द्वितीय विश्व युद्ध: ऐसी रहस्यमयी आर्मी, जिसने हिटलर की नाज़ी सेना को धूल चटाने में मदद की

    • Author, मैथ्यू विल्सन
    • पदनाम, बीबीसी कल्चर

जब हम युद्ध के दौरान काम करने वाले ख़ास कलाकारों की बात करते हैं, तो हम असल में उन लोगों के बारे में सोचते हैं, जिन्होंने प्रोपेगैंडा करने और उसे फैलाने का काम किया.

लेकिन क्या होगा, जब मैं आपसे ये कहूँ कि ये भूलाए जा चुके नायक हैं और संघर्ष को समाप्त करने के लिए उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण थी?

बीसवीं सदी में हुए युद्धों में स्त्री और पुरुष, सैनिक और नागरिक समेत सभी तरह के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों ने किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया.

लेकिन इन युद्धों में कलाकारों, कला इतिहासकारों, पुरातत्व वैज्ञानिकों और कला जगत से जुड़े अन्य लोगों के योगदान में बारे में अब भी पूरी जानकारी मौजूद नहीं है.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लड़ने वाली सेना की दो टुकड़ियों की कहानी और किस तरह उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में काम करने वाले कलाकारों से सीख लेकर युद्ध की नई तरह की रणनीति को जन्म दिया और आधुनिक युद्ध में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बने, ये जानना दिलचस्प है.

इन टुकड़ियों ने पहली बार युद्ध के मैदान को एक 'बड़े रंगमंच' के रूप में देखा और यहाँ अपनी रचनात्मक रणनीति का प्रयोग किया.

शांति के दौर में सभी कलाकार अपनी कलाकारी से भ्रम यानी आँखों का धोखा पैदा करते हैं. वो रोशनी और परछाइयों का इस तरह इस्तेमाल करते हैं कि देखने वाले को असलियत से परे कुछ और ही नज़र आता है.

कला के हर नमूने का उद्देश्य भ्रम पैदा करना नहीं होता, हालाँकि पश्चिमी कला के इतिहास में इसके निशान ज़रूर मिलते हैं. 1960 के दशक में यूनानी चित्रकार ज़ुकसिस ने अंगूर के गुच्छों की ऐसी ख़ूबसूरत तस्वीर बनाई थी कि एक चिड़िया इन्हें असली अंगूर समझ कर खाने आ गई.

सालों से युद्ध के दौर में कलाकारों को सैनिकों और विमान चालकों से कमतर आँका जाता रहा है. लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेनाओं का इस बात का अहसास हुआ कि कलाकारों के ज्ञान और उनके काम से युद्ध में भी मदद ली जा सकती है. ख़ास कर आंखों का धोखा पैदा करने के मामले में.

आसमान से दुश्मन के ठिकाने की जानकारी इकट्ठा करने के इस दौर में चित्रकारों और मूर्तिकारों ने सेना के छिपने के लिए ऐसे ख़ास कपड़े और जाल (छलावरण) तैयार किए, जो दुश्मन को धोखा देने में सक्षम थे.

ये वो दौर था, जब पहली बार कलाकारों की कला का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जा रहा था.

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस तरह के जाल बनाने वाले एक अहम ब्रितानी कैमोफ्लॉज आर्टिस्ट थे सोलोमन जे. सोलोमन. वो रॉयल अकादमी के सदस्य थे और उन्होंने जाने माने फ्रांसीसी चित्रकार एलेंक्ज़ेडर काबानेल के साथ पढ़ाई की थी.

युद्ध के दौरान सोलोमन को सेना की उस टुकड़ी में शामिल किया गया, जो सेना को छिपाने की रणनीति तैयार करती थी. उन्हें पश्चिमी फ्रंट पर तैनात किया गया. सेना के ट्रैंच को दुश्मन की नज़र से छिपाने के लिए बनाए गए उनके विशेष जाल बेहद कारगर साबित हुए.

उन्होंने दुश्मन को चकमा देने से जुड़ी कई योजनाओं में काम किया. इनमें से एक था 'ऑब्ज़र्वेशन ट्री' यानी 'निरीक्षण के लिए पेड़ बनाना' जिसे नोमैन्स लैंड में लगा दिया जाता था. ये एक पेड़ के खोखले तने की तरह दिखता था लेकिन इसके भीतर से दुश्मन की सेना की हरकतों और उनके ट्रैंच पर नज़र रखी जा सकती थी.

