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क्या मॉडर्न आर्ट भी सीआईए का हथियार था?
- Author, एलस्टेयर सूक
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ के बीच क़रीब आधी सदी तक शीत युद्ध चला. इस दौरान दोनों ही खेमों ने एक दूसरे से निपटने के लिए तरह-तरह के हथकंडे आज़माए.
लेकिन आपको शायद ही यक़ीन हो कि दोनों खेमों ने शीत युद्ध के दौरान कला के क्षेत्र में भी मोर्चेबंदी की.
असल में अमरीका और सोवियत संघ में लड़ाई ताक़त के साथ-साथ विचारधारा की भी थी. इसीलिए कला और संस्कृति की मोर्चेबंदी भी वाजिब ही थी.
बीसवीं सदी के पचास और साठ के दशक में न्यूयॉर्क में कलाकारों की एक टोली अचानक ही मशहूर हो गई. इस टोली को दुनिया ने 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' के नाम से जाना.
ये पेंटर्स की वो टोली थी, जिसे न कामयाबी मिली थी और न ही शोहरत. लेकिन पचास के दशक में अचानक इनके काम को सराहा जाने लगा. इनमें विलेम डे कूनिंग, जैक्सन पोलॉक और मार्क रोथको शामिल हैं.
इन सब की पेंटिंग की लंदन में नुमाइश लगी. रॉयल एकेडमी ऑफ आर्ट्स में लगी इस प्रदर्शनी के साथ ही 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़ा आधी सदी से भी ज़्यादा पुराना विवाद चर्चा में आ गया.
असल में 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' के समूह से जुड़ने वाले जो कलाकार थे, वो अचानक से ही मशहूर हो गए थे. इसी वजह से उनकी कामयाबी पर सवाल उठे थे.
चालीस के दशक में काम शुरू करने वाले इन सभी कलाकारों को कामयाबी बमुश्किल मिली थी. मगर पचास के दशक में देखते ही देखते, ये सभी अचानक पूरी दुनिया पर छा गए.
उस दौर में फ्रांस की राजधानी पेरिस, कला का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाने लगी थी. लेकिन 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' की शोहरत के साथ ही लोग कहने लगे कि कला की दुनिया में आज सबसे अच्छा काम पेरिस नहीं, न्यूयॉर्क में हो रहा है.
1957 में जैक्सन पोलॉक की एक हादसे में मौत के बाद, उनकी एक पेंटिंग को मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ने तीस हज़ार डॉलर में ख़रीदा था.
ये उस वक़्त बहुत बड़ी रक़म थी. अगले ही साल न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ मॉडर्न आर्ट ने यूरोपीय देशों में एक प्रदर्शनी आयोजित की. इसका नाम था, 'द न्यू अमरीकन पेंटिंग'.
इसमें 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' की पेंटिंग्स की यूरोप के तमाम शहरों में नुमाइश की गई. बर्लिन, ब्रसेल्स, मिलान, बेसेल, पेरिस और लंदन में इन पेंटिंग्स को ख़ूब सराहा गया.
इस तरह न्यूयॉर्क के कलाकार अपनी 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' के ज़रिए पूरी दुनिया पर छा चुके थे.
मगर कामयाबी के साथ ही विवाद भी शुरू हो गया था. पहले तो पॉप आर्ट के नाम से यूरोपीय कलाकारों की नई कोशिश ने 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरनी शुरू कीं.
फिर साठ के दशक में ही, लोगों ने 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़े कलाकारों को अचानक मिली कामयाबी पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.
1973 में आर्टफ़ोरम नाम की पत्रिका में कला समीक्षक, मैक्स कोज़लॉफ ने दावा किया कि 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' असल में प्रचार का हथकंडा है. जिसे अमरीकी सरकार का समर्थन हासिल है.
शुरू में तो इस आरोप को सिरे से नकार दिया गया. क्योंकि जिन कलाकारों को कामयाबी मिली थी, उनका सरकार से कोई क़रीबी ताल्लुक़ नहीं रहा था.
जैसे जैक्सन पोलॉक को रूस से आया सड़ा हुआ बाग़ी कहा जाता था. इसी तरह बार्नेट न्यूमैन नाम के कलाकार के बारे में भी कहा जाता था कि वो अराजकतावादी थे.
ऐसे में इन कलाकारों को सरकार की शह हासिल थी, इस बात पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था.
उस दौर में अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए, ऐसे कई कलाकारों, पत्रिकाओं और दूसरे मीडिया के ज़रिए अमरीकी नीतियों का प्रचार करती थी. ऐसे में मैक्स कोज़लॉफ के आरोपों में भी लोगों को दम दिखा.
साल 1999 में ब्रिटिश पत्रकार फ्रांसेस स्टोनर सांडर्स ने एक क़िताब लिखी. जिसमें उन्होंने दावा किया कि सीआईए ने 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़े कलाकारों को अपने प्रोपेगैंडा के लिए इस्तेमाल किया था.
सांडर्स का दावा था कि सीआईए ने क़रीब बीस सालों तक, अपने तमाम फ्रंट संस्थाओं के ज़रिए इन पेंटिंग्स को ख़रीदा, इनकी प्रदर्शनी लगवाई और इनके बारे में लोगों से अच्छी बातें कहलाईं. जिससे कि अमरीकी विचारधारा को बल मिले.
सांडर्स के मुताबिक़ 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' के कई कलाकारों की नुमाइश को सीआईए ने दूसरी संस्थाओं के ज़रिए पैसे दिए थे.
सांडर्स के मुताबिक़ न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ माडर्न आर्ट का ताल्लुक़ सीआईए से था, ये कोई छुपी बात नहीं.
हालांकि इर्विन सैंडलर नाम के कलाकार जो 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़े हुए थे, वो इन आरोपों को बेबुनियाद ठहराते हैं.
सैंडलर कहते हैं कि उस दौर की अमरीकी सरकार तो 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़े कलाकारों को वामपंथी कहती थी.
हालांकि मशहूर ब्रिटिश कला समीक्षक डेविड अनफाम का कहना है कि 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' को सीआईए की शह हासिल थी.
अनफाम के मुताबिक़ 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़े सभी कलाकार, बाग़ी माने जाते थे. वो उस दौर के हर नियम-क़ायदे को चुनौती देते थे.
ऐसे में सीआईए ने 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' को बढ़ावा दिया, ताकि ये जताया जा सके कि अमरीका में हर इंसान को कुछ भी करने की आज़ादी है. वहां के मुक़ाबले सोवियत संघ में लोगों को ये आज़ादी हासिल नहीं है.
हालांकि अनफाम ये भी कहते हैं कि 'एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेसनिज़्म' से जुड़ा हर कलाकार, सीआईए का एजेंट था, ये कहना ठीक नहीं. सीआईए सीधे तौर पर नहीं, बल्कि दूसरे लोगों और संस्थाओं के ज़रिए उनकी मदद करती थी.
अनफ़ाम कहते हैं कि ये सीआईए की शानदार रणनीति थी. इससे दुनिया को कला के क्षेत्र में काफ़ी अच्छा काम देखने को मिला.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)
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