दिल धड़कने का मतलब हमेशा इश्क़ नहीं होता

    • Author, डेविड रॉबसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

इंसान तमाम तरह के जज़्बात महसूस करता है. प्यार, ग़ुस्सा, नफ़रत, फ़िक्र. हर जज़्बे के हिसाब से हमारे शरीर में बदलाव आते हैं. ख़ुश होने पर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. ग़ुस्सा होने पर त्योरियां चढ़ जाती हैं.

कई बार हमारे शरीर के लक्षण ऐसे संकेत देते हैं कि हम जज़्बातों को लेकर धोखा खा जाते हैं. एक से एक तजुर्बेकार लोग समझ नहीं पाते कि आख़िर उनका दिमाग़ क्या महसूस कर रहा है.

कुछ ऐसा ही हुआ अमरीका की मनोवैज्ञानिक लिज़ा फेल्डमैन के साथ. एक रोज़ वो लैब में घंटों काम करने के बाद उकता गई थीं. एक साथी ने डेट पर जाने का ऑफ़र दिया. लिज़ा को वो शख़्स कुछ ख़ास पसंद नहीं था. मगर उन्होंने सोचा कि वक़्त बिताने में क्या हर्ज़ है. सो वो उस आदमी के साथ कॉफ़ी पीने चली गईं.

कॉफ़ी शॉप में बैठे-बैठे बतियाते हुए लिज़ा को ये एहसास होने लगा कि ये शख़्स इतना भी बुरा नहीं. इसके साथ एक और डेट पर तो जाया ही जा सकता है. वजह, उनके शरीर के लक्षण थे. पेट में उमड़-घुमड़ हो रही थी. सिर भारी लग रहा था. जैसे जज़्बात का तूफ़ान आया हुआ हो.

बीमार होने के संकेत

घर आते-आते उनकी ऐसी ही हालत थी. लेकिन घर पहुंचने पर उन्हें चक्कर आने का सिलसिला तेज़ हो गया. उन्हें उल्टियां होने लगीं. आख़िरकार लिजा को एहसास हुआ कि असल में तो उन्हें वायरल हुआ था. जिसे वो जज़्बात का तूफ़ान आना समझ रही थीं, असल में वो बीमार होने के संकेत थे.

लिज़ा फ़ील्डमैन अमरीका के बॉस्टन शहर में स्थित नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान पढ़ाती हैं. उन्होंने कई साल इंसान के जज़्बात पर रिसर्च की है. लिज़ा ने अपने रिसर्च और तजुर्बों की बुनियाद पर एक क़िताब लिखी है-'हाऊ इमोशन्स आर मेड.'

हम कई बार ये सोचते हैं कि कोई बात हम बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं. बहुत तेज़ ग़ुस्सा आता है. किसी बात की फ़िक्र सवार हो जाती है. कुछ बीमारियों के लक्षण भी जज़्बात के तूफ़ान आने जैसे संकेत देते हैं.

इस पर किताबें भी लिखी गईं

लिज़ा अपनी क़िताब में इस बात की पुरज़ोर वक़ालत करती है कि हमें अपने शरीर के संकेत समझने में ज़्यादा समझदारी दिखाने की ज़रूरत है. वो कुछ तरीक़े भी बताती हैं जिनसे जज़्बात पर क़ाबू पाया जा सकता है.

दिलचस्प बात ये है कि इंसानी भावनाओं पर ये ताज़ा रिसर्च पुरानी थ्योरी से बिल्कुल अलहदा है. उन्नीसवीं सदी में मशहूर वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने जज़्बात पर भी एक क़िताब लिखी थी- 'द एक्सप्रेशन ऑफ़ इमोशन्स इन मैन ऐंड एनिमल.'

डार्विन की थ्योरी के मुताबिक़ हम कुछ ख़ास शारीरिक संकेतों से अपने जज़्बात का इज़हार करते हैं. जैसे चेहरे के हाव-भाव, दिल की धड़कन बढ़ना घटना या बदन में ऐंठन होना.

अब लिज़ा के साथ ऐसा ही तो हुआ था. जब उन्होंने अपने शरीर में हो रहे बदलाव को अपने साथी के प्रति जज़्बात उमड़ने का भाव समझा था. जबकि सच ये था कि वो बीमार हो रही थीं.

डार्विन का कहना था कि 'इंसान अपने जज़्बात का फिंगर प्रिंट छोड़ता है.' लेकिन लिज़ा का मानना है कि ऐसा कुछ नहीं होता. हर जज़्बा कई तरह से ज़ाहिर होता है. कई बार दिमाग़ संकेतों का घालमेल कर जाता है.

हालात के मुताबिक़ आए बदलाव से हम कई बार जैसे फ़िक्र महसूस करते हैं, कुछ वैसा ही उत्साहित होने पर होता है.

यानी लिज़ा की मानें तो हमारे जज़्बात महसूस करने पर बड़ा असर हालात और माहौल का होता है.

लिज़ा ने इसे समझने के लिए अपने बच्चे के जन्मदिन पर एक पार्टी दी थी. ये बच्चों की पिज़्ज़ा पार्टी थी. मगर पिज़्ज़ा उन्होंने ऐसा बनाया था कि दिखने में भद्दा सा लगे.

जो जूस उन्होंने बच्चों के पीने के लिए रखा था, उसे लैब में पेशाब का सैंपल लेने वाले फ्लास्क में रखा था. इसी तरह जो सलाद लिज़ा ने पार्टी में रखा था, उसे डायपर का आकार दे दिया था.