युद्ध शुरू होने से पहले रॉयल कॉलेज ऑफ़ आर्ट में पढ़ाई कर चुके मूर्तिकार लियोन अंडरवुड 'ऑब्ज़र्वेशन ट्री' को युद्ध के मैदान में लगाने के ख़तरनाक काम में शामिल हुए.

एक और कलाकार, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कला के माध्यम से अपना योगदान दिया- वो थे नॉर्मन विल्किन्सन. युद्ध से पहले वो एक आम चित्रकार के रूप में काम करते थे. वो द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ के लिए पोस्टर और चित्र बनाया करते थे.

युद्धपोतों को बचाने का काम

रॉयल नेवी में काम के दौरान नॉर्मन विल्किन्सन युद्धपोत को घातक टॉरपीडो मिसाइलों से बचाने से जुड़ी संभावनाओं पर काम करने लगे थे.

वो ये समझ पा रहे थे कि समंदर के भीतर युद्धपोत को पूरी तरह दुश्मन की नज़र से छिपाना नामुमकिन हो सकता है. उन्होंने डिस्रप्टिव कैमोफ्लॉज या डैज़ल नाम की एक ख़ास तकनीक बनाई, जिसमें वो अलग-अलग रंगों से चित्र बनाकर पूरे युद्धपोत को रंग देते थे.

उनका उद्देश्य था कि विभिन्न रंगों और आकारों के कारण बने पैटर्न से दुश्मन भ्रमित हो जाए और उसे न तो पोत की असल गति का अंदाज़ा लग पाए और न ही उसकी सही जगह का पता लग पाए.

लंदन में मौजूद रॉयल अकादमी के चार स्टूडियो में उन्होंने अपनी इस योजना को अंजाम दिया. इस दौरान उनके साथ अन्य कलाकारों के अलावा जानेमाने ब्रितानी पेंटर एडवर्ड वड्सवर्थ ने भी काम किया.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों को चकमा देने के लिए सोलोमन, अंडरवुड, विल्किन्सन और वड्सवर्थ की बनाई छिपाने की कैमोफ्लॉज तकनीकों से प्रेरणा ली गई थी. हालांकि नई पीढ़ी के कलाकार भ्रम पैदा करने में पहले के कलाकारों से दो क़दम आगे ही साबित हुए.

1942 में उत्तर अफ्रीका के रेगिस्तान में मित्र राष्ट्रों की सेना जर्मनी, इटली और जापान के गठजोड़ से बने धुरी राष्ट्रों की सेना से लड़ रही थी. सितंबर 16 को दो ब्रितानी सैनिकों, जोफरी बार्कास और टोनी आयर्टन को मिस्र के बुर्ज-अल-अरब में एक उच्चस्तरीय बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया गया.

बार्कास और आयर्टन मिडल ईस्ट कमांड कैमोफ्लॉज विभाग में काम किया करते थे. सेना की ये टुकड़ी युद्ध के मैदान में सेना के हथियार, साजो-सामान और सैनिकों को छिपाने के अभियानों पर काम करती थी.

बड़े पैमाने परकाम

सेना के लिहाज़ से ये एक अलग ही तरह का विभाग था. यहाँ बार्कास और आयर्टन के साथ काम करने वाले युद्ध में शामिल हुए ख़ास तालीम प्राप्त सैनिक नहीं बल्कि कलाकार, सेट डिज़ाइनर और कार्टूनिस्ट थे, जिन्हें दुश्मन की नज़रों में भ्रम पैदा करने का सामान बनाने के लिए नियुक्त किया गया था. इनमें उस दौर के एक जानेमाने जादूगर भी शामिल थे.

आयर्टन एक पेंटर थे, जबकि बार्कास लेखक, फ़िल्म निर्माता और निर्देशक थे. 1936 में उनकी बनाई एक डॉक्यूमेन्ट्री को ऑस्कर पुरस्कार मिला था.

बुर्ज-अल-अरब में हुई बैठक में इन दोनों को अल-अलामीन में होने वाले दूसरे युद्ध के लिए एक टॉप-सीक्रेट प्लान बनाने के लिए कहा गया. उन्हें कहा गया था कि ये ये लड़ाई युद्ध की दिशा बदल सकती है और रेगिस्तान में लड़ी गई विश्व इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाई साबित हो सकती है.

