मुनाफ़ा भी दिख रहा है.

अब जब थोरियम से बिजली बनाने की तकनीक विकसित ही नहीं हुई, तो वो सुरक्षित होगी या नहीं, ये सवाल भी उठाया जा रहा है.

थोरियम के इस्तेमाल की भारत की कोशिश ऐतिहासिक और भौगोलिक वजहों से ख़ास रही है.

कुछ लोग मानते हैं कि कभी न कभी तो थोरियम से बिजली बनाने की मुहिम रंग लाएगी ही. और हमें ऐसा स्रोत चाहिए, जो सस्ती बिजली सब को मुहैया करा सके.

देश की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. कहा जा रहा है कि 2060 तक भारत की जनसंख्या 1.7 अरब हो जाएगी.

यानी दुनिया की कुल आबादी का पाँचवां हिस्सा भारत में होगा. इतनी बड़ी जनसंख्या को बिजली मुहैया कराना छोटी चुनौती नहीं है.

यूरेनियम बहुत कम

साल 2012 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के सचिव रहे श्रीकुमार बनर्जी कहते हैं कि 'भारत बिजली का भूखा देश है. अगर हमें सब को बिजली उचित क़ीमत पर पहुंचानी है, तो हमें देसी स्रोतों से बिजली निकालना सीखना ही होगा.'

आज जितने भी परमाणु बिजली घर हैं, वो यूरेनियम से चलते हैं. इसकी बड़ी वजह ये रही है कि पश्चिमी देशों ने जब एटमी ऊर्जा की खोज की, तो वो बम बनाकर तबाही मचाने के लिए की थी.

यूरेनियम से एटम बम बनाना सब से आसान था.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ज्योफ़ पार्क्स कहते हैं कि '1950 के दशक में हमारे सामने दो रास्ते थे. एक तो यूरेनियम से एटमी बिजली बनाने का. दूसरा थोरियम से. पश्चिमी देशों ने यूरेनियम को चुना. अगर उस वक़्त थोरियम से बिजली बनाने का रास्ता चुना गया होता, तो आज हालात अलग होते. मगर ऐसा हुआ नहीं.'

भारत के पास यूरेनियम बहुत कम था.

इसीलिए देश के एटमी कार्यक्रम के जनक होमी जहांगीर भाभा ये मानते थे कि आख़िर में भारत को थोरियम वाले रास्ते पर ही चलना होगा.

आज भी भारत की परमाणु ऊर्जा नीति भाभा के दिखाए रास्ते पर ही चल रही है.

थोरियम अपने आप से विस्फोट नहीं होता. वैज्ञानिक भाषा में इसे फिशन कहते हैं.

मतलब ये कि किसी परमाणु का केंद्र यानी न्यूक्लियस फूट जाता है. उससे जो ऊर्जा निकलती है, उसी से बिजली बनाई जाती है.

थोरियम को अगर यूं ही पड़ा रहने दिया जाए, तो, इसका क्षरण भी धीरे-धीरे होता है.

इससे इतना भी रेडिएशन नहीं होता कि इंसान की चमड़ी को भेद सके.

यही वजह है कि समुद्र तट की रेत में भारी तादाद में थोरियम होने के बावजूद वहां मस्ती करने वाले बेफ़िक्र होते हैं.

थोरियम को एटमी ऊर्जा का ईंधन बनाने के लिए इसे प्लूटोनियम से मिलाना पड़ता है. तब इसके परमाणु से ऊर्जा निकलती है, जिससे बिजली बनाई जा सकती है.

जब प्लूटोनियम को थोरियम से मिलाया जाता है, तो थोरियम के एटम यूरेनियम के कण यू-233 में तब्दील हो जाता है, जिसे जलाकर परमाणु बिजली बनती है.

कामयाबी की गारंटी

श्रीकुमार बनर्जी के बाद परमाणु ऊर्जा सचिव बने रतन कुमार सिन्हा कहते हैं कि थोरियम गीली लकड़ी की तरह है.

इससे सीधे आग जलाना बहुत मुश्किल है. लेकिन, जब आप इसे पहले से दहक रही भट्टी में डालते हैं, तो गीली लकड़ी भी जलने लगती है.

तो, भारत की कोशिश ये है कि थोरियम के इस ख़ज़ाने को फिसाइल मैटीरियल यानी ज्वलनशील परमाणु ईंधन में तब्दील करे.

पहले परंपरागत परमाणु ऊर्जा प्लांट में यूरेनियम जलाने से प्लूटोनियम का कचरा बनता है. फिर इसे और यूरेनियम में मिलाकर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में डाला जाता है.

इससे और प्लूटोनियम निकलता है. इसके बाद कुछ और ब्रीडर रिएक्टर बनाए जाते हैं. तब जाकर थोरियम को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा.

होमी जहांगीर भाभा ने अपने देश के थोरियम के ख़ज़ाने के इस्तेमाल का सपना देखा था, उसे पूरा करना मुश्किल साबित हुआ है.

