जासूसी कैमरे के लिए बंदरों ने मातम क्यों मनाया?

    • Author, एल्फ़ी शॉ
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ

बंदर के बच्चे जैसी दिखने वाली आकृति पथरीली ज़मीन पर गिरकर बेजान हो गई.

अगले कुछ ही पलों में वयस्क बंदरों का झुंड उसके चारों ओर जमा हो गया और वे एक-दूसरे को सांत्वना देने लगे.

इस दृश्य में क्या चल रहा है, यह समझने के लिए जानवरों के व्यवहार का विशेषज्ञ होने की ज़रूरत नहीं है.

हम शोक या मातम को ख़ास इंसानी अनुभूति मान सकते हैं, लेकिन जैसा कि इस मामले में और अन्य कई मामलों में दिखा है, हम अपने मृतकों के लिए शोक मनाने में अकेले नहीं हैं.

बंदरों के दल में जासूस

भारत के राजस्थान में लंगूर बंदरों के एक दल को फ़िल्माने के लिए "स्पाई इन दि वाइल्ड" की टीम ने कैमरे लगे हुए एक एनिमेट्रोनिक बंदर को तैनात किया.

बंदरों की टोली में वह जासूस बंदर था, जो पलकें हिला सकता था और लंगूर जैसी कुछ रिकॉर्डेड आवाज़ें निकाल सकता था.

बंदरों के दल ने उस घुसपैठिए "जासूस" को अपने दल का सदस्य समझ लिया.

एक मादा बंदर ने उस बच्चे को अपनी गोद में बिठाकर उसे पुचकारना चाहा, लेकिन उससे ग़लती हो गई और "जासूस" बंदर पेड़ की ऊंची डाल से नीचे पथरीली ज़मीन पर गिर पड़ा.

वह ज़मीन से उठ नहीं पाया (क्योंकि वह असली बंदर नहीं था). लेकिन उसे गोद में बिठाने वाली मादा बंदर ने समझा कि वह बच्चा उसकी ग़लती से मर गया है.

इसके बाद जो हुआ वह दिल को छू जाने वाला था. बंदरों ने जिस शोक का प्रदर्शन किया उसे आप इंसानी व्यवहार से इतर कुछ और नहीं मान सकते.

जानवरों का मातम

प्राइमेट्स यानी वानर परिवार का शोक मनाना कोई नई बात नहीं है. दल के किसी सदस्य की मौत होने पर वे मातम मनाते हैं, यह पहले भी देखा गया है.

शोध से पता चला है कि प्राइमेट्स की कई प्रजातियां मातम मनाने के संकेत प्रदर्शित करती हैं, हालांकि उनके शोक की अवधि और उसकी तीव्रता विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग हो सकती हैं.

किसी की मृत्यु होने पर उनमें अवसाद के लक्षण भी देखे गए हैं. मातम के दौरान वे उन उत्तेजनाओं पर भी प्रतिक्रिया नहीं देते जिन पर वे पहले बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया देते थे.

ऐसे कुछ चरम मामलों में एक चिंपाजियों के परिवार का है, जिसे जेन गुडॉल ने 1972 में रिकॉर्ड किया था.

फ़्लो नाम की मादा चिंपाजी का निधन हुआ तो उसका बेटा फ़्लिंट- जो अपनी मां पर बेहद निर्भर था- उसमें अवसाद के लक्षण दिखने लगे.

फ़्लिंट ने समूह में मिलना-जुलना बंद कर दिया और खाना-पीना भी छोड़ दिया.

धीरे-धीरे उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली ने जवाब दे दिया. वह बच नहीं पाया और मां की मौत के एक महीने के अंदर ही वह भी चल बसा.

मौत से पहले देखरेख

2014 के एक शोध में देखा गया कि सिर्फ़ प्राइमेट्स ही मातम नहीं मनाते, कुछ दूसरी प्रजातियां भी मृत्यु के करीब पहुंचे अपने दल के सदस्यों की फिक्र करते हैं.

एक मादा मर्मोसेट (अफ़्रीकी बंदर) पेड़ से गिर गई जिससे उसके सिर में ज़मीन में दबी किसी भारी चीज़ से चोट लग गई.

इसके बाद साढ़े तीन साल साथ रहे उसके नर साथी ने उसकी देखरेख की और दूसरे मर्मोसेट से उसे तब तक छिपाकर रखा जब तक कि दो घंटे बाद उसकी मौत नहीं हो गई.

प्राइमेट्स के कुछ समूह, जैसे जापानी मकाउ और हाउलर बंदरों को दल से बिछुड़े सदस्यों की फिक्र में जगते हुए देखा गया है. ऐसा पांच दिनों तक हो सकता है.

2018 में डूंडी (स्कॉटलैंड) के कैंपरडाउन वन्यजीव केंद्र को एक सप्ताह के लिए बंद कर दिया गया था ताकि वहां के मकाउ बंदरों के समूह को एक युवा सदस्य का मौत का शोक मनाने का समय मिल सके.

कई बार मृत देह के पास खड़े होकर पहरा देने की जगह, प्राइमेट्स का दल मृत बच्चे के शव को अपने साथ लेकर यात्रा करता है.

कितने दिन का शोक?

प्राइमेट्स समूहों की मादा अपने बच्चों के शव को 10 दिन या उससे भी ज़्यादा समय तक अपने साथ रखने के लिए जानी जाती हैं.

लेकिन इन माताओं को अपने बच्चे के मर जाने का पता होता है या नहीं, यह बहस का विषय है.

वे मृत शरीर को असामान्य तरीके से साथ रखते हैं. कई बार तो वे उसे उल्टा भी कर देते हैं और फर्श पर घसीटते हुए ले जाते हैं.

दिलचस्प है कि जापानी मकाउ बंदर दल के किसी छोटे सदस्य की मौत पर एक ख़ास आवाज़ निकालते हैं. इससे ऐसा लगता है कि उनको मौत के बारे में कुछ तो ज़रूर पता होगा.

प्राइमेट्स में "मृतक के सम्मान" की समझ का स्तर भिन्न हो सकता है.

स्पेक्ट्रम के एक छोर पर, कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने कुछ प्राइमेट्स को मृतकों को खाते देखा है यानी परिवार का सदस्य ही परिवार का भोजन बन जाता है.

दूसरी तरफ, 2017 में ज़ांबिया के चिम्फुंशी वन्यजीव अनाथालय ट्रस्ट में एक चिंपाजी को दूसरे मृत चिंपाजी के दांत साफ़ करते हुए देखा गया था.

चिंपाजी अपने जीवनकाल में दांत साफ़ करते हुए पाए गए हैं, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था जब अंतिम संस्कार के समय उनको ऐसा करते हुए देखा गया था.

(बीबीसी अर्थ पर इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी अर्थ को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)