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बंदरों के बर्ताव को समझ लें तो बन सकते हैं अमीर
- Author, डेविड एडमंड्स और बेन कूपर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पैसों के मामलों में क्या हम बंदरों से कुछ सीख सकते हैं? कैसे ख़र्च करने हैं? क्या जोखिम लेने हैं? कहां निवेश करना फ़ायदेमंद हो सकता है?
क्या हमें पैसों के मामले में इन सवालों के जवाब बंदरों के बर्ताव से मिल सकता है?
आख़िर बंदर हमारे पुरखे जो ठहरे! और अपने पूर्वजों से तो काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है.
ये सवाल इसलिए उठे हैं क्योंकि अमरीका के कैरेबियाई द्वीप पोर्टो रिको में इन दिनों एक दिलचस्प प्रयोग चल रहा है.
इस रिसर्च में छह कापुचिन बंदर शामिल हैं. इन छहों बंदरों को जेम्स बॉन्ड की फ़िल्मों के किरदारों के नाम दिए गए हैं.
रिसर्च करने वालों ने इन बंदरों को कुछ टोकन की मदद से अपने लिए ख़रीदारी करना सिखाया है. इन बंदरों को टोकन के साथ एक बाज़ारनुमा इलाक़े में भेजा जाता है.
फिर शोधार्थी ये देखते हैं कि ये बंदर ख़रीदारी करने में और लेन-देन में कितने जोखिम उठाते हैं. अलग-अलग टोकन के बदले में बंदरों को अलग-अलग सामान मिलता है.
क्या बंदर समझते हैं सस्ता-महंगा क्या होता है?
ये रिसर्च अमरीका की येल यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञान की प्रोफ़ेसर लॉरी सांतोस की अगुवाई में चल रहा है.
लॉरी सांतोस बताती हैं कि रिसर्च से वो ये समझने की कोशिश कर रही हैं कि क्या बंदरों को सामान का मंहगा या सस्ता होना समझ में आता है?
क्या वो ये समझ रखते हैं कि किस टोकन के बदले में किस स्टॉल से सामान लेना उनके लिए फ़ायदेमंद होगा.
लॉरी और उनके साथी ये देखकर हैरान हो गए कि ज़रा सी ट्रेनिंग में ही बंदरों को समझ में आ गया कि कौन सा शोधार्थी उन्हें टोकन के बदले में ज़्यादा और सस्ता माल देगा.
जहां भी टोकन के बदले में बंदरों को दोगुना खाना मिलता था, बंदर उसी स्टॉल पर लेन-देन के लिए ज़्यादा जाते थे.
बंदर समझते हैं करंसी?
इन बंदरों ने ख़रीदारी के दौरान इंसान जैसे कुछ और बर्ताव भी दिखाए.
इन बंदरों ने मौक़े का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की. जब भी उन्हें यूं ही पड़ा टोकन मिला, जिससे ख़रीदारी हो सकती थी, तो बंदरों ने उसे उठाकर अपने पास रखने में देर नहीं की.
यानी बंदरों को करेंसी की अहमियत समझ में आ गई थी. जैसे हम सिक्के और नोटों की अहमियत समझते हैं. ठीक उसी तरह बंदरों को भी टोकन की अहमियत समझ में आ गई.
जोख़िम लेने को तैयार रहते हैं बंदर?
इस रिसर्च की सबसे चौंकाने वाली बात रही कि बंदर, ज़्यादा हासिल करने के लालच में जोखिम लेने को भी तैयार थे.
रिसर्च के दौरान बंदरों को कुछ विकल्प दिए गए. उन्हें दो लोगों से टोकन के बदले में खाना मिल सकता था. इनमें से एक हर बार बंदरों को टोकन के बदले दो फल देता था. वहीं दूसरा आदमी कभी एक और कभी तीन फल भी दे देता था.
यानी दूसरे आदमी से टोकन के बदले फल लेने में जोखिम था. फिर भी रिसर्चरों ने देखा कि बंदर उसी आदमी के पास ज़्यादा जा रहे थे.
वजह ये उन्हें दो के बजाय तीन फल मिलने की उम्मीद थी जबकि इसमें जोखिम भी था कि उन्हें टोकन के बदले शायद एक फल ही मिले.
फिर भी बंदर उस जोखिम के लिए तैयार थे.
इंसानों की तरह बाजी लगाना
ये ठीक उसी तरह का प्रयोग था जैसे किसी शख़्स को एक बाज़ी के बदले तयशुदा दो हज़ार रुपए मिल रहे हों.
या फिर दूसरे विकल्प के तौर पर एक हज़ार भी मिल सकते हैं और तीन हज़ार भी.
बंदरों ने निश्चित फ़ायदा यानी दो हज़ार मिलने वाला विकल्प नहीं चुना. उन्होंने जोखिम का दांव खेला जिसमें एक हज़ार भी मिल सकते थे और तीन हज़ार भी.
ठीक वैसे ही जैसे बहुत से लोग ज़्यादा हासिल करने के चक्कर में जोखिम भरा दांव चलते हैं. वही काम बंदरों ने भी किया. आख़िर वो भी तो हमारे क़ुदरती रिश्तेदार हैं.
लॉरी सांतोस कहती हैं कि असल में जो निश्चित फ़ायदा है, उसमें ज़्यादा हासिल होने का नुक़सान भी है. नुक़सान का डर हम लोगों के ज़हन में इतना हावी हो जाता है कि लोग ज़्यादा जोखिम लेने लगते हैं.
ठीक यही बर्ताव बंदरों ने भी दिखाया.
बंदरों का ये बर्ताव हमें ये समझने में मददगार हो सकता है कि किस तरह गिरते हुए शेयर बाज़ार में भी लोग ज़्यादा कमाई की उम्मीद में निवेश करते जाते हैं. जोखिम लेते जाते हैं.
लॉरी सांतोस ये भी कहती हैं कि इसी वजह से लोग निवेश से कतराते हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि हाथ में जो रक़म आती है, उसमें से पैसा चला जाएगा. उनके हाथ में ख़र्च के लिए कम पैसा बचेगा.
पूर्वजों से मिले हैं अतार्किक फ़ैसले?
इस मानसिकता से बचने के लिए अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर 'नज़ थ्योरी' लेकर आए.
इस थ्योरी में लोगों को ये कहा जाता है कि उनकी कमाई जो आज है, वही कल भी रहेगी.
यानी कमाई के शुरुआती दिनों के बजाय आगे चलकर जब आमदनी बढ़ती है, तो लोगों से निवेश के लिए कहा जाता है.
इस तरह उन्हें अपने ख़र्च के पैसे में कमी होने का डर नहीं रहता.
पैसे को लेकर इंसान अक्सर बेतुका बर्ताव करता है. इसी वजह से क़ीमतें कभी आसमान में पहुंच जाती हैं और कभी शेयर मार्केट डूबने लगता है.
हम अक्सर ऐसे ग़लत फ़ैसले लेते हैं, जिनका कोई तर्क नहीं होता.
बंदरों पर हुए रिसर्च से साफ़ है कि ये हमारे विकास की प्रक्रिया का नतीजा है. हमें भी अपने पुरखों यानी बंदरों से कई चीज़ें विरासत में मिली हैं. इनमें कई बार बेतुका बर्ताव करना भी शामिल है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)