छात्रों के बीच पैसे देकर नकल कराने का चलन क्यों बढ़ रहा है?

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- Author, फिलिप्पा फ़ोगार्टी
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
क्रिस ने पहली बार जब किसी दूसरे के लिए निबंध लिखा तो इसके बदले में उन्हें खाना खिलाया गया था.
उनके एक दोस्त ने अपनी गर्लफ्रेंड के लिए मदद मांगी थी तो क्रिस उसके निबंध को पढ़ने और कुछ सुधार करने के लिए राज़ी हो गए थे.
लेकिन निबंध को संपादित करने भर से काम नहीं चलने वाला था. उसमें दिए गए तर्क गड्ड-मड्ड थे, इसलिए उन्हें पूरा निबंध दोबारा लिखना पड़ा.
क्रिस का निबंध अच्छा बन गया और उस लड़की को अच्छे ग्रेड मिल गए. उनका दोस्त भी खुश हो गया.
वह कहते हैं, "उसने सिंगापुर में मुझे हॉटपॉट (एक तरह की चीनी खाना) खिलाया. तब मैं पहली बार किसी हॉटपॉट रेस्तरां में गया था."
क्रिस के दोस्त ने दूसरे असाइनमेंट में भी उस लड़की की मदद करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया.
क्रिस ने कहा कि वह रोज हॉटपॉट नहीं खा सकते. उन्हें इसके पैसे चाहिए.
वह कहते हैं, "फिर उस लड़की ने मुझे अपने सहपाठियों से मिलवाया और इस तरह सब कुछ शुरू हुआ."
निबंध मिल (कारखाना)
क्रिस अब अपना "निबंध मिल" चलाते हैं. वो कहते हैं कि यह फ़ायदे का धंधा है, जिसमें उन छात्रों के असाइनमेंट लिखे जाते हैं जो ख़ुद से अपना काम पूरा नहीं कर सकते.
अमरीका में कॉलेज एडमिशन का स्कैंडल दुनिया भर में सुर्खियां बना तो छात्रों की नकल की तरफ लोगों का ध्यान गया.

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यह इस तरह का कोई पहला स्कैंडल नहीं था. भारत में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले की परीक्षा में बड़े पैमाने पर हुई धोखाधड़ी के मामले अब भी उजागर हो रहे हैं.
सिर्फ़ दाखिले की परीक्षाओं में ऐसा नहीं हो रहा. विश्वविद्यालयों में दाखिला पा जाने के बाद भी कुछ छात्रों को समस्याएं रहती हैं. वहां क्रिस जैसे लोगों की भूमिका शुरू होती है.
सही या गलत
कई साल तक सिंगापुर में पढ़ाई करने के बाद क्रिस अब चीन लौट आए हैं.
वह निबंध लिखते हैं और ऑस्ट्रेलिया से लेकर ब्रिटेन तक फैले अपने छात्र ग्राहकों से मिले काम को ठेके पर भी कराते हैं.
क्रिस का सालाना कारोबार डेढ़ लाख डॉलर से अधिक का है. यह कारोबार तब फैला था जब उनकी एक छात्र मास्टर डिग्री करने ऑस्ट्रेलिया गई और उसने वहां दूसरे लोगों को क्रिस के बारे में बताया.
वह हर हफ्ते कम से कम एक निबंध ख़ुद लिखते हैं. इसके अलावा व्यापार से लेकर वित्त तक के विषयों पर मिले काम को ठेके पर विशेषज्ञों के पास भेज देते हैं.
वह प्रति शब्द एक आरएमबी लेते हैं. इस तरह 1,000 शब्दों का निबंध करीब 1,000 आरएमबी (115 पाउंड या 150 डॉलर) में तैयार होता है.
क्रिस अपना पूरा नाम नहीं बताते. उनको लगता है कि वह जो करते हैं वह सिखाने और नकल कराने के बीच की चीज़ है.
