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जब एक ग़लत कौमा की वजह से लगी थी फांसी
- Author, क्रिस स्टोकेल वॉकर
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
ग़लत जगह पर लगाया गया कौमा क्या कर सकता है? अगर आपने किसी मैसेज या ई-मेल में कौमा सही जगह नहीं लगाया तो आपके सहयोगी गुस्सा कर सकते हैं, आपके दोस्त आप पर बिगड़ सकते हैं. लेकिन कुछ मामलों में यही कौमा ग़लती की बड़ी कीमत वसूल सकता है.
अमरीका के पोर्टलैंड की एक डेयरी कंपनी को इसी साल 50 लाख डॉलर चुकाने पड़े. कंपनी की ग़लती यह थी कि नियमों में एक कौमा छूट गया था. ओकहर्स्ट डेयरी कंपनी में काम करने वाले तीन लॉरी ड्राइवरों ने कोर्ट में दावा किया कि वर्षों से उन्हें ओवरटाइम कै पैसे नहीं मिले.
नियमों के मुताबिक कृषि उत्पादों, मीट-मछली और ख़राब होने वाली खाने-पीने की चीज़ों को डिब्बे में भरने, प्रॉसेस करने, ठंडा करने, सुखाने, बेचने, स्टोर करने, शिपमेंट के लिए पैक करने या वितरित करने वाले कर्मचारियों को ओवरटाइम के पैसे नहीं मिलेंगे.
ड्राइवरों ने कोर्ट में यह तर्क रखा कि चूंकि "शिपमेंट के लिए पैक करने" के बाद और "वितरित" करने से पहले कौमा नहीं लगा है, इसलिए वे ओवरटाइम के हकदार हैं.
कोर्ट ने ड्राइवरों के हक़ में फ़ैसला दिया, जिससे डेयरी कंपनी के 120 ड्राइवरों को फ़ायदा हुआ. ड्राइवरों के लिए केस लड़ने वाले वकील डेविड वेबर्ट ने कहा कि अगर क्लॉज में एक कौमा होता तो वे केस हार जाते.
कॉन्ट्रैक्ट में विराम चिह्नों का बहुत महत्व है. कॉन्ट्रैक्ट तैयार करने के मैन्युअल के लेखक केन एडम्स कहते हैं कि विराम चिह्न मायने रखते हैं, लेकिन सभी विराम चिह्न उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना कि कौमा. कौमा कॉन्ट्रैक्ट का अर्थ बदल देते हैं.
अर्थ बदल देते हैं कौमा
कॉन्ट्रैक्ट में अलग-अलग क्लॉज को जोड़ने के लिए कौमा लगाया जाता है. लेकिन यह पढ़ने वाले पर निर्भर है कि वह इसके क्या अर्थ निकालता है.
फुल स्टॉप या पूर्ण विराम का अर्थ निश्चित होता है. कोई भी वाक्य पूर्ण विराम पर आकर खत्म हो जाता है और उसके दो अर्थ नहीं निकाले जा सकते. लेकिन कौमा पढ़ने वाले को अनिश्चिता की स्थिति में छोड़ देता है.
अंग्रेज़ी भाषा में एक ही टेक्स्ट दो अलग-अलग व्यक्तियों को अलग अर्थ दे सकता है.
'एंड' और 'ऑर' के पहले लगने वाले ऑक्सफोर्ड कौमा को लेकर भी बहुत विवाद हुए हैं. दोनों पक्षों के तर्क दमदार हैं. लेकिन क़ानून की भाषा में अर्थ निश्चित होना चाहिए. जहां दांव पर करोड़ों लगे हों, वहां कौमा का अर्थ महत्वपूर्ण हो जाता है.
टेक्सास के वकील जेफ़ नोबेल्स कहते हैं कि चूंकि आप ऐसा कह रहे हैं, इसलिए कोर्ट भी वैसा ही मान ले, यह ज़रूरी नहीं. अमरीका की ज़्यादा अदालतें कॉन्ट्रैक्ट का मूल टेक्स्ट पढ़ती हैं और उसके वस्तुनिष्ठ अर्थ को ढूंढ़ती हैं. नोबेल्स कहते हैं, "विराम चिह्न कई बार वाक्य का अर्थ बदल देते हैं."
