इस तरह हो रही है वक़्त को थामने की कोशिश

समय, अंतरिक्ष

इमेज स्रोत, Alamy

    • Author, पीटर रे एलीसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

साहिर लुधियानवी ने लिखा था- वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज, वक़्त की हर शै ग़ुलाम, वक़्त का हर शै पे राज.

तो, ग़ालिब ने लिखा था- मैं गया वक़्त नहीं के लौट के फिर आ भी न सकूं.

अमरीकी कवि डेलमोर स्वार्ज़ ने लिखा था- वक़्त वो आग है जिसमें हम जलते हैं.

हम पैदा होते हैं, जीते हैं और मर जाते हैं. समय अपनी रौ में चलता रहता है. लेकिन, इतिहास गवाह है कि इंसान ने बारहां ये सोचा है कि वो वक़्त का पहिया थाम ले. वक़्त से आंखें फेर ले. वक़्त का रुख़ मोड़ दे. वक़्त बदल दे. कालचक्र की रफ़्तार धीमी कर दे, या वक़्त से आगे निकल जाए.

इंसान के इस ख़्वाब को बहुत से साइंस फ़िक्शन फ़िल्मों में दिखाया गया है,फ़ॉरएवर यंग से लेकर स्लीपिंग ब्यूटी तक.

1971 में जोसेफ़ हफ़ेल और रिचर्ड कीटिंग ने चार एटॉमिक क्लॉक विमानों में रखी. इन विमानों ने दुनिया का दो बार चक्कर लगाया. पहले पूरब की तरफ़ से. फिर पश्चिम की तरफ़. अब दुनिया गोल है, तो उनके चक्कर लगाने में फ़ासला तो एक सा ही तय हुआ. रफ़्तार एक थी, तो वक़्त भी उतना ही लगना चाहिए था. लेकिन, जब एटॉमिक क्लॉक को देखा गया, तो पता चला कि उनमें फ़र्क़ था.

इस तजुर्बे से एक बात साफ़ हो गई कि वक़्त जिस तरह गुज़रता है, वो हालात पर निर्भर करता है.

अमरीका की नॉर्थ कैरोलाइना स्टेट यूनिवर्सिटी की केटी मैक कहती हैं कि, 'अगर आप रोशनी की रफ़्तार से सफ़र कर रहे हैं, और आप ब्लैक होल के आस-पास हैं, तो जो वक़्त आप सफ़र के तजुर्बे में महसूस करेंगे, वो कहीं और बिताए समय से कम होगा.'

समय, अंतरिक्ष

इमेज स्रोत, Alamy

अंतरिक्ष यात्रियों की धीमी ज़िंदगी

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों की उम्र की रफ़्तार धीमी हो जाती है. धरती पर रहने वालों के मुक़ाबले उनकी ज़िंदगी धीमी हो जाती है.

अमरीकी वैज्ञानिक केटी मैक कहती हैं, "अंतरिक्ष यात्री बड़ी तेज़ी से धरती का चक्कर लगा रहे स्पेस स्टेशन पर सवार होते हैं. उन पर धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का असर भी कम होता है. इसलिए उनकी उम्र की रफ़्तार धीमी हो जाती है."

हालांकि, अंतरिक्ष यात्रियों की ज़िंदगी के वक़्त का ये ठहराव बेहद मामूली होता है. कुछ सेकेंड का होता है. हमें धरती के मुक़ाबले अपनी उम्र को गुज़रने से ठहराने के लिए सुदूर अंतरिक्ष में बेहद तेज़ रफ़्तार से दूरी तय करनी होगी. फ़िलहाल ये नामुमकिन है.

साइंस फ़िक्शन की कॉमेडी सिरीज़ 'रेड ड्वार्फ़' में एक कल्पना की गई है. इस सिरीज़ में एक किरदार है लिस्टर, जिसकी ज़िंदगी में ठहराव आ जाता है. वक़्त उसके आर-पार या इर्द-गिर्द नहीं गुज़रता. वो ठहर जाता है.

अब ये तो रही फ़िक्शन या कल्पना की बात.

समय, अंतरिक्ष

इमेज स्रोत, Alamy

वक़्त के पहिए थामने की कोशिश

वक़्त भले ही सापेक्षता के सिद्धांत से चलता हो. मतलब ये कि वक़्त भले ही किसी जगह, किसी माहौल और किसी शख़्स के हिसाब से गुज़रता हो, मगर ये हमारे अस्तित्व की बुनियाद है.

समय को लेकर हमारी सोच बदलना तो आसान है. मगर वक़्त के पहिए को रोक लेना बहुत बड़ी चुनौती है.

