'डार्विन का सिद्धांत' तैयार करने में कौन थे साथ?

क्या आपने ब्रिटिश वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वॉलेस का नाम सुना है? साइंस के जानकार शायद वॉलेस के बारे में जानते हों, मगर बाक़ी दुनिया उनसे अनजान है.

इसलिए यहां बताना जरूरी हो जाता है कि अल्फ्रेड रसेल वॉलेस वो वैज्ञानिक थे, जिन्होंने चार्ल्स डार्विन के साथ मिलकर धरती पर ज़िंदगी के विकास की थ्योरी दी.

साइंस पढ़ने वाला हर शख़्स, डार्विन की 'थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन' से वाकिफ़ है. लेकिन इस दुनिया ने ये बात भुला दी कि डार्विन के साथ ही वॉलेस ने भी ज़िंदगी के क्रमिक विकास का ये सिद्धांत दुनिया को दिया. वो सिद्धांत, जिसने दुनिया देखने के हमारे नज़रिए को ही बदल दिया.

अल्फ्रेड रसेल वॉलेस ब्रिटेन के वेल्स सूबे में पैदा हुए. सन 1823 में. उन्हें क़ुदरत को नज़दीक से देखने और समझने का जुनून था. बहुत छोटी उम्र से ही उन्होंने तरह-तरह के कीड़े-मकोड़े इकट्ठे करने शुरू कर दिए. बढ़ती उम्र के साथ उनका ये जुनून बढ़ता गया.

वॉलेस ने जंगलों में जाकर तरह-तरह के जानवरों को इकट्ठा करने की सोची. वॉलेस अपने एक दोस्त हेनरी वॉल्टर बेट्स के साथ सबसे पहले दक्षिण अमेरिका में अमेज़न के जंगलों में गए. हेनरी खुद एक प्रकृतिवादी थे. लेकिन बाद में ये दोनों अलग होकर अमेज़न के जंगलों में नई प्रजातियों के बारे में खोज करने लगे.

वॉलेस की ये यात्रा करीब चार साल की थी. इन चार सालों में बहुत से जीव-जंतुओं का बड़ा सरमाया उन्होंने जमा किया. ब्रिटेन वापसी के दौरान उनकी नाव में आग लग गई. इस नाव पर सवार लोग तो बच गए लेकिन वॉलेस ने जो नमूने इकट्ठा किए थे वो तबाह हो गए. लेकिन इस हादसे ने वॉलेस के जुनून और जज़्बे को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया.

1854 में वॉलेस ने एक बार भी अपना सफ़र शुरू किया. इस बार वो खोज के लिए पूर्वी एशिया के सफ़र पर निकले थे. उस वक़्त यूरोप के बहुत से लोग इस दुनिया से वाक़िफ़ तक नहीं थे. वॉलेस अपने मिशन पर मलय द्वीपसमूह पहुंचे.

ये जगह वॉलेस के घर से बहुत दूर थी. उनका सफ़र लंदन से सिंगापुर तक का था. सिंगापुर पहुंचने में वॉलेस को छह हफ़्ते लगे. उन्होंने सिंगापुर को अपना ठिकाना बनाया. जहां वो अलग-अलग द्वीपों से तरह-तरह के कीड़े मकोड़े लाकर रखा करते थे. उनकी ये खोज करीब आठ साल तक जारी रही. इन आठ सालों में उन्होंने जितनी तरह के जीव-जंतु देखे और उन्हें क़रीब से जाना, उसके बाद चौकाने वाले नतीजे सामने आए.

वॉलेस की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने भी माना कि धरती और उस पर जीवन दोनों ही कुछ हज़ार साल पहले की उपज नहीं हैं. बल्कि दुनिया करोड़ों साल पुरानी है.

वॉलेस ने ये भी कहा कि दुनिया जैसी आज दिखती है, वैसी हमेशा नहीं थी. जहां पहले पहाड़ थे, वहां समतल धरती आ गई. और कहीं पर नए-नए पहाड़ बनने लगे. वॉलेस ने एक क़दम और आगे बढ़ाते हुए कहा कि धरती की तरह जिंदगी भी समय के साथ बदली है. जानवरों की तमाम नस्लें अपने विकास के बाद से कई बार बदली हैं.