काम के दौरान एक मजदूर की मौत पर बीमा कवर के केस में नोबेल्स ने टेक्सास सुप्रीम कोर्ट में जिरह की थी. उन्होंने सफलतापूर्वक यह साबित किया कि नुकसान की भरपाई से जुड़े बीमा नियमों में विराम चिह्नों का प्रयोग बहुत मायने रखता है.
नोबेल्स कहते हैं कि अमरीकी अदालतें अब ज़्यादा से ज़्यादा टेक्स्ट पर निर्भर हो रही हैं. वे शपथ-पत्र दाखिल करने वाले व्यक्तियों के कोर्ट में दिए बयान के मुक़ाबले लिखित शब्दों पर अधिक ध्यान देती हैं.
महंगा कौमा
1872 में अमरीकी टैरिफ क़ानून में एक गैरज़रूरी कौमा ने सरकारी ख़जाने पर करीब 20 लाख डॉलर (आज के 4 करोड़ डॉलर के बराबर) का बोझ डाला.
1870 में बने टैरिफ एक्ट में एक छोटा-सा बदलाव किया गया था. अमरीका में उष्ण कटिबंधीय फलों की खेती बढ़ाने के लिए उनके पौधों के आयात को सीमा शुल्क से मुक्त किया गया था. लेकिन ग़लती से फल और पौधे के बीच में कौमा छूट गया. इसके बाद उष्ण कटिबंधीय फलों और पौधों का धड़ल्ले से आयात होने लगा और उन पर कोई सीमा शुल्क भी नहीं लग रहा था.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस ओर ध्यान दिलाया तो अमरीकी कांग्रेस ने क़ानून बदले. लेकिन ऐसी ग़लतियां रुक नहीं पाईं.
एडम्स कहते हैं, "कॉन्ट्रैक्ट की भाषा सॉफ़्टवेयर कोड की तरह होती है. अगर यह सही है तो सब कुछ ठीक है. लेकिन टाइपिंग की कोई ग़लती रह गई तो सारी चीजें पटरी से उतर जाती हैं."
दोहरे अर्थ छोड़ना
कुछ परिस्थितियों में कॉन्ट्रैक्ट तैयार करने वाले लोग जान-बूझकर ऐसे शब्द लिखते हैं जिनके दो मायने निकल सकें. जलवायु संरक्षण समझौतों में अक्सर ऐसा होता है.
जलवायु संरक्षण के शुरुआती समझौते में लिखा गया था- "सभी पक्षों का अधिकार है, और उनको चाहिए, कि वे स्थायी विकास को बढ़ावा दें." इस वाक्य से लगता है कि सभी देश राजी-खुशी स्थायी विकास को बढ़ावा देने में सक्षम हैं और उनको ऐसा करना चाहिए.
समझौते के मूल ड्राफ्ट में ऐसा नहीं था. वहां दूसरा कौमा बढ़ावा देने और स्थायी विकास के बीच में लगा था, जिससे यह अर्थ निकलता था कि स्थायी विकास को बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन देशों के लिए ऐसा करने की मजबूरी नहीं है.
डब्लू.डब्लू.एफ. के मुख्य सलाहकार स्टीफन कॉर्नेलियस कहते हैं, "विराम चिह्नों के छोटे से हेर-फेर से कई देशों को लगता है कि उनके हितों की रक्षा हो गई."
धंधे की चालाकियां
कूटनीति में यह सामान्य बात है कि समझौता करने वाले दो पक्ष अलग-अलग अर्थ निकालें.
जलवायु परिवर्तन वार्ताकार लॉरा हैनिंग स्कारबोरो कहती हैं, "समझौतों में 'अन्य बातों के साथ' जोड़ दिया जाता है. कौमा भी इसी तरह जोड़ दिया जाता है. यह सब लोगों को खुश करने के लिए किया जाता है."
कौमा को लेकर हुए क़ानूनी झगड़ों में एक बड़ा झगड़ा कनाडा की दो टेलीफोन कंपनियों के बीच हुआ. रोजर्स कम्युनिकेशन और बेल एलायंट 10 लाख कनाडाई डॉलर (लगभग 7 लाख 60 हज़ार अमरीकी डॉलर) के लिए कोर्ट पहुंचीं.
विवाद कौमा पर था. दोनों कंपनियों के बीच हुए समझौते में लिखा था, "यह समझौता समझौते की तारीख़ से पांच साल के लिए लागू रहेगा, फिर उसके बाद पांच साल और, जब तक कि कोई एक पक्ष एक साल का नोटिस देकर समझौता ख़त्म ना कर दे."
