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कहीं आप भी ध्यान को रामबाण तो नहीं समझते?
- Author, जेसिका ब्राउन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
मेडिटेशन का जो ज्ञान बौद्ध धर्म ने दुनिया को दिया, वह अब धर्म की सीमा लांघ चुका है. पश्चिमी जगत भी यह मानता है कि ध्यान लगाने से तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है.
मेडिटेशन का कारोबार तेज़ी से फल-फूल रहा है. 2018 में सिर्फ अमरीका में इसका बिजनेस 115 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है.
गूगल और नाइकी जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसे अपनाया है. वे अपने कर्मचारियों के लिए ऐसे प्रोग्राम आयोजित कराती हैं ताकि उनका तनाव कम हो, मानसिक सेहत दुरुस्त रहे और वे काम से ग़ैरहाज़िर ना रहें.
मेडिटेशन का इस्तेमाल कर्मचारियों को नए लक्ष्य के लिए प्रोत्साहित करने में भी होता है. लेकिन नए अध्ययन से पता चलता है कि ध्यान-साधना कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने का सबसे कारगर तरीका नहीं है.
मिनिसोटा यूनिवर्सिटी में मार्केटिंग की प्रोफेसर कैथलीन वोह्स कहती हैं, "ध्यान-साधना में वर्तमान को स्वीकार किया जाता है. जब हम कुछ नया करने या नये लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रोत्साहन की बात करते हैं तो उसमें वर्तमान को अस्वीकार किया जाता है. यह मेडिटेशन के उलट है."
कैथलीन ने अपनी बात साबित करने के लिए प्रयोग किए.
एक मेडिटेशन कोच ने 109 प्रतिभागियों को ध्यान लगाने के सामान्य निर्देश दिए. एक दूसरे समूह से कहा गया कि वे अपना मन किसी एक बिंदु पर केंद्रित करने की जगह अपने दिमाग को खुला छोड़ दें.
15 मिनट के पहले सेशन के बाद सभी प्रतिभागियों को पहेलियां सुलझाने या किसी चिट्ठी की भाषा ठीक करने जैसे कुछ सामान्य काम दिए गए. फिर उनसे पूछा गया कि वे अपने नये काम को करने के प्रति कितने उत्साहित हैं.
ध्यान लगाने के फायदे काल्पनिक हैं?
वोह्स और लिस्बन स्कूल ऑफ़ बिजनेस एंड इकनॉमिक्स के उनके सहयोगी एंड्रयू हैफेनब्रेक ने पाया कि मेडिटेशन करने वाले समूह के लोग दूसरे समूह के मुक़ाबले कुछ नया करने के प्रति कम उत्साहित थे. आने वाले समय के बारे में उनके विचार भी सीमित थे.
वोह्स और हैफेनब्रेक के मुताबिक ध्यान नये लक्ष्य को हासिल करने में बाधा खड़ी कर सकता है. जिस चीज के बारे में अभी ज्यादा रिसर्च नहीं हुए हैं, उसे सब पर आजमाने के ख़तरे बहुत हैं.
वोह्स कहती हैं, "पश्चिमी जगत, ख़ास तौर पर अमरीकी लोग रामबाण इलाज के कद्रदान हैं. यदि माइंडफुलनेस मेडिटेशन किसी गोली के रूप में आता तो वह सबसे लोकप्रिय होता. यह कैलोरी-फ्री है, पोर्टेबल है, इसमें कुछ खर्च नहीं होता और बैठने और आंखें बंद करने के अलावा कुछ करना भी नहीं होता. लेकिन इसके फायदे काल्पनिक हैं."
प्रोफेसर वोह्स का निष्कर्ष मेडिटेशन के बारे में आम धारणा के उलट है. लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक और मेडिटेशन रिसर्च लैब के डायरेक्टर पीटर मैलिनोव्स्की उनके तर्कों को मानने को तैयार नहीं हैं.
मैलिनोव्स्की कहते हैं, "उन्होंने ऐसे लोगों पर प्रयोग किए जिन्होंने पहले कभी ध्यान नहीं लगाया था. ऐसे में यह मान लेना कि वे ध्यान से तरोताजा थे गलत होगा."
"उन्होंने मेडिटेशन जैसा एक प्रोग्राम बनाया और कुछ समय के लिए ध्यान कराने की कोशिश की. लेकिन दोनों स्थितियां एक जैसी नहीं हैं."
अवसाद से बाहर आने में मददगार?
मैसाच्यूसेट्स जनरल हॉस्पिटल की न्यूरो साइंटिस्ट गाएल डेसबोर्ड्स दिमाग पर मेडिटेशन के असर को समझने के लिए ब्रेन स्कैन का सहारा लेती हैं. वे भी वोह्स के निष्कर्षों से इत्तफाक नहीं रखतीं.
"वोह्स ने जो कहा है कि वह हो सकता है, लेकिन प्रयोग के दौरान बहुत सीमित समय के लिए मेडिटेशन कराया गया. लंबे समय में इसका क्या असर होता है, यह उनका रिसर्च नहीं बताता."
ध्यान और साधना आपके काम को कैसे प्रभावित कर सकती है, इस बारे में बहुत कम रिसर्च हुए हैं. हाल में कुछ रिसर्च जरूर हुए हैं, लेकिन वे बहुत कम अवधि के मेडिटेशन प्रोग्राम पर केंद्रित हैं.
कुछ शोध से पता चला है कि मेडिटेशन अवसाद से बाहर आने में मददगार होता है.
कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के डेविड क्रेसवेल के मुताबिक दवाइयों के असर से मुक्त ध्यान-साधना कितना कारगर है, इस बारे में बहुत कम अध्ययन हुए हैं और भरोसेमंद ट्रायल के बिना ही कंपनियों ने इसे अपना लिया है.
मेडिटेशन के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को भी अभी ठीक से नहीं समझा गया है. आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी ने इसी साल मई में एक रिसर्च प्रकाशित किया है जो कहता है कि ध्यान से प्रेरणा का स्तर बढ़ता है, लेकिन यह रिसर्च शारीरिक अभ्यास से जुड़ा था, दफ्तर के काम से नहीं.
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कंपनियां करोड़ों खर्च कर रही है
जर्मनी और नीदरलैंड में हुए कुछ प्रयोगों से पता चला कि माइंडफुलनेस प्रोग्राम के बाद प्रतिभागियों में तनाव का स्तर कम हुआ, लेकिन ये रिसर्च मोटिवेशन के बारे में कुछ नहीं बताते. इस तरह मेडिटेशन के बारे में भ्रम की स्थिति बनी रहती है.
डेसबोर्ड्स कहती हैं कि कुछ ट्रेनर रोजाना की तकलीफों को अलग रखकर चेतना के नये स्तर को पाने पर जोर देते हैं, जबकि कुछ दूसरे ट्रेनर रोज-ब-रोज की चुनौतियों को सुलझाकर उनसे निपटने के कारगर तरीकों पर फोकस करते हैं. ये दोनों परस्पर विरोधी हैं.
"शोध हो रहे हैं, फंड भी मिल रहा है, लेकिन उनके परिणाम जानने और उनको लागू करने में वर्षों लग जाएंगे."
इस बीच बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां माइंडफुलनेस प्रोग्राम पर करोड़ों खर्च कर रही हैं. लिंक्डइन ने सनीवेल, सैन फ्रांसिस्को, न्यूयॉर्क और सिडनी में अपने दफ्तरों में मेडिटेशन रूम बनवाए हैं. वहां खासी बड़ी संख्या में कर्मचारी ध्यान लगाने के लिए आते हैं.
वेलनेस प्रोग्राम की सफलता को जानने के लिए कंपनी इस बात पर नज़र रखती है कि उसके कितने कर्मचारियों ने इसमें हिस्सा लिया, कितने मेडिटेशन रूम आए, कितनों ने वर्कशॉप में भाग लिया और कितनों ने माइंडफुलनेस ऐप्स का इस्तेमाल किया.
लिंक्डइन के वेलनेस प्रोग्राम के ग्लोबल हेड माइकल सूसी कहते हैं, "यह कारगर है. हमारे सहकर्मी इसके पॉजिटिव असर के बारे में अपने अनुभव हमसे शेयर करते हैं."
सर्वे, वर्कशॉप और सहकर्मियों से मिले फीडबैक के आधार पर सूसी कहते हैं कि मेडिटेशन से उनके कर्मचारी अच्छा महसूस करते हैं. उनको अच्छी नींद आती है. एकाग्रता बढ़ती है और तनाव कम होता है.
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रामबाण है या नहीं?
सूसी भी वोह्स के निष्कर्षों से इत्तफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि यह तात्कालिक तौर पर किसी टास्क को पूरा करने में भले कारगर ना हो, लेकिन कर्मचारियों को टास्क समझने और बड़े लक्ष्य को पाने में मदद मिलती है.
"हम वर्तमान स्थिति से संतुष्ट होने के लिए ध्यान-साधना को बढ़ावा नहीं देते. असल में इसका मकसद उलटा है. यदि कोई व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से असंतुष्ट है तो ध्यान लगाने से उसे इस असंतोष की वजह समझने में सहूलियत होती है और इससे निकलने का रास्ता भी मिलता है."
'अनवाइंड' के संस्थापक ज्ञान पोवार लंदन में कंपनियों के लिए मेडिटेशन प्रोग्राम कराते हैं. उनका बिजनेस विज्ञान से कम और निजी अनुभवों से ज्यादा चलता है.
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पोवार कहते हैं कि मेडिटेशन से उन्हें कंपनियों के तनावपूर्ण वक्त को हैंडल करने में मदद मिलती है. कर्मचारी भी मेडिटेशन करना चाहते हैं.
"उनको मालूम है कि नया चलन क्या है. यदि उनको उत्पादकता बढ़ानी है तो उन्हें अपने लोगों का खयाल रखना पड़ेगा. उनको पता है कि कर्मचारियों को ज्यादा घंटे काम करने पड़ते हैं और वे चाहते हैं कि उनकी मदद की जाए."
विशेषज्ञ दफ्तरों में ध्यान-साधना के असर को समझने में लगे हुए हैं, लेकिन रिसर्च से संकेत मिलते हैं कि ध्यान-साधना के बारे में लोकप्रिय धारणा के उलट यह रामबाण नहीं है.
इस बीच प्रोफेसर वोह्स एक नये रिसर्च की तैयारी कर रही हैं. वे यह पता लगाना चाहती हैं कि ध्यान लगाने से नकारात्मक भावनाओं को कम करने में कैसे मदद मिलती है.
वोह्स कहती हैं, "कई बार नकारात्मक भावनाएं भी अच्छी होती हैं."
"माता-पिता अपने बच्चों को यह समझाना चाहते हैं कि बच्चे का बुरा आचरण गलत है. नकारात्मक भावनाएं जाहिर करने से इसमें मदद मिलती है. संतुलित और शांत रहने से कई बार मकसद पूरे नहीं होते. ऐसी परिस्थितियों में ध्यान में खोये रहने से और बुरे नतीजे हो सकते हैं."
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