धरती पर वो जगहें, जहाँ सामने दिखती है मौत

    • Author, इला डेविस
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ

हम सब कई बार क़ुदरत के क़हर के शिकार हुए हैं. कभी हवा तो कभी पानी ने हम पर ज़ुल्म ढाया है. कभी हम तेज़ तूफ़ान में फंसे, तो कभी धूप की तुर्शी ने हमें जलाया है.

हां, इसकी वजह से हमारी जान नहीं गई. मगर धरती में ऐसी कई जगहें हैं जहां क़ुदरत जान लेने पर आमादा हो जाती है. इन जगहों को हम क़ुदरत के चार नज़रानों के हिसाब से बांट सकते हैं.

इनमें से पहला है पानी.

पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर भी मुमकिन नहीं. क्योंकि जल ही जीवन है. लेकिन अगर इसे गुस्सा आ जाए तो ये जानलेवा भी हो सकता है.

समुद्र किनारे बसने वाले तो अक्सर ही समुद्र के गुस्से को बर्दाश्त करते हैं. हिंद महासागर के पास बसा देश मालदीव इससे अछूता नहीं है. इसीलिए उसे अल्पकालिक देश कहा जाता है. मतलब आने वाले वक़्त में मालदीव, दुनिया के नक़्शे से मिट जाने का डर है.

सुनामी का पता पहले चलेगा

असल में मालदीव समुद्र के स्तर से थोड़ा नीचा है, लिहाज़ा जब भी समुद्र की लहरें उफान भरती हैं तो इसे अपनी चपेट में ले लेती हैं. हर साल बदलती धरती की आबो-हवा भी इसमें बड़ा रोल निभाती है. सबसे बुरा हाल तो तब होता है, जब अचानक समुद्र में तूफ़ान आता है और सुनामी जैसे हालात पैदा हो जाते हैं.

दरअसल जब समुद्र में एक के बाद एक ऊंची लहरें उठती हैं तो इससे समुद्र की गति में भी बदलाव आता है. और सुनामी आ जाती है जो अपने साथ जान-माल का भारी नुक़सान लाती है. अमरीकी नेशनल वेदर सर्विस के मुताबिक़ प्रशांत महासागर में 71 फ़ीसद मौक़ों पर सुनामी आने के हालात बने रहते हैं. इसके अलावा भूकंप के चलते भी सुनामी आ सकती है.

हालांकि अब ऐसी तकनीक खोज ली गई हैं, जिससे घातक सुनामी के आने से पहले ही एहतियाती क़दम उठाए जा सकते हैं. इसके लिए पहले से ही लोगों को ख़बर कर दी जाती है.

लेकिन, कई मर्तबा समुद्र में इतनी जल्दी हलचल होती है और सुनामी आ जाती है कि लोगों को हटाने के लिए बीस मिनट तक का समय नहीं मिल पाता. और हज़ारों जाने पल भर में चली जाती हैं. हाल की वर्षों में सबसे ख़तरनाक सुनामी हिंद महासागर में साल 2004 में आई थी जिसने क़रीब 15 देशों में दो लाख अस्सी हज़ार जानें निगल ली थी.

सैलाब का कितना डर?

1931 में चीन की यांग्त्सी नदी में आया सैलाब भी कोई भुला नहीं सकता. हालांकि रिकॉर्ड मौत के आंकड़े को कम ही आंकते है. फिर भी कहा जाता है कि इस सैलाब में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. इस सैलाब की वजह थी भारी बर्फ़बारी और बारिश.

जिसकी वजह से नदी का जल स्तर बढ़ गया था और उसके आस पास रहने वालों को इसकी क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी. चीन में आज पानी के किनारे लाखों ज़िंदगियां आबाद हैं. ये पानी इनके जीवन की बुनियादी ज़रूरत को तो पूरा करता है लेकिन कभी भी ये इस पानी के गुस्से का शिकार हो सकते हैं.

क़ुदरत की दूसरी नेमत है हवा.

अफ़्रीक़ा में बहुत सी क़ातिल झीलें हैं. लेकिन इन झीलों का पानी मुसीबत नहीं लाता है. दरअसल ये झीलें ऐसे इलाक़े में हैं, जहां आस-पास ज्वालामुखी हैं और उनमें लगातार हलचल होती रहती हैं.

कैमरून की 'न्योस' और कांगो-रंवाडा की सीमा पर स्थिन 'कीवू' ऐसी ही दो झीलें हैं, जिनमें ख़तरा बसता है. जिनके इलाक़े में ज्वालामुखी लगातार सक्रिय रहते हैं. जिसके नतीजे में यहां की ज़मीन से कार्बनडाई ऑक्साइड गैस रिसती रहती है.