पश्चिमी देशों ने एटमी बिजली बनाने की जो तकनीक विकसित की है, वो यूरेनियम पर केंद्रित है. फिर, भारत ने एनपीटी पर दस्तख़त भी नहीं किए.

इससे हुआ ये कि थोरियम से बिजली बनाने की भारत की कोशिश, दुनिया की इकलौती आवाज़ ही बन कर रह गई है.

साल 2008 में भारत और अमरीका के बीच हुई एटमी डील से भारत की राह आसान तो हुई है. लेकिन, ब्रीडर रिएक्टर का दूसरा चरण विकसित करने में कई दशक लग गए हैं.

1985 में पहले प्रायोगिक ब्रीडर रिएक्टर का परीक्षण किया गया था. आज तक इससे 40 मेगावाट बिजली भी नहीं बनाई जा सकी है.

हमारे देश का 500 मेगावाट क्षमता वाला फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इस साल चालू होने की संभावना है.

हालांकि इसे 2010 में ही शुरू हो जाना चाहिए था. अभी इसकी कामयाबी की गारंटी भी कोई नहीं लेने वाला है.

प्लूटोनियम की ज़रूरत

फिर, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की क्षमता के विस्तार से पहले भारत को इसे बिना किसी हादसे के चलाने के लिए तजुर्बेकार होना पड़ेगा.

श्रीकुमार बनर्जी कहते हैं कि इसमें एक दशक लग जाएंगे. तब जाकर प्लूटोनियम निकलना शुरू होगा.

इसी बुनियाद पर पहले कई प्लूटोनियम रिएक्टर लगाए जाएंगे. तब कहीं जाकर थोरियम से बिजली बनाने की कोशिश होगी.

दिक़्क़त ये भी है कि प्लूटोनियम रिएक्टर के बाई प्रोडक्ट यानी यू-232 से ख़तरनाक गामा किरणें निकलती हैं.

इन्हें क़ाबू करने में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर को कामयाबी तो मिली है, लेकिन अभी ये प्रयोग के स्तर पर ही हुआ है.

थोरियम से बिजली बनाने के भारत के देसी रिएक्टर का डिज़ाइन तैयार है. इसे एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर यानी एएचडब्ल्यूआर कहा जाता है.

हालांकि इसके निर्माण पर अभी काम शुरू होने की उम्मीद नहीं है.

इस रिएक्टर का डिज़ाइन तैयार करने वाले रतन कुमार सिनाह कहते हैं कि ये भारत की परमाणु ऊर्जा नीति के तीसरे चरण से मेल नहीं खाता.

इसे प्लूटोनियम की ज़रूरत होगी, ताकि थोरियम से बिजली बनाई जा सके.

तीसरे स्टेज का ये रिएक्टर जब भी बनेगा तब ये सीधे थोरियम का ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करेगा.

जिस तर्ज पर भारत ने इस रिएक्टर का डिज़ाइन तैयार किया है, उसी तर्ज पर पश्चिमी देश और चीन भी भविष्य के रिएक्टर विकसित कर रहे हैं.

भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से जुड़े लोग कहते हैं कि 2050 के दशक से पहले भारत के थोरियम से बिजली बनाने की उम्मीद कम ही है.

घाटे का सौदा

ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एम वी रमन्ना ने भारत की एटमी नीति पर कई किताबें लिखी हैं, रमन्ना कहते हैं कि, 'थोरियम की बातें तो पिछले 70 साल से हो रही हैं. लेकिन हमेशा इसके भविष्य की बात ही होती आई है. अभी भी सब कुछ भविष्य के गर्त में ही है.'

रमन्ना के मुताबिक़ परंपरागत तरीक़े से परमाणु बिजली बनाना पहले ही महंगा साबित हो रहा है.

ऐसे में थोरियम से चलने वाले रिएक्टर विकसित करने में निवेश करना बेवक़ूफ़ी होगी.

हालांकि थोरियम के समर्थक कहते हैं कि थोरियम से जितनी बिजली बनाई जा सकेगी, उससे इसकी तकनीक विकसित करने का निवेश घाटे का सौदा नहीं होगा.

थोरियम के हक़ में सब से बड़ी बात जो कही जाती है कि वो सुरक्षित है. लेकिन रमन्ना कहते हैं कि, 'चेर्नोबिल और फुकुशिमा के बारे में यही दावे किए गए थे कि वो सुरक्षित हैं.'

थोरियम का आइसोटोप यू232 तो बहुत ख़तरनाक है. लेकिन, लंबे वक़्त तक रखे रहने के बाद इससे जो रेडिएक्टिव विकिरण निकलता है, वो कम नुक़सानदेह होता है.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के ज्योफ़ पार्क्स कहते हैं कि अगर हम सुदूर भविष्य की बात करें, तो थोरियम के कचरे से निपटना कम मुश्किल होगा.

लेकिन, ये कोई बड़ा फ़ायदा नहीं कि थोरियम में भारी निवेश किया जाए. शायद थोरियम की सब से बड़ी ख़ूबी ये है कि इससे एटमी हथियार बनाना बहुत मुश्किल है.