वह कहते हैं, "मैं छात्रों से हमेशा कहता हूं कि आप मेरे निबंध का उल्लेख कर सकते हैं लेकिन इसे सीधे अपने प्रोफेसर को नहीं दे सकते."
"लेकिन वे क्या करते हैं उस पर मेरा नियंत्रण नहीं है. कुछ छात्र वास्तव में मुझसे सीखते हैं, इसलिए मुझे लगता है कि यह ग्रे एरिया में है."
कभी-कभी वह मना भी करना चाहते हैं लेकिन कर नहीं पाते.
क्रिस कहते हैं, "मैं ख़ुद से यह कहता हूं कि मुझे यह बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह धोखाधड़ी है. वे मुझसे कुछ नहीं सीखते. फिर एक महीने बाद उनका फोन आता है और वे कहते हैं कि क्या मैं फिर उनकी मदद कर सकता हूं क्योंकि ग्रैजुएट बनने के लिए यह असाइनमेंट पास करना जरूरी है."
"फिर मैं हां कर देता हूं, साथ ही यह भी कहता हूं कि यदि ऐसा है तो मैं यह आखिरी बार कर रहा हूं. मैं चाहता हूं कि वे कुछ सीखें लेकिन यह बहुत मुश्किल है.
तकनीक का सहारा
ब्रिटेन की क्वालिटी एश्योरेंस एजेंसी के गैरेथ क्रॉसमैन यहां छात्रों की गलती मानते हैं. उनका कहना है कि इस तरह धोखाधड़ी करने वाले छात्र न सिर्फ़ अपनी शिक्षा को कम कर रहे हैं, बल्कि समाज को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.
गैरेथ क्रॉसमैन कहते हैं, "वह धोखा दे रहे हैं. कोई नहीं चाहेगा कि ऐसे लोगों को बाद में काम मिले जो किसी योग्य नहीं हैं."रॉयल कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग ने इस पर अपनी चिंता जताई है और नर्सें भी बिना योग्यता के बाहर आ रही हैं.
क्रॉसमैन कहते हैं, "मुझे लगता है कि संस्थान भी इस बात को मान रहे हैं कि इससे उनकी साख जुड़ी हुई है इसलिए इससे निपटने की जरूरत है."
पिछले साल स्वानसी यूनिवर्सिटी ने एक रिसर्च प्रकाशित किया था जिसके मुताबिक दुनिया भर में हर 7 में 1 छात्र इस तरह की धोखाधड़ी में शामिल हो सकता है.
क्रॉसमैन का कहना है कि ऐसा पहले भी होता रहा है. तकनीकी विकास ने इसे व्यापक बना दिया है और निबंध मिल तकनीक का दोहन कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "जब हम सोशल मीडिया साइटों पर जाते हैं तो वहां विज्ञापन पॉप-अप होते रहते हैं. वे हमारी रुचि का अंदाज़ा लगाकर विज्ञापन दिखाते हैं. निबंध मिलों के साथ भी ऐसा ही है."
जो छात्र सोशल मीडिया पर निबंध लिखने में सहायता की तलाश करते हैं, उनको लक्षित किया जाता है.
निबंध मिल अपने आपको पढ़ाई में सहायक होने के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो पूरी तरह वैध है.

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वे "साहित्यिक चोरी से 100 फीसदी मुक्त" जैसे वाक्यांशों का इस्तेमाल करते हैं जिससे लगता है कि वे अच्छी गुणवत्ता के निबंध उपलब्ध कराते हैं.
क्रॉसमैन कहते हैं, "असल में वे यह कहना चाहते हैं कि आप इसे अपने निबंध के रूप में जमा कर सकते हैं और साहित्यिक चोरी पकड़ने वाले सॉफ्टवेयर इसे पहचान नहीं पाएंगे."
इस व्यवसाय को बाज़ार चला रहा है. इसे चलाने वाले पैसे कमा रहे हैं.
