मृत व्यक्ति के शुक्राणु लेना कितना नैतिक?

    • Author, जेनी मॉर्बर
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

आपको विकी डोनर फ़िल्म तो याद होगी? फ़िल्म की कहानी ये थी कि एक शख़्स अपने शुक्राणुओं का दान करके बहुत से बेऔलाद दंपतियों के घर आबाद करता है.

इस शख़्स की अहमियत इसलिए थी कि बहुत से मर्द किसी वजह से पिता नहीं बन सकते. वैसे में विकी, ऐसे लोगों के लिए अनजान मसीहा के तौर पर काम करता है.

लेकिन, दुनिया में बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो इस क़ाबिल होते हैं कि वो बाप बन सकें, मगर उनकी अगर अचानक मौत हो जाए, तो क्या हो?

उनके चाहने वालों की ख़्वाहिश होती है कि ऐसे लोगों का अंश दुनिया में आए और बना रहे. इसके लिए इन लोगों के शुक्राणु मौत के बाद संरक्षित किए जाते हैं, ताकि बाद में उनकी मदद से औलाद पैदा की जा सके.

1970 में हुई शुरुआत

किसी गुज़र चुके इंसान के शुक्राणु निकालने का सिलसिला 1970 के दशक में अमरीका में शुरू हुआ था.

पहली बार लॉस एंजेल्स शहर के डॉक्टर कैपी रॉथमैन ने किसी मुर्दा इंसान के शुक्राणु निकालकर उन्हें संरक्षित किया था.

ऐसा करने से पहले डॉक्टर रॉथमैन ऐसे लोगों के शुक्राणु निकालकर संरक्षित करते थे, जो बांझपन के शिकार थे.

इस काम की वजह से उन्हें पता चला कि किसी इंसान की मौत के 48 घंटे बाद तक उसके शुक्राणु ज़िंदा रहते हैं. उन्हें निकालकर औलाद पैदा करने के काम में लाया जा सकता है.

इसी के बाद उन्हें किसी मरे हुए इंसान के शुक्राणु निकालकर सहेजने का ख़्याल आया.

असल में बच्चा पैदा करने के लिए मां के अंडाणु और पिता के शुक्राणुओं का मेल ज़रूरी होता है.

जो लोग क़ुदरती तौर पर ऐसा नहीं कर पाते उनके शुक्राणुओं का अंडाणुओं से शरीर के बाहर मेल कराया जाता है. फिर, गर्भ को मां के गर्भाशय में पलने के लिए प्लांट किया जाता है.

30 घंटे बाद निकाले शुक्राणु से गर्भधारण

जब डॉक्टर रॉथमैन के मुर्दा इंसान के शुक्राणु निकालने की ख़बर फैली तो छह हफ़्तों के भीतर वो अगले छह महीने के लिए बुक हो गए थे.

तभी एक बड़े नेता के बेटे की दिमाग़ी तौर पर मौत हुई थी. वो नेता अपने बेटे के शुक्राणु सुरक्षित कराना चाहते थे, ताकि बाद में वो इसकी मदद से अपने बेटे की औलाद का मुंह देख सकें.

यूं तो मरे हुए इंसान के शुक्राणु सहेजने का सिलसिला 1970 के दशक के शुरू हो गया था. मगर इसकी मदद से पहला बच्चा 1999 में पैदा हुआ था.

गेबी वर्नोफ नाम की महिला ने ब्रैंडेलिन नाम की बच्ची को जन्म दिया था. इस महिला के पति की मौत के 30 घंटे बाद डॉक्टर रॉथमैन ने उनके शुक्राणु निकालकर लैब में सुरक्षित किए थे. जिसकी मदद से गेबी बाद में मां बनी.

आज रॉथमैन अमरीका का सबसे बड़ा स्पर्म बैंक चलाते हैं. वो अब तक 200 से ज़्यादा लोगों की मौत के बाद उनके शुक्राणु निकालकर संरक्षित कर चुके हैं.

आज की तारीख़ में अमरीका में ये काम सिर्फ़ रॉथमैन नहीं बल्कि कई डॉक्टर कर रहे हैं.

मौत के बाद 48 घंटों तक शुक्राणु निकालकर सुरक्षित किए जा सकते हैं. ऑस्ट्रेलिया में तो ऐसा एक मामला सामने आया था जिसमें 48 घंटे के बाद भी शुक्राणु सुरक्षित निकाले गए थे और उनसे एक सेहतमंद बच्चे का जन्म हुआ था.

किसी की मौत के बाद शुक्राणु निकालने में सबसे बड़ा सवाल नैतिकता का आता है. किसी आदमी की मौत के बाद उसकी रज़ामंदी तो ली नहीं जा सकती.

ऐसे में नैतिकता तो इस बात की गवाही नहीं देती कि ऐसा किया जाए. मगर बहुत से लोगों की ख़्वाहिश होती है कि जाने वाले का अंश दुनिया में बना रहे.

क्या कहते हैं कानून?

कई युवा महिलाएं ऐसी होती हैं, जो जीवनसाथी की अचानक मौत के बाद भी उसका बच्चा पैदा करना चाहती हैं. मान लिया कि किसी इंसान की मौत के बाद उसके परिजन इस बारे में इजाज़त दे सकते हैं, या मना कर सकते हैं.

