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धरती पर तबाही से पहले उल्कापिंड का पता लगाया जा सकता है?
- Author, क्रिस बरानियूक
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
अगर किसी रोज़ हमारी धरती से कोई क्षुद्र ग्रह या उल्कापिंड टकरा जाए, तो क्या होगा?
क्या ऐसी किसी आफ़त को आने से रोका जा सकता है? क्योंकि उल्कापिंड या धूमकेतु अगर पृथ्वी से टकराया तो भारी तबाही मच सकती है.
ब्रह्मांड में बहुत से उल्कापिंड, धूमकेतु और क्षुद्र ग्रह तैर रहे हैं. ये बेक़ाबू हैं और किसी भी ग्रह के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में आने पर उससे टकराकर ख़त्म हो जाते हैं. ऐसा टकराव भारी तबाही ला सकता है.
हमारी धरती ने इसका एक सबूत 1908 में साइबेरिया के टुंगुस्का में देखा था. जब एक क्षुद्र ग्रह धरती से टकराने से पहले जलकर नष्ट हो गया था. इसकी वजह से क़रीब 100 मीटर बड़ा आग का गोला बना था. इसकी चपेट में आकर 8 करोड़ पेड़ नष्ट हो गए थे.
ऐसी किसी तबाही से बचाने के लिए दुनिया के कई वैज्ञानिक जुटे हुए हैं. वे किसी एस्टेरॉयड के धरती से टकराने का पूर्वानुमान लगाकर, उससे निपटने के उपाय तलाश रहे हैं.
बोत्सवाना के जंगलों में खोज
ऐसी ही एक टीम हाल ही में अफ्रीकी देश बोत्सवाना गई थी. इस टीम ने लगातार पांच दिनों तक जंगलों में मशक़्क़त की. कांटेदार झाड़ियों और घास की मोटी परत के बीच ये वैज्ञानिक एक ख़ास चीज़ तलाश रहे थे.
उन्हें मोटे तौर पर तो इस बात का अंदाज़ा था कि उन्हें 200 वर्ग किलोमीटर के दायरे में किस जगह पर उसे खोजना है. लेकिन, उस एस्टेरॉयड के टुकड़े बहुत ही छोटे थे. इसलिए उसे ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था. किसी को क्या पता कि क्षुद्र ग्रह के वो टुकड़े कहीं दब गए हों? या हवा में उड़ गए हों?
तभी अचानक वैज्ञानिकों की नज़र एक काले, धूल भरे पत्थर पर पड़ी. ये हमारी धरती का नहीं था. ये बाहर से आया था.
एक महीने पहले खगोलविदों की एक टीम ने पूर्वानुमान लगाया था कि एक क्षुद्र ग्रह धरती से आकर उसी जगह टकराएगा. इसका नाम 2018 एलए रखा गया था. ये रात के वक़्त बोत्सवाना के जंगलों में गिरा था. धरती के वातावरण में आकर ये जल गया था और इसके टुकड़े बिखर गए थे.
इस क्षुद्र ग्रह के टुकड़े मिलने से खगोलविदों की एक बात सही साबित हुई. और हमारे इतिहास में ऐसा केवल दूसरी बार हुआ था कि किसी क्षुद्र ग्रह को वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में देखा और फिर उसके टुकड़े धरती पर मिले.
लोगों को सूचित करना होगा आसान?
जिस टीम ने इस टुकड़े को खोजा, उसे ये उम्मीद है कि दूरबीनों की मदद से एक दिन ऐसी घटना के प्रति लोगों को आगाह किया जा सकेगा.
अगर ख़तरा गंभीर होगा, टकराने वाला कोई धूमकेतु या उल्कापिंड बड़े आकार का होगा, तो ये चेतावनी दुनिया को बड़ी तबाही से बचा लेगी.
जब 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह अंतरिक्ष में तैर रहा था, तो इसे कैटालिना स्काई सर्वे नाम की संस्था की दूरबीन ने देखा था. ये प्रोजेक्ट नासा की मदद से चलाया जा रहा है.
