इस साल दुनिया को परेशान करने वाले 12 सवाल

दुनिया

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    • Author, ब्रायन कफ़लिंक
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

आज दुनिया बहुत तरह की चुनौतियां का सामना कर रही है. इसमें सबसे बड़ी चुनौती है जलवायु परिवर्तन.

जिस तेज़ी से धरती की आबो-हवा बदल रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि दुनिया बहुत तेज़ी से ख़ात्मे की ओर बढ़ रही है. लेकिन दुनिया के सामने ये इकलौती मुश्किल नहीं. ऐसे बहुत से मसले हैं, जो बज़ाहिर बहुत छोटे हैं, लेकिन असल में हैं बहुत गंभीर.

इस साल वो कौन सी चुनौतियां हैं, जिनका सामना सारी दुनिया करने वाली है? चलिए आपको विस्तार से बताते हैं.

बेअसर हो रही है दवाएं

बीमारियों पर क़ाबू पाने के लिए बहुत तरह की दवाएं बनाई गई हैं. रिसर्च के ज़रिए ही आज जानकार इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बहुत सी ऐसी एंटीबायोटिक दवाएं हैं जिनका इस्तेमाल अब बंद हो जाना चाहिए.

एंटी बायटिक

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जानकारों का तर्क है कि जब भी किसी एंटीबायटिक का बहुत इस्तेमाल होता है. तो. एक वक़्त ऐसा आता है कि वो दवा बेअसर हो जाती है. कीटाणु उस दवा से लड़ने की ताक़त पैदा कर लेते हैं.

आज ऐसी बहुत सी एंटीबायटिक हैं जो इसी वजह से बेकार हो चुकी हैं. और अब ज़रूरत है नई दवाएं बनाने की ताकि किसी भी तरह के संक्रमण पर समय रहते काबू पाया जा सके.

बेअसर एंटीबायटिक की वजह से ही हर साल सात लाख लोगों की जान जाती है. अगर ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब गंभीर बीमारियों का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.

जल का गहराता संकट

एक और बड़ी चुनौती जो दुनिया के सामने है, वो है पानी की क़िल्लत. कमोबेश हर देश में लोग शहरों की तरफ़ भाग रहे हैं. ज़मींदोज़ पानी का इस्तेमाल भी धड़ल्ले से हो रहा है. और नदी नालों का पानी लापरवाही की वजह से बर्बाद हो रहा.

विज्ञान

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भारत जैसे विकासशील देशों को तो इस समस्या का सामना बहुत बड़े पैमाने पर करना पड़ता है. इस चुनौती से निपटने के लिए ज़रूरी है कि ऐसी तकनीक खोजी जाएं जिनके ज़रिए पानी बचाया जा सके. साथ ही इस्तेमालशुदा पानी को फिर से उपयोगी बनाने पर भी रिसर्च की जाए.

अफ़वाहें सब पर भारी

आज हम डिजिटल वर्ल्ड में जी रहे हैं जहां सोशल मीडिया का बोलबाला है. सोशल मीडिया के सहारे आज दुनिया एक सूत्र में बंध गई है. कोई भी तकनीक तभी तक ठीक है, जब तक उसका सही इस्तेमाल किया जाए.

सोशल मीडिया

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लेकिन देखा जा रहा है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल बेकार की बातें, अफ़वाहें फैलाने और प्रोपेगेंडा करने के लिए भी किया जा रहा है. इस पर लगाम लगाने की ज़रूरत है.

आंकड़ों को संभालने का संकट

ऐसी नीति बनाए जाने की ज़रूरत है जो ख़बरों की सच्चाई परखने के बाद ही उन्हें सबके सामने रखने की इज़ाज़त दे. हर जानकारी की पड़ताल मुमकिन नहीं. लिहाज़ा ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, जहां लोग एक दूसरे पर और तमाम जानकारियों पर यक़ीन कर सकें.

फैल रही है महामारियां

ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से आज लगभग सारी दुनिया के लोग एक देश से दूसरे देश में जाते हैं. इन्हीं लोगों के साथ बहुत सारी बीमारियां भी फैल रही हैं. ज़ीका और ईबोला जैसी बीमारियां इसी तरह से एक देश से दूसरे देश में फैलीं.

