कॉफ़ी पीने वालों को डरा रही है यह बीमारी

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- Author, जोस लुइस पेनारेडोन्डा
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अगर आप कॉफ़ी के शौक़ीन है, तो आपके लिए बुरी ख़बर है. एक बीमारी है, जो आपके शौक़ पर बुरी नज़र डाल रही है.
ये ऐसी बीमारी है, जो कॉफ़ी के पौधों को अपनी चपेट में ले रही है. तो आपके कॉफ़ी के शौक़ को पूरा करने के लिए ज़रूरी है कि इस बीमारी को समझा और फिर इस पर क़ाबू पाया जाए.
लैटिन अमरीकी देश कोलंबिया दुनिया में कॉफी पैदा करने वाला तीसरा बड़ा देश है. ये देश बड़े पैमाने पर दुनिया के दीगर मुल्कों को कॉफी निर्यात करता है. बीते साल ही कोलंबिया ने क़रीब दो अरब डॉलर से ज़्यादा की कॉफी निर्यात की थी.
अकेले कॉफ़ी ही कोलंबिया के कुल निर्यात का 7.7 फ़ीसद है. लेकिन हो सकता है कि आने वाले दिनों में कोलंबिया से कॉफ़ी का निर्यात बंद हो जाए. अगर ऐसा हुआ तो दुनिया भर में कॉफ़ी के शौक़ीनों को अपनी जेब ज़्यादा ढीली करनी पड़ेगी.

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पौधे की पत्तियों पर जंग
दरअसल कोलंबिया में कॉफ़ी के पौधे एक ख़ास क़िस्म की बीमारी का शिकार हो रहे हैं. इस बीमारी में पौधे की पत्तियों पर जंग की रंगत वाली परत जम जाती है. और धीरे-धीरे पूरे पौधे को कत्थई रंग का बना देती है. फिर पौधों की पत्तियां तेज़ी से झड़ने लगती है और कुछ समय बाद कॉफ़ी के बीज उगना बंद हो जाते हैं.
अब तक की गई रिसर्च के मुताबिक़ कॉफ़ी के पौधे को ये बीमारी हेमेलिया वास्त्रिक्स नामक फफूंद की वजह से होती है. हालांकि कोलंबिया में पौधों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर रिसर्च जारी है. लेकिन अभी तक इस बीमारी की सही वजह पता नहीं चल पाई है.
अगर पौधों में ये बीमारी यूं ही फैलती रही तो बहुत जल्द कोलंबिया में कॉफी की पैदावार ख़त्म हो जाएगी. ठीक उसी तरह जैसा उन्नीसवीं सदी में श्रीलंका और फिलीपींस में हुआ था.
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कॉफी के पौधों की कमी के चलते ही अंग्रेज़ों ने अब चाय पीना शुरू कर दिया है. श्रीलंका ने भी अब कॉफी की जगह चाय की खेती शुरू कर दी है.

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'द ब्यूटी' ऐंड 'द बीस्ट'
कोलंबिया में दो क़िस्म की कॉफ़ी पैदा होती है. एक का नाम है 'द ब्यूटी' और दूसरी का नाम है 'द बीस्ट'. द ब्यूटी कॉफ़ी की ख़ुशबू ज़्यादा अच्छी होती है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी मांग भी ज़्यादा है.
कोलंबिया कॉफ़ी की इसी क़िस्म का निर्यात सबसे ज़्यादा करता है. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि 'द ब्यूटी' कॉफी के पौधे ही सबसे ज़्यादा बीमारी का शिकार हो रहे हैं.
हालांकि 'द बीस्ट' भी अच्छी कॉफी मानी जाती है. ये सस्ती होती है और इसकी खेती भी आसान होती है. लेकिन 'द ब्यूटी' के आगे ये कॉफ़ी टिक नहीं पाती.
कॉफ़ी के पौधों में पनपने वाली इस अनजान बीमारी की वजह जानने के लिए कोलंबिया ने 1960 में एक रिसर्च लैब बनायी थी. इसका नाम सिनेकैफ़े रखा गया. इस लैब को कोलंबिया के लगभग सभी कॉफी उत्पादकों ने मिलकर बनाया था.

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नई क़िस्म के कॉफी के पौधे
इस लैब के टेक्निकल डायरेक्टर हर्नेन्डो का कहना है कि उनकी रिसर्च की बदौलत ही नई क़िस्म के कॉफी के पौधे उगाए गए हैं. इससे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाज़ारों को फ़ायदा हुआ है.
कोलंबिया में रिसर्चर ये बात जान गए थे कि 'द ब्यूटी' और 'द बीस्ट' को मिलाकर कोई और नस्ल नहीं बनाई जा सकती. लिहाज़ा उन्होंने 1927 में एक हाइब्रिड नस्ल की कॉफी पैदा की जिसे 'टीमोर' नाम दिया गया.
1940 तक इसकी खेती बड़े पैमाने पर होने लगी. इस कॉफ़ी के बीजों में 'द बीस्ट' के बीजों की तरह बीमारी से लड़ने की क्षमता थी. धीरी-धीरे कॉफी का उत्पादन करने वाले दूसरे देशों ने भी इस तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया. लेकिन ज़ायक़े में ये कॉफ़ी ज़्यादा लज़ीज़ नहीं थी. नतीजतन इसका कारोबार बहुत फल नहीं पाया.