1858 में वॉलेस, इंडोनेशिया के टरनेट द्वीप पर कुछ वक्त गुज़ारने गए थे. यहां उन्होंने एक निबंध लिखा. इस लेख ने जिंदगी के वजूद के बारे में इंसान की सोच हमेशा के लिए बदल दी. उन्होंने कहा, "जब एक प्रजाति अपने वजूद को बचाने के लिए संघर्ष करती है, तो वो किसी दूसरी प्रजाति में बदल जाती है".

वॉलेस ने अपना यही मत चार्ल्स डार्विन को भी भेजा, जिनके साथ वो अक्सर ही ख़तो-क़िताबत करते थे.

डार्विन भी क़रीब बीस सालों से अपनी ''थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन'' पर काम कर रहे थे. इसके लिए उन्होंने लैटिन अमरीका के गैलेपैगोस द्वीप समूह पर काफ़ी वक़्त बिताया था. लेकिन विरोध के डर से डार्विन ने अपने सिद्धांत को दुनिया के सामने नहीं पेश किया था.

लेकिन जब उन्हें वॉलेस का साथ मिला, तो डार्विन ने दोनों के नाम से ये नई थ्योरी प्रकाशित की.

इससे साइंस की दुनिया में तहलका मच गया. वॉलेस और डार्विन दोनों ही मशहूर हो गए. हालांकि बाद में जब जब डार्विन की क़िताब ''ऑन दा ओरिजन ऑफ स्पीशीज़ बाय मीन्स ऑफ़ नेचुरल सेलेक्शन'' प्रकाशित हुई तो लोग वॉलेस को भूल गए. आज वॉलेस अपनी आइलैंड बायोग्राफ़ी के लिए ज़्यादा जाने जाते हैं.

वॉलेस का मानना था कि धरती पर जीवों की तमाम नस्लों के विकास में द्वीपों का बड़ा योगदान रहा है. उन्होंने बताया कि प्रशांत महासागर में बहुत से द्वीप पहले एक दूसरे से जुड़े थे. मगर समंदर का स्तर बढ़ने के साथ ही ये सब डूब गए.

उन्होंने देखा कि बहुत से द्वीपों पर पाए जाने वाले जानवर एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे.

वॉलेस के मुताबिक़, पहले ऑस्ट्रेलिया से एशिया तक एक-दूसरे से जुड़े थे. मगर जब समंदर की वजह से अलगाव हुआ, तो जानवर छोटे द्वीपों में क़ैद होकर रह गए. इससे उनकी अलग-अलग नस्लें अलग द्वीपों पर विकसित हुईं.

समंदर में एक ख़ास जगह को वॉलेस लाइन कहा जाता है, जिसके पूरब की तरफ़ वो द्वीप हैं जहां ऑस्ट्रेलिया से मिलते जुलते जीव पाए जाते हैं. वहीं इसके पश्चिम में एशियाई द्वीप जैसे इंडोनेशिया-मलयेशिया वग़ैरह हैं, जहां के जीवों की नस्लें एकदम अलग हैं.

वॉलेस ने जानवरों के अलग-अलग रंगों के बारे में भी खूब लिखा है. जबकि उस दौर में साइंस ने इतनी तरक़्क़ी नहीं की थी. फिर भी 2016 में प्रकाशित हुए एक रिसर्च और वॉलेस की डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुरानी खोज में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं है.

वॉलेस ने कहा था कि ये दुनिया सिर्फ़ इंसान के भोगने के लिए नहीं है. इसलिए हमें क़ुदरत के संसाधनों का संभलकर इस्तेमाल करना चाहिए. आज डेढ़ सौ साल बाद भी हम ये बात ठीक से नहीं समझ सके हैं.

वॉलेस की कर्मभूमि रहे पूर्वी एशियाई देश आज भी ज़िंदगी के अनगिनत रंगों से गुलज़ार हैं. मगर, बढ़ते इंसानी दखल से यहां तमाम प्रजातियों पर ख़तरा मंडरा रहा है.

1869 में मलय द्वीपसमूह के बारे में वॉलेस ने जो किताब लिखी है वो उनके बेहतरीन कामों में गिनी जाती है.

वैज्ञानिकों के बीच ये काफ़ी पसंद की जाने वाली क़िताब है और आज भी वैज्ञानिक इसे पढ़ते हैं.

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