बुरा वक़्त भले ही भारी गुज़रता हो. अच्छा समय भले ही आप के हिसाब से जल्दी से उछल-कूद मचाकर चला जाता हो, मगर वक़्त का क्या है, गुज़रता है, गुज़र जाएगा.

पर, इंसान ने हार नहीं मानी है. वो वक़्त के पहिए को थामने में जुटा हुआ है.

अमरीका की डिफ़ेंस सेक्टर की कंपनी डारपा इस वक़्त समय के पहिए को थामने पर रिसर्च कर रही है. डारपा एक ऐसा रिसर्च कर रही है जिसमें ज़ख़्मी सैनिक के शरीर के अंगों के काम करने की रफ़्तार धीमी की जा सके ताकि जब तक उसे मेडिकल इमदाद नहीं मिले, तब तक उसके घाव और न ख़राब हों.

इसे 'बायोस्टैसिस' कहते हैं. इसमें किसी इंसान के शरीर के अंगों की रफ़्तार धीमी की जाती है. इस तकनीक से हम बीमार लोगों की हालत बिगड़ने से रोक सकते हैं. ख़ास तौर से जंग में घायल सैनिकों की मदद में ये तकनीक तो बहुत काम आ सकती है.

डारपा में इस प्रोजेक्ट के मैनेजर डॉक्टर त्रिस्तान मैक्लूयर-बेग्ले कहते हैं कि ऐसा करना बायोइंजीनियरिंग की मदद से संभव है. शरीर में मौजूद प्रोटीन की बनावट में हेर-फेर से हम अंगों के काम करने की रफ़्तार धीमी कर सकते हैं.

अगर डारपा का ये प्रयोग कारगर रहता है तो बायोस्टैसिस से मेडिकल की दुनिया में बहुत से काम लिए जा सकते हैं. ब्लड बैंक में रखे ख़ून की मियाद बढ़ाई जा सकती है. ऐसी ही दूसरी बायो-मेडिकल चीज़ों को हम ज़्यादा समय तक सुरक्षित रख सकते हैं.

डॉक्टर त्रिस्तान कहते हैं कि 'इस तकनीक की मदद से हम वैक्सीन, एंटीबॉडी और एंजाइम को ज़्यादा दिनों तक सुरक्षित रख सकते हैं. अभी तो इन्हें जमाकर रखना पड़ता है, जो काफ़ी महंगा होता है.'

फ़िलहाल तो बायोस्टैटिस यानी जैविक ठहराव का ये प्रयोग सेहत के मोर्चे पर किया जा रहा है. इस मामले में हमें क़ुदरत से सीखने को मिल सकता है.

समय, अंतरिक्ष

इमेज स्रोत, Alamy

जानवरों में बायोस्टैसिस

बहुत से जीव हैं जो बायोस्टैसिस की मदद से ख़ुद को मरने से बचाते हैं जैसेकि जंगली मेंढक. सर्दियों के दिनों में मेंढक के शरीर की कमोबेश सारी जैविक प्रक्रियाएं थम जाती हैं. वो जम जाता है.

इसी तरह भालू भी सर्दियों में हाइबरनेशन यानी शीतनिद्रा की स्टेज में चले जाते हैं. उनके शरीर की जैविक क्रियाएं बहुत धीमी हो जाती हैं. वो सर्दियां बीत जाने पर, कई महीनों बाद इस हालात से बाहर आते हैं. फिर से ज़िंदगी की दौड़-भाग शुरू कर देते हैं.

इंसान भी मेडिकल साइंस में ऐसे प्रयोग करता है. जैसे दिल का दौरा पड़ने या दिमाग़ को चोट लगने पर कई बार कृत्रिम तरीक़े से इंसान की जैविक क्रियाओं को धीमा किया जाता है ताकि उस इंसान की जान बचाई जा सके.

नासा अपने मंगल अभियान के लिए ऐसे प्रयोग कर रहा है जिसके तहत वो अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर की जैविक गतिविधियों की रफ़्तार धीमी करने का इरादा रखता है ताकि वो ज़्यादा वक़्त धरती से दूर बिता सकें.

इस प्रक्रिया की शुरुआत में दवा की मदद से इंसान को अचेत किया जाएगा. फिर उसे उसी हालत में रखा जाएगा और ज़रूरत पड़ने पर उसे फिर से होश में लाया जाएगा.

स्पेसवर्क्स नाम की कंपनी के लिए काम करने वाले जॉन ब्रैडफ़ोर्ड कहते हैं कि, 'हम ऐसी दवाएं ईजाद करने पर काम कर रहे हैं, जो अचेत करने वाली दवाओ के बुरे असर को कम कर सकें और इंसान की जैविक क्रियाओं की रफ़्तार को बिना हेवी डोज़ के धीमा कर सकें.'