जब ज़मीन के अंदर इस गैस का ग़ुबार फटता है तो एक बादल सा बन जाता है. चूंकि गैस हवा के मुक़ाबले ज़्यादा भारी होती है लिहाज़ा वो जितनी जगह घेरती है, उतनी जगह की ऑक्सीजन को ख़त्म कर देती है.

1980 में कैमरून की न्योस झील में ऐसे ही दो विस्फोट हुए थे जिसके नतीजे में 1700 लोगों की जान गई थी और करीब 3500 जानवर दम घुटने से मौत की नींद सो गए थे.

हवा का ख़तरनाक होना

हालांकि जानकारों का कहना है कि गैस के रिसाव को रोकने के नायाब तरीक़े खोज लिए गए हैं. पाइप लाइन के ज़रिए इस गैस को झील से बाहर निकालने का इंतज़ाम कर लिया गया है.

इसी तरह 'कीवू' झील की ज़मीन से भी मीथेन गैस का रिसाव बड़े पैमाने पर होता है. जो कभी भी जानलेवा साबित हो सकती है. हालांकि इस गैस के इस्तेमाल से बिजली पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं.

लेकिन सिर्फ़ गैस ही ख़तरनाक नहीं. अगर हवा ताक़तवर होकर अपना तेवर देखाए तो कैसे पल भर में सब कुछ तहस नहस कर सकती है. अंटार्कटिका का 'केप डेनिसन' इलाक़ा धरती पर सबसे तेज़ हवाओं वाला इलाक़ा है. हालांकि ये एक ग़ैर-आबाद इलाक़ा है.

तबाही का हैती से रिश्ता

लेकिन इस इलाक़े की हवाएं दूर दूर तक फैले आबादी के इलाक़ों पर अपना असर डालती हैं. और बर्बादी की दास्तान लिख जाती हैं. समुद्री तूफ़ानों से तबाही का शिकार सबसे ज़्यादा अगर कोई होता है तो वो है कैरेबियाई देश हैती. ये देश मेक्सिको की खाड़ी में बनने वाले हरीकेन के हाइवे में पड़ने वाला देश है. और ये ग़रीब भी है.

आर्थिक रूप से कमज़ोर देशों को इस तरह की क़ुदरती आफ़तों की मार सबसे ज़्यादा झेलनी पड़ती है. इस तरह की क़ुदरती आफ़तों से बचने के लिए पहले से सूचना का होना ज़रूरी है. इसके लिए मौसम विभाग का नई तकनीक और मशीनों से लैस होना जरूरी है. और इसके लिए मोटी रक़म ख़र्च होती है जोकि आर्थिक तौर पर कमज़ोर देशों की पहुंच से बाहर होता है.

जर्मनी की स्टुटगार्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर योर्न बिर्कमैन का कहना है तूफ़ान ज़्यादा घातक इसलिए भी होते हैं क्योंकि इनकी भविष्यवाणी करना मुश्किल होता है. इसके अलावा लोगों के पास जानकारी का अभाव होता है जिसकी वजह से नुक़सान ज़्यादा होता है.

हाल ही में 'यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी' ने क़ुदरत के क़हर के जोखिम वाले देशों पर एक रिपोर्ट जारी की जिसकी फेहरिस्त में प्रशांत महासागर में स्थित 'वानुआतू' नंबर एक पर है, जहां साल 2016 में करीब एक तिहाई आबादी क़ुदरती आफ़त का शिकार हुई.

क़ुदरत के चलते लाखों की मौत

2015 में कुछ ही हफ़्तों के अर्से में यहां भूकंप आया, ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ, तूफान आया लेकिन फिर भी मरने वालों की संख्या कुल 11 थी. जबकि साल 1970 में जब बांग्लादेश में 'भोला तूफ़ान' आया था तो उसने क़रीब पांच लाख लोगों की जान ली थी. ये आंकड़े इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि तकनीक की मदद से प्राकृतिक आपदाओं पर नियंत्रण किया जा रहा है.

क़ुदरत के क़हर का तीसरा ज़रिया है ज़मीन.

धरती के अंदर बहुत सी प्लेंटें तैरती रहती हैं. जिससे बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पन्न होती है. जब ये ऊर्जा अपना दबाव बनाती है या ये प्लेंटें आपस में टकराती हैं तो इससे धरती के अंदर भारी तरंगे पैदा होती हैं जिसके नतीजे में भूकंप आता है.

