क्या एलईडी लाइट्स हमें बीमार कर रही हैं?

    • Author, लूसी जोन्स
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बड़े ज़ोर-शोर से अपनी उजाला योजना का प्रचार करती है. ख़ुद पीएम मोदी ने देश भर में एलईडी बल्ब बांटने और सस्ती दरों पर बेचने से देश को भारी बचत होने का कई बार दावा किया है.

पिछले साल फरवरी में पीएम मोदी ने संसद को बताया था कि देश भर में उजाला योजना के तहत 21 करोड़ से ज़्यादा एलईडी बल्ब बांटे गए. इससे देश ने क़रीब 11 हज़ार करोड़ रुपयों की बचत की.

भारत में हर साल क़रीब 77 करोड़ बल्ब बेचे जाते हैं. सरकार की योजना है कि इनकी जगह एलईडी बल्ब ही बिकें. इससे क़रीब 105 अरब बिजली की बचत होने का अनुमान है. लोगों के बिजली बिल भी कम आएंगे और पर्यावरण के लिए घातक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा.

एलईडी को लेकर ये शोर सिर्फ़ भारत में हो ऐसा नहीं है. पिछले एक दशक में ज़्यादातर यूरोपीय देशों और अमरीका ने अपने शहरों को रोशन करने के लिए बड़ी तादाद में एलईडी बल्ब लगाए हैं.

नीली रोशनी के ख़तरे?

पेरिस से लेकर ब्रुकलिन तक स्थानीय परिषदों और निकायों ने ज़्यादा बिजली खाने और गर्मी पैदा करने वाले पीले सोडियम बल्बों की जगह एलईडी बल्ब लगाने का अभियान छेड़ रखा है. एलईडी बल्ब में एक डायोड होता है, जिससे नीली रोशनी निकलती है. ये पुराने बल्बों की पीली रोशनी के मुक़ाबले आंखों को चुभने वाली हो सकती है.

स्ट्रीट लाइट और विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाली होर्डिंग में लगी एलईडी लाइट के अलावा भी हम रोज़ाना इस तीखी नीली रोशनी से वाबस्ता होते हैं. हमारे स्मार्टफ़ो और कंप्यूटर से लेकर टीवी तक में यही तीखी नीली रोशनी वाली एलईडी लाइट्स लगी होती हैं. और अब तो सरकार घर-घर में एलईडी लाइट्स लगवाने में जुटी है.

लेकिन, इस बिजली और पैसे बचाने वाली एलईडी रोशनी के चक्कर में हम कहीं अपनी सेहत को तो दांव पर नहीं लगा रहे?

ये सवाल हाल की एक रिसर्च से उठा है. इस साल की शुरुआत में दुनिया भर के मशहूर मनोचिकित्सकों ने साइकियाट्री के वर्ल्ड जर्नल ऑफ़ बायोलॉजी में एक रिसर्च पेपर लिखा था. इसमें एलईडी लाइट से दिमाग़ी बीमारी के ख़तरे के प्रति आगाह किया गया था.

बाइपोलर डिस-ऑर्डर को न्योता?

इस पेपर में मनोचिकित्सकों ने नीली रोशनी के हमारी नींद और शरीर की अंदरूनी घड़ी पर पड़ने वाले बुरे असर के प्रति आगाह किया था. हम जिस तरह से अपनी सेहत के लिए डिजिटल ऐप और दूसरी मशीनें इस्तेमाल कर रहे हैं, इससे किशोरों और युवाओं में एलईडी लाइट्स के कई बुरे प्रभाव देखने को मिल सकते हैं.

शिकागो के फीनबर्ग स्कूल ऑफ़ मेडिसिन में साइकियाट्री ऐंड बिहैवियरल साइंसेज़ के क्लिनिकल असिस्टेंट प्रोफ़ेसर जॉन गॉटलिब कहते हैं कि, 'एलईडी रोशनी से जुड़ी मेरी चिंता उस पुरानी बात को लेकर है, जिसमें हमने देखा था कि पागलपन और बाइपोलर डिसॉर्डर जैसी बीमारियों का रोशनी से नाता है'. गॉटलिब ने भी इस रिसर्च पेपर में अपना योगदान दिया था.