अफ़सोस की बात है कि ग्लोबलाइज़ेशन के बावजूद इस तरह की महामारियों से बचने का माक़ूल इंतज़ाम नहीं है. ये एक बड़ी चुनौती है. ज़रूरत है नई दवाएं ईजाद करने की. साथ ही किसी मुश्किल से निपटने के लिए पूरी दुनिया एकजुट हो इसका कोई तरीक़ा निकाला जाना चाहिए.

जीका के ख़तरे

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ख़ुदा ना ख़्वास्ता अगर कभी फिर से 1981 के स्पेनिश फ्लू की तरह से किसी और महामारी का सामना करना पड़ा तो भयानक नतीजे भुगतने होंगे. सारी दुनिया को इस तरह की बीमारियों से लड़ने के लिए खुद को तैयार करना होगा.

बढ़ती आबादी का संकट?

बढ़ती आबादी

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आज इंसानिय का पहिया, तेल और कोयले से दौड़ रहा है. इनका इस्तेमाल बहुत तेज़ी से हो रहा है. क्योंकि आबादी भी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है. इस बढ़ती आबादी को ऐसी एनर्जी चाहिए जो ग्रीन हो, क्लीन हो और जिसका बार-बार इस्तेमाल हो सके. तेल, गैस और कोयला तो धरती पर सीमित तादाद में ही हैं.

एक दिन ख़त्म हो जाएंगे. फिर हम लोग क्या करेंगे. इसीलिए हवा, पानी, सूरज की रौशनी के ज़रिए ऊर्जा पैदा करने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. फिर हमें ऊर्जा का इस्तेमाल भी कम करना होगा. और आबादी बढ़ने की रफ़्तार पर भी क़ाबू पाना होगा. वरना हमारी तरक़्क़ी रुक जाएगी.

नई तकनीक के सहारे इंसान के शरीर में होने वाली सभी क्रियाओं का डिजिटाइज़ेशन करने की तैयारी की जा रही है. यानी हर इंसान के शरीर का पूरा ख़ाका कंप्यूटर पर मौजूद रहेगा. हालांकि ये सब करना आसान नहीं होगा.

जीन तकनीक पर सवाल

लेकिन, अगर ऐसा हो पया तो हम बहुत जल्द वर्चुअल मेडिकल कोच बन जाएंगे. आपके स्मार्ट फोन पर आपको अपने शरीर की पूरी जानकारी एक ऐप के ज़रिए मिल जाएगी. आप वक़्त रहते बहुत सी बीमारियों को शुरूआती दौर में ही रोक पाएंगे.

विकास

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नई तकनीक के सहारे क्रिस्पर-केस 9 जीन एडिटिंग टेक्नोलोजी बनाने की कोशिश की जा रही है. इस तकनीक के सहारे खराब जीन की जगह, सही जीन लगाकर उसमें बदलाव किए जाएंगे. जिससे आगे चलकर इंसान को किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े.

जीन एडिटिंग तकनीक के सहारे ना सिर्फ़ इंसान की समझ में इज़ाफ़ा किया जा सकेगा बल्कि इससे इंसानी ज़िंदगी लंबी भी हो सकेगी. लेकिन इस तकनीक के सहारे बहुत से सवाल खड़े हो सकते हैं. इस तकनीक का ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है लिहाज़ा जल्दबाज़ी में कोई फ़ैसला नहीं लिया जा सकता.

शहरों का क्या होगा हाल?

जो शहर अभी आबाद हैं, उन्हें कैसे और ज़्यादा बेहर और खूबसूरत बनाया जाए ये भी एक बड़ा सवाल है. हर साल क़रीब पंद्रह करोड़ लोग शहरों की तरफ़ पलायन कर रहे हैं. 2050 तक पूरी दुनिया में सात अरब लोग शहरों में रह रहे होंगे. और यही शहर माहौल में कार्बन फैलाने के लिए लगभग 75 फ़ीसद ज़िम्मेदार होंगे.