1556 में चीन के 'शांक्सी' में आया भूकंप अब तक का सबसे ख़तरनाक भूकंप माना जाता है जिसने क़रीब आठ लाख लोगों की जान ली थी. जब भी बड़ा भूकंप आता है तो अक्सर अपने साथ सुनामी भी लाता है.

इसकी वजह से इंसान को दोहरी मार झेलनी पड़ती है. हालांकि जिन इलाक़ों में भूकंप आने का अंदेशा ज़्यादा रहता है वहां अक्सर ऐसी इमारतें बनाई जाती हैं जिससे भूकंप आने पर कम से कम नुक़सान हो.

भूकंप का ख़तरा

प्रशांत महासागर के नीचे सेंट आंद्रे फॉल्ट है. जहां पैसिफ़िक प्लेट और अमेरिकन प्लेट एक दूसरे से मिलती हैं. इनकी वजह से अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में भूकंप आने का ख़तरा मंडराता रहता है. मगर अमीर देशों के पास क़ुदरत से लड़ने के ज़्यादा ज़रिए होते हैं.

इसीलिए लॉस एंजेलेस और टोक्यो जैसे शहरों में भूकंप रोधी इमारतें बना ली जाती हैं. वहीं भूकंप के लिहाज़ से सबसे ख़तरनाक इलाक़े पैसिफिक रिंग ऑफ़ फायर, जहां दुनिया के 81 फ़ीसद भूकंप आते हैं, वहां स्थित ज़्यादातर देश संसाधन कम होने से नुक़सान झेलते हैं.

इंसान को जो एक और क़ुदरती चीज़ नुक़सान पहुंचाती है, वो है आग.

ज़मीन के ऊपर जो कुछ होता है उसका सीधा संबंध धरती के अंदर चल रही गतिविधियों से होता है. जब धरती के अंदर टेक्टॉनिक प्लेटें एक दूसरे से टकराती हैं तो उससे भूकंप आता है. मगर जब यही प्लेटें एक दूसरे से दूर जाती हैं तो ज्वालामुखी विस्फ़ोट होता है.

अफ्रीकी देश इथियोपिया में डानाकिल डिप्रेशन ऐसी जगह है जहां का माहौल इंसान के लिए सबसे ज़्यादा जानलेवा माना जाता है. यहां का सालाना औसत तापमान 34.4 डिग्री सेल्सियस रहता है.

ये दुनिया का सबसे गर्म और सबसे कम बारिश वाला इलाक़ा है. यहां नमक की झीलें हैं. डानाकिल डिप्रेशन में स्थित पहाड़ आग उगलते हैं. मगर अफार जनजाति के लोग इस इलाक़े को अपना घर बताते हैं.

ज्वालामुखी के पास बसावट

असल में इंसान की फ़ितरत है कि वो ख़तरनाक इलाक़ों में अपना आशियाना बनाता है. मिसाल के तौर पर इटली के माउंट विसूवियस को लीजिए. इस ज्वालामुखी में विस्फोट से पॉम्पियाई नाम का शहर लावे में दब गया था.

मगर इसके क़रीब ही आज नेपल्स शहर बस गया है. मेक्सिको में पोपोकेटेपीटल ज्वालामुखी के पास ही मेक्सिको सिटी शहर बसा है.

2015 में प्रकाशित हुई एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले 400 सालों में ज्वालामुखी विस्फोटों से क़रीब दो लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. ज्वालामुखी विस्फोट के लिहाज़ से इंडोनेशिया को सबसे ख़तरनाक देश बताया गया है.

1815 में 'सुंबावा द्वीप' के 'ताम्बोरा ज्वालामुखी' के संपर्क में आने से क़रीब 70 हज़ार लोगों की जान चली गई थी. यही नहीं जब ये ज्वालामुखी फटते हैं, तो, अपने पीछे सूखे के हालात छोड़ जाते हैं. भुखमरी से भी बड़े पैमाने पर लोगों की जान जाती है.

हालांकि अब नई तकनीक के सहारे इस सारी आपदाओं से इंसान ने काफ़ी हद तक ख़ुद को महफ़ूज़ कर लिया है. लेकिन बहुत बार क़ुदरत कुछ सोचने तक का समय नहीं देती. और ये तब ज़्यादा होता है जब हम उसके साथ खिलवाड़ ज़्यादा करते हैं. लिहाज़ा क़ुदरत से खिलवाड़ मत करिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)