नौकरी के शुरुआती 10 दिनों में क्या करें, क्या न करें

    • Author, एरिक बार्टन
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

जब व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशंस डायरेक्टर एंटनी स्कैरमूची को दस दिन में ही नौकरी से हाथ धोना पड़ा तो सोशल मीडिया में नौकरी बचाने के नुस्खों की बाढ़-सी आ गई. कयास लगने लगे कि इतने कम समय में भला ऐसा क्या हुआ कि एंटनी को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

उनके साथ जो भी हुआ हो, लेकिन यहां पेश हैं कुछ ज़रूरी हिदायतें जो नौकरी के शुरुआती दिनों में बेहद अहम हैं ताकि आपकी नौकरी लंबी चले.

किसी भी नई नौकरी में ख़ुद को साबित करने का भारी दबाव रहता है. हम अपने नए बॉस, नए साथियों को दिखाना चाहते हैं कि हम ही इस नौकरी के लिए सबसे योग्य हैं. लेकिन इस चक्कर में हम कई बार बेवकूफ़ियां कर जाते हैं और फिर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं.

नौकरी के शुरुआती दिनों में क्या न करें?

ख़ुद को सर्वज्ञानी न समझें: नौकरी के शुरुआती दिन होते हैं लोगों को समझने और नए काम को आंकने के. इसलिए शुरुआती बैठकों में बोलें कम, मुस्कराएं ज़्यादा. ऐसा न जताएं कि आप सब कुछ जानते हैं. आपके सीनियर लगातार आपको तौल रहे होते हैं और किसी को भी बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग पसंद नहीं आते.

इसके अलावा, नई नौकरी में हमें कंपनी के कामकाज में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों का भी अंदाज़ा नहीं होता. इसलिए शुरुआती दिनों में, कंपनी में आमूल चूल बदलाव की बड़ी-बड़ी योजनाएं पेश न करें. साथ ही, कंपनी में कामकाज की शैली की तब तक आलोचना न करें जब तक आपको भरोसा न हो जाए कि आपकी बातों को गंभीरता से लिया जाएगा.

ये सारी आलोचनाएं आपके साथियों को पसंद नहीं आने वालीं. हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर गौतम मुकुन्द कहते हैं, "बड़े धमाके कई बार आत्मघाती भी हो सकते हैं."

कंपनी में अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगाएं

'Your Best Just Got Better' किताब के लेखक जेसन वॉमिक की सलाह के मुताबिक, 'बेहतर होगा कि नौकरी के शुरुआती दस दिनों में यह समझने की कोशिश करें कि कंपनी में प्रभावशाली लोग कौन हैं और आपकी ख़ुद की हैसियत क्या है. " इसके बाद ही अपने पत्ते खोलना शुरू करें.

बड़े-बड़े दावे न करें: हार्वर्ड बिजनेस स्कूल में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर गौतम मुकुन्द कहते हैं, "ज़्यादातर लोगों की आदत होती है नई नौकरी में बड़े-बड़े दावे करने की. ये दावे बाद में पूरे नहीं हो पाते और फिर जवाब देना भारी पड़ जाता है."

सैन फ़्रांसिस्को की मार्केटिंग सॉफ़्टवेयर कंपनी ऑटोपायलट के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल शार्के का मानना है कि शुरुआती दिनों में बड़े दावे करने से खुद को रोकना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन खुद पर नियंत्रण रखें. कुछ दिनों के लिए बड़े-बड़े लक्ष्यों की बात न करें.

पहले आसान लक्ष्य बनाएं, उन्हें हासिल करें और सबकी निगाह में अपने लिए जगह बनाएं. इस दौरान ज़िम्मेदारी से काम करते हुए अपना ध्यान सही संबंध विकसित करने पर लगाएं.

नई नौकरी में शुरू में क्या करना चाहिए?

संबंध बनाएं : कंपनी में ऐसे वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क बढ़ाएं जो आपको सही सलाह दे सकें और आपकी मदद कर सकें. उनसे सवाल ज़रूर पूछें, घबराएं नहीं. लेकिन, जैसा कि वोमिक कहते हैं, 'सवाल ऐसे न हों कि लगे कि आप सब कुछ जानते हैं. कोई भी नए आए कर्मचारी से यह नहीं सुनना चाहता कि काम करने का सही तरीका क्या है.'

प्रोफ़ेसर मुकुन्द का सुझाव है, "सवाल ऐसे होने चाहिए कि लगे आप उनकी गाइडेंस चाहते हैं." प्रोफ़ेसर मुकुन्द अपने छात्रों से कहते हैं, "औरों से सलाह मांगने वाले सवाल प्रभावशाली मैनेजरों और सहयोगियों से संबंध विकसित करने का सबसे अच्छा तरीका है."

खुद प्रोफ़ेसर मुकुन्द को भी यह सीख अपने अनुभव से मिली. 2002 में जब उन्होंने मैकिन्सी एंड कंपनी में बतौर बिज़नेस एनालिस्ट अपनी पहली नौकरी शुरू की तो युवा प्रोफ़ेसर मुकुन्द के ज़हन में नित नए विचार उपजते रहते थे. वह हर बैठक में उन विचारों को सबके साथ साझा करने से भी नहीं चूकते. लेकिन पहले ही रिव्यू में उनके मैनेजर ने उन्हें चेताया, "तुम सबसे जूनियर हो लेकिन बैठकों में बोलते सबसे ज़्यादा हो."

ऐसा नहीं कि कंपनी को उनके इनपुट की कद्र नहीं थी, बस अभी उनकी वह हैसियत नहीं थी कि बैठकों में वह सबसे ज़्यादा बोलें.

वरिष्ठ अधिकारी और प्रबन्धक लगातार आपका मूल्यांकन करते रहते हैं, इसलिए यह समझना बेहद ज़रूरी है कि कब बोलना और सवाल पूछना बंद कर दें और सुनने पर ध्यान दें.

आसान लक्ष्य बनाएं और उन्हें हासिल करें: कंपनी के काम-काज को ठीक से जानना, कंपनी के प्रबन्धकों, अधिकारियों से जान-पहचान और कंपनी में अपनी भूमिका को समझना, शुरुआती दसेक दिनों के लिए ऐसे ही लक्ष्य पर्याप्त हैं. इन्हें न केवल हासिल करना आसान है, बल्कि इनसे यह भी साबित होगा कि आप कंपनी के मामलों में रुचि ले रहे हैं.

नौकरी की शुरुआत में, सबसे ज़रूरी है यह समझना कि कंपनी को आपसे क्या अपेक्षाएं हैं और वास्तव में आपकी भूमिका क्या है. इस मंत्र को हमेशा याद रखें कि बड़बोलापन आपकी नैया डुबा भी सकता है. इन सुझावों को ज़रूर आज़माएं ताकि आपका हाल भी एंटनी स्कैरमूची जैसा न हो.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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