महानगर

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आबादी बढ़ने की वजह से आज उप-नगर बसाए जा रहे हैं. निवेशक ऐसी जगह पर पैसा लगाने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं जहां लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलने की उम्मीद है. लिहाज़ा ऐसी पॉलिसी बनाए जाने की ज़रूरत है जिसके ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को रहने के लिए बेहतर घर मिल सकें.

हाल में हुई रिसर्च बताती हैं कि किसी देश में दी जाने वाली जन सेवाएं वहां की आबादी के मुक़ाबले काफ़ी नहीं होतीं. जिसके चलते बच्चे की पैदाइश के समय ही कभी बच्चे की मौत हो जाती है, तो कभी मां की या कभी दोनों की.

ज़िंदगी बेहतर बनाने की चुनौती

आबादी

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जो लोग बीमार होते हैं, उन्हें भी मुनासिब इलाज नहीं मिलने की वजह से वो एक सेहतमंद ज़िंदगी से महरूम रह जाते हैं. ये हालात विकाससील देशों में ज़्यादा देखने को मिलते हैं. इसीलिए सभी लोगों को रहने के लिए एक माक़ूल घर, संतुलित आहार और रोज़गार देना ज़रूरी होगा.

एक अनुमान के मुताबिक़ साल 2050 तक अफ़्रीकी देशों के ज़्यादातर लोग शहरों की तरफ़ पलायन करेंगे. ऐसे में निवेशक अफ़्रीक़ा में निवेश के लिए एक साज़गार माहौल देख रहे हैं. लेकिन जानकार इसे मुनासिब नहीं मानते. उनके मुताबिक़ ऐसे बड़े शहरों में रहन-सहन के मुताबिक़ आर्थिक विकास पर ज़ोर ज़्यादा रहता है. इससे कुछ अमीरों का ही भला हो पाता है.

नए इलाकों का विकास?

आम जनता से जुड़ी योजनाएं कहीं पीछे रह जाती है. विकास के लिए आम जनता की भागीदारी भी ज़रूरी है. नए शहर बसाने के बजाय जो इलाक़े अभी विकसित नहीं हुए हैं, पहले उन्हें विकसित किया जाए. इन इलाक़ों में कम निवेश करने पर भी अच्छे नतीजे मिल सकते हैं.

प्राकृतिक आपदाओं का संकट

प्राकृतिक आपदा

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क़ुदरती आपदाओं से बचने के लिए बहुत तरह की रिसर्च की जा रही हैं. लेकिन रिसर्च के इन नतीजों का आम जनता को फ़ायदा नहीं मिल पा रहा है. क्योंकि उन तक जानकारी ही नहीं पहुंच पाती. रिसर्च किसी परेशानी का हल तलाशने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

मान लीजिए अगर कोई भूकंप की बारे में जानकारी लेना चाहता है, तो रिसर्चर उसे वैज्ञानिक भाषा में ही जवाब देता है. जोकि उसकी समझ के परे होता है. ज़रूरी है कि ऐसे नौजवान रिसर्चर आगे आएं जो आसान भाषा में लोगों को किसी भी क़ुदरती आफ़त की वजह और उससे बचने के उपाय बता सकें.

बढ़ती कारों का संकट

कारों का संकट

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शहरों में जिस तरह आबादी बढ़ रही है, वैसे ही कारों की संख्या भी बढ़ रही है. ऐसे में इन कारों को सड़कों पर चलने और पार्किंग के लिए ज़्यादा जगह की ज़रूरत होगी. लिहाज़ा इस तरह की प्लानिंग की ज़रूरत है जहां एक ही जगह का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा लोग कर सकें. शहरों को बेहतर बनाने के लिए तकनीक का सहारा तो बहुत लिया गया, लेकिन यही तकनीक बहुत बार परेशानियों का सबब भी बनती है.

तो, ये वो बारह बड़ी चुनौतियां जिनका हमें सामना ही नहीं करना, बल्कि इन पर जीत भी हासिल करनी है. उम्मीद है कि हम इन मुश्किलों से पार पा लेंगे. इन चुनौतियां का हल खोज निकालेंगे. ताकि इंसानियत का पहिया घूमता रहे. हम बेहतर ज़िंदगी जी सकेंगे. बेहतर दुनिया में रह सकेंगे.

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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