बार्कास और आयर्टन को उस वक्त बेहद आश्चर्य हुआ, जब उन्हें बताया गया कि मित्र देशों की सेना के लिए सबसे अहम रणनीति बनाने का काम उनके हवाले होगा. कुछ देर के लिए दोनों एक दूसरे का मुँह ताकने लगे.

वो सोच में पड़ गए थे कि मिडल ईस्ट कमांड के पास कई युद्धपोत, लड़ाकू विमान, टैंक और हथियार थे. ऐसे में कमांड को कलाकारों की क्या ज़रूरत आन पड़ी?

पहले के कलाकारों से प्रेरणा

इससे पहले तक मिडल ईस्ट कमांड कैमोफ्लॉज विभाग केवल सेना के साजो-सामान और सैनिकों के छिपने की तकनीकों पर काम करता था. वो हवाई पट्टी को काले और भूरे रंग से पेंट कर देते थे, जिस पर हथियारों की परछाईं को कुछ इस तरह बनाया जाता था कि धुरी राष्ट्रों की सेना को वहाँ कुछ न होने का भ्रम हो.

लड़ाकू विमान रखे जाने वाले हैंगर को वो रिहाइशी इलाक़ों के घरों की तरह पेंट करते थे, ताकि आसमान से देखने पर वहाँ सैन्य अड्डा होने का अहसास दुश्मन को न हो. एक तरह से कहा जाए, तो वो विल्किन्सन और सोलोमन की ईजाद की गई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे थे.

लेकिन सितंबर 1942 में मित्र देशों को दुश्मन को चकमा देने के लिए और अधिक भ्रम पैदा करने की ज़रूरत महसूस हुई. जानेमाने जर्मन जनरल इर्विन रोम्मेल उत्तर अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की सेना का नेतृत्व कर रहे थे. उनके लगतार आगे बढ़ते रहने, उनकी तकनीकी जानकारी और बेहतर हथियारों से मित्र देशों की सेना में डर का माहौल था.

लड़ाई जीतने के लिए मित्र देशों की सेना को जर्मनी और इतालवी सेना को चकमा देना था और उन्हें ये समझने पर मजबूर करना था कि हमला अभी नहीं होगा और जिस रास्ते हमले की उम्मीद है उस रास्ते दुश्मन नहीं आएगा.

नकली सेना खड़ी करने के लिए 28 दिन का समय

इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए उन्हें लड़ाई के मैदान के उत्तर की तरफ इतने नकली टैंक खड़े करने थे कि दुश्मन को भ्रम हो कि हमला इसी तरफ़ से होने वाला है. इसके साथ उन्हें दक्षिण की तरफ कम से कम 600 नकली गाड़ियों का काफ़िला तैयार करना था कि ताकि धुरी राष्ट्र की सेना को लगे कि उत्तर दिशा के साथ-साथ एक और शक्तिशाली हमला दक्षिण की तरफ़ से भी होने वाला है.

बार्कास और आयर्टन समेत कैमोफ्लॉज विभाग की उनकी पूरी टीम के सामने नकली टैंक और गाड़ियाँ बनाने के लिए केवल 28 दिनों का समय था. साथ ही उनके सामने ये भी चुनौती थी कि वो सेना और असली हथियारों को दुश्मन की नज़रों से छिपा कर रखें.

दक्षिण की दिशा में नकली गाड़ियों का काफ़िला तैयार करने के लिए उन्होंने रसद के सामान के ख़ाली बक्से, हथियारों के ख़ाली बक्सों और तेल के ख़ाली कंटेनरों का इस्तेमाल किया, जिन्हें तारपोलीन और खजूर के पत्तों से ढँका गया था. इन गाड़ियों के पास एक बड़ा नकली पानी का पाइप भी बनाया गया.

उत्तर की दिशा का तरफ़ टैंक बनाने के लिए उन्होंने लकड़ी के खाली बक्सों का इस्तेमाल किया, जिनके ऊपरी हिस्से में उन्होंने अलग से ढँक कर बक्से रखे. हथियारों को भी इसी तरह ढँक दिया गया.

युद्ध शुरू ठीक होने से इनके कवर को हटाया गया. ये स्पष्ट था कि धुरी राष्ट्र की सेना इस चकमे को समझने के लिए तैयार नहीं थी. उनके सामने अचानक जैसे शून्य से एक बड़ी सेना आकर खड़ी हो गई थी.

