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अंतरिक्ष कारोबार की होड़ में शामिल ऑस्ट्रेलिया
- Author, रिचर्ड हॉलिंगम
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अंतरिक्ष का कारोबार काफ़ी तेज़ी से फैल रहा है. जिन देशों के पास अंतरिक्ष में जाने, सैटेलाइट लॉन्च करने की तकनीक है, वो काफ़ी पैसे कमा रहे हैं.
मगर, अंतरिक्ष की तकनीक विकसित करने में भी काफ़ी पैसों की ज़रूरत होती है. बहुत से विकसित देश भी हैं जो ज़्यादा निवेश के चलते अंतरिक्ष की रेस से अलग हैं.
ऐसा ही देश है ऑस्ट्रेलिया. जो विकसित देश होने के बावजूद स्पेस रेस में बहुत पीछे छूट गया है. अब कुछ लोग ऑस्ट्रेलिया को फिर से अंतरिक्ष की रेस में शामिल करने में जुटे हैं.
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मगर, ऑस्ट्रेलिया हमेशा से स्पेस रेस से अलग नहीं था. आधी सदी पहले ऑस्ट्रेलिया में भी अच्छा ख़ासा स्पेस सेंटर था. ये स्पेस सेंटर, दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के रेगस्तानी इलाक़े में वूमेरा नाम की जगह पर था.
वूमेरा से 28 अक्टूबर 1971 को गोली की तरह के ब्लैक एरो रॉकेट ने अंतरिक्ष में छलांग लगाई थी. इसके ज़रिए ब्रिटेन के प्रॉस्पेरो सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा गया था. ये पिछले दस सालों की मेहनत का फल था.
इससे ऑस्ट्रेलिया में अंतरिक्ष के नए युग की शुरुआत हो सकती थी. जैसे आज नासा का केप केनावरल या रूस का बैकानूर स्पेस सेंटर मशहूर हैं, वैसे वूमेरा भी दुनिया के मशहूर अंतरिक्ष केंद्रों में शुमार हो सकता था.
ब्रिटेन का वो लॉन्चर कार्यक्रम रद्द कर दिया गया. इसके बाद वूमेरा को भी उसके हाल पर छोड़ दिया गया. ऑस्ट्रेलिया के एडीलेड शहर से क़रीब पांच सौ किलमीटर दूर स्थित वूमेरा में आज भी फौजी साजो-सामान का परीक्षण होता है. मगर यहां का स्पेस सेंटर वीरान पड़ा है.
ब्रिस्बेन की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी के माइकल स्मार्ट इस जगह में फिर से जान डालने में जुटे हैं. वो कहते हैं कि फिलहाल ये जगह कुछ भी नहीं. हालांकि अब माइकल और उनकी टीम नई पीढ़ी के स्क्रैमजेट अंतरिक्ष यान का परीक्षण कर रही है.
स्क्रैमजेट साठ के दशक में विकसित किए गए थे. आम इंजनों से अलग ये स्क्रैमजेट हवा को खींचकर उसके ज़रिए ईंधन जलाते हैं और उसकी मदद से उड़ान भरते हैं. ये आवाज़ से पांच गुनी से भी तेज़ रफ़्तार से उड़ते हैं, जबकि बाक़ी जेट इंजन हवा को दबाकर ईंधन जलाते हैं.
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दिक़्क़त ये है कि स्क्रैमजेट को काम करने के लिए पहले उसे आवाज़ से पांच गुनी तेज़ रफ़्तार से उड़ाना ज़रूरी होता है. ऐसे में उनका इस्तेमाल कैसे हो, ये सवाल बना हुआ है.
स्क्रैमजेट को आवाज़ से पांच गुना ज़्यादा रफ़्तार तक पहुंचाने के लिए माइकल और उनकी टीम एक रॉकेट का इस्तेमाल करने का इरादा रखती है.
