‘सेक्स एंड द सिटी’: शो जो महिलाओं की आवाज़ बना

    • Author, जेनिफ़र आर्मस्ट्रॉन्ग
    • पदनाम, लेखिका, बीबीसी कल्चर के लिए

थियेटर, सिनेमा समाज का आईना होते हैं. इनकी कहानियां समाज से ही निकलती हैं. उसके इर्द-गिर्द ही घूमती हैं.

लेकिन कभी-कभी सिनेमा समाज में बड़ा बदलाव लाने और ख़ामोश ज़बानों को आवाज़ देने का काम भी करता है.

इसकी शानदार मिसाल है अमरीकी टीवी सीरियल 'सेक्स एंड द सिटी'.

यूं तो दुनिया भर के अधिकांश समाज पुरुष प्रधान ही हैं लेकिन, एशियाई महिलाओं पर पाबंदियां कुछ ज़्यादा ही लगाई जाती रही हैं.

यहां तक कि वो खुलकर अपने जज़्बात का इज़हार भी नहीं कर सकतीं. अपने ही शरीर के बारे में उन्हें बात करने में शर्म आती है.

यौन संबंध जो कि इंसानी वजूद की बुनियाद है, उस पर महिलाएं अगर कुछ कहें तो उन्हें बेहया, बेशर्म का नाम दे दिया जाता है.

'सेक्स एंड द सिटी' ने ऐसी ही महिलाओं को आवाज़ दी. उनकी ख़्वाहिशों, ज़रूरतों को समाज के सामने रखा.

'सेक्स एंड द सिटी' 1998 से 2004 तक अमरीका में दिखाया जाने वाला सबसे लोकप्रिय टीवी सीरियल था.

अमरीका में इसकी ज़बरदस्त शोहरत के चलते ही साल 1999 में जब इसका दूसरा पार्ट एचबीओ चैनल पर शुरू हुआ तो एक साथ कई दूसरे देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, जापान, आयरलैंड, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और भी कई देशों में वहां की भाषा में इसे प्रसारित किया गया.

चार सहेलियों की कहानी

'सेक्स एंड द सिटी' की कहानी चार सहेलियों की है. जो अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीती हैं.

ख़ुद को किसी से कम नहीं मानतीं. अपनी हसरतों का ख़ुलकर इज़हार करती हैं. जो दिल में है उसे किसी की परवाह किए बग़ैर बस कह देती हैं.

ये चारों सहेलियां यौन संबंधों के बारे में भी खुलकर बात करती हैं.

जापान की वॉइस ओवर आर्टिस्ट युको नागाशिमा को जब इस शो की किरदार कैरी को अपनी आवाज़ में डब करने को कहा गया तो उन्हें हिचक महसूस हो रही थी.

दरअसल जापान में महिलाएं सेक्स के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं. जबकि कैरी बेबाक किरदार है. वो सेक्स लाइफ़ के बारे में खुलकर बात करती है.

ऐसे में कैरी के डायलॉग डब करना उनके लिए आसान नहीं था. यूको नागाशिमा ने द वॉल स्ट्रीट जरनल को दिए इंटरव्यू में इस बात को स्वीकार किया कि शुरूआत में वो कैरी के डायलॉग बोलने में झिझक रही थीं.

लेकिन जब उन्हेंने ये समझ लिया कि सीरियल में महिलाओं के उन मुद्दों को सहजता से उठाया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जैसे हैं तो उनकी हिचक मिट गई.

इस टीवी शो में आवाज़ देने के बाद नागाशिमा ने कैरी के किरदार के लिए 'सेक्स एंड द सिटी' की अगली दो फ़िल्मों में भी आवाज़ दी.

'सेक्स' शब्द का हौव्वा

'सेक्स एंड द सिटी' को ना सिर्फ़ जापान, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी ख़ूब पसंद किया गया.

भारत में भी इस सीरियल का प्रसारण किया गया था. इसकी चार महिला कलाकार सामंथा, कैरी, शार्लोट और मिरांडा को दुनिया के तमाम देशों के लोग जानने लगे थे.

इस साल 'सेक्स एंड द सिटी' के 20 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है.

टीवी की दुनिया का ये ऐसा इकलौता सीरियल था जिसने दुनिया भर में अपना सिक्का जमाया था. यही नहीं इस सीरियल ने कई ब्रैंड्स को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला दी थी.

जैसे मनोलो ब्लैनिक शूज़ और मैन्गोलिया बेकरी के कप केक.

द जापान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, सेक्स एंड द सिटी में महिलाओं की आज़ादी का जो ख़्याल पेश किया गया था, उसने जापानी समाज में औरतों की सोच बदलने में अहम रोल निभाया.

यहाँ की महिलाएं आपस में भी बात करते हुए भी 'सेक्स' शब्द का इस्तेमाल करने से कतराती थीं. लेकिन 1999 में जापान में ये शो ऑन एयर होने के बाद जापानी महिलाओं के लिए ये शब्द हौव्वा नहीं रह गया था.

