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बॉस से नज़दीकी के फ़ायदे कम मुश्किलें ज्यादा!
अपने बॉस के साथ अच्छे रिश्ते न होना आपके लिए कई तरह की दिक़्क़तें पैदा कर सकता है. लेकिन आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि बॉस के साथ नज़दीकी भी आपको कई तरह की मुश्किलों में डाल सकती है. अमरीका की सैन डिएगो यूनिवर्सिटी के जेरेमी बर्नर्थ कहते हैं कि बॉस से क़रीबी ताल्लुक़ आपके ऊपर कई तरह के दबाव डालता है. ख़ास तौर से अगर आप पहले दोस्त रहे हों और फिर आपका दोस्त आपका बॉस बन जाए. इससे तनाव बढ़ता है. लोग अक्सर दफ़्तर से ग़ायब रहने लगते हैं. और उनके काम पर बुरा असर पड़ता है.
बॉस से नज़दीकी थोड़े वक़्त के लिए तो बहुत अच्छी होती है. लेकिन लंबे वक़्त तक अगर आप बॉस के क़रीबी रहते हैं तो इससे थकान और निराशा होने लगती है. ऐसा तब और होता है जब बॉस से नज़दीकी की वजह से आप अपनी ज़रूरतों और अपने सिद्धांतों से समझौते करने लगते हैं. क्योंकि आपके बॉस को लगता है कि बुरा हो या अच्छा हर फ़ैसले में आपको उसके साथ होना चाहिए.
ऐसा सभी नज़दीकी रिश्तों में होता है. फिर चाहे घर का हो या दफ़्तर का न्यूयॉर्क के मनोवैज्ञानिक विंसेंट पासारेली कहते हैं कि घरेलू ताल्लुक़ और दफ़्तर के संबंधों में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं होता. विसेंट कहते हैं कि हम अक्सर दफ़्तर में भी ऐसे साथी तलाशते हैं जिनके साथ घर जैसा माहौल महसूस हो. अपनी ज़िंदगी के तमाम तजुर्बों की बिनाह पर ही हम दफ़्तर में साथी बनाते हैं.
दफ़्तर में बॉस से नज़दीकी के कई फ़ायदे होते हैं. मगर इससे रिश्ते का दबाव आपके ऊपर बढ़ भी जाता है. कहने को तो दूर रहने वालों से आपके रिश्ते तनाव भरे होते हैं. मगर नज़दीकी ताल्लुक़ भी कई बार आपको तनाव देते हैं. जब हम किसी के क़रीब होते हैं तो हम चीज़ों को नए नज़रिए से देखते हैं. मतभेदों को हम इनकार समझने लगते हैं. किसी के बर्ताव से निराशा को हम धोखा समझने लगते हैं.
अगर आप ऐसी कंपनी में काम करते हैं जहां निजी और कारोबारी रिश्ते साथ-साथ चलते हैं, तो दोस्त से मुलाज़िम बनना बेहद मुश्किल होता है. इससे तनाव और बढ़ जाता है. ऐसे में अगर आपका बॉस आपका दोस्त है और वो आपको डांटता है तो आपको लगता है कि बॉस नहीं, आपका दोस्त आपको जलील कर रहा है.
और जैसा कि मियां-बीवा या फिर दो क़रीबी दोस्तों के बीच होता है, रिश्तों में गर्माहट या ठंडापन आपको अलग-थलग होने का एहसास देता है. जिससे आप रोज़ मिलते थे, बिंदास बातें करते थे. अचानक ही वो आपको बहुत दूर खड़ा मालूम होता है. अचानक ही आपको लगता है कि आप उससे मिल ही नहीं सकते. फिर से अच्छा वक़्त साथ नहीं गुज़ार सकते. आपको लगता है कि दोस्त ने आपके साथ दगा किया है. आपका साथ छोड़ दिया है.
किसी बॉस से दोस्ती होना आसान होता है. मगर किसी दोस्त का बॉस बनना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. वजह ये कि आपका दोस्त, बॉस के तौर पर आपसे उम्मीदें पाल लेता है. उसे लगता है कि आपको हर इशारा समझना चाहिए. उसकी हर बात पर हामी भरनी चाहिए.
ऐसे में बेहतर ये होता है कि बॉस से दोस्ती का रिश्ता खत्म कर देना चाहिए. आपको उसे सिर्फ़ बॉस के तौर पर देखना चाहिए. आपको अपनी हदें खुद तय करनी होती हैं. आपको पता होना चाहिए कि आपका जो दोस्त है वो बॉस के तौर पर जब ज़्यादा डिमांड करे तो उसे मना करना चाहिए. ये ठीक उसी तरह है जब आप आत्ममुग्ध बॉस से निपटते हैं. जिसे अपने सिवा कुछ भी नहीं सूझता.
उसके दिल में आपका खयाल नहीं होता. ऐसे शख़्स पर भरोसा करना है या नहीं, ये उसके बर्ताव पर ही निर्भर करता है. कहने का मतलब ये कि बॉस अगर दोस्त है, तो दोस्ती भी औपचारिकता और दफ़्तर के उसूलों के दायरे में ही निभानी चाहिए. और अगर ऐसी दोस्ती बोझ बनने लगे तो उसे उतार फेंकना चाहिए.
(अंग्रेज़ी में इस मूल लेख को पढ़ने में के लिए यहां क्लिक करें, जो कि बीबीसी कैपिटल में है.)
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