चकमा देने में मिली कामयाबी

बार्कास और आयर्टन की मेहनत ने अपना काम कर दिखाया था. मित्र देशों की सेना ने इर्विन रोम्मेल की सेना को हरा दिया. युद्ध के बाद जनरल रोम्मेल ने स्वीकार किया कि मित्र देशों की सेना ने उन्हें भ्रमित किया था.

इन कलाकारों ने दूसरों को भी प्रेरित किया. इनसे प्रेरणा लेकर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी मिलिटरी रेजिमेंट का गठन किया गया. इसे 'घोस्ट आर्मी' यानी भूतों की सेना कहा जाता था. इसमें क़रीब 1,000 सैनिक थे जिन्हें बाद में डी-डे यानी नॉर्मेंडी में हुए हमले में इस्तेमाल किया गया था.

इस 'घोस्ट आर्मी' का उद्देश्य था कि वो जर्मन सेना को यक़ीन दिलाए कि 30,000 सैनिकों का एक और दस्ता उन पर हमला करने के लिए तैयार है, ताकि वो अपनी सैनिकों के ठिकानों को तुरंत बदल दें, जिससे मित्र देशों की सेना को जंग जीतने में मदद मिले.

मिडल ईस्ट कमांड कैमोफ्लॉज विभाग की तरह 'घोस्ट आर्मी' ने भी सैनिकों के साथ-साथ कई आर्किटेक्ट, डिज़ाइनर और कलाकारों को नियुक्त किया. इनमें फोटोग्राफर आर्ट केन, फैशन डिज़ाइनर बिल ब्लास और पेंटर एल्सवर्दी केली शामिल थे.

साल 1944 से 1945 के बीच इस टुकड़ी ने जर्मन सेना को चकमा देने वाले 22 अभियानों को अंजाम दिया और ये टुकड़ी एडॉल्फ हिटलर पर मित्र देशों की सेना की जीत में अहम साबित हुई.

दुश्मन सेना को भ्रमित करने के लिए 'घोस्ट आर्मी' ने कई तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया. सैकड़ों ऐसे ख़ास गुब्बारे बनाए गए, जो हवा भरने पर टैंक की शक्ल अख़्तियार कर लें. दूर से देखने पर ये असली टैंक की तरह दिखते थे और इसके ज़रिए वो जर्मन सेना को धोखा देने में सक्षम हुए.

टुकड़ी में एक और टीम थी, जो ऐसे फ़र्जी रेडियो संदेश प्रसारित कर रही थी, जो नाज़ी सेना के जासूस पकड़ सकते थे. साथ ही नाज़ी सेना को भ्रम में रखने के लिए उन्होंने मोबाइल लाउडस्पीकर का इस्तेमाल किया, जिस पर वो सेना के क़दमों की आहट और पुल बनाने की योजना जैसे प्रोजेक्ट से जुड़ी आवाज़ें ज़ोर से सुनाते थे.

'घोस्ट आर्मी' में शामिल कलाकार और सैनिक एक्टर की तरह भी काम करते थे और अलग-अलग रेजिमेंट की ड्रेस पहन कर आसपास के रिहाइशी इलाक़ों में जाते थे और आम लोगों से बात करते थे, ताकि वहाँ फैले जासूस उनकी बातें सुनें.

युद्ध के ख़त्म होने के बाद तय किया गया कि इस 'घोस्ट आर्मी' को सीक्रेट ही रखा जाएगा और युद्ध में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी को साल 1996 तक गुप्त रखा गया. हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रथम विश्व युद्ध में शामिल कलाकारों, मिडल ईस्ट कमांड कैमोफ्लॉज विभाग और अमेरिका की घोस्ट आर्मी ने युद्ध के मैदान में भ्रम पैदा करने वाली कला के इस्तेमाल का नया इतिहास बनाया.

बीसवीं सदी से पहले सेना में कलाकारों का इस्तेमाल ज़रूरत पड़ने पर ही किया गया और आधुनिक युद्ध रणनीति में कलाकारों के काम को नए तरीक़े से काम में लाया गया है.

लेकिन आम तौर पर युद्ध में दुश्मन सेना को धोखा देने और भ्रम पैदा करने के लिए ख़ास तकनीकों का इस्तेमाल इससे पहले भी किया जाता रहा है. ईसा पूर्व पाँचवीं सदी में चीन के लेखक सुन त्ज़ू ने अपनी किताब 'आर्ट ऑफ़ वॉर' में इसका ज़िक्र किया है कि ये दुश्मन को भ्रमित करना हमेशा से युद्ध रणनीति का अहम हिस्सा रहा है.

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