प्रोफ़ेसर गॉटलिब कहते हैं कि, 'मैंने पहले ही ये देखा था कि डिप्रेशन के शिकार लोगों के इलाज में तेज़ रोशनी से काफ़ी मदद मिलती है. लेकिन मुझे धीरे-धीरे इस बात का अंदाज़ा हुआ कि दिमाग़ी बीमारी की सूरत में बेवक़्त की रोशनी हमारे ऊपर बुरा असर डालती है. इसका हमारे सोने-जागने के चक्र पर भी बुरा असर पड़ता है'.

स्मार्टफोन का बुरा असर

इस रिसर्च पेपर ने अंदेशा जताया है कि एलईडी लाइट्स के बढ़ते इस्तेमाल का दिमाग़ी तौर पर बीमार लोगों के इलाज पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इसी तरह, अगर सेहतमंद लोगर वो मोबाइल या दूसरे तरह के डिजिटल ऐप के ज़रिए अपनी सेहत की निगरानी करते हैं. जैसे कि मूड में बदलाव, या ब्लड प्रेशर नापना और अगर वो ये काम सोने से ठीक पहले करते हैं. तो, इसका बुरा असर उनकी नींद पर पड़ता है. उनकी बॉडी क्लॉक गड़बड़ हो जाती है. इसका उनकी सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव होता है.

प्रोफ़ेसर गॉटलिब कहते हैं कि, 'आज स्मार्टफ़ोन बहुत आम हैं. इसी वजह से लोगों की ये सेहत के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बनते जा रहे हैं. अब इनके साथ अगर घर मे भी एलईडी बल्ब लगे हैं. सड़कों पर भी लगे हैं. पब, बार, सिनेमाहॉल से लेकर ट्रैफ़िक सिग्नल और पढ़ने के ठिकानों जैसे लाइब्रेरी या यूनिवर्सिटी में भी एलईडी बल्ब लगे हैं, तो इनसे रोशनी वाला प्रदूषण फैल रहा है. इंसान आज इस प्रदूषण का शिकार हो रहा है'.

'सोने के पहले न देखें फोन'

नीली रोशनी के हमारे ऊपर असर को लेकर पहले भी रिसर्च हुई हैं. ये रिसर्च बताती हैं कि नीली रोशनी की वजह से हमारे शरीर को नींद की याद दिलाने वाले केमिकल मेलाटोनिन का रिसाव रुक जाता है. इससे हमारी नींद पर प्रभाव पड़ता है. नींद न आने से हमारी 'क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़' गिरती है. दिमाग़ी सेहत बुरी होती जाती है.

हमारे दिमाग़ी तौर पर बीमार होने का ख़तरा बढ़ जाता है. बच्चों और किशोरों में नींद न आने या बेवक़्त आने पर हुई रिसर्च बताती हैं कि इसक सीधा ताल्लुक़, उनके डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल से है. मसलन, कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन.

अमरीका की नेशनल स्लीप फाउंडेशन की सलाह है कि लोग सोने के लिए बिस्तर पर जाने से कम से कम आधे घंटे पहले लोग आधुनिक उपकरणों को बेडरूम से बाहर का रास्ता दिखा दें. लेकिन, फिलहाल दिमाग़ी तौर पर बीमार या बायोलॉजिकल क्लॉक में गड़बड़ी के शिकार लोगों के लिए ऐसी कोई गाइडलाइन नहीं है.

पूरी दुनिया में एलईडी लाइट्स का विस्तार हो रहा है. इन्हें लेकर हमारा पूरा ध्यान अभी बेहतर रोशनी और बिजली बचाने पर है. लेकिन, अब वैज्ञानिक और स्वास्थ्य के विशेषज्ञ एलईडी उद्योग के साथ मिलकर एलईडी में नीली रोशनी की तादाद कम करने में जुटे हैं. वो ऐसे बल्ब बनाने में जुटे हैं, जो दिमाग़ी बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर बुरा असर नहीं डालेंगे.

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