इस क्षुद्र ग्रह को एटलस यानी एस्टेरॉयड टेरेस्ट्रियल इम्पैक्ट लास्ट एलर्ट सिस्टम की दूरबीन ने भी देखा था.
एटलस सिस्टम अमरीका की हवाई यूनिवर्सिटी का है. ये दूरबीनों का ऐसा सिस्टम है, जिसका मक़सद धरती की तरफ़ आ रहे बड़े-बड़े उल्कापिंडों या क्षुद्र ग्रहों से आगाह करना है.
एटलस सिस्टम की स्थापना जॉन टोनरी ने की है, जो एक खगोलविद हैं. उन्हें इस सिस्टम की स्थापना करने की प्रेरणा उन चर्चाओं से मिली थी, जिनमें ये कहा जा रहा था कि किसी उल्कापिंड या धूमकेतु के धरती से टकराने की संभावना बहुत ही कम है. शायद हज़ार दो हज़ार साल में कभी एक बार ऐसा हो सकता है.
तब गई थी सिर्फ़ 1 शख़्स की जान
टोनरी कहते हैं कि, "मुझे इन बातों से हैरानी होती थी. लोग बड़े यक़ीन के साथ ऐसे दावे करते थे. जबकि हमारी धरती से किसी क्षुद्र ग्रह के टकराने की सबसे हालिया घटना क़रीब 100 साल पहले हुई थी."
टोनरी का इशारा साइबेरिया के टुंगुस्का में एस्टेरॉयड के जलने की तरफ़ था. जिसमें 8 करोड़ से ज़्यादा पेड़ तबाह हो गए थे. ये एक वीरान इलाक़ा था.
सोचिए, अगर वो क्षुद्र ग्रह किसी बड़ी आबादी वाले इलाक़े के ऊपर वातावरण में जला होता तो? हम इसकी कल्पना मात्र से ही सिहर उठते हैं कि तब कितनी बड़ी तबाही मची होगी. हालांकि 1908 में साइबेरिया की घटना में केवल एक व्यक्ति की जान गई थी.
टोनरी के एटलस सिस्टम के तहत अब तक दो दूरबीनें लगाई गई हैं. दोनों ही अमरीका के हवाई में हैं.
हालांकि टोनरी बहुत जल्द दक्षिण अफ्रीका में एक दूरबीन लगाने वाले हैं, ताकि धरती के दक्षिणी गोलार्ध के आसमान के ऊपर भी निगरानी की जा सके. जल्द ही एक चौथी दूरबीन लगाने के लिए भी पैसा जुटाया जाएगा.
जब एटलस सिस्टम पूरी तरह काम करने लगेगा, तो टोनरी को उम्मीद है कि हमें किसी भी संभावित ख़तरे की जानकारी पहले से मिल जाएगी. हमें इतना वक़्त मिल जाएगा कि हम लोगों को टकराने वाली संभावित जगह से हटा सकें.
बोत्सवाना में एस्टेरॉयड के जो टुकड़़े मिले, उनकी मदद से हमें आज ये यक़ीन है कि एटलस सिस्टम से ऐसे किसी ख़तरे का सही-सही अंदाज़ा लगाया जा सकता है. 2018 एलए नाम का ये क्षुद्र ग्रह किस जगह टकराएगा, इसका सटीक अंदाज़ा लगाना बड़ी उपलब्धि है. क्योंकि, ये बहुत छोटा सा, केवल दो मीटर का चट्टान का टुकड़ा मात्र था.
एटलस सिस्टम कैसे करेगा काम
ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर क्लीमेंस रंफ कहते हैं कि 'एटलस सिस्टम बहुत अच्छी पहल है. रोज़ाना कोई न कोई एस्टेरॉयड हमारी नज़र से बच जाता है.'
धरती के इर्द-गिर्द सारा आसमान ऐसी बेअंदाज़ चट्टानों से भरा हुआ है. एटलस का काम ऐसे टुकड़ों का पता लगाना है, जो हमारी धरती के लिए ख़तरा बन सकते हैं.
जॉन टोनरी ने बताया कि उनकी टीम ने केवल एक रात की निगरानी से दस लाख टुकड़ों में से 2018 एलए को खोज निकाला था. आसमान में लगातर आतिशबाज़ी होती रहती है. उल्कापिंड जलते रहते हैं. धूमकेतु तैरते हैं. तारे आपस में टकराकर जलते हैं.