अगर हमारे शरीर का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक कम हो जाए, तो हमारे शरीर के भीतर चलने वाली क्रियाओं की रफ़्तार आधी रह जाती है. इससे उम्र पचास फ़ीसद तक बढ़ सकती है.

जो जानवर शीत निद्रा या हाइबरनेशन की प्रक्रिया से गुज़रते हैं, वो ज़्यादा दिनों तक जीते हैं. जॉन ब्रैडफ़ोर्ड कहते हैं कि अगर आप छह महीने तक शीतनिद्रा में रहते हैं, तो आप की उम्र तीन महीने तक बढ़ सकती है. हालांकि, फ़िलहाल इंसान की उम्र बढ़ाने के बजाय, रिसर्चरों का मक़सद कुछ और है.

फिलहाल तो अंगदान का इंतज़ार करने वाले लोगों और दूसरी बीमारियों के शिकार इंसानों की मदद के लिए इस तकनीक के विकास पर काम किया जा रहा है.

समय, अंतरिक्ष

इमेज स्रोत, Getty Images

फ़्रीज़ करके ज़िंदा करने की उम्मीद

ये तो हुई जैविक क्रियाएं धीमी करने की बात. हमने बहुत-सी फ़िल्मों में देखा है कि इंसान को फ़्रीज़ कर दिया गया. फिर वो दस-बीस साल बाद उसी हालत में सक्रिय हो गया जब उसे फ़्रीज़ किया गया था. जैसे फ़ॉरएवर यंग फ़िल्म.

किसी भी चीज़ को भयंकर ठंड में जमाने की तकनीक को क्रायोनिक्स कहते हैं. इसमें शरीर को -190 डिग्री सेल्सियस तापमान पर जमा दिया जाता है. मक़सद, बाद में मरीज़ को फिर से ज़िंदा हालत में वापस लाना.

लेकिन, किसी को ऐसे जमाना इतना आसान नहीं है. इसके लिए शरीर से ख़ून को पूरी तरह से निकाल कर उसके शरीर में क्रायो-सॉल्यूशन डाला जाता है. यानी उन्हें उसी हालत में नहीं रखा जाता. बल्कि उनके अंदर जमा देने वाला सॉल्यूशन भरा जाता है. तब इंसान का शरीर जमी हुई बर्फ़ सरीख़ा दिखता है.

क्रायोनिक्स तकनीक का इस्तेमाल किसी इंसान के दिल की धड़कन रुकने के बाद ही होता है. वो भी इस उम्मीद में कि भविष्य में मेडिकल साइंस इतनी तरक़्क़ी कर लेगा कि उस शख़्स के दिल को फिर से धड़काया जा सकेगा.

इसी उम्मीद में दुनिया भर में बहुत से लोगों ने अपने परिजनों को क्रायोनिक्स की मदद से जमा कर रखा है. मगर अभी इस प्रयोग के दूसरे सिरे यानी जमाए गए शरीर में फिर से जान डालने की कामयाबी तक हम नहीं पहुंचे हैं.

अभी तक ऐसा चमत्कार सिर्फ़ क़ुदरत ही दिखा सकी है. 2001 में कनाडा के एडमॉन्टन की रहने वाली 13 बरस की लड़की एरिका नॉरबी की धड़कन दो घंटे बंद रहने के बाद फिर से शुरू हो गई थी. दो घंटे तक भयंकर सर्दी में उसकी धड़कन बंद रही थी. यानी तकनीकी रूप से वो मर चुकी थी.

बहुत से लोगों को ये उम्मीद है कि आगे चल कर साइंस की मदद से हम ऐसा कर सकेंगे.

वैसे, वक़्त हमारी हक़ीक़त की बुनियाद है. हम इसे धीमा या तेज़ तो शायद कर लें, रोक नहीं सकते.

फिर वक़्त की रफ़्तार धीमी करने के लिए भी इतनी पेचीदा प्रक्रियाओं से गुज़रना होगा कि वो करना भी फ़िलहाल असंभव-सा दिखता है.

देखना ये है कि बायो-इंजीनियरिंग से हम वक़्त को चकमा दे पाएंगे या नहीं ?

डॉक्टर त्रिस्तान कहते हैं कि, 'हो सकता है कि ऐसा आगे चल कर संभव हो, मगर इसके लिए आप अपनी रातों की नींद न उड़ाएं.'

(नोटः ये पीटर रे एलीसन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जोबीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)