अगर आप ऐसी कुछ साइटों पर जाते हैं तो कभी-कभी उनके पास स्लाइडर्स होते हैं जहां आप बताते हैं कि आपको किस स्तर का काम चाहिए, कितने शब्दों का लेख चाहिए.
अगर आप 10 हज़ार शब्दों में 2.1 ग्रेड का शोध प्रबंध चाहते हैं तो इसके हज़ारों पाउंड लगते हैं.
वैध कारोबार
निबंधों की गुणवत्ता अलग-अलग हो सकती है. कुछ लोगों के पास विशेषज्ञता है और दूसरे कुछ लोग मुश्किल से साक्षर हैं. फिर पकड़े जाने का जोखिम भी है.
क्रिस के 5 से 10 फीसदी ग्राहक पकड़े गए हैं. वह कहते हैं, "मैंने उनको कहा कि आप इसे सीधे अपने शिक्षक के पास जमा मत कीजिए. आप इसको देखिए और इसमें कुछ बदलाव कीजिए. उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी तो इसमें मेरी गलती नहीं है."
पकड़े गए छात्रों ने नकल बंद नहीं की, बस थोड़ा अनुकूलन कर लिया. वह कहते हैं, "वह तब भी मेरा इस्तेमाल कर रहे हैं, बस उन्होंने निबंध को अपने शब्दों में लिख लिया."
क्रिस का कहना है कि वह इस तरह के काम बंद करना चाहते हैं, लेकिन उनके ग्राहक ऐसा नहीं करने को कहते हैं. फिर उनके कुछ कर्मचारी भी हैं जो उन पर निर्भर हैं.
क्रिस कहते हैं, "मुझे उनको पैसे देने होते हैं. वे पैसे के लिए इसी पर निर्भर हैं. अगर मैं यह काम छोड़ देता हूं तो उनके परिवार को सहारा देने वाला कोई नहीं होगा, इसलिए मैं अभी इसे बंद करने नहीं करना चाहता."

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सोशल मीडिया
क्रॉसमैन के संगठन ने कई टेक कंपनियों को लिखा है कि वे निबंध मिलों के विज्ञापन बंद करें.
कुछ सोशल मीडिया कंपनियों ने, जिसमें गूगल भी है, निबंध मिलों के विज्ञापन पर रोक लगाई है, कम से कम ब्रिटेन में. लेकिन फ़ेसबुक ने अब तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है.
अमरीका के कुछ राज्यों, न्यूजीलैंड और आयरलैंड गणराज्य ने निबंध मिलों पर कानूनन रोक लगाई है, लेकिन विकसित दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ये वैध हैं.
क्रॉसमैन का कहना है कि धोखाधड़ी करने वाले छात्र किसी विशेष समूह या डेमोग्राफी के नहीं हैं. पढ़ाई में पिछड़ रहे छात्र इसका ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं.
क्रॉसमैन कहते हैं, "विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के इसके फेर में पड़ने के कई कारण हो सकते हैं. उनके पास मदद का नेटवर्क नहीं होता. परिवार का नेटवर्क नहीं होता, कई बार भाषा कौशल भी नहीं होता."
"यह संस्थानों की जिम्मेदारी है कि संघर्ष कर रहे छात्रों की पहचान की जाए और उनको सहारा दिया जाए."
साहित्यिक चोरी पकड़ने वाले नये सॉफ्टवेयर भी बन रहे हैं जो नकल किए गए काम को पहचान लेते हैं और यह भी पता लगा लेते हैं कि क्या किसी निबंध के एक से ज़्यादा लेखक हैं.
लेकिन यह एक अहम चुनौती से निपटने की सिर्फ़ एक रणनीति है. क्रॉसमैन कहते हैं, "बेशक तकनीक सुधर रही है, लेकिन वहां भी कोई जादू की छड़ी नहीं है."
(यह लेख बीबीसी कैपिटल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटलके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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