मगर इस मामले में दूसरा पहलू क़ानूनी है. इसे लेकर मौजूदा क़ानूनी हालात बेहद पेचीदा हैं.

अमरीका को ही ले लीजिए. वहां इस बारे में क़ानून केंद्र सरकार बनाती है. मगर उसमें बाक़ी अंग निकाले जाने को लेकर तो ज़िक्र है. पर, शुक्राणुओं को लेकर तस्वीर साफ़ नहीं. साथ ही कृत्रिम गर्भाधान को लेकर अलग राज्यों के अलग क़ानून हैं.

अगर कोई इंसान अपनी वसीयत में अपने अंगों को लेकर साफ़ निर्देश नहीं देता, तो उसके परिजन इसका फ़ैसला कर सकते हैं.

लेकिन शुक्राणुओं का मसला बाक़ी अंगों से अलग है. क्योंकि इससे नई ज़िंदगी जन्म लेती है. इसीलिए अमरीका के कई अदालती फ़ैसलों में इसे ख़ून, हड्डी, अस्थि मज्जा या दूसरे अंगों से ज़्यादा अहमियत दी गई है.

अमरीकी सोसाइटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन कहती है, "अगर वसीयत में ज़िक्र नहीं है तो किसी डॉक्टर को मरे हुए इंसान के शुक्राणु निकालने को मजबूर नहीं किया जा सकता."

वैसे अमरीकी सोसाइटी ने साफ़ किया है कि इस बारे में अस्पताल अपने ख़ुद के दिशा-निर्देश बना सकते हैं.

कई ऐसे देश हैं जहां मुर्दा इंसान के शुक्राणु निकालने पर पाबंदी है. फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और कनाडा में आप ऐसा नहीं कर सकते.

ब्रिटेन में अगर किसी इंसान ने मरने से पहले इसकी इजाज़त नहीं दी है तो आप मरने के बाद उसके शुक्राणु नहीं निकाल सकते.

लेकिन 1990 के दशक में डायेन ब्लड नाम की महिला ने क़ानूनी लड़ाई लड़कर अपने पति की मौत के बाद उसके शुक्राणु निकालने की मंज़ूरी हासिल की थी. हालांकि इसके लिए उसे अपने पति के शव से निकले शुक्राणु देश से बाहर भेजने पड़े. जहां बाद में वो उनके ज़रिए मां बन सकी.

वहीं ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में एक महिला को अपने पति की मौत के बाद उसके शुक्राणु इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं मिली.

वहीं, इज़राइल में किसी शख़्स की मौत के बाद उसके परिजन उसके शुक्राणु निकालने की इजाज़त दे सकते हैं. बल्कि इस काम में सरकार भी मदद करती है.

लेकिन 2015 में इज़राइल में अजीबोग़रीब मामला सामने आया. एक सैनिक की मौत के बाद उसके मां-बाप चाहते थे कि उनके बेटे के शुक्राणु की मदद से उनकी बहू मां बने.

मगर सैनिक की विधवा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उस महिला ने अपने पति के शुक्राणुओं के उसके मां-बाप के इस्तेमाल करने पर भी रोक लगवा दी.

आम तौर पर ऐसे मामलों में मरे हुए शख़्स के सबसे क़रीबी लोगों की ख़्वाहिशों का ख़याल किया जाता है.

वैसे, स्पर्म बैंक में शुक्राणु दान करने वालों से पूछा जाता है कि उनकी अचानक मौत के बाद उनके शुक्राणु इस्तेमाल किए जाएं या नहीं. आम तौर पर शुक्राणु दान करने वाले इसकी मंज़ूरी दे देते हैं.

हालांकि 1998 में एक ब्रिटिश मेडिकल पत्रिका ने इसे अनैतिक बताया था. इस पत्रिका के लेख में कहा गया था कि डॉक्टरों को ऐसा करने से मना करने का साहस दिखाना चाहिए.

वहीं अमरीका में 2008 में हुए सर्वे में मौत के बाद इंसान के शुक्राणु निकालने को काफ़ी समर्थन मिला था.

कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि, इससे पैदा हुए बच्चे का अपने पिता से कभी साबक़ा नहीं पड़ेगा. लेकिन ब्रिटेन की डायेन ब्लड कहती हैं कि बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जिन्हें अपने बाप के बारे मे कोई जानकारी ही नहीं होती.

कुछ डॉक्टर कहते हैं कि ऐसे शुक्राणुओं की मदद से पैदा बच्चों के ऊपर काफ़ी दबाव हो जाता है.

उन्हें लगता है कि लोग उसमें मरे हुए शख़्स को तलाशते हैं. ये बच्चों पर बेवजह का दबाव बनाता है.

लेकिन कैपी रॉथमैन जैसे डॉक्टर मानते हैं कि वो तो गुज़रने वाले शख़्स के परिजनों को राहत देने के लिए ऐसा करते हैं. क्योंकि ज़्यादातर मामलों में बाद में इन शुक्राणुओं की मदद से बच्चे पैदा ही नहीं किए जाते.

('मोज़ैक' में प्रकाशित मूल लेख के संपादित अंशों को क्रिएटिव कॉमन लाइसेंस के तहत दोबारा छापा गया है.)

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