समलैंगिक होने को ग़लत क्यों माना जाता है

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- Author, ब्रैंडन एंब्रोसिनो
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
किसी भी जीव की नस्ल में इज़ाफ़े के लिए सेक्स ज़रूरी प्रक्रिया है. क़ुदरत में जितने नस्ल के जीव हैं, उनके बीच शारीरिक संबंध के उतने ही तरीक़े.
आम तौर पर नर और मादा के बीच यौन संबंध से नई पीढ़ी का जन्म होता है. मगर, दुनिया के सबसे अक़्लमंद प्राणी यानी इंसानों के बीच जिस्मानी ताल्लुक़ सिर्फ़ आने वाली नस्ल पैदा करने के लिए नहीं होता.
इंसान की सेक्स में दिलचस्पी की कई वजहें होती हैं. इंसानों के बीच कई तरह से रिश्ते बनते हैं.
यूं तो आज के दौर में होमोसेक्शुआलिटी को बहुत से समाजों में मान्यता मिलने लगी है. मगर एक दौर ऐसा भी था जब समलैंगिकता को नफ़रत की नज़र से देखा जाता था. इसे क़ुदरती नहीं माना जाता था.

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चलिए आज हम होमोसेक्शुआलिटी या समलैंगिकता को छोड़कर इसके बरक्स जो रिश्ता होता है, उसकी बात करें. क्या आप जानते हैं कि उसे क्या कहते हैं?
बहुत से लोग ये कहते हैं कि इसे सामान्य यौन संबंध कहेंगे, जिसमें औरत, मर्द की तरफ़ या मर्द औरत की तरफ़ आकर्षित होते हैं.
अंग्रेज़ी में इसके लिए लफ़्ज़ है Heterosexual या HeteroSexuality. डिक्शनरी में तलाशें तो हिंदी में इस शब्द का मतलब होता है उभयलिंगी.
विपरीत लिंग के साथी में दिलचस्पी क़ुदरत में इतनी आम है कि इसे सामान्य सेक्स संबंध का नाम दे दिया गया. मगर कभी आपने सोचा कि आख़िर आपको कब इसके बारे में बताया गया. कब आपको समझाया गया कि आप मर्द हैं तो आपको औरत से ही रिश्ता बनाना है या औरत हैं तो मर्द से ही रिश्ता बनाना है.

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आप कहेंगे कि ये तो क़ुदरतन होता है. इसे कोई सिखाया-पढ़ाया थोड़े ही जाता है. जिसे आप सामान्य सेक्स संबंध कहते हैं वो अगर क़ुदरती तौर पर आपके अंदर आता है. तो उन लोगों के अंदर भी प्रकृति के साथ ही सेक्स की वो दिलचस्पी पैदा होती है, जिसे समलैंगिकता कहकर कुछ लोग नफ़रत की नज़र से देखते हैं.
भारत में तो प्राचीन काल में सेक्स को लेकर खुलकर चर्चा होती थी. मगर, पश्चिमी देशों में आज आप सेक्स को लेकर जो खुलापन देख रहे हैं, वो ज़्यादा पुरानी बात नहीं है. ये सिर्फ़ पिछले सौ सालों में हुआ है.
आज से एक सदी पहले समलैंगिकता को ज़्यादातर पश्चिमी देशों में जुर्म और पाप माना जाता था. ये ग़ैरक़ानूनी भी था और दीन-ईमान के ख़िलाफ़ भी.
उन्नीसवीं सदी तक सामान्य यौन संबंध जिसे अंग्रेज़ी में हेटरोसेक्शुअल कहा जाता है, वही सही अमल समझा जाता था. लेकिन बीसवीं सदी के आग़ाज़ ने यौन संबंध जैसे विषय को बहस का एक बड़ा मुद्दा बना दिया.

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इसकी बड़ी वजह पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति थी. जिसके बाद शहरों की आबादी बढ़ने लगी. लोगों के पास दौलत बढ़ने लगी. लोग सेक्स को सिर्फ़ बच्चा पैदा करने का ज़रिया समझने के बजाय उसे लुत्फ़ की चीज़ समझकर ज़्यादा तवज्जो देने लगे.
शहरों की आबादी बढ़ी तो सेक्स से जुड़े अपराध भी बढ़े. जिसके बाद सेक्स को लेकर नई बहस शुरू हुई. लोगों ने सेक्स को लेकर नए तज़ुर्बे करने शुरू किए तो उसके लिए नए शब्द गढ़े जाने लगे.
आज से हज़ार साल पहले तक हेटरोसेक्शुअल या सामान्य यौन संबंधों के बारे में लोगों की बहुत अलग राय थी.
बीसवीं सदी की शुरुआत में तमाम डिक्शनरी में इसे भी नफ़रत की भावना वाली परिभाषा के दायरे में रखा गया था. मगर अगले पच्चीस सालों में बहस आगे बढ़ी. साल 1934 में हेटरोसेक्शुअल की परिभाषा में थोड़ा फेरबदल हुआ.
कहा गया कि, "विपरीत लिंग के प्रति सेक्स की ख़्वाहिश का होना एक फ़ितरी अमल है" और यही हेटरोसेक्शुअल की परिभाषा है, जो आज हम सब जानते हैं.