इसके लिए उन्होंने स्पार्टन के नाम से लॉन्चिंग सिस्टम तैयार किया है, जो स्क्रैमजेट को अंतरिक्ष में आवाज़ से पांच गुना ज़्यादा रफ़्तार से ले जाकर छोड़ेगा. वहां से आगे की उड़ान स्क्रैमजेट अपनी ताक़त से भरेगा.
माइकल कहते हैं कि उनका प्रयोग कामयाब रहा तो सैटेलाइट प्रक्षेपण का खर्च काफ़ी कम हो जाएगा. इसके ज़रिए अंतरिक्ष की सैर भी की जा सकेगी. हालांकि वो ख़ुद इसके ज़रिए अंतरिक्ष में जाने से इन्कार करते हैं.
फ़िलहाल, सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए तीन स्टेज में तीन अलग रॉकेट इस्तेमाल होते हैं.
पहला रॉकेट आवाज़ से पांच-छह गुनी रफ़्तार से सैटेलाइट को लेकर जाता है. फिर दूसरा बूस्टर रॉकेट उसे आगे धकेलता है. फिर तीसरे स्टेज में तीसरा रॉकेट सैटेलाइट को अंतरिक्ष में उसकी कक्षा में स्थापित करता है.
माइकल का इरादा है कि वो सामान्य रॉकेट से पहले स्क्रैमजेट को अंतरिक्ष में पहुंचाएंगे. फिर स्क्रैमजेट, आख़िरी चरण के रॉकेट को आगे ले जाएगा. आख़िरी चरण का रॉकेट सैटेलाइट को अंतरिक्ष में स्थापित करेगा.
इसमें ख़ास बात ये होगी कि काम पूरा करके स्क्रैमजेट और आख़िरी दौर का रॉकेट अंतरिक्ष से धरती पर वापस आ जाएंगे. इनका फिर से इस्तेमाल हो सकेगा. यह ऐसी ख़ूबी है जो फिलहाल किसी और लॉन्चिंग सिस्टम में नहीं. इसी से सैटेलाइट लॉन्च का ख़र्च काफ़ी कम हो जाएगा.
अपने ख़्वाब की ताबीर के लिए माइकल स्मार्ट पिछले कई सालों से तमाम तजुर्बे कर रहे हैं. स्क्रैमजेट को हाइपरसोनिक या आवाज़ से कई गुना तेज़ उड़ान पर भेज रहे हैं. वो कहते हैं कि इसे क़ाबू में रखना बड़ी चुनौती है. इसलिए वो पूरी उड़ान को पहले से तय करके कंप्यूटर में फीड कर देते हैं.
माइकल स्मार्ट चाहते हैं कि उनका मिशन कामयाब हो तो ऑस्ट्रेलिया वापस स्पेस रेस में शामिल हो. सैटेलाइट लॉन्च करे और अंतरिक्ष की सैर के कार्यक्रम बनाए.
वैसे अगर स्क्रैमजेट का प्रयोग कामयाब रहा तो उसे हवाई उड़ानों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. इससे सिडनी से लंदन का हवाई सफ़र सिमटकर दो घंटों का ही रह जाएगा. हालांकि स्क्रैमजेट को रफ़्तार देने के लिए रॉकेट की ज़रूरत होगी. सवाल ये है कि क्या लोग रॉकेट से हवाई सफर करने को राज़ी होंगे?
वैसे इसके ज़रिए स्पेस मिशन ज़रूर भेजे जा सकते हैं. वूमेरा में अगले साल कुछ और टेस्ट होने हैं. जिनके बाद माइकल और उनकी टीम सैटेलाइट लॉन्च के लिए तैार होगी.
इस राह में सबसे बड़ी दिक़्क़त पैसे की है. अभी टेस्ट करने के लिए तो कम पैसों की ज़रूरत है, जिसका इंतज़ाम माइकल और उनकी टीम जैसे-तैसे कर ले रहे हैं.
मगर सैटेलाइट लॉन्च के लिए मोटी रक़म चाहिए. माइकल को उम्मीद है कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार इस काम में दिलचस्पी लेगी.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)