इनमें से दस या बीस ही एटलस सिस्टम की निगरानी के दायरे से बाहर हैं. ये सारी ख़तरनाक हों, ये ज़रूरी नहीं है. ऐसे में कोई क्षुद्र ग्रह अगर धरती की तरफ़ बढ़ता दिखाई देता है, तो एटलस की दूरबीनें चेतावनी दे देती हैं. इस चेतावनी को एटलस की वेबसाइट पर डाल दिया जाता है.
नासा जैसे संस्थानों में काम कर रहे खगोलविद या इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के माइनर प्लानेट सेंटर में भी इस चेतावनी को पढ़ लिया जाता है. इससे उन्हें तुरंत आने वाले ख़तरे के बारे में पता चल जाता है. फिर वो धरती की तरफ़ आ रहे एस्टेरॉयड की निगरानी शुरू कर देते हैं. और खगोलविद इस बात का भी अंदाज़ा लगाने लगते हैं कि वो धरती पर कहां टकरा सकता है.
क्लीमेंस रंफ कहते हैं कि कुछ बड़े आकार के क्षुद्र ग्रह सूरज की कक्षा में नियमित रूप से तैरते रहते हैं. हो सकता है कि वो धरती के रास्ते में पड़ जाएं, या न भी पड़ें. ऐसे क्षुद्र ग्रहों के टकराने या न टकराने की भविष्यवाणी करना आसान है.
इंसानों को कैसा बचाया जा सकेगा
लेकिन, हर खगोलीय चट्टान का मिज़ाज अच्छा हो, ये नहीं कहा जा सकता. कई तो ऊटपटांग कक्षा में भी घूम रहे होते हैं. वो अचानक से आकर धरती से टकरा सकते हैं. ऐसे ख़तरों से इंसान को बचाने में एटलस जैसे सिस्टम काफ़ी कारगर साबित हो सकते हैं.
एरिज़ोना यूनिवर्सिटी की एलेसांड्रा स्प्रिंगमैन कहती हैं कि अगर कोई उल्कापिंड रडार की पकड़ में आ जाता है, तो आप उससे धरती को ख़तरे का अनुमान लगा सकते हैं. ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हमारी धरती के वातावरण में प्रवेश के बाद वो कितना ख़तरनाक होगा. कोई भी क्षुद्र ग्रह जितना बड़ा और भारी होगा, उससे हमें उतना ही ज़्यादा ख़तरा होगा.
लेकिन, अगर कोई ऐसा धूमकेतु, उल्कापिंड या क्षुद्र ग्रह हो, जो हज़ारों-लाखों लोगों के लिए ख़तरा बनने वाला हो, तो क्या होगा? अगर इससे इतना कचरा धरती पर गिरने की आशंका हो कि पृथ्वी की जलवायु पर लंबे वक़्त के लिए असर पड़े, तो क्या होगा?
मोटे तौर पर ये मान लीजिए कि हम ऐसे किसी क्षुद्र ग्रह का पता पहले से लगा लेंगे. हमें इससे बचने के लिए थोड़ा वक़्त मिल जाएगा.
एलेसांड्रा स्प्रिंगमैन कहतीं है कि इस तरह के एस्टेरॉयड से बचने के लिए कोई अंतरिक्ष यान इसकी तरफ़ भेजा जा सकता है, जो इससे टकराकर अंतरिक्ष में ही ख़त्म कर दे. या उसका रास्ता बदल देगा. अगर समय कम हो, तो कोई बम भी इस क्षुद्र ग्रह पर फेंका जा सकता है.
अगर, हम ऐसे किसी ख़तरे को धरती से दूर रख पाए, तो इसका पूरा श्रेय उन वैज्ञानिकों को जाएगा, जो हमें ये बताएंगे कि कोई उल्का पिंड कितना बड़ा है और कितनी तेज़ी से धरती की तरफ़ बढ़ रहा है. और इससे हमें कितना बड़ा ख़तरा है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)
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