अनजाने मुल्क में ऐसे बनाएं दोस्त

बहुत सी वजहों से हमें अपना मुल्क़ छोड़ कर दूसरे देशों को जाना पड़ता है. जगह नई, लोग नए, संस्कृति नई, खान-पान भी बिल्कुल अलग, सब कुछ एक दम से बदल जाता है.

ऐसे में रहने की जगह तलाशना किसी मुहिम से कम नहीं होता. आप विदेशी होते हैं तो लोग आसानी से आपसे घुलते-मिलते भी नहीं हैं. ऐसे में जब तक लोगों के साथ जान पहचान नहीं बन जाती तब तक तो अकेलेपन के सहारे ही रहना पड़ता है.

चलिए आपको ऐसे ही कुछ लोगों के तजुर्बों से रूबरू कराते हैं जिन्होंने विदेशों में जाकर अपनी जगह बनाई. वहां के लोगों के साथ दोस्ती की है और फिर वहीं के बाशिंदे हो बन गए.

ब्रिटेन के रहने वाले मार्क रिचर्ड एडम्स 1991 में एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में नॉर्वे गए. रिचर्ड इससे पहले भी कई और देशों में जाकर काम कर चुके थे. उन्हीं देशों की तरह नॉर्वे भी उनके लिए एक नया देश था.

और दूसरे देशों की तरह नॉर्वे में भी उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन नॉर्वे में उन्हों ने जिम ज्वाइन कर लिया. यहां स्कीइंग भी शुरू कर दी. कहने का मतलब ये कि उन्होंने बहुत से शौक़ पूरे करने शुरू कर दिए. इन सब का एक ही मक़सद था नए लोगों से मिलना, उनसे दोस्ती करना.

आज रिचर्ड को नॉर्वे में रहते हुए 26 साल हो गए हैं. उन्हेंने अपनी परिवार भी यहीं पर बसा लिया है. लेकिन रिचर्ड ने नार्वे के लोगों के दरमियान अपनी जगह बनाने के लिए बहुत मेहनत की. उन्होंने यहां की ज़बान सीखी. यहां के सियासी समीकरण समझे और यहां की तहज़ीब को अपनी तहज़ीब बनाया तब जाकर यहां के लोगों ने उन्हें अपने बीच जगह दी.

जियानी ल्यू अपने तजुर्बे से कहती हैं कि अगर आप विदेश में रहकर दोस्त बनाना चाहते हैं, तो, एक ही जगह पर बार-बार जाइए. जैसे आप जिस रेस्टोरेंट में जाते हैं या जिस सुपर मार्केट में जाते हैं वहां तब तक जाइए जब तक कि वहां के लोग आप से पूरी तरह से वाक़िफ़ ना हो जाएं और आपसे दोस्ताना ताल्लुक़ ना बना लें.

मुमकिन है यहां बहुत से लोग लगातार आते-जाते ही होंगे. ऐसे में आपकी उनसे दोस्ती हो जाएगी. बार-बार आने से इन जगहों के कर्मचारी भी आप को पहचानने लगेंगे. जियानी ल्यू कहती हैं कि अगर ज़बान एक जैसे हो तो बहुत सी मुश्किलें खुद-ब-ख़ुद ही आसान हो जाती हैं.

लेकिन अगर भाषा अलग है तो फिर आपको अपने सलूक से वहां के लोगों का दिल जीतना होगा. मसलन जिस किसी से भी आपकी नज़र मिले उसे मुस्कुराकर देखिए. अगर कोई बात करता है तो ध्यान से उसकी बात सुनिए. आपके आस पास जो लोग हैं उन्हें समझने कि कोशिश कीजिए.

हरेक देश की जीवनशैली एक जैसी नहीं है. विकसित देशों में जीवन विकासशील देशों की तुलना में बहुत अलग है. अमरीका या ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में अगर रहना पड़े तो बहुत मुश्किलें सामने आती हैं. यहां लोगों के पास समय ही नहीं होता. ऐसे में सोशल मीडिया आपकी मदद कर सकता है.

सोशल नेटवर्किंग साइट 'मीट-अप' के ज़रिए आपकी मुश्किल हल हो सकती है. ये ऐसी साइट है जहां आप ब्रिटेन में रहने वालों से संपर्क कर सकते हैं. हैरानी की बात तो ये है कि ख़ुद लंदन के लोग भी अपना सामाजिक दायरा बढ़ाने के लिए इस ऐप का ख़ूब इस्तेमाल करते हैं. लेकिन जापान जैसे देशों में ये ऐप बहुत काम का नहीं.

समान भाषा तो एक दूसरे को नज़दीक लाने में अहम रोल निभाती ही है. अगर आपका अक़ीदा और क़ौम समान हो तो वो भी लोगों के साथ घुलने मिलने में मदद करता है. लंदन के रहने वाले नईम अमारी ने विदेश में क़रीब पांच साल गुज़ारे. उनके मुताबिक़ आप जिस भी देश में जाएं वहां की संस्कृति और लोगों की इज़्ज़त करें, वहां की भाषा सीखने की कोशिश करें, वहां के लोगों के साथ ताल-मेल बनाने की कोशिश करें. ऐसा करने पर वहां के लोग भी आपको अपने साथ स्वीकार कर लेंगे.

लेकिन ऐसा करना हरेक के लिए आसान नहीं होता. एमिलिया बर्गोगलियो जापान में रहती हैं. उनका कहना है वो इस देश में कोई दोस्त नहीं बना पाई हैं. उनके मुताबिक़ आपके साथी कर्मचारी आपके दोस्त नहीं हो सकते. यहां के स्थानीय लोग और विदेशी अपने अपने खेमों में रहते हैं.

इसी तरह ब्रिटेन के डेविड डफ़ी ने भी पोलैंड में दस साल गुज़ार दिए लेकिन आज भी उन्हें वहां अकेलेपन का एहसास होता है. उनके मुताबिक़ विदेश में इस अकेलेपन से लड़ने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए.

जिन लोगों को घर के आराम और परिवार के बीच रहने की आदत होती है उनके लिए तो इस अकेलेपन को झेलना और भी मुश्किल होता है. लेकिन कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं होती कि इंसान उससे पार ना पा सके. किसी और के देश में जाकर अगर आपको अपनी जगह बनानी है तो समझौता भी आपको ही करना पड़ेगा. आपको ही उनके रंग में रंगना होगा.

पुरानी कहावत है, जैसा देश, वैसा भेष...

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