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किस कॉफ़ी की बहुत है मांग?
सिनेकैफे के रिसर्चरों ने अपनी कोशिश जारी रखी. 1980 में आखिरकार उन्हें वो पौधा मिल ही गया जो 'द ब्यूटी' नस्ल की कॉफ़ी के टक्कर का था. इसे नाम भी 'कोलंबिया' ही दिया गया. आज अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसकी ख़ूब मांग है.
दरअसल 'हेमेलिया वास्त्रिक्स' फफूंद एक ख़तरनाक क़िस्म की फफूंद है. ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ पारंपरिक कॉफी को ही अपना शिकार बनाती है. बल्कि कॉफी की हाईब्रिड नस्लों को भी अपनी चपेट में लेती है.
हालांकि कोलंबिया हाइब्रिड नस्ल में इस फफूंद से लड़ने की क़ुव्वत ज़्यादा है. फिर भी ये प्रजाति इससे अछूती नहीं है. कुछ रिसर्चर मानते हैं कि जब ठंड बढ़ती है तो पत्तियों पर इस फफूंद के हमले का ख़तरा कुछ कम हो जाता है. लेकिन एक बार जब ये फफूंद किसी पौधे में लग जाती है तो फिर नतीजे घातक होते हैं.
सिनेकैफे नई तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कॉफी की बहुत सी नई क़िस्में पैदा करने में लगा है. 2005 में उन्होंने कॉफी का एक नया बीज खोजा जिसका नाम है 'कास्तिलो'. इस बीज का नाम इसे खोजने वाले वैज्ञानिक के नाम पर ही रखा गया है. 'कोलंबिया' बीज के बाद खोजा जाने वाला ये दूसरा ऐसा कॉफी बीज है जिसे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पसंद किया गया.

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...तो कॉफ़ी पर नहीं होगा किसी बीमारी का असर
2016 में एक और बीज खोजकर्ताओं ने बाज़ार को दिया. इसका नाम है 'सिनेकेफे-1'. इस बीज में बहुत सी बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि बहुत जल्द वो कॉफी के ऐसे बीज खोज लेंगे जिन पर किसी बीमारी का असर नहीं होगा.
कोलम्बिया में कॉफ़ी का व्यापार बड़े पैमाने पर होता है. देश के क़रीब साढ़े सात लाख लोग इससे जुड़े हैं. कॉफ़ी की खेती अगर ख़त्म होती है, तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर लोग बेरोज़गार हो जाएंगे. लिहाज़ा अगर हाइब्रिडड कॉफ़ी बाज़ार में जगह बना लेती है तो इन छोटे मज़दूरों के सामने रोज़ी रोटी का संकट खड़ा नहीं होगा.
इसके अलावा कॉफ़ी की खेती करने वालों का अपने खेत में उगने वाले पौधों और बीजों से जज़्बाती जुड़ाव हो जाता है. वो अपने पौधों के मिज़ाज को समझने लगते हैं. जब उनके खेतों में पारंपरिक पौधों के साथ हाइब्रिड पौधे लगाए गए तो उन्हों ने इन पौधों की देखभाल ठीक वैसे ही की जैसे कोई अपने घर में मेहमान की करता है.

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कॉफ़ी की खेती से क्यों कतराते हैं किसान?
कॉफ़ी की खेती में पहले मोटा पैसा लगाना पड़ता है. कई सालों के बाद जब बीज अच्छी मात्रा में होने लगते हैं, तब कहीं कमाई होना शुरू होती है. इसीलिए बहुत से लोग इस कारोबार में पैसा लगाने से कतराते हैं.
लेकिन जिन किसानों का पेशा सिर्फ़ कॉफ़ी की खेती है उन्हें कोलंबिया सरकार की कॉफ़ी फेडरेशन फेडकैफ़े लोन देती है. किसानों को सस्ते बीज भी मुहैया कराए जाते हैं. साथ ही उन्हें कॉफ़ी की खेती की आधुनिक तकनीक भी दी जाती है.
कोलंबिया में कॉफ़ी का कारोबार और खेती बचाने की कई स्तर पर कोशिशें की जा रही हैं. बहुत हद तक इस दिशा में कामयाबी भी मिल गई है, लेकिन फिर भी पौधों में बीमारी फैलने ख़तरा हमेशा बना रहता है.
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