लेकिन, इससे बिजली बनाने की प्रक्रिया इतनी पेचीदा है कि मुनाफ़ा, घाटे का सौदा दिखने लगता है.

जेएनयू में भौतिकी के प्रोफ़ेसर रामामूर्ति राजारमन कहते हैं कि, 'असल में थोरियम को देश के गौरव से जोड़ कर देखा जाता है. होमी भाभा ने इसे आत्मनिर्भरता का ज़रिया बताया था. भारत ने एटमी मामले में कई दशक तक अछूत देश का दंश झेला है. यही वजह है कि यहां की परमाणु ऊर्जा नीति में थोरियम से बिजली बनाने की बात अहम है.'

ऊर्जा नीति

भारत में बिजली की खपत बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. देश की कोशिश ये है कि ये डिमांड कोयले के कम से कम इस्तेमाल से पूरी हो.

पूरी तस्वीर में एक छोटा हिस्सा नवीनीकृत ऊर्जा का भी है, यानी सोलर एनर्जी और पवन ऊर्जा.

भारत 2022 तक 175 गीगावाट बिजली पैदा करने की कोशिश में जुटा है. विंड एनर्जी के मामले में भारत दुनिया में चौथा बड़ा देश है, तो सोलर एनर्जी में पांचवीं पायदान पर है.

मशहूर परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर कहते हैं कि 'पवन और सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना मुश्किल है. एटमी बिजली ही देश की बिजली की ज़रूरतें पूरी करने का इकलौता ज़रिया है, जिसमे प्रदूषण कम होगा. भारत को थोरियम से बिजली बनाने की दिशा में बढ़ना ही होगा.'

किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता कितनी अहम है, ये विवाद का विषय है.

लेकिन, जब होमी भाभा ने भारत की परमाणु ऊर्जा नीति बनाई थी, तब दुनिया के हालात अलग थे.

यूरेनियम के बड़े भंडारों का पता नहीं था. लगता ये था कि जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी, यूरेनियम हासिल करना महंगा और मुश्किल होता जाएगा.

पर, आज दुनिया में एटमी पावर प्लांट बंद हो रहे हैं. यूरेनियम की मांग घटी है और इसके नए स्रोत खोज निकाले गए हैं.

माना जाने लगा है कि पहले जितना सोचा गया था उससे कहीं ज़्यादा यूरेनियम के भंडार धरती पर हैं.

ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर विलियम नुटाल ऊर्जा नीति के विशेषज्ञ हैं.

प्रोफ़ेसर नुटाल कहते है कि आज यूरेनियम बड़े आराम से मिल जाता है. प्रोफ़ेसर नुटाल मानते हैं कि ऐतिहासिक रूप से भारत का थोरियम से बिजली बनाने का ख़्वाब आत्मनिर्भरता से जुड़ा है.

वो ये भी कहते हैं कि एटमी ऊर्जा, किसी और तरीक़े से बिजली बनाने के मुक़ाबले कम प्रदूषण करती है. मगर इसके फ़ायदे पूरी तरह से साबित नहीं हो सके हैं.

वैसे, भारत केवल थोरियम से बिजली बनाने पर ध्यान दे रहा हो, ऐसा भी नहीं है. सौर और पवन ऊर्जा आज देश की ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा हैं.

तकनीक में निवेश

हाल ही में सरकार ने 12 हेवी वाटर रिएक्टर बनाने को मंज़ूरी दी है.

देश में 22 ऐसे रिएक्टर पहले से चालू हैं, जब कि 9 पर काम चल रहा है.

भारत की कोशिश रूस, फ्रांस और अमरीका से रिएक्टर के डिज़़ाइन हासिल करने की भी है.

ज्योफ़ पार्क्स मानते हैं कि थोरियम को लेकर भारत का ख़्वाब बचकाना भी नहीं है. बल्कि इस बात की तारीफ़ होनी चाहिए कि भारत ने 70 साल पहले जो योजना बनाई थी वो आज भी उस पर अडिग हैं. ब्रिटेन में ऐसा नहीं हुआ.

अनिल काकोदकर मानते हैं कि पश्चिमी देशों के लिए थोरियम में दिलचस्पी न दिखाने की बड़ी वजह है.

इन देशों में बिजली की मांग में बहुत तेज़ी से बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है. फिर वो कई दशकों से यूरेनियम से एटमी बिजली बना रहे हैं.

ऐसे में उन्हें थोरियम की तकनीक में निवेश फ़ायदे का सौदा नहीं दिखता.

विकसित देशों के मुक़ाबले भारत जैसे विकासशील देश में बिजली की मांग बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. फिर, थोरियम से परमाणु हथियार बनाना भी मुश्किल है.

काकोदकर कहते हैं कि, 'अगर आप कार्बन मुक्त विश्व चाहते हैं, तो बिना परमाणु ऊर्जा के वो मुमकिन नहीं है. परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता बढ़ाने के लिए आख़िर में आप को थोरियम पर आना ही होगा. किसी न किसी को तो इस बदलाव की अगुवाई करनी ही होगी. हम भारत के लोग यही कर रहे हैं.'

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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