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लेकिन सवाल ये है कि क्या हमेशा से इंसान सिर्फ़ हेटरोसेक्शुअल ही रहा है या फिर जितने तरह के जिस्मानी रिश्ते हम आज देखते हैं, वैसा हमेशा से था.
इस पर बहुत रिसर्च हुए हैं. इनका निचोड़ ये है कि इंसान के विकास की प्रक्रिया में समलैंगिकता एक ख़ास वक़्त के बाद शुरू हुई.
अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड हालपिरिन का कहना है कि सेक्स का कोई इतिहास नहीं रहा. ये तो शरीर के अंदर होने वाली अन्य सामान्य क्रियाओं की तरह ही होना वाली एक क्रिया है. और इसका संबंध नस्ल में इज़ाफ़ा करने से है
शायद यही वजह थी कि उन्नीसवीं सदी तक तो यौन संबंध के लिए पश्चिमी देशों में शब्द तक नहीं गढ़े गए थे.
1868 से पहले तक तो सामान्य यौन संबंध के लिए भी कोई शब्द नहीं था. लेकिन जब लोगों के बीच तरह तरह से सेक्स होता देखा गया. तब उनकी दिलचस्पियों को देखते हुए उन्हें अलग-अलग नाम दिए गए.

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1860 में हंगरी के एक पत्रकार कार्ल मारिया कर्टबेनी ने लोगों के यौन व्यवहार के आधार पर चार नाम दिए. पहला हेटरोसेक्शुअल, जिसे सामान्य यौन संबंध कहा जा सकता है. दूसरा होमोसेक्शुअल यानि समलैंगिक. इसके अलावा हेटरोजेनिटी और मोनोसेक्शुअल- दो ऐसे शब्द है जो बहुत इस्तेमाल में नहीं आते. इसके बरक्स मास्टरबेशन यानी हस्तमैथुन और बेस्टिएलिटी यानि पशुसंभोग या वहशीपन जैसे शब्द आज भी इस्तेमाल में हैं.
यौन संबंधों पर बहुत तरह की किताबें लिखी गईं. लेकिन उनमें भी हेटरोसेक्शुअल जैसा शब्द लिखने से परहेज़ किया गया. सबसे पहले ये शब्द 1880 में एक पत्रकार ने अपने नॉवेल में लिखा था.
इसके बाद 1889 में जर्मनी के मनोचिकित्सक रिचर्ड वॉन क्राफ्ट ईबिंग ने सेक्स से जुड़े तमाम बर्तावों पर एक क़िताब लिखी. उसमें उन्होंने हेटरोसेक्शुअल लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया. हालांकि रिचर्ड की दिलचस्पी भी दूसरी चीज़ों में थी, आम सेक्स संबंध में नहीं. इसलिए उन्होंने भी हेटरोसेक्शुअल को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी.

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पश्चिमी देशों में 19वींसदी तक सेक्स को सिर्फ़ नस्ल बढ़ाने का ज़रिया माना जाता था. इसे यौन आनंद के तौर पर देखना धर्म के ख़िलाफ़ समझा जाता था. यहां तक कि हस्तमैथुन के ख़िलाफ़ भी पश्चिमी समाज में मज़बूत राय थी. बाइबिल में भी समलैंगिकता और हस्तमैथुन को पाप बताया गया है.
लेकिन रिचर्ड वॉन क्राफ्ट-ईबिंग ने पहली बार मज़बूती से ये बताने की कोशिश की कि यौन संबंध सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिए नहीं बनाए जाते. बल्कि ये एक ऐसी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए भी बनाए जाते हैं जो जज़्बाती, जिस्मानी और दिमागी सुकून देता है. अगर सेक्स सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए होता तो समान लिंग वाले एक दूसरे के प्रति यौन संबंध बनाने के लिए आकर्षित नहीं होते.

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यौन संबंधों के प्रति बदलते व्यवहार को कुछ रिसर्चर बदलते जीवन स्तर के साथ जोड़कर देखते हैं. जैसे कुछ रिसर्चर मानते हैं जैसे-जैसे समाज में मध्यम वर्ग बड़ा हुआ वैसे-वैसे सेक्स के प्रति लोगों का व्यवहार बदलने लगा. जबकि सेक्स की ख़्वाहिश का संबंध किसी वर्ग, धर्म या अमीर ग़रीब से नहीं होता. इसका संबंध सिर्फ़ इंसान से होता है. किसी में ये ख़्वाहिश कम तो किसी में ज़्यादा. लेकिन इससे अछूता कोई नहीं होता.
अगर कोई समलैंगिक है या उभयलिंगी है तो उसमें उस इंसान का कोई क़सूर नहीं है. बल्कि उसकी ये ख्वाहिश उतनी ही सामान्य है जितना हेटरोसेक्शुआलिटी. जिसे हम सामान्य यौन संबंध कहकर समाज में मान्यता देते हैं.
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