नतीजा ये हुआ कि पार्टी में आए लोगों ने उसे खाने से इनकार कर दिया. सब को मालूम था कि ये खाने की चीज़ें ही हैं. ये साफ़-सुथरी हैं. बस, इन्हें पेश इस तरह से किया गया है. मगर किसी का खाने का मन नहीं हुआ. सब को खाने को देखकर घिन आ रही थी.

लिज़ा का कहना है कि बच्चों के डायपर देखकर उन्हें घिन जैसा महसूस हो रहा था, इसी वजह से खाने का मन नहीं हुआ.

लिज़ा का कहना है कि अक्सर हमारे जज़्बात हालात पर रिएक्शन होते हैं. जैसे पेट में ऐंठन को हम किसी के लिए मोहब्बत का जज़्बा उठना मान लेते हैं. ख़ुद लिज़ा के साथ डेट पर जाने का यही तजुर्बा हुआ था. लेकिन असल में वो बीमारी के संकेत थे. लेकिन दिमाग़ तो डेट पर जाने के हालात के हिसाब से महसूस कर रहा था. सो बीमारी के संकेत को उसने मोहब्बत के जज़्बे का उफ़ान समझा.

पैदाइशी तौर पर नहीं लक्षण

पेट दर्द आप के पेट में इन्फेक्शन का संकेत भी हो सकता है. आप परिवार से दूर होते हैं, तो आप को ये भी लगता है कि घरवालों की याद आ रही है. दिल की तेज़ धड़कन आप के उत्साहित होने का संकेत भी हो सकता है या शादी के मौक़े पर भाषण देने की फ़िक्र भी. या ये भी हो सकता है कि आपने दफ़्तर में ज़्यादा कॉफ़ी पी ली है.

लिज़ा कहती हैं कि फ़िक्र, ग़ुस्सा या घिन आने के जज़्बात हमारे अंदर पैदाइशी तौर पर नहीं होते. ये हमारी परवरिश, माहौल और हालात के हिसाब से पनपते हैं. हमारे मां-बाप, दोस्त, टीवी, क़िताबें, पुरानी यादें हमें कुछ ख़ास हालात में ख़ास तरह से प्रतिक्रिया देना सिखाते हैं. इन्हीं की बिना पर हमारा भविष्य का बर्ताव तय होता है.

दो अलग-अलग देशों के लोग किसी भी चीज़ पर अलग तरह की प्रतिक्रिया देते हैं. अब जैसे हंसने को ही लीजिए. आम तौर पर हिंदुस्तानी ज़ोर से ठहाका लगाकर हंसते हैं. वहीं पश्चिमी सभ्यता में इसे बेअदबी माना जाता है.

इतिहासकार कहते हैं प्राचीन रोमन साम्राज्य में लोग खुलकर मुस्कुराते तक नहीं थे. उनके अंदर मुस्कुराने की अदा थी ही नहीं. पर इसका ये मतलब नहीं कि वो ख़ुशी नहीं महसूस करते थे. मगर उस दौर में दांत साफ़ रखने का चलन नहीं था. सो गंदे दांत दिख न जाएं इसलिए लोग खुलकर हंसने-मुस्कुराने से कतराते थे.

लिज़ा ने कुछ ऐसा ही तजुर्बा अफ्रीका के नामीबिया के हिम्बा कबीले के लोगों के साथ किया. उन्होंने पाया कि हर तरह के हालात पर हिम्बा लोग पश्चिमी देशों के लोगों से अलग प्रतिक्रिया देते हैं.

एक खुली आंखों वाले शख्स की तस्वीर को पश्चिमी देश के लोग घूरना कहते हैं. मगर वही तस्वीर हिम्बा क़बीले की एक महिला ने देखी तो कहा कि वो देख रही है.

समझना आसाना नहीं

लिज़ा बताती हैं कि उत्तरी ध्रुव के पास रहने वाले उटका एस्किमो के अंदर ग़ुस्से का जज़्बा ही नहीं होता. वहीं प्रशांत महासागर के ताहिती द्वीप पर रहने वालों के अंदर दुख का एहसास नहीं होता.

भूख, थकान, बीमारी के संकेत हमारे शरीर में कमोबेश एक जैसे ही होते हैं. अब हम इन में फ़र्क़ कर पाएं ये बेहद ज़रूरी है. लिज़ा मानती हैं कि अपने शरीर के संकेतों को सही-सही पढ़ना आना चाहिए. इंसान अपने दिमाग़ को थोड़ी कसरत करा कर ये काम कर सकता है.

वो इसके लिए अच्छा खान-पान और नियमित रूप से वर्ज़िश करने को ज़रूरी बताती हैं. कई बार अच्छी मालिश और मसाज से भी आप को ख़ुद को बेहतर समझने में मदद मिलती है.

लिज़ा कहती हैं कि ध्यान और योग से भी आप को अपने शरीर में उठ रहे संकेत पढ़ने में आसानी होती है.

लिज़ा इस बात पर ज़ोर देती हैं कि जज़्बात हमारे अंदर पैदाइशी तौर पर नहीं होते. हम उन्हें अपने अंदर पैदा करते हैं. ये हालात और परवरिश पर निर्भर करता है. इसलिए हमें जज़्बात महसूस करना और उन्हें सही तरीक़े से समझना आना चाहिए.

हर सोसाइटी में किसी ख़ास जज़्बे के लिए ख़ास लफ़्ज़ होता है. कई बार हम दूसरे देशों में इस्तेमाल होने वाले शब्दों से भी अपने जज़्बात का इज़हार कर सकते हैं.

हालांकि ये आसान काम नहीं. वैसे जज़्बात को समझना आसान काम रहा भी कहां है? अक्सर यही तो लोगों की शिकायत रहती है कि उनकी बात समझी नहीं गई.

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