जापान की फ़ैशन इंडस्ट्री पर असर

हाऊ मॉडर्न जेपनीज़ वुमन आर चेंजिंग किताब की लेखिका वेरोनिका चैम्बर्स का कहना है कि ऐसा नहीं है कि जापानी औरतों के जज़्बात दीगर देशों की औरतों से अलग हैं.

'सेक्स एंड द सिटी' के किरदारों की तरह वो भी अपने रिश्ते में मर्ज़ी शामिल करना चाहती हैं. अपनी पसंद का साथी चुनना चाहती हैं.

लेकिन सामाजिक बंदिशें उन्हें कभी मुंह नहीं खोलने देतीं. ऐसे में इस टीवी सीरियल ने जापना की महिलाओं को आवाज़ दी. साथ ही इस सीरियल ने जापान के हाराजुका आंदोलन को भी गति प्रदान की.

दरअसल जापानी लोग दिल से पारंपरिक और देसी हैं. जब जापान में अमरीकी सिपाहियों और सैलानियों ने यहां आना शुरू किया तो उनके फ़ैशन और विदेशी चीज़ों ने जापान के नौजवानों को अपनी तरफ़ खींचा.

जापान के फ़ैशन डिज़ाइनर भी इससे प्रभावित हुए. लिहाज़ा उन्होंने विदेशी फ़ैशन के लिए बाक़ायदा मुहिम शुरू कर दी और ख़ुद को हाराजुका ट्राइब कहलाने लगे.

'सेक्स एंड द सिटी' में जिस तरह का फ़ैशन पेश किया था उसने जापान की फ़ैशन इंडस्ट्री को भी बल दिया.

सेक्स संबंधी सीन

सेक्स एंड द सिटी ने एशियाई बाज़ार पर भी अपना असर डाला.

न्यूयॉर्क स्थित मैग्नोलियन बेकरी के कप केक की दक्षिण कोरिया और जापान में डिमांड बढ़ने लगी.

देखते ही देखते ये कप केक यहां के खानों का हिस्सा बनने लगे. पिछले साल ही कोरिया ने अपने यहां कप केक की 70 फ़ीसद फ़रोख़्त का श्रेय इस सीरियल को दिया है.

साल 2000 में जब इसी सीरियल पर आधारित दो फ़िल्में रिलीज़ हुईं तो उनका ख़ुमार भी जापानी महिलाओं के सिर चढ़कर बोला.

जापान में ये सीरियल सेंसर किए बग़ैर दिखा गया था जबकि कुछ अन्य देशों जैसे सिंगापुर में पहले पहल तो इसे दिखाने की इजाज़त ही नहीं दी गई.

हालांकि बाद में साल 2004 में इसकी बढ़ती डिमांड और मक़बूलियत कि वजह से इसके कुछ सीन हटाकर कुछ शर्तों के साथ इजाज़त मिल गई.

हटाए गए सीन में ज़्यादातर सेक्स संबंधी सीन थे.

सिंगापुर की तरह और भी कई एशियाई देशों में लंबे समय तक इस शो पर पाबंदी लगी रही.

प्रेम संबंधों और सेक्स पर खुलकर बात

मिसाल के लिए फ़िल्म सेक्स एंड द सिटी-2 के प्रोड्यूसर कुछ सीन अबू धाबी में शूट करना चाहते थे.

शूट किए जाने वाले सीन में फ़िल्म के एक किरदार सामंथा को भरे बाज़ार में एक शख़्स पर कॉन्डोम फेंकना था.

फ़िल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद अबू धाबी के अधिकारियों ने शूटिंग की इजाज़त नहीं दी. बाद में ये सीन मोरक्को में शूट किए गए.

यही नहीं अबू धाबी में ये फ़िल्म दिखाई भी नहीं गई. हालांकि संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों का कहना था कि फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूटरों ने इस बारे में कभी उनसे संपर्क ही नहीं किया.

उन्हें डर था कि दुबई का सेंसर बोर्ड फ़िल्म में बहुत ज़्यादा काट-छांट करने को कहेगा और ये उन्हें मंज़ूर नहीं था.

हाल ही में चीन ने अपने दर्शकों के लिए सेक्स एंड द सिटी की तर्ज़ पर ही 'ए ड्रामा कॉल्ड ओडे टू जॉय' के नाम से शो बनाया है.

ये शो पाँच शहरी महिलाओं पर आधारित है, जो अपने प्रेम संबंधों और सेक्स पर खुल कर बात करती हैं. शो की एक किरदार तो अपने बॉय फ़्रैंड को ये कह कर ही हैरान कर देती है कि वो वर्जिन नहीं है.

बहरहाल सेक्स एंड द सिटी को आए 20 साल हो चुके हैं और इन बीस सालों में इस शो ने दुनिया भर की महिलाओं को अपने बारे में सोचने की ताक़त दी है.

महिलाओं की ज़रूरतों और यौन संबंधों की ख़्वाहिशों से दुनिया को रूबरू कराया है. ये शो इक्कीसवीं सदी की महिलाओं की आवाज़ बना.

(येलेख जेनिफ़र आर्मस्ट्रॉन्ग की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है.मूल रूप से अंग्रेज़ी मेंबीबीसी कल्चर की साइट पर ये कहानी लिखी गई थी. उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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