दोनों कंपनियां दूसरे कौमा का अलग अर्थ निकाल रही थीं. बेल का कहना था कि एक साल का नोटिस देकर समझौता कभी भी ख़त्म किया जा सकता है, जबकि रोजर्स के मुताबिक ऐसा पहले पांच साल के बाद ही किया जा सकता है.
2002 में जब दोनों कंपनियों ने समझौता किया था, तब बेल ने रोजर्स को अपने टेलीकॉम पोल 9.60 कनाडाई डॉलर के हिसाब से किराये पर दिए थे. 2004 तक उसकी लागत दोगुनी हो गई और बेल एलायंट नये सिरे से कॉन्ट्रैक्ट करना चाहती थी. रोजर्स इसके लिए तैयार नहीं थी.
अदालतें भी कौमा के अर्थ को लेकर अनिश्चित थीं. कनाडा के रेडियो-टेलीविजन एंड टेलीकम्युनिकेशन कमीशन ने 2006 में बेल एलायंट के पक्ष में फ़ैसला दिया. एक साल बाद कमीशन ने कॉन्ट्रैक्ट का फ्रेंच वर्जन देखा तो उसने अपना फ़ैसला बदल दिया.
सवाल है कि पेशेवर कॉन्ट्रैक्ट लेखकों से ग़लती क्यों हो जाती है? वे कौमा का ग़लत प्रयोग क्यों कर देते हैं? एडम्स कहते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट तैयार करने में कॉपी-पेस्ट का बड़ा प्रयोग होता है. पिछले कॉन्ट्रैक्ट के हिस्से ज्यों के त्यों उठा लिए जाते हैं. इससे नये कॉन्ट्रैक्ट में वह बातें नहीं आ पातीं, जिसका समझौता आप करना चाहते हैं.
जानलेवा कौमा
ग़लत जगह पर लगे एक कौमा ने मौत की सज़ा के एक केस में भी अहम रोल निभाया. आयरलैंड के रोजर केसमेंट को 1916 में फांसी की सज़ा दी गई. यह सज़ा 1351 के देशविरोधी क़ानून के तहत दी गई.
केसमेंट ने जर्मनी में पकड़े गए युद्ध बंदियों को ब्रिटेन के ख़िलाफ़ युद्ध करने के लिए भड़काया था.
मुक़दमे में इस बात पर लंबी बहस हुई कि केसमेंट ने 14वीं सदी के क़ानून को तोड़ा या नहीं. क़ानून की धारा में लगे एक कौमा को मिलाकर पढ़ने पर केसमेंट का काम देशद्रोह की सीमा में आता था. अगर कौमा नहीं होता तो उसने कोई अपराध ही नहीं किया था.
केसमेंट के वकीलों ने दलील दी कि जुर्म साबित करना किसी कौमा को मोहताज नहीं होना चाहिए. यदि एक कौमा की वजह से जुर्म साबित होता है तो फ़ैसला अभियुक्त के पक्ष में होना चाहिए.
कोर्ट ने इन दलीलों को नहीं माना. उसने आदेश दिया कि कौमा मायने रखता है. केसमेंट का जुर्म साबित हुआ और उसे फांसी दे दी गई.
हालांकि आजकल किसी की ज़िंदगी कौमा के प्रयोग पर पर नहीं टिकी है. लेकिन करोड़ों-अरबों रुपये, बीमा पॉलिसी और जलवायु संरक्षण समझौते इस पर ज़रूर टिके हैं.
यही कारण है कि किसी कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने से पहले यह सलाह दी जाती है कि समझौते को ध्यान से पढ़ें और तसल्ली कर लें कि हर जगह कौमा सही जगह पर लगा है.
नोबेल्स कहते हैं, "लोग कॉन्ट्रैक्ट की भाषा के बारे में तोल-मोल करके कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं करते. वे खुद से जो अर्थ निकालते हैं, उसके हिसाब से साइन कर देते हैं. लेकिन किसी कंपनी के लिए कॉन्ट्रैक्ट वकील तैयार करते हैं और उनका अलग मतलब भी हो सकता है."
इसलिए दस्तखत करने से पहले ध्यान दें. आज की सावधानी भविष्य में आपको बड़ी परेशानियों से बचा सकती है.
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